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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 401, कुल 508 में से

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पृष्ठ 401

देखते उन पर्वतो को तोड डाला । उसके बाद तीनो वानर-नेताओ ने गज, तुरग तथा रथो पर
लगातार पर्वतो तथा वृक्षो की वर्षा की, तो उपाक्ष ने अद्वितीय ढग से उन्हें वीच ही में
काट डाला । उसके पश्चात् द्विविद तथा मैन्द आश्चर्यजनक रीति से वृक्षो को उखाडकर
राक्षसो पर फेंकने लगे तो शोणिताक्ष ने अपनी गदा से उन्हें बीच में ही चूर-चूर कर दिया।
तब प्रजघ ने अपनी तेज तलवार को चमकाते हुए वानरो से भिड गया, तो मैन्द ने एक
काले साल-वृक्ष से उस पर प्रहार किया । इससे सतुष्ट न होकर मैन्द ने अपनी मुष्टि से
उस राक्षस के वक्ष पर प्रहार किया, तो खड्ग को नीचे फेंककर उस राक्षस ने क्रोध से
अपनी वज्र-सम मुष्टि से मैन्द पर प्रहार किया । इस प्रहार से मैन्द मूच्छित हो गया, किन्तु
शीघ्र ही सँभलकर अपनी प्रबल मुष्टि से प्रजघ पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस
पृथ्वी पर गिर पडा । अपने चाचा को इस प्रकार गिरते देखकर उपाक्ष रथ से उतर पडा
और तलवार लेकर युद्ध करने के लिए निकला । तब द्विविद ने अत्यत क्रोध से उस पर
आक्रमण किया, अपनी प्रबल मुष्टि से उस पर प्रहार करके अपने समस्त बल से उसे
पकड लिया । तुरत उपाक्ष का अनुज शोणिताक्ष वहाँ पहुँच गया और द्विविद के वक्ष स्थल
पर मुष्टि का प्रबल प्रहार करके उसे मूच्छित कर दिया और अपने भाई को छुडाकर ले
गया । द्विविद शीघ्र ही सचेत हो उठा और मैन्द को साथ लेकर उपाक्ष तथा शोणिताक्ष
पर आक्रमण करके युद्ध करने लगा । युद्ध करते समय द्विविद ने आश्चर्यजनक ढग से
शोणिताक्ष को पकडकर उसे अपने पैरो से ऐसा रौद दिया कि उसका रूप पहचानना भी कठिन
हो गया । तभी मैन्द ने अपनी भीषण मुष्टियो के प्रहार से उपाक्ष को, उसके शरीर तथा हड्डियो
को चूर-चर करके, मार डाला ।
इस प्रकार, चारो राक्षस-नेताओ को मरे देखकर राक्षस-सेना प्राण लेकर भागने
लगी । यह देखकर कुभ अत्यत क्रुद्ध हुआ और भागनेवालो को आश्वासन देकर सुरधनु-
सदृश प्रकाशित होनेवाले अपने धनुष तथा चमकनेवाले बाण धारण करके एक पैर आगे
करके धनुष चलाने की मुद्रा में खडे होकर क्रूर गति से वानरो पर बाण चलाने लगा ।
उसके बाणो के प्रहार से द्विविद एक पहाड की भाँति पृथ्वी पर भयकर गति से गिर पडा ।
अपने सामने अपने प्रिय अनुज की यह दशा देखकर मैन्द ने अत्यत वेग से एक पर्वत कुभ
पर फेंका, तो उसने सात बाणो से उस पर्वत को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया । फिर, उसने मैन्द
पर एक ऐसा अस्त्र चलाया कि वह वीर पृथ्वी पर लुढक गया । अपने दोनो मातुलो को
इस प्रकार धराशायी होते देख, अगद ने एक विशाल पर्वत को उठाकर कुभ पर फेंका ।
किन्तु, उसने पाँच बाणो से उस पर्वत को तोड दिया और फिर लगातार अगद पर असख्य
शर चलाये । क्रोध से जलते हुए अगद ने भयकर गति से कुभ पर कई विशाल पर्वत
फेंके, किन्तु कुभ ने उन सब पर्वतो को सहज ही काट डाला । उसके पश्चात् उसने दो
पैने शर अगद के ललाट के मध्य भाग को लक्ष्य करके चलाये । उन शरो के प्रहार के
कारण फूटनेवाली रक्त-धाराओ को पोछते हुए अगद ने एक पेड को उखाडकर उसने
कुभ पर प्रहार किया, किन्तु उस राक्षस ने उस पेड को भी तोडकर अगद को बहुत भीषण
बाणो से पीडित किया । इससे अगद मूच्छित होकर पृथ्वी पर गिर पडा। उनके गिरते ही