रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
४०० रामायणमीमांसा त्रयोदश
पाषाणभूता राजेन्द्र तस्य रामस्य दर्शनात् ।
अहल्या मुक्तशापा च जगाम गौतमं प्रति ॥९७॥” (नृ० पु० अध्याय ४७)
नृसिंहपुराण के अनुसार अहल्या पाषाणप्रतिमा हो गयी थी । राम के दर्शन से वह शापमुक्त हुई—
“जगाम शक्रः स्नानार्थं स्वर्णदीं सुमनोहराम् ।
ददर्श तत्र रुचिरां मार्जन्तीं च नितम्बिनीम् ॥१९॥
सस्मितां सकटाक्षां तामहल्यां गौतमप्रियाम् ।
दृष्ट्वा च विपुलश्रोणीं स्तनयुग्मं मनोहरम् ॥२०॥
मूर्ति विधाय तद्भर्तुः तत्समीपं जगाम ह ।
गत्वा तु स्निग्धवस्त्रां तां समाकृष्य स्मरातुरः ॥२२॥
एतस्मिन्नन्तरे तप्त्वा समागत्य मुनीश्वरः ।
ददर्श गेहे मिथुनं मैथुने च रतिप्रिये ॥२५॥
विज्ञानेनातिरोषेण बभञ्ज सुरतिक्षणम् ॥२६॥
वेदं विज्ञाय नीच त्वं योनिलुब्धोऽसि कर्मणा ॥३०॥
योनीनां च सहस्रं च तव गात्रे भवत्विह ।
पूर्णं वर्षं च सततं योनिगन्धमवाप्नुहि ॥३१॥
पादानतामहल्यां तामुवाच मुनिपुङ्गवः ॥३६॥
वनं गत्वा चिरं तिष्ठ विधाय मूर्तिमश्मनः ॥३७॥
श्रीरामचरणस्पर्शात् सद्यःशुद्धा बभूव ह ॥४३॥”
( ब्र० वै० पु० कृष्णजन्मखण्ड अध्याय ४७ )
इन वचनों में इन्द्र को सहस्रभग तथा योनिगन्ध होने का शाप दिया है और सूर्य की आराधना से इन्द्र को
सहस्राक्ष होने का शापानुग्रह किया गया है और अहल्या को पाषाण शिला बनकर रहने एवं रामपादस्पर्श से उद्धार
की बात कही गयी है ।
“कस्यचित्त्वथ कालस्य गौतमस्य मुनेः प्रिया ॥ ७ ॥
अहल्या नाम भार्याभूद् रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
तां दृष्ट्वा चकमे शक्रः कामदेववशं गतः ॥ ८ ॥
नित्यमेव समागत्य स्वर्गलोकात् स कामभाक् ।
गौतमे निर्गते राजन् समिदिध्मार्थमेव हि ॥
दर्भार्थं फलमूलार्थं स्वयमेव महात्मभिः ॥ ९ ॥
अथ तस्य समाचख्यो नारदो मुनिसत्तमः ।
शक्रस्य चेष्टितं सर्वं तथाहल्यासमुद्भवम् ॥१०॥
तच्छ्रुत्वा सहसा तूर्णं गौतमो गृहमभ्यगात् ।
यावत्पश्यति देवेशं सह पत्न्या समागतम् ॥११॥
शक्रोऽपि गौतमं दृष्ट्वा पलायनपरायणः ।
निर्जगामाश्रमात्तस्मात् विवस्त्रोऽपि भयाकुलः ॥१२॥
अहल्या च भयत्रस्ता दृष्ट्वा भर्तारमागतम् ।
अधोमुखी स्थिता राजन् तदा व्याकुलितेन्द्रिया ॥१३॥
अध्याय बालकाण्ड ४०१
गौतमोऽपि च तद् दृष्ट्वा सम्यग्भार्याविचेष्टितम् ।
ददौ शापं महाराज कोपसंरक्तलोचनः ॥१४॥
यस्माच्छक्र पापकर्म कृतमीदृग् विगर्हितम् ।
भार्या मे दूषिता साध्वी तस्मादवृषणो भव ॥१५॥
सहस्रं च भगानां ते वक्त्रे भवतु मा चिरम् ।
येन त्वं विप्लवं यासि त्रैलोक्ये सचराचरे ॥१६॥
अपरं मर्त्यलोकेऽत्र यद्यागच्छसि वासव ।
पूजाकृते ततो मूर्धा शतधा ते भविष्यति ॥१७॥
एवं शप्त्वा च तं शक्रं ततोऽहल्यामुवाच सः ।
कोपसंरक्तनेत्रस्तु भर्त्सयित्वा मुहुर्मुहुः ॥१८॥
यस्मात्पापे त्वया कर्म कृतमेतद् विगर्हितम् ।
तस्माच्छिलामयी भूत्वा त्वं तिष्ठ वसुधातले ॥”१९॥
( स्कन्दपु० नागरखण्ड अध्याय २०७ )
अर्थ—उपर्युक्त वचनों में कहा गया है कि अहल्या के सौन्दर्य से मोहित होकर काम के वशीभूत हो इन्द्र
सदा अहल्या के पास आया करते थे । नारदजी ने गौतम से इन्द्र-अहल्या का सब वृत्तान्त बताया । यह सुनकर गौतम
तुरन्त घर गये । इन्द्र भयभीत होकर विवस्त्र ही भागे । अहल्या भी भयभीत हो गयी । गौतम ने इन्द्र को सहस्र भग
होने का शाप दिया और यह भी कहा कि मर्त्यलोक में आते ही तुम्हारा मूर्धा शतधा विदीर्ण हो जायेगा । अहल्या को
शिला होने का शाप दिया ।
“पुराभूद् गौतमो नाम त्रिकालज्ञो महामुनिः ।
अहल्येति च तस्यासीद् भार्या रूपजिताप्सराः ॥१३७॥
एकदा रूपलुब्धस्तामिन्द्रः प्रार्थितवान् रहः ।
प्रभूणां हि विभूत्यन्धा धावत्यविषये मतिः ॥१३८॥
सानुमेने च तं मूढा वृषस्यन्ती शचीपतिम् ।
तच्च प्रभावतो बुद्ध्वा तत्रागाद् गौतमो मुनिः ॥१३९॥
मार्जाररूपं चक्रे च भयादिन्द्रोऽपि तत्क्षणम् ।
कः स्थितोऽत्रेति सोऽपृच्छदहल्यामथ गौतमः ॥१४०॥
एसो ठिओ खु मज्जारो इत्यपभ्रष्टवक्त्रया ।
गिरा सत्यानुरोधिन्या सा तं प्रत्यब्रवीत् पतिम् ॥१४१॥
सत्यं त्वज्जार इत्युक्त्वा विहसन् स ततो मुनिः ।
सत्यानुरोधकृत्सान्तं शापं तस्यामपातयत् ॥१४२॥
पापशीले शिलाभावं भूरिकालमवाप्नुहि ।
आ वनान्तरसंचारिराघवालोकनादिति ॥१४३॥
वराङ्ग्लुब्धस्याङ्गे ते तत्सहस्रं भविष्यति ।
दिव्यस्त्रीं विश्वकर्मा यां निर्मास्यति तिलोत्तमाम् ॥१४४॥
५१
४०२ रामायणमीमांसा त्रयोदश
तां विलोक्य तदेवाक्ष्णां सहस्रं भविता च ते।
इतीन्द्रमपि तत्कालं शपति स्म स गौतमः ॥’’१४५॥
(कथासरित्सागर-३।३)
अर्थ-उपर्युक्त वचनों में भी इन्द्र और अहल्या दोनों सदोष हैं। मार्जाररूप में इन्द्र को सत्यानुरोधिनी
प्राकृत भाषा में अहल्या ने मार्जार-बोधन की दृष्टि से मज्जार कहा। जिसका वास्तविक अर्थ मज्जार मेरा जार ही
था। गौतम ने उपहास करते हुए कहा सत्य ही यह त्वज्जार तुम्हारा जार (उपपति) ही है। उन्होंने उसे शाप
दिया पापशीले तुम बहुत काल तक शिलाभाव को प्राप्त होओ और तबतक शिला बनी रहो जबतक वनान्तर संचारी
राघव का दर्शन नहीं होता। इन्द्र के लिए पुनः कहा वराङ्गलुब्ध इन्द्र, तुम्हारे शरीर में सहस्र भग तबतक रहेंगे
जबतक विश्वकर्मा द्वारा निर्मित दिव्यस्त्री तिलोत्तमा नहीं प्राप्त होती। उसको देखते ही वे सहस्र भग सहस्र नेत्रों के
रूप में परिणत हो जायेंगे।
“दत्वाऽस्य वृषणौ भूमौ नाशयित्वा भगानिमान् ।
मर्त्यलोके गतिश्चास्य यथा स्यात्तत्समाचर ॥४६॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां स मुनिर्दैवगौरवात् ।
वृषणौ मेषसम्भूतौ योजयामास तौ तदा ॥४७॥
तान् भगान् पाणिना स्पृष्ट्वा चक्रे नेत्राणि सन्मुनिः ।
ततः प्रोवाच तान् देवान् गौतमश्च महातपाः ॥४८॥
सहस्राक्षो मया शक्रो निर्मितोऽयं सुरोत्तमाः ।
समेषवृषणश्चापि स्वं च राज्यं करिष्यति ॥४९॥
शोभास्य नेत्रजा वक्त्रे सुरम्या सम्भविष्यति ।
पुंस्त्वं च मेषजोत्थाभ्यां वृषणाभ्यां भविष्यति ॥”५०॥
(स्कन्दपु० नागरखण्ड अ० २०७)
उक्त वचनों के अनुसार गौतम से अनुग्रह करके इन्द्र को वृषण प्रदान करने और भगों को मिटाने तथा
मर्त्यलोक आ सकने की देवताओं ने प्रार्थना की। देवताओं के गौरव से मुनि ने मेषवृषण लगाकर, अपने हाथ से भगों
का स्पर्श करके उन्हें नेत्र बना दिया और मर्त्यलोक-गति की भी अनुमति दे दी।
“ततो मार्गे मया दृष्टा गौतमस्याश्रमे शुभे ।
अहल्या सा शिलारूपा प्रमाणेन महत्तमा ॥२४॥
ततः प्रोक्तौ मया रामः स्पृशेमां वत्स पाणिना ।
मानुषत्वं लभेद्येन गौतमस्य प्रिया मुनेः ॥२५॥
अविकल्पं ततो रामो मम वाक्येन तां शिलाम् ।
पस्पर्श पार्थिवश्रेष्ठ कौतूहलसमन्वितः ॥२६॥
अथ रामेण संस्पृष्टा सहसैवाङ्गना मुनेः ।
शुशुभे मानुषी जाता दिव्यरूपवपुर्धरा ॥”२७॥
(स्कन्दपु० नागरखण्ड अ० २०८)
इन वचनों के अनुसार शिलारूप में पड़ी अहल्या का परिचय देकर मुनि ने उसे हाथ से स्पर्श करने के
लिए राम को प्रेरित किया। राम के स्पर्श करते ही वह दिव्यदेहधारिणी दिव्य स्त्री हो गयी।
अध्याय बालकाण्ड ४०३
“गौतमो ब्राह्मणस्त्वासीत्साक्षाद् ब्रह्मोव चापरः ।
सत्यधर्मसमायुक्तो वानप्रस्थाश्रमे रतः ॥२॥
तस्य पत्नी महाभागा अहल्या नाम विश्रुता ।
रूपयौवनसम्पन्ना त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥३॥
अस्या अप्यतिरूपेण देवराजः शतक्रतुः ।
मोहितो लोभयामास ह्यहल्यां बलसूदनः ॥४॥
मां भजस्व वरारोहे देवराजमनिन्दिते ।
क्रीडयस्व मया सार्धं त्रिषु लोकेषु पूजिता ॥५॥
किं करिष्यसि विप्रेण शौचाचारकृशेन तु ।
तपःस्वाध्यायशीलेन क्लिश्यन्तीव सुलोचने ॥६॥
एवमुक्ता वरारोहा स्त्रीस्वभावात् सुलोचना ।
मनसाध्याय शक्रं सा कामेन कलुषीकृता ॥७॥
तस्या विदित्वा तं भावं स देवः पाकशासनः ।
गौतमं वञ्चयामास दुष्टभावेन भावितः ॥८॥
विदित्वा चान्तरं तस्या गृहीत्वा वेषमुत्तमम् ।
अहल्यां रमयामास विश्वस्तां मन्दिरान्तिके ॥९॥
क्षणमात्रान्तरे तत्र देवराजस्य भारत ।
आजगाम मुनिश्रेष्ठो मन्दिरं त्वरयान्वितः ॥१०॥
आगतं गौतमं दृष्ट्वा भीतभीतः पुरन्दरः ।
निर्गतः स ततो दृष्ट्वा शक्रोऽयमिति चिन्तयन् ॥११॥
ततः शशाप देवेन्द्रं गौतमः क्रोधमूर्च्छितः ।
अजितेन्द्रियोऽसि यस्मात्त्वं तस्माद् बहुभगो भव ॥१२॥
एवमुक्तस्तु देवेन्द्रः तत्क्षणादेव भारत ।
भगानां तु सहस्रेण तत्क्षणादेव वेष्टितः ॥१३॥
त्यक्त्वा राज्यं सुरैः सार्धं गतश्रीको जगाम ह।
तपश्चचार विपुलं गौतमेन महीतले ॥१४॥
अहल्यापि ततः शप्ता यस्मात्त्वं दुष्टचारिणी ।
प्रेक्ष्य मां रमसे शक्रं तस्मादश्ममयी भव ॥१५॥
गते वर्षसहस्रान्ते रामं दृष्ट्वा यशस्विनम् ।
तीर्थयात्राप्रसङ्गेन धौतपापा भविष्यसि ॥१६॥”
( स्कन्दपु० रेवाखण्ड अ० १३६ )
उपर्युक्त वचनों से विदित होता है कि इन्द्र और अहल्या दोनों ही सदोष थे । देवराज के अनेक चाटुमय
वचनों से मोहित हुई उसकी बुद्धि स्त्रीस्वभाववशात् चञ्चल हो गयी । तब इन्द्र ने उत्तम वेष ग्रहण करके उसे रमण
कराया । गौतम ने क्रोधमूर्च्छित होकर इन्द्र को बहुभग होने का शाप दिया तथा अहल्या को पाषाणमयी होने का शाप
दिया । सहस्र वर्षों के अन्त में राम के दर्शन से शापमुक्त होने का अनुग्रह भी किया ।
४०४ रामायणमीमांसा त्रयोदश
परशुराम
जैसे "काशी में राम ने गङ्गास्नान किया" और "काशी दशाश्वमेध घाट पर राम ने गङ्गास्नान किया"
इन वचनों का आपस में कोई विरोध नहीं है, क्योंकि प्रथम वाक्य सामान्य है, द्वितीय विशेष है। गङ्गा में किसी
विशेष घाट पर ही स्नान बन सकता है, अतः उसकी दशाश्वमेध घाट के साथ एकवाक्यता बन जाती है। इसी प्रकार-
असति विरोधे-सभी विशेषों का सामान्य के साथ समन्वय हो जाता है। इस नीति से राम, सीता, लक्ष्मण और परशुराम
सभी के चरित्रों में समन्वय कर लेना उचित है। महावीरचरित, अनर्घराघव, बालरामायण, महानाटक, प्रसन्नराघव,
रामचरितमानस, रामचन्द्रिका आदि में परशुराम के तेजोभङ्ग का मिथिला में वर्णन किया गया है। इनमें परशुराम के
वाग्युद्ध का विस्तृत वर्णन है। परशुराम का क्रोध उग्र होता है। वे वध करने की धमकी देते हैं। राजशेखर के
बालरामायण के अनुसार दशरथ तथा परशुराम सीता और राम के विवाह के बाद मिथिला में पहुँचते हैं। उसके
अनुसार विश्वामित्र का आदेश पाकर लक्ष्मण ही नारायणीय धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ाते हैं। जिसपर जनक, लक्ष्मण
और उर्मिला के विवाह का प्रस्ताव करते हैं। विश्वामित्र के सुझाव के अनुसार भरत और माण्डवी एवं शत्रुघ्न और
श्रुतकीर्ति का विवाह होता है।
अद्भुतरामायण के अनुसार राम ने धनुष चढ़ाकर परशुराम को विराट् रूप दिखाया और बाण छोड़कर
उनका तेज ले लिया। तब परशुराम ने होश में आकर राम को विष्णु का अवतार मानकर उन्हें प्रणाम किया और
उनकी आज्ञा से महेन्द्र पर्वत पर चले गये। पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १३ के अनुसार राम ने क्षत्रिय-विध्वंस के
प्रायश्चित्तार्थ तप के उद्देश्य से उन्हें महादेव के पास भेजा था। इनमें कई अंशों को प्रशंसार्थवाद समझकर उनका
समाधान करना उचित है। रामकीर्ति में रामपरमस्र को एक क्रूर यक्ष माना है। राम उनसे कहते हैं कि मैं नारायण
का अवतार हूँ। उसपर वे प्रमाण चाहते हैं कि राम उनका चाप उठा लें। राम बायें हाथ से लीलापूर्वक उस
धनुष को उठाकर बाण चढ़ाते हैं। तब रामपरमस्र क्षमा मांगते हैं तथा राम को अपना ऐन्द्रजालिक बाण भी दे देते
हैं। यह भी वाल्मीकिरामायण की कथा का ही संवर्धित रूप है।
कृत्तिवासरामायण में सीता को शङ्का होती है कि एक धनुष को तोड़कर मेरे साथ विवाह किया, अब
भृगुमुनि एक धनुष और लाये हैं। न जाने मेरी कितनी सपत्नियां होंगी।
अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, राघवोल्लास तथा रामचरितमानस में तेजोभंग के पश्चात् परशुराम
राम की स्तुति करते हैं। रामभक्ति का वरदान लेकर चले जाते हैं। राघवोल्लास में राम की प्रभावपूर्ण बातों से
ही परशुराम शान्त हो जाते हैं। विष्णु-धनुष चढ़ाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। वे अपने सब अस्त्र-शस्त्र राम के
चरणों में अर्पित कर देते हैं। कम्बरामायण के अनुसार तेजोभङ्ग के पश्चात् देवता पुष्पवृष्टि करते हैं और राम विष्णु
का धनुष वरुण को अर्पित कर देते हैं।
सामान्य विशेषपर्यवसायी होता है, अतएव सामान्य का विशेष से विरोध भी नहीं होता। हाँ, विरुद्ध
विशेष्यों में विरोध हो सकता है। विष्णु के हुंकार से स्तम्भित होकर शिव ने धनुष छोड़ दिया था। वही धनुष
जनक को प्राप्त हुआ था। उसी का भंग होने से परशुराम क्षुब्ध हुए थे। देवता लोगों ने "शिव और विष्णु में कौन
श्रेष्ठ हैं" यह प्रश्न पितामह ब्रह्मा से किया। ब्रह्मा ने शङ्का दूर करने के लिए अपने सत्य संकल्प से दोनों में विरोध
उत्पन्न कर दिया। ब्रह्मा की संकल्पसिद्धि के लिए ही दोनों ने विरोध स्वीकार किया। विष्णु के हुंकार से शिव
का धनुष शिथिल हो गया और स्वयं महादेव स्तम्भित हो गये। देवताओं की प्रार्थना से दोनों ने युद्ध बन्द कर दिया।
देवताओं ने इस घटना से विष्णु को अधिक श्रेष्ठ माना। रामाभिरामी टीका के अनुसार इस युद्ध में विष्णु की
उत्कृष्टता सिद्ध हुई है। त्रिपुरवध में विष्णु बाण बनकर शिव के उपकरण हुए थे। अतः दोनों समान ही हैं।
अध्याय बालकाण्ड ४०५
शिवपुराण एवं शिवमहिम्न के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही ज्योतिर्लिङ्गरूप भगवान् का अन्त नहीं पा सके ।
अतएव विष्णु भगवान् सदा सहस्र कमलों से शिव की अर्चा किया करते थे । भक्ति-परीक्षा के लिए एक दिन शिवजी
ने एक कमल लुप्त कर दिया, तब विष्णु ने अपना नेत्रकमल ही चढ़ा दिया । शिव भगवान् के वरदान से वह नेत्र
ही सुदर्शनचक्र हो गया ।
इस तरह शिव और विष्णु दोनों ही वस्तुतः एक हैं, फिर भी एक दूसरे की उपासना करते हैं तथा एक
दूसरे को अपने से उत्कृष्ट प्रख्यापित करते हैं ।
वाल्मीकिरामायण तथा अन्य राम-कथाओं में विवाह के पश्चात् अयोध्या की यात्रा के समय परशुराम
आते हैं ।
“राम रामापति कर धनु लेहू । खैंचहु चाप मिटै सन्देहू ॥ ( रा० मा० १।२८३।४)
उनके यह कहने पर ज्यों ही राम विष्णु का धनुष चढ़ाते हैं, परशुराम निस्तेज हो जाते हैं और युद्ध का
अवसर ही नहीं आता । वे राम को विष्णु समझकर प्रणाम करते हैं ।
राम ने चढ़े हुए बाण से परशुराम के तपोबल से संचित लोकों को नष्ट कर दिया, क्योंकि राम का
बाण अमोघ था और ब्राह्मण परशुराम पर प्रहार करना राम को इष्ट नहीं था । उनकी दिव्य गति पर बाण का
प्रयोग इसलिए नहीं किया कि परशुराम ने यह कहा कि कश्यप के अनुरोध से मैं पृथ्वी पर निवास नहीं कर सकता ।
मैं समुद्र से नया स्थान महेन्द्राचल लेकर वहीं रहता हूँ । दिव्यगति नष्ट होने पर वहाँ पहुँचना असंभव होगा, अतः
मेरे तपोबल से अर्जित लोकों पर ही बाण चलाइये ।
कहते हैं, परशुराम एक सुयोग्य प्रतिद्वन्द्वी क्षत्रिय से युद्ध करना चाहते थे । पर यह कथन निष्प्रमाण ही
है । सहस्रबाहु कार्तवीर्यार्जुन जैसे महान् क्षत्रियों से वे द्वन्द्वयुद्ध कर ही चुके थे ।
महाभारत के अनुसार उन्होंने भीष्म से २१ दिन तक द्वन्द्वयुद्ध किया था ।
परशुराम राम से कहते हैं विष्णु-धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ा दो तो मैं तुमसे द्वन्द्वयुद्ध करूँगा । शिव-धनुष
और विष्णु-धनुष दोनों ही विश्वकर्मा से निर्मित थे । अध्यात्मरामायण के अनुसार परशुराम कहते हैं—या तो अपना
राम नाम छोड़ दो अथवा मुझसे युद्ध करो । नृसिंहपुराण में भी ऐसा उल्लेख है—
“त्यज त्वं रामसंज्ञां तु मया वा समरं कुरु ।”
“त्वं राम इति नाम्ना मे चरसि क्षत्रियाधम ।
द्वन्द्वयुद्धं प्रयच्छाशु यदि त्वं क्षत्रियोऽसि वै ॥ अध्यात्मरामायण ( १।७।११ )
तथा आनन्दरामायण ( १।३।३५ ) में भी ऐसा ही उल्लेख है ।
अध्यात्मरामायण के अनुसार “पुराणं जर्जरं चापं भङ्क्त्वा त्वं कत्थसे मुधा ।” ( १।७।८२ )
परशुराम कहते हैं तुम जर्जर पुराने धनुष को तोड़कर व्यर्थ डींग हांकते हो । यहाँ वे शिव-धनुष का
अपमान नहीं करते हैं, परन्तु उसकी प्राचीनता कहकर राम के पराक्रम का ही अपकर्ष बताना चाहते हैं । अतएव
अन्यत्र परशुराम को शिव का शिष्य माना गया है और शिव-धनुष तोड़ने को वे अपने गुरु का अनादर समझते हैं—
“सुनहु राम जो शिव-धनु तोरा । सहसबाहु सम सो रिपु मोरा ॥”
( रा० मा० १।२७०।२ )
वस्तुतः इनका कोई विरोध नहीं है ।
४०६ रामायणमीमांसा त्रयोदश
वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड में वर्णित परशुराम की कथा को बुल्के विकास या प्रक्षिप्त मानते हैं,
क्योंकि महाभारत के रामोपाख्यान में उसका संकेत नहीं है । परन्तु उनका यह मत सर्वथा अशुद्ध है, कारण रामो-
पाख्यान में संक्षिप्त रामकथा का वर्णन है । जब वाल्मीकिरामायण महाभारत से प्राचीन है तो उसकी कथावस्तु का
अस्तित्व अर्वाचीन महाभारत पर कैसे निर्भर हो सकता है ? अतः परशुराम की कथा को अर्वाचीन नहीं कहा जा
सकता है ।
महाभारत के अनुसार परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि की आज्ञा के अनुसार अपनी माता रेणुका का
वध किया था । आज्ञापालन के फलस्वरूप वर पाकर उसे पुनः जिलाया था ( म० भा० ३।११६ ) । रामचरितमानस
में भी उसकी चर्चा है—
“परशुराम पितु आज्ञा राखी । मारी मातु लोक सब साखी ॥
( रा० मा० २।१७२।४ ) ।
इसी तरह कार्तवीर्यार्जुन ने जमदग्नि की कामधेनु का हरण किया था तब परशुराम ने उसका वध किया
था । सहस्रार्जुन के पुत्रों ने जामदग्न्य की अनुपस्थिति में जमदग्नि को मार डाला । उन्होंने उसके प्रतीकारस्वरूप
पृथिवी को इक्कीस बार क्षत्रियविहीन बना दिया था । कश्यप को पृथिवी देकर स्वयं महेन्द्र पर्वत पर रहने लगे—म०
भा० ३।११७।१४ तथा शान्तिपर्व ४९ अध्याय—
‘त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः ॥ ६४ ॥’ वाल्मीकिरामायण के अनुसार परशुराम
क्षत्रियविरोधी थे । वे राम द्वारा धनुर्भङ्ग सुनकर उनसे द्वन्द्वयुद्ध करने के लिए प्रस्तुत थे ।
प्रसन्नराघव, रामचरितमानस तथा कृत्तिवासरामायण में लक्ष्मण परशुराम से कुछ उग्रता से बातें करते
हैं । रामचन्द्रिका में भरत तथा शत्रुघ्न भी वार्तालाप में भाग लेते हैं । अन्त में महादेव आकर विवाद शान्त करते
हैं । महावीरचरित, अनर्घराघव तथा प्रसन्नराघव में राम तथा परशुराम युद्ध करने के लिए रङ्गमञ्च पर आ जाते
हैं; परन्तु राम के वैष्णव धनुष चढ़ाने से परशुराम का तेजोभङ्ग होने के कारण युद्ध की नौबत नहीं आती । शङ्कर-
देवकृत रामविजय के अनुसार अयोध्या के मार्ग में परशुराम राम का वध करने का प्रयत्न करते हैं, क्योंकि उन्होंने
उनके गुरु का धनुष तोड़ डाला था । द्वन्द्वयुद्ध में राम ने उन्हें पराजित किया । तोरवेरामायण में राम ने तोमर से
परशुराम का परशु आकाश में फेंक दिया तथा अपने रथ से उतरकर, परशुराम का धनुष छीन लिया । इन अंशों को
वस्तुतः विकार ही समझना चाहिये, क्योंकि ये सब राम की ब्रह्मण्यता तथा धीरोदात्तता के विरुद्ध हैं । विदेशी राम-
कथाओं में उक्त संघर्ष और भी उग्र हो जाता है । खोतानी रामायण के अनुसार दशरथ ने परशुराम के पिता के
आश्रम में कामधेनु गाय देखी तथा दशरथ का पुत्र सहस्रबाहु उसका अपहरण करने को गया । परशुराम ने तपस्या द्वारा
कुठार प्राप्त कर सहस्रबाहु का वध किया । बाद में सहस्रबाहु के पुत्र राम तथा लक्ष्मण परशुराम को खोज में निकले ।
अन्त में राम ने बाण से परशुराम को मार डाला। यह भी विदेशियों के भारतीय शास्त्रानभिज्ञता का ही परिणाम है ।
उन्हें हैहयवंश तथा रघुवंश का भेद ज्ञात न होने से इस प्रकार का विपर्यय हुआ है । सेरीराम के अनुसार पुष्पराम
( परशुराम ) राम को आदेश देते हैं कि अपना राम नाम छोड़ दो । अस्वीकार करने पर राम से उनका युद्ध होता
है । अगले दिन राम का बाण पुष्पराम का पोछा करता है । वे स्वर्ग, पाताल और सागर में भ्रमण करके कहीं त्राण
न पाकर राम की ही शरण लेते हैं । रामकियेन के अनुसार राम ने द्वन्द्वयुद्ध के अन्त में अपने को नारायण के रूप में
प्रकट किया, इसपर रामासुर ने राम को ईश्वर का धनुष प्रदान किया । राम ने उसे ले लिया । उसे आकाश में
फेंक दिया, जिससे आवश्यकता पड़ने पर वह धनुष उनके काम आ सके । कहना न होगा कि विविध देशों में होकर
के उन देशों में पहुँचने तक राम-कथा में अनेक विकृतियाँ आ गयी हैं ।
श्रीबुल्के कहते हैं, "महाभारत में परशुराम की कथा अनेक स्थलों में वर्णित है, किन्तु इसमें कहीं भी उनके
विष्णुत्व की ओर संकेत नहीं मिलता । फिर भी नारायणीयोपाख्यान में (म० भा० १२।३२६।७७), हरिवंश ( १।४१
११२-१२०; २।२२।२-४८, ) विष्णुपुराण ( १।९।१४३ ), भागवतपुराण ( १।३।२०; २।७।२२ ) में उनका अवतारों
में उल्लेख विद्यमान है ।" परन्तु बुल्केजी भारतीय विचार-पद्धति से बिलकुल अपरिचित हैं, अतएव आर्ष ग्रन्थों के
समन्वय का दृष्टिकोण उन्हें विदित नहीं है और मान्य भी नहीं है । नारायणीयोपाख्यान में जो अंश है उसका अन्य
स्थलों के साथ समन्वय ही अभीष्ट है । विष्णुपुराण आदि भी आर्ष ग्रन्थ एवं प्रमाण ही हैं । यदि विष्णुपुराण आदि
में परशुराम को स्पष्टरूप से विष्णु का अवतार कहा गया है और महाभारत में भी नारायणीयोपाख्यान में परशुराम
का विष्णु अवतार होना भी प्रसिद्ध ही है फिर भी महाभारत के ही कई स्थलों में उनका विष्णुत्व-वर्णन न होने से
परशुराम विष्णु के अवतार नहीं हैं यह कैसे कहा जा सकता है ? यह स्पष्ट जान लेना चाहिये कि केवल
परन्तु उक्त कथन अर्धसत्य ही है, क्योंकि अवतार के कारणों का निरूपण तो बालकाण्ड वाल्मीकिरामायण
में भी है ही । विवाह के प्रसङ्ग में सूर्यवंश या इक्ष्वाकुवंश का वर्णन भी वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड में है ही
( १।७०।२१-४३ ) । दशरथ के विवाह और अन्धमुनि की कथा भी वाल्मीकिरामायण में है ही । कृष्णलीला का
अनुकरण राम में संभव नहीं है, क्योंकि राम कृष्ण से प्राचीन ही हैं, यही कहना युक्त भी है । आर्ष वर्णन सभी
प्रामाणिक हैं । वाल्मीकिरामायण में अनुक्त होने पर भी कोई विरोध नहीं है । वाल्मीकिरामायण से अनुक्त भी
अविरुद्ध विशेष मान्य होता ही है—'अनुक्तमप्रतिषिद्धमनुमतं भवति ।' तीर्थ-यात्रा, वैराग्य आदि भी योगवासिष्ठ
प्रोक्त होने से प्रामाणिक ही हैं। इसी तरह वाल्मीकिरामायण में अनुक्त भी विशेष अन्य ग्रन्थों द्वारा वर्णित होने पर
मान्य ही हैं । शतकोटिप्रविस्तर रामायण में अविरुद्ध अन्य विशेषों का वर्णन संभव ही है ।
अवतारवाद
अवतारवाद के विरुद्ध बुल्के द्वारा प्रस्तुत तर्कों का पीछे विस्तार से खण्डन किया जा चुका है । अतएव इस
सम्बन्ध में अधिक वक्तव्य अपेक्षित नहीं है ।
श्रीबुल्के का पुत्रेष्टियज्ञ के प्रसङ्ग को प्रक्षिप्त कहना भी असङ्गत ही है । अन्यान्य अंशों में श्रीबुल्के
महाभारत के रामोपाख्यान का सहारा पकड़ते हैं, पर वह इस प्रसङ्ग में यह मानते हैं कि उसमें अवतारवाद का
उल्लेख है । फिर भी वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड में वर्णित अवतारवाद को प्रक्षिप्त मानने का हठ करते हैं। साथ
ही यह भी आवश्यक नहीं है कि संक्षिप्त रामोपाख्यान में विस्तृत रामकथा के सर्वांश का वर्णन हो । एक प्राचीन ग्रन्थ
का प्रामाण्य अर्वाचीन ग्रन्थ पर निर्भर नहीं हो सकता । बुल्के कहते हैं हरिवंशपुराण, वायुपुराण एवं भागवतपुराण
में दशरथ के यज्ञ का वर्णन नहीं है; परन्तु यदि वर्णन होता तो भी जैसे उनमें वर्णित अवतारवाद उन्हें मान्य नहीं है
वैसे ही उनमें वर्णित यज्ञ भी मान्य न होता या बुल्के उसे भी प्रक्षिप्त मान बैठते ।
“सुतार्थं तप्यमानस्य नासीद् वंशकरः सुतः ।” वाल्मीकिरामायण ( १।८ ) के अनुसार श्रीदशरथजी
तप हो रहे थे, परन्तु कोई वंशकर पुत्र नहीं हुआ था अथवा 'तप्यमानस्य' का अभिप्राय यह है कि राजा दशरथ
विविध प्रकार के तप कर रहे थे । जैसा कि स्कन्दपुराण के दो स्थलों में उनकी तपस्या का वर्णन है, नागरखण्ड के
अनुसार दशरथ का शनैश्चर के साथ युद्ध होने के पश्चात् इन्द्र ने उनसे कहा—
“अपुत्रस्य गतिर्नास्ति” अपुत्र की गति नहीं होती । इसपर राजा कार्तिकेयपुर में १०० वर्ष तक तपस्या
करते हैं । अन्त में जनार्दन प्रकट होकर स्वयं चार पुत्रों के रूप में प्रकट होने का वरदान देते हैं । बाद में दशरथ
को चार पुत्रों एवं एक पुत्री की प्राप्ति होती है । प्रभासखण्ड के अनुसार प्रभास में तप करने और शिवलिङ्ग-
स्थापना करने की भी चर्चा आती है । वाराहपुराण के अनुसार दशरथ वसिष्ठ के परामर्श से राम-द्वादशी का
व्रत करते हैं । फलस्वरूप विष्णु उनके सन्तानरूप में प्रकट हुए । वस्तुतः किसी महाफल की प्राप्ति के लिए लोग
अनेक प्रकार की तपस्याएँ तथा आराधनाएँ करते ही हैं । तदनुसार दशरथ के भी अनेक तप और व्रतों की बात
सङ्गत ही है ।
सारलादास के महाभारत के अनुसार इन्द्र के यहाँ से लौटते हुए दशरथ के द्वारा कपिला की अवज्ञा हो
गयी थी, इसलिए कपिला के शाप से पुत्र-प्राप्ति में बाधा हुई; परन्तु बाद में व्याघ्र के आक्रमण से कपिला को
बचाने के कारण कपिला के वरदान से उन्हें चार पुत्रों की प्राप्ति होती है । ग्रामगीतों के अनुसार किसी योगी के
प्रसाद से उन्हें पुत्र-प्राप्ति होती है । बिहौर के अनुसार किसी ब्राह्मण को अपने ज्येष्ठ पुत्र देने की प्रतिज्ञा से दशरथ
को पुत्र-प्राप्ति हुई है । संथाल जाति में प्रचलित कथा के अनुसार किसी योगी ने चार आम दिये थे । उन्हें अपनी
पत्नियों को खिलाने से उन्हें पुत्र-प्राप्ति होती है ।
अध्याय बालकाण्ड ४०९
सबका निष्कर्ष यही है कि श्रीदशरथजी को अनेक तपस्याओं, यज्ञों तथा व्रतों एवं योगियों और मुनियों के
अनुग्रह से ही राम, लक्ष्मण आदि जैसे दिव्य सुपुत्रों की प्राप्ति हुई । तिब्बती रामायण के अनुसार ५०० पाँच सौ
कैलासवासी ऋषियों से दशरथ ने पुत्र-प्राप्ति की प्रार्थना की थी । उनके दिये हुए एक फल के खाने से उनकी दो
पत्नियों को राम और लक्ष्मण दो पुत्र हुए थे । असमिया बालकाण्ड के अनुसार अन्धकमुनि के दिये फल से दशरथ
को पुत्र-प्राप्ति हुई । सेरीराम के अनुसार एक योगी ने सन्तान-प्राप्ति के लिए चार "वाजहर" नामक पत्थर प्रदान
किये थे । एक अन्य पाठ के अनुसार दशरथ को दस हजार हाथियों के वध का परामर्श दिया गया था। देशान्तर
और कालान्तर में विविध संसर्गों से रामायण की मूल कथाओं में अनेक प्रकार की विकृतियों का आ जाना स्वाभाविक
ही है, अतः राम की कथाओं में वाल्मीकिरामायण मुख्य प्रमाण है। तदनुसार आर्ष रामायण एवं पुराणों, संहिताओं
की कथाएँ प्रमाण हैं। अन्य कथाएँ भी पूर्वोक्त आर्ष ग्रन्थों से अविरुद्ध ही प्रमाण हैं। विरुद्ध कथाओं को विकृति ही
समझना चाहिये ।
वाल्मीकिरामायण के अनुसार एक अश्वमेधयज्ञ एवं एक पुत्रेष्टियज्ञ का वर्णन मिलता है । इसी अवसर
पर हविर्भाग-ग्रहणार्थ देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा परमर्षि आते हैं और ब्रह्मा से निवेदन करते हैं कि आपके वरदान से
दृप्त होकर रावण हम सबको बाधित करता है । उसके वध का आप मार्ग निकालिये । ब्रह्मा कहते हैं मनुष्य के द्वारा
उसका वध संभव है । उसी समय वहाँ विष्णु भगवान् का भी आगमन होता है । वह सब की प्रार्थना पर दशरथ के
पुत्ररूप में प्रकट होकर रावण-वध करने का आश्वासन देते हैं।
पुत्रेष्टियज्ञ की अग्नि से प्रकट होकर अग्निदेव दशरथ को पायसान्न प्रदान करते हैं । श्रीदशरथजी उसे
अपनी पत्नियों में बांट देते हैं, जिससे तीनों गर्भवती होती हैं ( वा० रा० १ । सर्ग १५ और १६ ) । अनन्तर विष्णु
के अवतार भूत राम की सहायता के लिए ब्रह्मा की आज्ञा के अनुसार देवता लोग अप्सराओं और गन्धर्वियों से वानरों
के रूप में प्रकट होते हैं ( वा० रा० १ । सर्ग १७ ) ।
बुल्के कहते हैं, "वाल्मीकिरामायण में पहले अश्वमेध का ही वर्णन किया था; बाद में पुत्रेष्टियज्ञ का वर्णन
जोड़ दिया गया है ।" परन्तु यह उनकी भ्रान्ति ही है। उनकी दृष्टि में तो अश्वमेध-वर्णन भी प्रक्षिप्त ही है। वही
क्यों वे तो सारे बालकाण्ड को ही प्रक्षिप्त मानते हैं, जिसका कि हम पीछे खण्डन कर चुके हैं । वस्तुतः अश्वमेधयज्ञ
तो श्रवणकुमार-वध आदि पापों के प्रायश्चित्तार्थ किया गया था । पुत्र के लिए पुत्रेष्टियज्ञ का ही अनुष्ठान किया गया
था । अतएव पद्मपुराण, नृसिंहपुराण, रघुवंश, भट्टिकाव्य, जानकीहरण, अध्यात्मरामायण, रामचरितमानस आदि में
पुत्रेष्टियज्ञ का ही वर्णन है।
ब्रह्मपुराण (अध्याय १२३ ) में श्रवणकुमार-वध का प्रायश्चित्त करने के लिए ही अश्वमेधयज्ञ के आयोजन
का उल्लेख है । यज्ञ में आकाशवाणी भी हुई थी कि राजा अपने ज्येष्ठ पुत्र के प्रसाद से पापमुक्त हो जायेंगे ।
अन्य कथाओं के अनुसार पुत्रेष्टियज्ञ-वर्णन के प्रसङ्ग में ही हनुमान्, विभीषण और सीता तथा वानर-
सेनापतियों के भी जन्म का निर्देश है। आनन्दरामायण के अनुसार एक गीध ने कैकेयी का पायस उसके हाथ से
छीन लिया था और अञ्जनी पर्वत पर फेंक दिया था । इसपर अन्य रानियों ने पायस का कुछ अंश कैकेयी को दे
दिया । भावार्थरामायण में भी ऐसी ही कथा है । अन्य रचनाओं के अनुसार दशरथ ने सर्वप्रथम कैकेयी को पायस
प्रदान नहीं किया था, अतः वह मानिनी हो रही थी । इतने में चील ने उसके हाथ से पायस लेकर अञ्जनी के मुख
में डाल दिया । उसी से हनुमान् की उत्पत्ति हुई । आनन्दरामायण ( १।१।९६ ), भावार्थरामायण ( १।१ ), पाश्चात्य
वृत्तान्त नं० १ तथा दक्षिण भारतीय एक वृत्तान्त के अनुसार ऋषि ने दशरथ की पत्नियों का नाम पूछा । भूल से
दशरथ के मुख से कैकसी रावण की माता का नाम निकला । इसपर ऋषि ने पायस के चार भागों के पाँच भाग
५२
बना दिये । एक काक ने उसका एक भाग चुराकर कैकसी के पास पहुँचा दिया । उसे खाने के कारण कैकसी ने
विभीषण को जन्म दिया । सेरीराम तथा रामकियेन में सीता के जन्म का सम्बन्ध पुत्रेष्टियज्ञ से स्थापित किया गया
है । सेरीराम के अनुसार एक काक पायस का षष्ठांश चुराता है । इसपर याज्ञिक कहता है कि यह काक दशरथ-पत्नी के
पुत्र द्वारा मारा जायगा तथा जो इस पायस को खायेगा उसे एक पुत्री उत्पन्न होगी, जिसका विवाह राम के साथ होगा ।
बाद में रावण उस पायस को खाता है । रामकियेन के अनुसार यज्ञ के उस पायस की सुगन्धि लङ्का तक पहुँच
गयी । मन्दोदरी ने रावण से उसे माँगा । रावण ने काकना राक्षसी को पायस लाने का आदेश दिया । राक्षसी ने
पायस का अष्टमांश चुराया । वह मन्दोदरी को दिया गया । उसी से सीता का जन्म होता है ( अ० १० ) । भुइयां
माधवदासकृत विचित्ररामायण के अनुसार डाकिनियाँ आकर पुत्रेष्टियज्ञ के धूम का पान करती हैं और गर्भवती होकर
वानर-सेना के २५ सेनापतियों को जन्म देती हैं ।
भट्टिकाव्य तथा रामायण ककविन में दशरथयज्ञ का वर्णन है, पर किसी दिव्य पुरुष द्वारा पायस प्रदान
का उल्लेख नहीं है । भट्टिकाव्य के अनुसार वे हुतावशिष्ट हवि का कुछ अंश खाती हैं ( सर्ग १ ) ।
पद्मपुराण ( पातालखण्ड ११२।२३ और उत्तरखण्ड १८९।४७ ) के अनुसार विष्णु ही यज्ञाग्नि से प्रकट
होकर पायस प्रदान करते हैं । रामरहस्य ( २।१४३ ) में भी वैसा ही उल्लेख है । वस्तुतः अग्निमुखेन विष्णु आदि
सभी देवताओं का तर्पण होता है । अग्नि के अन्तर्यामी विष्णु ही हैं । बृहद्धर्मपुराण ( पूर्वखं० अ० १८ ) तथा
वाल्मीकिरामायण ( १ । सर्ग १५ ) के अनुसार विष्णु देवताओं को आश्वासन देते हैं कि मैं राम के रूप में अवतार
लूँगा । उसी समय शिव हनुमान् के रूप में राम को सहायता देने की प्रतिज्ञा करते हैं । अध्यात्मरामायण के अनुसार
गोरूपधारिणी धरित्री देवताओं और मुनियों के साथ ब्रह्मा की शरण लेती है । ब्रह्मा सबको साथ लेकर क्षीरसमुद्र-
वासी विष्णु के पास जाते हैं और स्तुति कर रावण-वध की प्रार्थना करते हैं । विष्णु कश्यप और अदिति के
वर प्रदान की चर्चा करते हुए लक्ष्मी सहित अवतार लेने का आश्वासन देते हैं । ब्रह्मा देवताओं को वानरवंश
में अवतरित होने का आदेश देते हैं । पद्मपुराण ( गौडीय पातालखण्ड अध्याय १४ ) में शान्ता अपने पिता दशरथ
से अपने पति ऋष्यशृङ्ग की शक्ति का वर्णन करती है, दशरथ उनके द्वारा पुत्रेष्टियज्ञ कराते हैं ।
कृत्तिवासरामायण के अनुसार दशरथ अपने मन्त्रियों से कहते हैं कि मुझे अन्धक मुनि ने वर दिया है ।
ऋष्यशृङ्ग द्वारा यज्ञ कराने से पुत्र-प्राप्ति होगी । यह ऋष्यशृङ्ग कौन हैं ? इसपर वसिष्ठ ने उनकी कथा बतायी ।
तब दशरथ लोमपाद के यहाँ जाकर ऋष्यशृङ्ग को अयोध्या लाकर यज्ञ कराते हैं । विचित्ररामायण के अनुसार
पुत्रेष्टि के समय परशुराम प्रकट होकर आदेश देते हैं जो ज्येष्ठ पुत्र हो उसका मेरा नाम रखना । काश्मीरीरामायण के
अनुसार नारायण ने दशरथ को स्वप्न में कहा कि मैं तुम्हारा पुत्र बनूंगा ।
अवतारवाद का विकास ?
श्रीबुल्के यह मानते हैं कि पहले वाल्मीकिरामायण में अवतार का वर्णन नहीं था । यह पीछे का
विकास है, परन्तु उनका यह मत सर्वथा अशुद्ध और निराधार है, क्योंकि मन्त्रों, ब्राह्मणों, पुराणों, महाभारत, गीता
आदि में सर्वत्र अवतारवाद प्रसिद्ध है । अतः वाल्मीकिरामायण के अवतार-वर्णन को प्रक्षिप्त कहना सर्वथा
निर्मूल ही है ।
दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार कौशल्या को पायस का आधा भाग प्राप्त हुआ । सुमित्रा को एक चतुर्थांश
तथा कैकेयी को एक अष्टमांश दिया गया है ।
वाल्मीकिरामायण उदीच्यपाठ तथा रामचरितमानस का पायस-विभाग निम्नोक्त है—
अध्याय बालकाण्ड ४११
कौशल्या को अर्धभाग, कैकेयी को एक चतुर्थांश और सुमित्रा को दो अष्टमांश । रघुवंश, आध्यात्मरामायण
आदि में चारों भाई एक एक चतुर्थांश से जन्म लेते हैं।
श्रीबुल्के कहते हैं, किन्तु आगे चलकर तीनों भाई भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न एक एक चतुर्थांश से समन्वित
माने जाते जाते हैं (वा० रा० १।१८।१३,१४)। यह अन्तिम रूप सबसे प्राचीन है । चारों भाई विष्णु के चतुर्थांश
माने जाते हैं। हरिवंश, विष्णुपुराण, वायुपुराण आदि में विष्णु का चार रूपों में प्रकट होने का उल्लेख है ।
“कृत्वाऽऽत्मानं महाबाहुश्चतुर्धा प्रभुरीश्वरः ।” ( हरिवं० १।४१।१२२ )
“कौशल्यायै नरपतिः पायसार्धं ददौ तदा ।
अर्धार्थं ददौ चापि सुमित्रायै नराधिपः ॥
कैकेय्यै चावशिष्टार्धं ददौ पुत्रार्थकारणात् ।
प्रददौ चावशिष्टार्धं पायसस्यामृतोपमम् ।।
अनुचिन्त्य सुमित्रायै पुनरेव महामतिः ।” (वा० रा० १।१६।२७,२८)
राजा ने कौशल्या के लिए पायस का अर्धभाग प्रदान किया, अर्ध से अर्ध अर्थात् चतुर्थांश सुमित्रा को दिया
गया एवं अवशिष्टार्थ अर्थात् चतुर्थांश का अर्ध यानी अष्टमांश कैकेयी को प्रदान किया । पुनश्च अन्य अष्टमांश सुमित्रा
को दिया गया । कैकेयी की अपेक्षा ज्येष्ठ और कौशल्या की अपेक्षा कनिष्ठ सुमित्रा को पादोन अर्धांश प्रदान किया
गया । संभोग-पक्षपात होने पर भी धर्मविभाग कर्म में पक्षपात नहीं होता । तथा च भरत और शत्रुघ्न दोनों पाद
( चतुर्थांश ) के अर्ध-अर्ध हैं। अन्य दृष्टि से राम और भरत प्रत्येक त्र्यंश हैं । लक्ष्मण और शत्रुघ्न दो अष्टमांश हैं ।
कौशल्या को दिये गये अर्धांश का अर्धांश (चतुर्थांश) सुमित्रा को कौशल्या द्वारा दिलाया गया अर्थात् कौशल्या के
लिए दत्त भाग से अवशिष्ट भाग में दो भाग करके एक भाग सुमित्रा को दिया गया था । अवशिष्ट अन्य भाग कैकेयी
को दिया गया, परन्तु उसमें से अर्धभाग पुनः कैकेयी द्वारा सुमित्रा को प्रदान किया गया । कौशल्या के लिए दिये हुए
अर्धांश से अर्धावशिष्ट—अवशिष्ट अर्ध-भाग कैकेयी को प्रदान किया गया । पुनश्च उसमें से अर्धांशभाग कैकेयी के
द्वारा पुनः सुमित्रा को दिलाया गया ।
कालिदास भी यही कहते हैं—
“स तेजो वैष्णवं पत्न्योर्विभेजे चरुसंज्ञितम् ।
द्यावापृथिव्योः प्रत्यग्रमहर्पतिरिवातपम् ॥
अर्चिता तस्य कौशल्या प्रिया केकयवंशजा ।
अतः सम्भावितां ताभ्यां सुमित्रामैच्छदीश्वरः ॥
ते बहुज्ञस्य चित्तज्ञे पत्न्यौ पत्युर्महीक्षितः ।
चरोरर्धार्धभागाभ्यां तामयोजयतामुभे ॥
सा हि प्रणयवत्यासीत् सपत्न्योरुभयोरपि ॥” ( रघुवं० १०।५४-५७ )
जैसे अहर्पति अर्थात् सूर्य अपने अभिनव आतप (घाम) को द्युलोक और पृथिवीलोक दोनों के लिए
विभक्त कर देते हैं वैसे ही राजा ने उस चरुरूप वैष्णव तेज को ज्येष्ठ होने से धर्मतः आदरणीय कौशल्या और प्रिय
होने से कैकेयी के लिए बराबर विभक्त कर दिया । राजा दशरथ ने यह भी चाहा कि दोनों रानियाँ सुमित्रा को
सम्मानित करें । राजा के मन की बात को जाननेवाली कौशल्या और कैकेयी ने चतुर्थांश अर्थात् अपने अर्ध से अर्ध
भाग सुमित्रा को प्रदान कर दिया, क्योंकि वह दोनों ही सपत्नियों से स्नेह करती थी । इस व्याख्या के अनुसार ही
४१२ रामायणमीमांसा त्रयोदश
राम-लक्ष्मण और भरत-शत्रुघ्न की घनिष्ठता और एकवाक्यता सिद्ध होती है। अन्यथा इसका कोई बीज नहीं सिद्ध
होगा । पद्मपुराण में पायस विभाग के अनुसार ही उनकी घनिष्ठता कही गयी है—
“युगं बभूवतुस्तत्र सुस्निग्धौ रामलक्ष्मणौ ।
तथा भरतशत्रुघ्नौ पायसांशवशात् स्वतः ॥”
मल्लिनाथ के अनुसार, रघुवंश में “चरयोरर्धार्धभागाभ्याम्” का अर्थ निम्नोक्त है । “चरयोरर्धार्धभागौ समभागौ
तयोर्योऽर्धभागौ तौ च तौ भागौ च ।” अर्थात् अपने भाग के अर्ध का जो अर्ध भाग है वह भाग दोनों ने सुमित्रा को
प्रदान किया । मल्लिनाथ के अनुसार यह विभाग वाल्मीकिरामायण के अनुसार नहीं है, किन्तु नृसिंहपुराण के
अनुसार है—
“ते पिण्डप्राशने काले सुमित्रायै महीपतेः ।
पिण्डाभ्यामल्पमल्पन्तु स्वभगिन्यै प्रयच्छतः ॥”
अर्थात् पिण्डप्राशन-काल में कौशल्या और कैकेयी ने अपने अपने पिण्ड में से थोड़ा-थोड़ा भाग अपनी
भगिनी सुमित्रा को प्रदान किया । परन्तु रामाभिरामी टीका के अनुसार रामायण का भी वही अर्थ है। उनके
अनुसार कौशल्या के अर्धभाग से ही अर्धार्ध सुमित्रा को दिया गया है। इस पक्ष में छः छः आना भाग से राम और
भरत तथा दो-दो आना भाग से लक्ष्मण और शत्रुघ्न होते हैं । वाल्मीकिरामायण के अन्य टीकाकारों के अनुसार
राजा ने ज्येष्ठ पत्नी होने से कुछ अधिक पायस का आधा अंश कौशल्या को प्रदान किया । फिर यह विचार करके
कि सुमित्रा का एक पुत्र राम का अनुयायी हो और एक भरत का अनुयायी हो, कौशल्या के भाग से ही अर्ध अर्थात्
कुछ न्यून अर्ध अंश राजा ने कौशल्या से सुमित्रा को दिलाया । इसी तरह कौशल्या के भाग से कुछ न्यून अवशिष्ट
अर्धभाग कैकेयी को प्रदान किया । पुनश्च कैकेयी के भाग से अर्धभाग सुमित्रा को कैकेयी के द्वारा दिलाया । इनके
अनुसार पायस में आठ भाग किये गये। उनमें पाँच अंश कौशल्या को दिये गये, कौशल्या के भाग से डेढ़ अंश सुमित्रा
को दिया गया । कौशल्या के भाग से अवशिष्ट तीन अंश कैकेयी को दिये गये । कैकेयी के भाग से डेढ़ अंश पुनः
कैकेयी के द्वारा सुमित्रा को दिया गया। साढ़े तीन अंशों को एक करके कौशल्या ने खाया, उसी से राम का
प्रादुर्भाव हुआ । डेढ़ अंश कैकेयी ने खाया उससे भरत का आविर्भाव हुआ । सुमित्रा ने पहले कौशल्या दत्त डेढ़ अंश
खाया उससे लक्ष्मण का आविर्भाव हुआ । पश्चात् कैकेयी द्वारा दत्त डेढ़ अंश खाया उससे शत्रुघ्न का जन्म हुआ ।
रामाभिरामी टीका के दृष्टिकोण से भी ‘अर्धार्धभागाभ्याम्’ रघुवंश के इस पद्यांश का अर्थ है—स्वस्वलब्धांशसम्बन्ध्य-
र्धार्धभागाभ्याम् । स्वस्वलब्ध अंशसम्बन्धी अर्ध के अर्धभाग को दोनों ने सुमित्रा के लिए प्रदान किया । इससे नृसिंह-
पुराण की यह उक्ति भी अपने पिण्ड से अल्पम् अल्पम् ( थोड़ा-थोड़ा ) दोनों ने सुमित्रा को दिया, अपने समान भाग
नहीं दिया, सिद्ध होती है । पद्मपुराण उत्तरखण्ड के अनुसार राजा ने अपनी ज्येष्ठा और कनिष्ठा पत्नियों को देखकर
दिव्य पायस प्रदान किया । इसी बीच उनकी मध्यमा पत्नी सुमित्रा आ गयी । वह भी पुत्रकामा थी, उसको देखकर
कौशल्या और कैकेयी ने अपना आधा-आधा भाग सुमित्रा को प्रदान किया---
“स राजा तत्र दृष्ट्वाऽथ पत्नीं ज्येष्ठां कनीयसीम् ।
विभज्य पायसं दिव्यं प्रददौ सुसमाहितः ॥
एतस्मिन्नन्तरे पत्नी सुमित्रा तस्य मध्यमा ।
तत्समीपं प्रयाता सा पुत्रकामा सुलोचना ॥
तां दृष्ट्वा तत्र कौशल्या कैकेयी च सुमध्यमा ।
अर्धमर्धं प्रददतुस्ते तस्यै पायसं स्वयम् ॥” (पद्मपु० उत्तरखं० २४२।५९-६१)
अध्याय बालकाण्ड ४१३
एतावता यह भी निश्चित होता है कि सुमित्रा मध्यमा और कैकेयी कनीयसी पत्नी थी। इसी अध्याय में
तीनों को क्रमिक प्रथमा, द्वितीया और तृतीया भी कहा गया है—
“कोशलस्य नृपस्याथ पुत्रो सर्वाङ्गशोभना ।
कौशल्यां नाम तां कन्यामुपयेमे स पार्थिवः ॥
मागधस्य नृपस्याथ तनयात्र शुचिस्मिता ।
सुमित्रा नाम नाम्ना च द्वितीया तस्य भामिनी ।
तृतीया केकयस्याथ नृपतेर्दुहिता तथा ।
भार्याभूत् पद्मपत्राक्षी कैकेयी नाम नामतः ॥”
स्कन्दपुराण (नागरखण्ड अध्याय ९८) में यह भी कहा गया है—कौशल्या नाम की विख्याता ज्येष्ठ
पत्नी में प्रथम पुत्र राम उत्पन्न हुए, कनिष्ठा कैकेयी में भरत नामक पुत्र उत्पन्न हुए एवं सुमित्रा नाम्नी मध्यमा पत्नी
में शत्रुघ्न और लक्ष्मण उत्पन्न हुए—
“कौशल्या नाम विख्याता तस्य भार्या सुशोभना ।
ज्येष्ठा तस्यां सुतो जज्ञे रामाख्यः प्रथमः सुतः ॥
[साऽ]न्या कैकेयी नाम तस्य भार्या कनिष्ठिका ।
भरतो नाम विख्यातस्तस्याः पुत्रो भवत्यसौ ॥
सुमित्राख्या तथा अन्या पत्नी या मध्यमा स्थिता ।
शत्रुघ्नलक्ष्मणौ पुत्रौ तस्यां जातौ महाबलौ ॥”
(स्कन्दपु० नागरखं० ९८।१९–२२)
कुछ लोगों के अनुसार भरत और शत्रुघ्न कैकेयी के यमल पुत्र थे, इसके अनुसार “निज जननी के एक
कुमारा” की संगति लग जाती है।
“प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम् ।
कौशल्याऽजनयद्रामं दिव्यलक्षणसंयुतम् ॥” (वा० रा० १।१८।१०)
उत्तम ग्रह, नक्षत्र, लग्न आदि का उदय होने पर सर्वलोकनमस्कृत दिव्यलक्षणसम्पन्न जगदीश्वर राम
को कौशल्या ने जन्म दिया । रामाभिरामी के अनुसार सर्वलोकनमस्कृत से यह सूचित किया गया है कि प्रादुर्भाव-काल
में कौशल्या को भगवान् के विराट् रूप का दर्शन हुआ और उस रूप के दर्शन से विस्मित होकर कौशल्या ने उन्हें
नमस्कार किया और बालरूप धारण करने की प्रार्थना की एवं भगवान् बालरूप से प्रकट हुए ।
“विष्णोरधं महाभागं पुत्रमैक्ष्वाकुनन्दनम् ।
लोहिताक्षं महाबाहुं रक्तोष्ठं दुन्दुभिस्वनम् ॥” (वा० रा० १।१८।११)
रामाभिरामी के अनुसार इन श्लोकों का भी पूर्वोक्त श्लोकों के साथ समन्वय ही करना चाहिये तथा शङ्ख,
चक्र और अनन्त (शेष) से विशिष्ट विष्णु का अर्ध अर्थात् किञ्चित् न्यून भाग शङ्ख, चक्र और शेष हैं । शङ्खादि-
रहित विष्णु रामरूप में अवतीर्ण हुए ।
“भरतो नाम कैकेय्यां जज्ञे सत्यपराक्रमः ।
साक्षाद् विष्णोश्चतुर्भागः सर्वैः समुदितो गुणैः ॥” (वा० रा० १।१८।१३)
४१४ रामायणमीमांसा त्रयोदश
साक्षात् विष्णु का चतुर्भाग ( चतुर्थांश से न्यून भाग ) सर्वगुणों से युक्त सत्यपराक्रम भरत के रूप में प्रकट
हुआ, क्योंकि पूर्व श्लोकों की व्याख्या के अनुसार पायस के चतुर्थांश न्यून अर्धभाग से ही भरत का जन्म हुआ है।
मध्यमपदलोपी समास न समझने के कारण ही श्रीबुल्के आदि ने चतुर्भागः का चतुर्थ भाग अर्थ समझ लिया है, जो कि
पूर्व व्याख्या के सर्वथा विरुद्ध है। जब एक साधारण लेख के वाक्यों में भी पूर्वापर का विरोध परिहार करके समन्वय
किया जाता है, तब महान् आर्ष रामायण में समन्वय न करके विरोध व्यक्त करना अज्ञता ही है। भरत को पाञ्चजन्य
का अवतार समझना चाहिये ।
“अथ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ सुमित्राऽजनयत्सुतौ ।
वीरौ सर्वास्त्रकुशलो विष्णोरर्धसमन्वितौ ।” ( वा० रा० १।१८।१४ )
विष्णु के अर्ध भाग से समन्वित सर्वास्त्रकुशल लक्ष्मण और शत्रुघ्न को सुमित्रा ने उत्पन्न किया। यहाँ
अर्धशब्द भाग का बोधक है, अंश का नहीं; अतः पूर्वोक्त विभाग के अनुसार पायस के दो अष्टमांशों से लक्ष्मण और
शत्रुघ्न की उत्पत्ति हुई। उपर्युक्त मतभेदों का समाधान कल्पभेद से कर लेना चाहिये । श्रीतुलसीदासजो ने भी अपनी
एक स्वतन्त्र परम्परा का निर्देश रामचरितमानस में किया है। उन्होंने बताया है कि श्रीभगवान् शिव ने मानस का
निर्माण करके अपने मन में रखा था। उसी को उन्होंने शिवा (पार्वती) से कहा था। शिव ने ही काकभुशुण्डि को भी
दिया । भुशुण्डि से याज्ञवल्क्य ने पाया। उन्होंने भरद्वाज को सुनाया। उसे मेरे गुरु ने सूकरक्षेत्र में मुझे प्रदान किया
था। जिन्होंने यह कथा नहीं सुनी हो, उन्हें आश्चर्य नहीं करना चाहिये, क्योंकि हरि अनन्त हैं। उनके गुण, कर्म
और नाम भी अनन्त हैं। उनके विविध अवतार होते हैं, अतः किसी कल्प के अनुसार इस कथा की भी संगति लगा
लेनी चाहिये ।
“संभु कीन्ह यह चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा ॥
सोइ शिव काकभुसुंडिहि दीन्हा । रामभगत अधिकारी चीन्हा ॥
तेहिसन जागबलिक मुनि पावा । तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा ॥”
( रा० मा० १।२९ (ग) । २, ३ )
“मैं पुनि निज गुरुसन सुनी कथा सो सूकरखेत ।” ( रा० मा० १।३० (क) )
“जेहि यह कथा सुनी नहि होई। जनि आचरजु करै सुनि सोई ॥
राम कथा कै मिति जग नाही । असि प्रतीति तिनके मन माही ॥
नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा ॥
कलप भेद हरि चरित सुहाये । भाँति अनेक मुनीसन गाये ॥”
( रा० मा० १।३२।२-४ )
रामकथा की इयत्ता नहीं है। राम के अवतार अनेक प्रकार के होते हैं। रामायण शतकोटिप्रविस्तर है ।
कल्पभेद से मुनीशों ने अनेक प्रकार के चरित्रों का वर्णन किया है। यद्यपि तुलसीदास अपने रामचरितमानस को
नानापुराणनिगमागमसम्मत मानते हैं तथापि क्वचिदन्यतोऽपि से परम्पराप्राप्त अन्यान्य वस्तुओं का प्रवेश भी उन्हें मान्य
प्रतीत होता है। इसी दृष्टि से रामचरितमानस का चरु-विभाग वाल्मीकि आदि से विलक्षण प्रतीत होता है। उसके
अनुसार पायस का अर्ध भाग कौशल्या को प्रदान किया गया। उससे राम का आविर्भाव हुआ। आधे में दो भाग
करके एक भाग कैकेयी को प्रदान किया गया, जिससे भरत का जन्म हुआ। अवशिष्ट अर्ध में दो विभाग कर एक-एक
भाग कौशल्या और कैकेयी के हाथ से सुमित्रा को दिया गया। उनमें से कौशल्यादत्त भाग से रामानुज लक्ष्मण का
प्रादुर्भाव एवं कैकेयीदत्त चरुभाग से भरतानुज शत्रुघ्न का आविर्भाव हुआ। टीकानिरपेक्ष मूल वाल्मीकि के ( १।१६।
अध्याय बालकाण्ड ४१५
२७) और (१८।११) के अनुसार भी चरु के अर्ध भाग से राम का आविर्भाव स्पष्टतया सिद्ध है। किन्तु अन्य
भागों में वाल्मीकिरामायण रामचरितमानस में भिन्नता है। शङ्ख, चक्र और शेष सहित विष्णु की अपेक्षा केवल
विष्णु अर्ध समझे जा सकते हैं, अर्ध भाग में शङ्ख, चक्र और शेष समझे जा सकते हैं। वासुदेव, संकर्षण,
प्रद्युम्न और अनिरुद्ध की दृष्टि से क्रमेण राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का आविर्भाव समझना चाहिये ।
माण्डूक्य उपनिषद् की दृष्टि से राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न को क्रमशः तुरीय ब्रह्म, आनन्दमय, हिरण्यगर्भ और
विराद् समझना चाहिये । नृसिंहतापनीय उपनिषद् की दृष्टि से ओत अर्थात् विराट् तुरीय को शत्रुघ्न, अनुज्ञाता
हिरण्यगर्भ तुर्य को लक्ष्मण, अनुज्ञा आनन्दमय (अव्याकृत) तुरीय को भरत और अविकल्प तुर्य तुरीय को राम
समझना चाहिये ।
“क्वेषानुज्ञेत्येष एवात्मेति होवाच । ते होचुर्नमस्तुभ्यं वयं त इति ह प्रजापतिर्देवाननुशशासेति ।
ओतमोतेन जानीयादनुज्ञातारमान्तरम् । अनुज्ञामद्वयं लब्ध्वा उपद्रष्टारमाव्रजेदित्युपद्रष्टारमाव्रजेदिति ।
( नृसिंहोत्तरतापनीय खण्ड ९ )
“अथ तुरीयेण ओतश्च प्रोतश्च ह्यायमात्मा नृसिंहोऽस्मिन् सर्वमयं सर्वात्मार्यं हि सर्वं नैवौतोऽद्वयो
ह्यायमात्मकल एवाविकल्पः । नहि वस्तु सदयं ह्योत इय सद्धनोऽयं चिद्धनः····। अनुज्ञाता ह्यायमात्मैष ह्यस्य
सर्वस्य स्वात्मानमनुजानाति ।
ओमिति ह्यानुजानाति····················································
अनुज्ञैकरसो ह्यायमात्मा···········································
न ह्ययमोतो नानुज्ञाता·············································
अनुज्ञैकरसो ह्ययमोङ्कारः···························ओङ्कारकश्चिदेवानुज्ञा ।
“अविकल्पो ह्ययमोङ्कारः····परमेश्वर एवैकमेव तद्भवत्यविकल्पोऽपि नात्र काचन भिदास्ति
नैव तत्र काचन हि भिदास्त्यत्र भिदामिव मन्यमानः शतधा सहस्रधा भिन्नो मृत्योर्मृत्युमाप्नोति ।”
( नृ० उ० ता० खण्ड ८ )
“अनुज्ञाया निर्विकल्पस्य चान्तरत्वमवगन्तव्यम् ।” ( शां० भा० )
रामतापनीय की दृष्टि से अकाराक्षरसंभूत लक्ष्मण विश्व या विराट् हैं, उकाराक्षरसंभूत शत्रुघ्न तैजस या
हिरण्यगर्भ हैं, मकाराक्षरसंभूत भरत अव्याकृत या प्राज्ञ हैं एवं अर्धमात्रासंभूत राम तुरीय ब्रह्म हैं—
“अकाराक्षरसंभूतः सौमित्रिर्विश्वभावनः ।
उकाराक्षरसंभूतः शत्रुघ्नस्तैजसात्मकः ॥
प्राज्ञात्मकस्तु भरतो मकाराक्षरसंभवः ।
अर्धमात्रात्मको रामः ब्रह्मानन्दैकविग्रहः ॥
विश्वभावनो विरड्रूपः जाग्रदभिमानी संकर्षणः । तैजसात्मकः स्वप्नाभिमानी शत्रुघ्नः
प्रद्युम्नः । प्राज्ञात्मकः सुषुप्ताभिमानी भरतः ।
“रामस्तुरीयावस्थं ब्रह्म वासुदेवात्परम् श्रीरामसान्निध्यवशाज्जगदानन्ददायिनी । उत्पत्ति-
स्थितिसंहारकारिणी सर्वदेहिनाम् ।। सा सीता भवति ज्ञेया मूलप्रकृतिसंज्ञिता । ( बिन्द्वीशवाच्या कार्योन्मुखी
नादांशवाच्या शक्तिशान्तारूपे अप्प्रवस्थे अस्या एव । ) प्रणवत्वात् प्रकृतिरिति वदन्ति ब्रह्मवादिनः ॥”
वस्तुतः रामतापनीय के सौमित्रि शब्द का शत्रुघ्न अर्थ करना चाहिये और शत्रुघ्न शब्द का यौगिक अर्थ
शत्रुहन्ता लक्ष्मण करना अभीष्ट है। जिस प्रकार गीता में--
"भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥” (गी० ७।४) ।
इस श्लोक में मन का अर्थ अहङ्कार, बुद्धि का अर्थ महत्तत्त्व और अहङ्कार का अर्थ अव्यक्त तत्त्व करके
अष्ट प्रकृतियों की गणना की जाती है। प्रकृत में भी वैसा ही समझना चाहिये। इस दृष्टि से पायस को निर्विशेष तथा
सविशेष उभयविध सम्पूर्ण ब्रह्म समझना चाहिये। (एको विष्णोर्महद्भूतम् ) पायस का प्रथम अर्धभाग अर्धमात्रालक्ष्य
निर्विशेष ब्रह्म का प्रतीक है। उसी से राम का प्रादुर्भाव है। द्वितीय अर्धभाग को स्थूल-सूक्ष्म कार्यब्रह्म और कारण-
ब्रह्मरूप सविशेष ब्रह्म का प्रतीक समझना चाहिये। सविशेष के प्रथम दो विभाग हुए कारण और कार्य विभाग।
कारण विभाग के प्रतीकरूप प्रथम भाग से भरत का आविर्भाव है और द्वितीय भाग के सूक्ष्म और स्थूल कार्य के भेद
से पुनः दो विभाग हुए । सूक्ष्म कार्यब्रह्म का लक्ष्मण और स्थूल कार्यब्रह्म का शत्रुघ्न के रूप में आविर्भाव हुआ। कार्य
में स्पष्टता होने के कारण लक्ष्मण और शत्रुघ्न का गौर रूप है। कारण एवं कारणातीत निर्विशेष ब्रह्म में अव्यक्तता
के कारण नीलाम्बुजश्यामलता है। निराकार आकाश की श्यामलता के समान ही निराकार कारण और तुरीय ब्रह्म
को श्यामल समझा जा सकता है। परन्तु एक दृष्टि से लक्ष्मण को ही शेष, अनन्त या अव्याकृत कहा गया है।
अव्याकृतब्रह्म अक्षरब्रह्म को ही व्यापी वैकुण्ठ एवं भगवान् का आसन शेष (अनन्त) या सिंहासन माना जाता है।
शेष शब्द अव्याकृत या कारणब्रह्म है, क्योंकि प्रपञ्च-प्रलय के बाद वही अवशिष्ट रहता है। "शिष्यते यः स शेषः"
जो बाकी बचता है वही शेष है।
"नष्टे लोके द्विपरार्द्धावसाने महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु ।
व्यक्तेऽव्यक्तं कालवेगेन याते भवानेकः शिष्यते शेषसंज्ञः ॥” (भा० पु० १०।३।२५)
प्रलयकाल में सब लोकों के नष्ट होने पर सब भूत, भूतादि अहङ्कार में लीन हो जाते हैं। व्यक्त अहङ्कार,
महान् आदि भी अव्यक्त में प्रलीन हो जाते हैं। तब केवल आप ही रह जाते हैं, अतः आपकी शेषसंज्ञा होती है।
अकार-प्रश्लेष से अशेष संसार की संज्ञा (शान्त) आप में होती है। इस दृष्टि से शेष ही संकर्षण या कारणब्रह्म होते
हैं और वे अनन्यभक्ति से सर्वशेषी भगवान् का अपने को शेष (अङ्ग) बना देते हैं। अपने आपको ही भगवान् की
शय्या, सिंहासन, पादुका आदि बनाकर अपने आप को ही पहरेदार या अङ्गरक्षक बना देते हैं, इसलिए भी वे शेष
हैं। जो अपने आपको मुख्य भगवान् का अङ्ग बना देता है वही अशेष अर्थात् सब कुछ होता है। इसी दृष्टि से
वाल्मीकिरामायण में अवशिष्ट पायस के अर्धांश सविशेष ब्रह्म का अर्धांश कारण ब्रह्मांश सुमित्रा को दिया गया है
और उससे लक्ष्मण का आविर्भाव हुआ। शेष अर्ध अर्थात् कार्यब्रह्म में दो विभाग किये गये एक सूक्ष्म कार्यब्रह्म और
अन्य स्थूल कार्यब्रह्म दोनों ही कैकेयी को प्रदान किये गये। उनमें से एक भाग स्थूल कार्य ब्रह्मरूप पुनः सुमित्रा
को दिया गया। उसीसे शत्रुघ्न की उत्पत्ति हुई। सूक्ष्म कार्यब्रह्म का कैकेयी से भरत के रूप में प्रादुर्भाव हुआ। उन
दोनों भागों को शङ्ख और चक्र रूप भी कहा जा सकता है। श्रीराम के अनन्त यशःसौरभ तथा विजय के ज्ञापक
पाञ्चजन्य शङ्खरूप भरत हैं।
"रघुपतिकीरति विमल पतका। दण्ड समान भयो जस जाका ॥”
( रा० मा० १।१६।३ )
दैत्यादि शत्रुओं का सूदन करनेवाला चक्र ही श्रीरिपुदमन शत्रुघ्न के रूप में प्रकट हुआ। इस तरह दोनों
ही पक्षों का कल्पभेद एवं अभिप्रायभेद से समन्वय है। नृसिंहपुराण, पद्मपुराण, रघुवंश आदि के अनुसार कारण
एवं कारणातीत अव्यक्त होने से पायस का जो प्रथमार्ध भाग है, वह कौशल्या को प्रदान किया गया। उसी में से
कारणांश अर्ध या अल्पांश सुमित्रा को दिया गया जिससे लक्ष्मण की उत्पत्ति हुई। कारणातीत ब्रह्मांश से कौशल्या ने
राम को जन्म दिया। सूक्ष्म और स्थूल उभय कार्यब्रह्मामय पायसार्द्ध कैकेयी को प्रदान किया गया। उसी में से कैकेयी
ने अर्ध या अल्प स्थूल कार्यब्रह्मात्मक अंश सुमित्रा को प्रदान किया। उसीसे शत्रुघ्न की उत्पत्ति हुई। शेष सूक्ष्म
कार्यब्रह्मात्मक भाग से कैकेयी में भरत का आविर्भाव हुआ। यहाँ भी सूक्ष्म व्यापक ब्रह्म की अपेक्षा स्थूल ब्रह्म व्याप्य
एवं अल्प ही होता है। पृथिवी, जल, वायु आदि में पृथिव्यादि कार्यों की अपेक्षा जलादि कारणों में उत्तरोत्तर
व्यापकता, सूक्ष्मता तथा स्वच्छता श्रुति, स्मृति एवं युक्तियों से भी सिद्ध ही है। इस तरह इन पक्षों में विरोध की
कल्पना न कर समन्वय ही समझना चाहिये। साङ्गोपाङ्ग सविशेष अथवा निर्विशेष विष्णु ही चार रूपों में विभक्त
होकर राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के रूप में प्रकट हुए, अतः हरिवंश आदि के श्लोकों की भी संगति लग
जाती है। "कृत्वात्मानं महाबाहुश्चतुर्धा प्रभुरीश्वरः ।” इस वचन में यह नहीं कहा गया है कि चारों भाग बराबर
ही थे। यदि वैसा कहा भी हो तो भी पूर्ण के सब अंश पूर्ण ही होते हैं, इस दृष्टि से साम्यकथन भी सङ्गत
हो सकेगा।
वासुदेव, संकर्षण आदि का राम आदि के रूप में प्रादुर्भाव हुआ है, यह पक्ष भी विष्णुधर्मोत्तर (अ०
२१२) तथा नारदपुराण (उत्तरखण्ड अ० ७५) के अनुसार ठीक ही है । ये पुराण भी आस्तिकों की दृष्टि से
परम प्रमाण हैं। इनमें बुद्धि, चित्त, अहङ्कार एवं अन्तर्यामी का ही क्रमेण राम आदि के रूप में प्रादुर्भाव समझना
चाहिये ।
श्रीबुल्के का बाद की अधिकांश कथाओं में राम विष्णु के पूर्ण अवतार माने गये हैं, यह कहना असङ्गत
है, क्योंकि वस्तुतः सभी कथाओं में राम का पूर्णावतार ही माना गया है। जहाँ कहीं "अंशेनावततार" कहा गया
है। उसका समन्वय करके अंशेन भरतादिना अथवा ज्ञानैश्वर्यादिना अर्थात् भरतादि अंशों के साथ अथवा दिव्य ज्ञान,
ऐश्वर्य आदि के साथ पूर्णतम भगवान् अवतीर्ण हुए यही अर्थ समझना चाहिये, क्योंकि वाल्मीकिरामायण में भगवान्
की स्तुति करते हुए ब्रह्मादि देवता स्पष्ट कहते हैं कि आप आदिकर्ता स्वयंप्रभु नारायण हैं।
“त्रयाणामपि लोकानामादिकर्ता स्वयंप्रभुः ।” (वा० रा० ६।११७।७ )
“भवान्नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः ।” (वा० रा० ६।११७।१३)
इसी तरह "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्” ( भाग० पु० १।३।२८) में भी कृष्ण को स्वयं भगवान् माना
गया है, अंश नहीं।
तिब्बती रामायण में विष्णु एवं विष्णु के पुत्र का राम और लक्ष्मण के रूप में अवतार वर्णन है। किन्तु
उसपर अनीश्वरवादी बौद्धों का प्रभाव होने से वह वाल्मीकिरामायण के तुल्य प्रमाण नहीं है।
नृसिंहपुराण (अ० ४७), देवीपुराण (१।३०) आदि में तथा जावा के सेरतकाण्ड में लक्ष्मण को
शेषावतार कहा गया है, यह ठीक है। नृसिंहपुराण को परवर्ती कहना अनभिज्ञता ही है। रघुवंश के टीकाकार
मल्लिनाथ ने तो रघुवंश के चरुविभाग का आधार ही नृसिंहपुराण को माना है। इसी तरह "भरतशत्रुघ्नौ शङ्खचक्रे”
अध्यात्मरामायण (१।४।१८) तथा "शङ्खचक्रे द्वे भरतं सानुजम्” ( ३।२।१६ ) ।
"शङ्खो बभूव भरतः श्रीविष्णोः सव्यसत्करे ।
वामे करे बभूवास्य शत्रुघ्नश्च सुदर्शनम् ।” (अ० रा० ९।६।१६ )
५३
पद्मपुराण (उत्तरखण्ड १६९।९३-९५), रामरहस्य (अ० ३) आदि में भी इसी तरह का प्रतिपादन
है। रामरहस्य आदि को अर्वाचीन कहना भी असङ्गत है। इसी तरह आनन्दरामायण (३।९।४७) में
“बभूवस्तुश्चक्रदरो कैकेयीसूनुलंक्षणान्तकश्च।।” में भरत को चक्र और शत्रुघ्न को शङ्ख कहा गया है। उदारराघव
(सर्ग २), तत्त्वसंग्रहरामायण (१।१४) तथा काश्मीरीरामायण (२।१३) में भी भरत और शत्रुघ्न को क्रमशः
चक्र और शङ्ख का अवतार माना गया है। इस परिवर्तन को कल्पान्तरीय ही मानना उचित है। इसी तरह
लिङ्गपुराण (२।५।१४७, १४८) तथा अद्भुतरामायण (४।६६, ६७) में भरत और शत्रुघ्न को विष्णु की दाईं
और बाईं बाहुओं का अवतार माना गया है। इसका अभिप्राय यही है कि वे दोनों राम की दाईं और बाईं भुजाओं
के तुल्य सहायक एवं प्रिय हैं। जैसा कि वाल्मीकिरामायण में लक्ष्मण के सम्बन्ध में कहा गया है कि वे राम के
बहिर्श्वर प्राण ही थे—“नित्यं प्राणो बहिश्चरः ।'” पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ का यह कथन कि चक्र भरत हैं और
शङ्ख लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न दोनों के रूप अवतीर्ण हुए हैं, प्रामाणिक नहीं है, क्योंकि भारत की ही सुनी सुनायी बातों
का पाश्चात्यों ने विकृतरूप में वर्णन किया है ।
रामकियेन (अ० २) के अनुसार भरत को चक्र और शत्रुघ्न को गदा मानना भी वैसा ही है । सारला-
दास के उड़ियामहाभारत वनपर्व (पृ० २२८) में विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र तथा महादेव राम, शत्रुघ्न, भरत तथा लक्ष्मण के
रूप में प्रकट हुए, इस कथन का आधार उपनिषद् ही हैं। रामतापनीय उपनिषद् आदि के अनुसार विराट् ब्रह्मा का
शत्रुघ्न रूप स्वीकृत है। राम को शुद्ध ब्रह्म, विष्णु या इन्द्र को भरत और अव्याकृत महादेव को लक्ष्मण कहा जा
सकता है। तारसार उपनिषद् के अनुसार शिव का हनुमान् के रूप में, विष्णु का सुग्रीव के रूप में तथा ब्रह्मा का
जाम्बवान् के रूप में एवं नाद, बिन्दु, कला, कलातीत तथा परतत्त्व तत्त्वों का शत्रुघ्न, भरत, लक्ष्मण, सीता और राम
के रूप में प्रादुर्भाव माना गया है । (देखिये उपनिषद्ब्रा० में)
बुल्के का यह कहना अशुद्ध है कि अवतारवाद का विकास हुआ है । रामतापनीय उपनिषद्, जो सनातनी
जगत् की दृष्टि में वेद है, उसमें राम को परब्रह्म का अवतार माना गया है, अतएव राम को अवतार मानना विकास
नहीं है, किन्तु स्वाभाविक वस्तु का वर्णन है। बुल्के साहब के परम प्रमाण युद्धकाण्ड में भी राम को ऋत ब्रह्म
स्वरूप ही माना गया है !
“अक्षरं ब्रह्म सत्यं च मध्ये चान्ते च राघव ।” (वा० रा० ६।११७।१४)
“त्वं त्रयाणां हि लोकानामादिकर्ता स्वयंप्रभुः । ........त्वमोङ्कारः परात्परः ॥”
(६।११७।१८, १९) ।
पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ४६) में राम का शिव से यह कहना ठीक है कि हममें और तुममें अन्तर
(भेद) समझनेवाले अज्ञ हैं, ऐसे लोगों को नरक की यातना भोगनी पड़ेगी । बुल्के ऐसी बातों से परस्पर शास्त्रवचनों
का विरोध दिखाकर अवतारवाद को अर्वाचीन कल्पनामात्र कहना चाहते हैं। परन्तु वे समन्वय की पद्धति न जानने
के कारण ही ऐसी भ्रान्तियों से ग्रस्त हुए हैं ।
“ममासि हृदये शर्व भवतो हृदयं त्वहम् ।
आवयोरन्तरं नास्ति मूढाः पश्यन्ति दुर्धियः ॥
ये भेदं विदधत्यद्धा आवयोरेकरूपयोः ।
कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते नराः कल्पसहस्रकम् ॥”
(पद्मपु० पातालखं० ४६।२०, २१)
यह ठीक ही है। कृत्तिवासरामायण के अनुसार दुर्गा का यह कहना भी ठीक ही है कि राम शिव के
गुरु हैं, उनमें भेद नहीं है। रामचरितमानस में भी शिव एवं राम को अभिन्न कहा गया है । वहाँ तो शिवजी को
अध्याय बालकाण्ड ४१९
राम का सेवक, स्वामी और सखा भी कहा गया है—
“सेवक स्वामि सखा सियपिय के ।” ( रा० मा०, १।१४।२ )
जो शिवभक्त नहीं है वह राम को कभी भी नहीं सुहाता है—
“सिवपद कमल जिन्हहि रति नाहीं ।
रामहिं ते सपनेहु न सोहाहीं ॥” ( रा० मा० १।१०३।३ ) ।
इसी तरह आनन्दरामायण ( मनोहरखण्ड ७।१२ ), रामलिङ्गामृत ( सर्ग १० ) तथा धर्मखण्ड
( अध्याय २९ ) में राम और शिव का अभेद कहना भी उचित ही है ।
“त्वं विष्णुर्जानकी लक्ष्मीः शिवस्त्वं जानकी शिवा ।
ब्रह्मा त्वं जानकी वाणी सूर्यस्त्वं जानकी प्रभा ॥”
( अ० रा० २।१।१३ )
हे राम आप विष्णु हैं एवं जानकी लक्ष्मी हैं। इसी तरह आप दोनों ही शिव एवं पार्वती, ब्रह्मा और
वाणी, सूर्य तथा प्रभा हैं। इतना ही क्यों अध्यात्मरामायण में यह भी कहा गया है कि लोक में जितने पुरुष हैं सब
आप हैं और सभी स्त्रियां जानकी हैं ।
आनन्दरामायण के अनुसार—“राम एवात्र कृष्णः स कृष्ण एवात्र राघवः । उभयोर्नान्तरम्”
( १।११४ ) । राम ही कृष्ण हैं और कृष्ण ही राम हैं। दोनों में अन्तर नहीं है । वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड में
भी राम को कृष्ण कहा गया है “कृष्णश्चैव बृहद्बलः ।” ( वा० रा० ६।११७।१५ ) । कृष्णोपनिषद् के अनुसार
राम ही कृष्ण हुए हैं । तत्त्वसंग्रहरामायण आदि के अनुसार शिव, ब्रह्मा और हरि त्रिमूति सच्चिदानन्द ब्रह्म के
अवतार राम हैं । बलरामदासरामायण के अनुसार विष्णु ही राम आदि चारों भाइयों के रूप में अवतरित होते हैं
और लक्ष्मी ही सीता के रूप में प्रकट होती हैं ।
आरण्यकाण्ड के मङ्गलाचरण और दण्डकारण्य के वृत्तान्त में उड़िया के लोकप्रिय देवताओं को भी
राम से अभिन्न कहा गया है । तदनुसार राम, सीता और लक्ष्मण को क्रमशः जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलभद्र से अभिन्न
माना जाता है। इसमें भी कोई असङ्गति नहीं है ।
बौद्धों के ग्रन्थों में राम को बोधिसत्त्व माना गया है । कहीं-कहीं बुद्ध को भी राम का अवतार माना
गया है ।
“यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ॥” ( गी० १०।४१ )
के अनुसार सभी उत्कृष्ट विभूतियाँ भगवान् के ही अंश हैं । इस दृष्टि से बुद्ध भी भगवान् के ही तेजोंश
से उद्भूत हों यह स्वाभाविक है ।
जैन कथाओं में राम आदि के पूर्वजन्म की कथा का विशेष वर्णन किया गया है। उसमें
उनका उद्देश्य राम का अनीश्वरत्व वर्णन ही है, क्योंकि जैन अनीश्वरवादी होते हैं। राम का ईश्वरत्व
तथा वैदिक मार्गरक्षकत्व आदि उनके धर्म के विरुद्ध हैं। इसी लिए जैनों ने वाल्मीकिरामायण तथा
पुराणों की प्रसिद्ध राम-कथाओं को विकृत कर अपने ग्रन्थ निर्मित किये। श्रीबुल्के ने भी यह स्वीकार-
किया है कि जैन राम-कथा वाल्मीकिरामायण का ही विकृत रूप है ।