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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 496

अध्याय बालकाण्ड ४१९
राम का सेवक, स्वामी और सखा भी कहा गया है—
“सेवक स्वामि सखा सियपिय के ।” ( रा० मा०, १।१४।२ )
जो शिवभक्त नहीं है वह राम को कभी भी नहीं सुहाता है—
“सिवपद कमल जिन्हहि रति नाहीं ।
रामहिं ते सपनेहु न सोहाहीं ॥” ( रा० मा० १।१०३।३ ) ।
इसी तरह आनन्दरामायण ( मनोहरखण्ड ७।१२ ), रामलिङ्गामृत ( सर्ग १० ) तथा धर्मखण्ड
( अध्याय २९ ) में राम और शिव का अभेद कहना भी उचित ही है ।
“त्वं विष्णुर्जानकी लक्ष्मीः शिवस्त्वं जानकी शिवा ।
ब्रह्मा त्वं जानकी वाणी सूर्यस्त्वं जानकी प्रभा ॥”
( अ० रा० २।१।१३ )
हे राम आप विष्णु हैं एवं जानकी लक्ष्मी हैं। इसी तरह आप दोनों ही शिव एवं पार्वती, ब्रह्मा और
वाणी, सूर्य तथा प्रभा हैं। इतना ही क्यों अध्यात्मरामायण में यह भी कहा गया है कि लोक में जितने पुरुष हैं सब
आप हैं और सभी स्त्रियां जानकी हैं ।
आनन्दरामायण के अनुसार—“राम एवात्र कृष्णः स कृष्ण एवात्र राघवः । उभयोर्नान्तरम्”
( १।११४ ) । राम ही कृष्ण हैं और कृष्ण ही राम हैं। दोनों में अन्तर नहीं है । वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड में
भी राम को कृष्ण कहा गया है “कृष्णश्चैव बृहद्बलः ।” ( वा० रा० ६।११७।१५ ) । कृष्णोपनिषद् के अनुसार
राम ही कृष्ण हुए हैं । तत्त्वसंग्रहरामायण आदि के अनुसार शिव, ब्रह्मा और हरि त्रिमूति सच्चिदानन्द ब्रह्म के
अवतार राम हैं । बलरामदासरामायण के अनुसार विष्णु ही राम आदि चारों भाइयों के रूप में अवतरित होते हैं
और लक्ष्मी ही सीता के रूप में प्रकट होती हैं ।
आरण्यकाण्ड के मङ्गलाचरण और दण्डकारण्य के वृत्तान्त में उड़िया के लोकप्रिय देवताओं को भी
राम से अभिन्न कहा गया है । तदनुसार राम, सीता और लक्ष्मण को क्रमशः जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलभद्र से अभिन्न
माना जाता है। इसमें भी कोई असङ्गति नहीं है ।
बौद्धों के ग्रन्थों में राम को बोधिसत्त्व माना गया है । कहीं-कहीं बुद्ध को भी राम का अवतार माना
गया है ।
“यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ॥” ( गी० १०।४१ )
के अनुसार सभी उत्कृष्ट विभूतियाँ भगवान् के ही अंश हैं । इस दृष्टि से बुद्ध भी भगवान् के ही तेजोंश
से उद्भूत हों यह स्वाभाविक है ।
जैन कथाओं में राम आदि के पूर्वजन्म की कथा का विशेष वर्णन किया गया है। उसमें
उनका उद्देश्य राम का अनीश्वरत्व वर्णन ही है, क्योंकि जैन अनीश्वरवादी होते हैं। राम का ईश्वरत्व
तथा वैदिक मार्गरक्षकत्व आदि उनके धर्म के विरुद्ध हैं। इसी लिए जैनों ने वाल्मीकिरामायण तथा
पुराणों की प्रसिद्ध राम-कथाओं को विकृत कर अपने ग्रन्थ निर्मित किये। श्रीबुल्के ने भी यह स्वीकार-
किया है कि जैन राम-कथा वाल्मीकिरामायण का ही विकृत रूप है ।