रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 494, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवं कारणातीत अव्यक्त होने से पायस का जो प्रथमार्ध भाग है, वह कौशल्या को प्रदान किया गया। उसी में से
कारणांश अर्ध या अल्पांश सुमित्रा को दिया गया जिससे लक्ष्मण की उत्पत्ति हुई। कारणातीत ब्रह्मांश से कौशल्या ने
राम को जन्म दिया। सूक्ष्म और स्थूल उभय कार्यब्रह्मामय पायसार्द्ध कैकेयी को प्रदान किया गया। उसी में से कैकेयी
ने अर्ध या अल्प स्थूल कार्यब्रह्मात्मक अंश सुमित्रा को प्रदान किया। उसीसे शत्रुघ्न की उत्पत्ति हुई। शेष सूक्ष्म
कार्यब्रह्मात्मक भाग से कैकेयी में भरत का आविर्भाव हुआ। यहाँ भी सूक्ष्म व्यापक ब्रह्म की अपेक्षा स्थूल ब्रह्म व्याप्य
एवं अल्प ही होता है। पृथिवी, जल, वायु आदि में पृथिव्यादि कार्यों की अपेक्षा जलादि कारणों में उत्तरोत्तर
व्यापकता, सूक्ष्मता तथा स्वच्छता श्रुति, स्मृति एवं युक्तियों से भी सिद्ध ही है। इस तरह इन पक्षों में विरोध की
कल्पना न कर समन्वय ही समझना चाहिये। साङ्गोपाङ्ग सविशेष अथवा निर्विशेष विष्णु ही चार रूपों में विभक्त
होकर राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के रूप में प्रकट हुए, अतः हरिवंश आदि के श्लोकों की भी संगति लग
जाती है। "कृत्वात्मानं महाबाहुश्चतुर्धा प्रभुरीश्वरः ।” इस वचन में यह नहीं कहा गया है कि चारों भाग बराबर
ही थे। यदि वैसा कहा भी हो तो भी पूर्ण के सब अंश पूर्ण ही होते हैं, इस दृष्टि से साम्यकथन भी सङ्गत
हो सकेगा।
वासुदेव, संकर्षण आदि का राम आदि के रूप में प्रादुर्भाव हुआ है, यह पक्ष भी विष्णुधर्मोत्तर (अ०
२१२) तथा नारदपुराण (उत्तरखण्ड अ० ७५) के अनुसार ठीक ही है । ये पुराण भी आस्तिकों की दृष्टि से
परम प्रमाण हैं। इनमें बुद्धि, चित्त, अहङ्कार एवं अन्तर्यामी का ही क्रमेण राम आदि के रूप में प्रादुर्भाव समझना
चाहिये ।
श्रीबुल्के का बाद की अधिकांश कथाओं में राम विष्णु के पूर्ण अवतार माने गये हैं, यह कहना असङ्गत
है, क्योंकि वस्तुतः सभी कथाओं में राम का पूर्णावतार ही माना गया है। जहाँ कहीं "अंशेनावततार" कहा गया
है। उसका समन्वय करके अंशेन भरतादिना अथवा ज्ञानैश्वर्यादिना अर्थात् भरतादि अंशों के साथ अथवा दिव्य ज्ञान,
ऐश्वर्य आदि के साथ पूर्णतम भगवान् अवतीर्ण हुए यही अर्थ समझना चाहिये, क्योंकि वाल्मीकिरामायण में भगवान्
की स्तुति करते हुए ब्रह्मादि देवता स्पष्ट कहते हैं कि आप आदिकर्ता स्वयंप्रभु नारायण हैं।
“त्रयाणामपि लोकानामादिकर्ता स्वयंप्रभुः ।” (वा० रा० ६।११७।७ )
“भवान्नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः ।” (वा० रा० ६।११७।१३)
इसी तरह "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्” ( भाग० पु० १।३।२८) में भी कृष्ण को स्वयं भगवान् माना
गया है, अंश नहीं।
तिब्बती रामायण में विष्णु एवं विष्णु के पुत्र का राम और लक्ष्मण के रूप में अवतार वर्णन है। किन्तु
उसपर अनीश्वरवादी बौद्धों का प्रभाव होने से वह वाल्मीकिरामायण के तुल्य प्रमाण नहीं है।
नृसिंहपुराण (अ० ४७), देवीपुराण (१।३०) आदि में तथा जावा के सेरतकाण्ड में लक्ष्मण को
शेषावतार कहा गया है, यह ठीक है। नृसिंहपुराण को परवर्ती कहना अनभिज्ञता ही है। रघुवंश के टीकाकार
मल्लिनाथ ने तो रघुवंश के चरुविभाग का आधार ही नृसिंहपुराण को माना है। इसी तरह "भरतशत्रुघ्नौ शङ्खचक्रे”
अध्यात्मरामायण (१।४।१८) तथा "शङ्खचक्रे द्वे भरतं सानुजम्” ( ३।२।१६ ) ।
"शङ्खो बभूव भरतः श्रीविष्णोः सव्यसत्करे ।
वामे करे बभूवास्य शत्रुघ्नश्च सुदर्शनम् ।” (अ० रा० ९।६।१६ )
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