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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

तृतीय तरंग ५९९
काश्मीरेषु घनोदग्रमग्रहारं द्विजन्मनाम् ।
राजा मडवराज्ये यो भेडराख्यमकारयत् ॥४८१॥
४८१. जिस राजा ने कश्मीर में मडव१ राज्य गत प्रभूत धन (पूर्ण) भेडर२ (ग्राम)
ब्राह्मणों को अग्रहार में प्रदान किया ।
विशां विपाटितारिष्टमरिष्टोत्सादने व्यधात् ।
वल्लभा यस्य बिम्बोष्ठी बिम्बा विश्वेश्वरं हरम् ॥४८२॥
४८२. जिसकी बिम्बोष्ठी 'बिम्बा' नाम्नी प्रिया ने अरिष्टोत्सादन में मनुष्यों के
अनिष्ट नष्ट कर्ता विश्वेश्वर शिव (हर) को स्थापित किया ।
भ्रातरो मन्त्रिणस्तस्य त्रयो मठसुरौकसः ।
सेतोश्च कारका आसन् खङ्गशत्रुघ्नमालवाः ॥४८३॥
४८३. खङ्ग, शत्रुघ्न एवं मालव नामक उसके तीन मन्त्रिवन्धुओं ने मठ, देवालय
एवं सेतु निर्माण कराया ।
विलसन का मत है कि राजा ने विहार मन्दिर
आदि का अपनी विदेशी प्रजा के कश्मीर में आकर
ठहरने के लिए निर्माण कराया था ।
विर्दउद्दीन इस राजा को ईरान के राजा
एज्दजर्द का समकालीन कहता है । उसने उत्तरीय
पूर्वीय ईरान के जिलो को जीत लिया था । किन्तु
यहाँ पर उसने बालादित्य को भ्रम से प्रतापादित्य
समझ लिया है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४८१ में 'भेडरा' का पाठभेद
'भेरडा' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
४८१ (१) मडवराज्य : तरंग २ : १५ पाद
टिप्पणी द्रष्टव्य है ।
(२) भेडर : यह वर्तमान बिडर ग्राम
है । ब्रिङ्ग परगना में है। सन् १८६१ में श्री
स्टीन ने इस ग्राम की यात्रा की थी । ग्राम के
मध्य में एक दृहा है । यह मन्दिर का ध्वंसावशेष
है । उसमें से अलंकृत शिला खण्ड निकाल लिये
गये हैं । समीपस्थ ब्राह्मणो का ग्राम हागल गुण्ड है ।
वहा दुर्गा की पूजा 'बिदा देवी' नाम से होती है ।
विंदा शब्द भेड का अपभ्रंश है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४८२ में 'विपाटि' का पाठभेद
'विपर्टि' और 'विपति' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
४८२ (१) अरिष्टोत्सादन : मच्छहोम परगना
में यह वर्तमान ग्राम रतसुन है। श्री स्टीन के सुझाव
पर पण्डित काशीराम इस ग्राम में सन् १८६१ में
गये थे परन्तु उन्हें यहां कुछ प्राप्त नहीं हुआ ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४८३ में 'रौकसोः' का पाठभेद
'रोकः' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
४८३ (१) सेतु : यहाँ सेतु का अर्थ कोई बाँध
अथवा सेतु अर्थात् पुल लगाया जा सकता है। सेतु
का प्रचलित अर्थ पुल ही है। परन्तु बाँध के अर्थ
में भी इसका प्रयोग किया गया है

६०० राजतरंगिणी
बभूव तस्य भूर्भर्तुः भुवनाद्भुतविभ्रमा ।
तनयाऽनङ्गलेखाख्या शृङ्गारोदधिकौमुदी ॥४८४॥
४८४. उस नृपति को भुवनाद्भुत विलासयती शृङ्गार रूपी समुद्र के लिये कौमुदी
(कार्तिक एवं आश्विन पूर्णिमा) अनंगलेखा नाम्नी कन्या हुई ।
तां वीक्ष्य लक्षणोपेतां मृगाक्षीं पितुरन्तिके ।
अमोघप्रत्ययो व्यक्तं व्याजहारेति दैववित् ॥ ४८५ ॥
४८५. पितृ पार्श्व में लक्षण सम्पन्न उस मृगाक्षी को देखकर अमोघप्रत्ययी ज्योतिषी ने
इस प्रकार सुस्पष्ट कहा-
भविता तव जामाता जगतीभोगभाजनम् ।
त्वदन्तमेव साम्राज्यं गोनन्दान्वयजन्मनाम् ॥ ४८६ ॥
४८६. "गोनन्दवंशियों का साम्राज्य तुम्हारे ही तक है-और तुम्हारा जामाता
जगत् पृथ्वी का भोग भाजन होगा।"
सुतासंतानसाम्राज्यमनिच्छन्नथ पार्थिवः ।
दैवं पुरुपकारेण जेतुमासीत्कृतोद्यमः ॥ ४८७ ॥
४८७. सुता संतान के साम्राज्य को न चाहते हुए, नृपति ने दैव को पुरुषार्थ पूर्वक
विजित करने का प्रयत्न किया ।
अराजान्वयिने दत्ता नेयं साम्राज्यहारिणी ।
मत्त्वेति प्रददौ कन्यां न कस्मैचन भूपुजे ॥ ४८८ ॥
४८८. 'अराजवंशीय' को प्रदत्त यह कन्या राज्यहारिणी नहीं होगी' ऐसा मानकर
उसे किसी राजा को नहीं दिया ।
हेतुं सरूपतामात्रं कृत्वा जामातरं नृपः ।
अथाश्वघासकायस्थं चक्रे दुर्लभवर्धनम् ॥ ४८६ ॥
४८९. राजा ने सुन्दरता मात्र को हेतु मानकर अश्वघास कायस्थ दुर्लभ वर्धन
को जामाता बनाया।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४८४ में 'विभ्रमा' का पाठभेद
'विक्रमा' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
४८८ (१) अराजवंशीय : राजा की इच्छा
यह नहीं थी की गोनन्द वंश से साम्राज्य दूसरे वंश में
चला जाय । अतएव वह निसन्देह चिन्तित हुआ था ।
कल्हण प्रथम तरंग में गोनन्दवंश के गोनन्द प्रथम
दामोदर यशोवती, तथा गोनन्द तृतीय का वर्णन
कर ३५ राज्यो का विवरण लुप्त मानता है ।
पाठभेद :
श्लोक सख्या ४८६ में 'सरूप' का पाठभेद

तृतीय तरंग ६०१
मातुः कार्कोटनागेन सुस्नातायाः समीयुपा ।
राज्यायैव हि संजातो राज्ञा नाज्ञायि तेन सः ॥ ४९० ॥
४९०. उस राजा ने यह नहीं जाना कि सुस्नात (इसकी) माता और कर्कोट नाग १
के सम्भोग से राज्य के लिये ही वह उत्पन्न हुआ है।

'स्वभूष' तथा 'स रूप' मिलता है ।
पादटिप्पणियां
(१) अश्वघास कायस्थ : श्रीनगर में घोड़ों के लिये घास समीपवर्ती स्थानो, सरोवरों, घासवाली भूमि, से नावों द्वारा लाई जाती थी। नावें मुख्य यातायात को साधन थी ।
घास व्यर्थ न जाय और वह अश्व जिनका सम्बन्ध उन दिनो अश्वारोही सेना तथा देश की सुरक्षा से था राज्य सम्पत्ति समझा जाता था। उसपर राज्य कर लगता था । डोगरा काल तक यह कर चलता रहा है ।
कायस्थ यहाँ पर जातिवाचक न हो कर कर्म-वाचक है। कश्मीर में कर्मणा कायस्थ होते थे। राज्य कर्मचारो को कायस्थ कहते थे । अश्वघास कायस्य का यहा तात्पर्य घोड़ों के लिये घास लाने वालों का अधिकारो राज्य कर्मचारी है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४९० में 'कार्को' का 'कर्को', 'समीयुपा' का 'समेयुपा', 'संजातो' का 'संजाता' तथा 'सः' का पाठभेद 'सा' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
४९० (१) कार्कोट नाग : कर्कोट नाग के नाम पर कश्मीर का कर्कोट राजवंश चला था। कल्हण ने इस राजवंश के राजाओ का वर्णन समस्त चतुर्थ तरंग में किया है। उसमें १७ राजा हुए थे । उनका शासन काल लौकिक संवत् ३६७७ से ३९२९ तक रहा है। इस वंश ने कश्मीर पर २५४ वर्ष ५ मास २७ दिन तक शासन किया था।

नीलमत पुराण में कार्कोट नाग का वर्णन मिलता है । कश्मार के नागामो की तालिका मे प्रारम्भ में ही उसका नाम नील, वासुकी, तथा तक्षक नाग के साथ आता है। प्रतीत होता है। कार्कोट नाग की पूजा विभिन्न स्थानो में होती थी ।
करकोट द्रग का नाम कार्कोट नाम पर पड़ा था । (त० ८.१५९६) अनुमान किया जाता है कि वह तोष मैदान पास के समोपस्थ किसी एक सरोवर में निवास करता था। उसका उल्लेख चौथी राजतरंगिणी के श्लोक ११४ तथा तीर्थों में किया गया है । वेगिल परगना में काकोदर पर्वत बाहुभूस का नाम कार्कोट का ही अपभ्रंश है। तीर्थों में एक ओर कार्कोट नाग का उल्लेख मिलता है । कुधर परगना में यह गांव उतरुस है । हरचरित चिंतामणि १० में वर्णित स्रोत सम्भवतः यही है ।
नीलमत में कार्कोट नाग का उल्लेख आता है ।
कम्बलाश्वतरो नागो कार्कोटकधनंजयौ ॥ 881 : १०५० ॥
कद्रू का पुत्र कर्कोटक नाग वरुण की सभा में उपस्थित रहता है। (म० स० ९:९) नागो की भोगवती नामक नगरी में इसका निवास कहा गया है (म० उ० १०१ : ९) नारद की दावाग्नि में जब यह फँस गया था तो नल ने इसका उद्धार किया था । (म० व० ६३) कार्कोट नामक भारतवर्ष के विभाग के कार्कोटक लोगों को महाभारत में विधर्मी कहा गया है। उनका वर्णन महाभारत कर्ण पर्व (४४:४३) में मिलता है । जयपुर राज्य के पूर्व अंचल में कार्कोट नगर नामक स्थान है। वहाँ मालवों के आरम्भिक काल की मुद्रायें

७६

राजतरंगिणी ६०२
मिलती है। शिव के रथ में रस्सो के रूप में इनका
प्रयोग किया गया था। (म० पर्व : ४ : २९)
यह भगवान् बलराम के स्वधाम गमन के समय
उपस्थित था। (म० मौ० ४ : १७)
अथर्व वेद में कार्कोट नाग का उल्लेख विषहर
के रूप में किया गया है। प्रमुख नागो के वर्णन में
नागराज कर्कोट का गौरवपूर्ण स्थान है।
यह राजवंश का संरक्षक माना जाता है।
नेपाल में आज भी कार्कोट नाग को पूजा कहीं-कहीं
की जाती है। नेपाली गाथाओं में उसे लोक प्रिय
स्थान प्राप्त है।
नेपाल के नागाओं में यह एक प्रमुख नाग माना
जाता है। बंगाल के कायस्थों की एक शाखा अपने
को नागवंशीय कहती है। अपने नाम के साथ नाग
मल्ल धारण करते हैं।
मध्य प्रदेश के गोंड़ लोग अपने को नागवंशीय
मानते है। आसाम की सूरमाघाटी में नाग जाति
की आबादी है। उन्ही के नाम पर भारत के एक
प्रदेश का नाम 'नागालेण्ड' पड़ा है।
नागवश सम्बन्धी अनेक गाथायें चान, दक्षिण
पूर्व एशिया, जापान में प्रचलित हैं। बौद्ध तथा हिन्दू
गाथाओ में नाग गाथाओ का तथा उनसे सम्बन्धित
अनेक प्रसंगो का वर्णन मिलता है। अजन्ता को
भित्तिचित्र पर उनका अस्तित्व मिलता है।
तक्षक नाग मुख्य नाग रहा है। उसी के नाम
पर तक्षशिला नाम पड़ा था। अफगानिस्तान
के प्राचीन गान्धार देश में नाग जाति का अस्तित्व
था। अफगानिस्तान का एक बहुत बड़ा समाज
अपने को पूर्व कालीन नाग वंशीय मानता है।
नाग तथा नागा प्रायः शिव तथा शैवमत से
सम्बन्धित किये गये हैं। शिव का आभूषण ही
नाग है। दक्षिण भारत का शैवमत उत्तर भारत
में पहुँचा। उनकी स्मृति नागा तथा नेपाल की
नायर जाति में अभी तक अक्षुण्ण है। अनेक नगर
नाग के नामपर बसे हैं—जैसे नागपुर ।
उत्तर भारत में नाग पंचमी का पर्व बड़े धूम-
धाम से मनाया जाता है। कहा है कि नागपंचमी
ब्राह्मणों का, चित्तर दूजको क्षत्रियों का, दोपावलो
वैश्यो का और होली शुद्र का पर्व है।
नाग पंचमी के दिन नाग पूजा होती है।
सखो तथा गशी के रहने की जहाँ सम्भावना होती
है वहाँ दूध में धान का लावा डालकर दोना अथवा
मिट्टी की दीया में रख दिया जाता है। मैं पात्नो
बाल्यवस्था में अपने सोनियादह वारानसी शहर
के बरोघा, तालाब, भीत तथा कूँवों पर रखता
रहा। मेरे घर में अब भी नागपंचमी के दिन थाली
में कोटोरियो तथा पौधम के वृक्ष के टूथ में धान
का लावा तथा दूध रखा जाता है। काशो में बालक
नाग पंचमी के दिन कागज पर छोटे नाग के चित्र
को बेचते कहते हैं—'बड़े गुरु' का 'छोटे गुरु' का
नाग लो।
गुरु शब्द महत्वपूर्ण है। काशी में नाग कूँवाँ
एक मुहल्ला है। यहाँ हजारो वर्ष पुरानो विशान
शाखला है। काशी के ब्राह्मण लोग वहाँ पर एकत्रित
होते हैं। शास्त्रार्थ होता है। गुरु तथा शिष्य सभी
शास्त्रार्थ में सम्मिलित होते हैं। यह स्थान अब
मुसलमानी मुहल्ले में पड़ गया है। समय परिवर्तन
के कारण अब न तो यहाँ पहले जैसा मेला लगता है
और न तो शास्त्रार्थ के लिये उत्साह पूर्वक गुरु शिष्य
आते हैं। दो चार ब्राह्मण आ जाते हैं। पुरानी
बातें दुहरायी जाती हैं।
महाभारत के अनुसार शेष नाग सर्व प्रथम
उत्पन्न हुए थे। तत्पश्चात् वासुकी, ऐरावत, तक्षक
कार्कोटक तथा धनञ्जयादि नाग उत्पन्न हुए थे।
कार्कोटक नाग के अर्जुन के जन्म दिवसपर जाने का
उल्लेख मिलता है। (म० भा० १२९ : ७१)
शेषस्तु प्रथमो जातो वासुकिस्तदनन्तरम्।
ऐरावतस्तक्षकश्च कार्कोटकधनञ्जयौ ॥
—म० आ० ३५:५

तृतीय तरंग ६०३
निश्चिन्वते हि ज्ञंमन्या यमेवायोग्यमाग्रहात् ।
जिगीषयेव तत्रैव निदधाति विधिः शुभम्¹ ॥ ४९१ ॥
४९१. अपने को विज्ञ मानने वाले जिसे हठात् अयोग्य सिद्ध करते हैं, उसी में
विजय की इच्छा से विधि शुभ रख देता है।
मात्सर्यॆण जहद् ग्रहान्विसदृशे धूमध्वजे योग्यतां
ज्ञात्वा स्वां निदधत् त्विषं दिनपतिर्हास्य. प्रशान्त्युन्मुखः ।
दैवं वेत्ति न यः शिखी स परतो नामास्तु तत्संभवाः
स्युर्दीपा अपि यद्दृशेन जगतस्तिग्मांशुविस्मारकाः¹ ॥ ४९२ ॥
४९२. मात्सर्य से नक्षत्रों को तिरस्कृत करते एवं अपने को समर्थ जानकर अतुलनीय
अग्नि में अपनी कान्ति रखते हुए, अस्तोन्मुख सूर्य², उपहास पात्र होता है। जो अग्नि
देव को नहीं जानता है, वह तो दूर रहे, उससे उत्पन्न जगत् के दीपक भी जिसके प्रभाव से
सूर्य के विस्मारक होते हैं।
धिया भाग्यानुगामिन्या चेष्टमानो नयोचितम् ।
अभूत्सर्वस्य चक्षुष्यः स तु दुर्लभवर्धनः ॥ ४९३ ॥
४९३. और वह दुर्लभवर्धन भाग्यानुगामिनी बुद्धि द्वारा नयोचित चेष्टा करता हुआ
सर्वजनप्रिय हो गया।
प्रज्ञया द्योतमानं तं प्रज्ञादित्य इति प्रथाम् ।
कौबेरभाग्यसाम्यं च शनकैः श्वशुरोऽनयत् ॥ ४९४ ॥
४९४. शनैः शनैः श्वशुर ने प्रज्ञा से द्योतमान उसे प्रज्ञादित्य नाम से ख्यात कर
कुबेरतुल्य भाग्यशाली बना दिया।
कश्मीर के भ्रमण काल में मैं किस्तवार गया ४९२ (१) राजतरंगिणी सूक्ति सग्रह का
था। भद्रवा पहुँचा। स्थान अत्यन्त सुरम्य है। यह ८४वाँ श्लोक है।
मुझे वहाँ 'वासुकी पुराण' की बात कही गयी।
यह भी नीलमत पुराण की तरह एक उप- (२) सूर्य : सूर्य जब अस्त होता है तो
पुराण है। कहा जाता है कि वह अपनी ज्योति अग्नि में
पाठभेद : संग्रहीत कर देता है जिससे अग्नि प्रज्वलित.
श्लोक सख्या ४९१ मे 'निश्चिन्वते' का रहती है।
'निश्चिन्वाते' तथा 'समन्‍या' का पाठभेद 'सामन्‍या', कहावत है कि चन्द्रमा के समान दीप भी
'संमन्या' तथा 'शामध्या' मिलता है। अपना प्रकाश सूर्य से ग्रहण करता है।
पादटिप्पणियाँ : पाठभेद :
४९१ (१) राजतरंगिणी सूक्तिसग्रह का श्लोकसंख्या ४९४ में 'कौबेर' का 'कौबीर'
यह ८३वाँ श्लोक है। तथा 'साम्यं' का पाठभेद 'स्वम्य' मिलता है।

६०४ राजतरंगिण
पित्रोः प्रेयस्तयोद्वृत्ता तारुण्यादिमदेन च ।
राजपुत्री यथावत्तु गणयामास नैव तम् ॥ ४९५ ॥
४९५. माता पिता की प्रियता, तारुण्य आदि के मद के कारण प्रमत्त राजपुत्री ने
उसे ( पति को ) यथोचित सम्मान नहीं दिया ।
स्वैरिणीसंगमो भोगा युवानोऽग्रे पितुर्गृहम् ।
पत्युर्मृदुत्वमित्यस्याः किं नाभूच्छीलविघ्नकृत् ॥ ४९६ ॥
४९६. स्वैरिणी-संगम, भोग, युवापुरुष-सहवास, पितृगृह, पति की मृदुता
इसे प्राप्त थे । इसमें कौन इसे शीलच्युत करने वाला नहीं थी ?
सा नित्यदर्शनाभ्यासाच्छनकैर्विशता मनः ।
अनङ्गलेखा खङ्गेन संप्रायुज्यत मन्त्रिणा ॥ ४९७ ॥
४९७. नित्यदर्शन अभ्यास से धीरे धीरे ( उसके ) मनमें प्रविष्ट मन्त्री खङ्ग पर
अनंगलेखा आसक्त हो गयी ।
छन्नप्रेमसुखाभ्यासनष्टभीतिसंभ्रमा ।
धाष्टर्यं दिनाद्दिनं यान्ती ततस्तन्मयतां ययौ ॥ ४९८ ॥
४९८. प्रच्छन्न प्रेम, सुख के अभ्यास से लज्जा, भय, सम्भ्रम रहित, वह दिन प्रति
दिन धृष्ट होती हुई, तन्मय हो गयी ।
स मन्त्री दानमानाभ्यां वशीकृतपरिच्छदः ।
अन्तःपुरे यथाकामं विजहार तया सह ॥ ४९९ ॥
४९९. उस मन्त्री ने दान-मान, द्वारा परिजनों को स्वाधीन करके अन्तःपुर में उसके
साथ स्वेच्छापूर्वक विहार किया ।
उपलेभे च शनकैस्तस्यास्तं शीलविप्लवम् ।
विरागलिङ्गैरूद्बुद्धिः धीमान् दुर्लभवर्धनः ॥ ५०० ॥
५००. बुद्धिमान दुर्लभवर्धन ने धीरे-धीरे (स्त्रीके) प्रकट होते विराग आदि चिन्हों
से उसके उस शील विप्लव को जान लिया ।
पादटिप्पणियाँ : पादटिप्पणियाँ :
४९६ (१) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह ४९८ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह
८५ वाँ श्लोक है । ८६ वाँ श्लोक है ।
पाठभेद : पाठभेद :
श्लोकसंख्या ४९७ में 'संप्रायु' का पाठभेद श्लोकसंख्या ४९९ में 'सह' का पाठभेद
'सप्रयु' मिलता है। 'समम्' मिलता है ।

तृतीय तरंग ६०५
सखीमध्ये रहः स्मेरा विवर्णा भर्तृदर्शने ।
अकाण्ड एव प्रोत्थाय पश्यन्ती सस्मितं पथः ॥ ५०१ ॥
५०१. एकान्त में सखी मध्य सस्मिता वह भर्त्ता दर्शन से विवर्ण हो जाती थी और
अकाण्ड ही उठकर सस्मित पथ को देखती थी¹।
पत्युः कोपे कृतावज्ञा भ्रूनेत्रचिवुकाञ्चनैः ।
तदप्रियं भाषमाणे सस्मितं न्यस्तलोचना ॥ ५०२ ॥
५०२. उसके प्रति अप्रियभाषण करने पर पति प्रकोप की भ्रू, नेत्र, चिवुकों के संकोच
पूर्वक वह न्यस्त लोचन सस्मित अवज्ञा कर देती थी।
तत्तुल्यगुणनिर्विण्णा तद्विपक्षस्तुतौ रता ।
रिरंसां तस्य संलक्ष्य सखीभिर्बद्धसंकथा ॥ ५०३ ॥
५०३. तदनुरूप गुणों के प्रति निर्विण्ण और उसके प्रतिकूल पक्ष की स्तुति में रत वह
पति की रिरंसा को संलक्षित कर सखियों के साथ वार्ता में लग जाती थी।
तच्चुम्बने भुग्नकण्ठी तदाश्लेपासहाङ्गका ।
तत्संभोगे त्यक्तहर्षा तत्तल्पे व्याजनिद्रिता ॥ ५०४ ॥
५०४. उसके चुम्बन में तिर्यक् कण्ठ हो जाती, उसके आलिंगन को असह्य अनुभव
करती, उसके सम्भोग में सव्याज निद्रित हो जाती।
भवेद्धि प्रायशो योषित् प्रेमविक्रीतचेतना ।
निवेदयन्ती दौःशीन्यपिशाचावेशवैकृतम्¹ ॥ ५०५ ॥
५०५. प्रेम विक्रीत चेतना योषित् प्रायशः दुश्शीलता बस पिशाचावेशवत् वैकृत
प्रकट करती है।
श्लोक संख्या ५०१ में 'प्रोत्थाय' का पाठभेद 'ञ्चलैः' मिलता है ।
'प्रोप्ताय' मिलता है।
श्लोक संख्या ५०३ में 'तत्तुल्य' का पाठभेद
पादटिप्पणियाँ : 'तत्तृत्य' मिलता है ।
५०१ (१) श्लोक संख्या ५०१ से ५०५ तक श्लोक संख्या ५०४ में 'श्लेपास' का पाठभेद
का अनुवाद ओस्तोन, श्री पण्डित आदि प्रायः सभी
अनुवादकों ने एक साथ किया है । थो कल्हण 'श्लेपे स' तथा 'निद्रिता' का 'निद्रता' मिलता है ।
पण्डित ने उन्हें एक साथ युग्मम्, तिलकम्, कुलकम् श्लोक संख्या ५०५ के पश्चात् 'कुलकम्' लिखा
के समान एक नहीं रखा है । एक प्रति में मिलता है ।
'कुलकम्' भी लिखा मिला है । पादटिप्पणियाँ :
पाठभेद : ५०५ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह
श्लोक संख्या ५०२ में 'ञ्चनैः' का पाठभेद ८७ वा श्लोक है । यह पद सुभाषित है ।

६०६ राजतरंगिणी
निगूढदारदौर्गाल्म्यचिन्ताकृशवपुस्ततः ।
शुद्धान्तमविशज्जातु निशि दुर्लभवर्धनः ॥५०६॥
५०६. पत्नी के निगूढ दौरात्म्य की चिन्ता वश कृश शरीर दुर्लभवर्धन कदाचित्
रात्रि काल में शुद्धान्तःपुर में प्रवेश किया ।
सोऽपश्यत्सुरतक्लान्तिसुलभस्वापनिस्सहाम् ।
दुर्जारभर्तुरङ्गेषु प्रत्युप्तामिव वल्लभाम् ॥ ५०७ ॥
५०७. उसने देखा—सुरति क्रान्ति सुलभ स्वाप (शयन) युक्त (उसकी) वल्लभा
दुर्जांर भर्ता के अंग से लिपटी है।
श्वासैरगलितावेगैः कम्पयद्भिः कुचाङ्कुरौ ।
निवेदयन्तीं तत्कालमेव निर्वहणं रतेः ॥ ५०८ ॥
५०८. कुचांकुरों को कम्पित करते श्वास प्रश्वासों से तत्काल ही रति समाप्ति का
बोध करा रही थी ।
अन्यस्यापि क्रोधहेतुं पुनरप्यक्षमावहाम् ।
तां तथाऽवस्थितां वीक्ष्य स प्रजज्वाल मन्युना ॥ ५०६ ॥
५०९. दूसरों के लिये भी क्रोध निमित्त एवं अक्षम्य उसे, उस अवस्था में देखकर, वह
क्रोध से प्रज्वलित हो उठा ।
प्रजिहीर्षुः स रोषेण विमर्शेन निवारितः ।
प्रहृत्यैव प्रहृत्यैव द्विवृत्तं स्वममन्यत ॥ ५१० ॥
५१०. क्रोध से प्रहारेच्छुक, वह विमर्श के कारण निवारित हो, अपने को प्रहार
करने से बचा लिया ।

पाठभेद : श्यत्' तथा 'दुर्जार' का पाठभेद 'दुर्जात' मिलता है ।
श्लोकसंख्या ५०६ में 'जातु' का पाठभेद 'ज्ञानु'
श्लोक सख्या ५०८ में 'दयन्ती' का पाठभेद
मिलता है।
'दयन्तो' तथा 'दयन्तो' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
५०६ ( १) शुद्धान्त : इसका शाब्दिक अर्थ श्लोक सख्या ५०९ में 'क्रोध' का पाठभेद
शुद्ध अन्तरीष होता है। यह रनिवास किंवा 'क्रुधो' तथा सुझाव है कि 'पुनः' का पाठभेद
अन्तःपुर के अर्थ में यहा प्रयुक्त किया गया है। 'मुने' होना चाहिये ।
पाठभेद : श्लोक सख्या ५१० में 'स' का पाठभेद 'स्म'
श्लोक संख्या ५०७ में 'सोऽपश्यन्' का 'योऽप- मिलता है ।

तृतीय तरंग ६०७
ततस्तथाविधः क्षुभ्यन् प्रकोपावेशसागरः ।
विचारवेलया तस्य वलाच्छममनीयत ॥ ५११ ॥
५११. तथाविध उस क्षुब्ध होते प्रकोपावेश सागर को उसकी विचार (वेला तट) ने
बलात् शान्त कर दिया ।
नमस्तस्मै ततः कोऽन्यो गण्यते वशिनां धुरि ।
जीर्यन्ते येन पर्याप्ता ईर्ष्याविषविषूचिकाः १ ॥ ५१२ ॥
५१२. उसे नमस्कार है—उसके 'अतिरिक्त अन्य कौन जितेन्द्रियों में अग्रणी है जो
पर्याप्त ईर्ष्याविष विसूचिका को नष्ट कर देता है ।
सोऽचिन्तयदहो कष्टश्चेष्टा रागानुगा इमाः ।
विचारवन्ध्याः क्षिप्यन्ते क्षिप्रं याभिरधो नराः ॥ ५१३ ॥
५१३. उसने चिन्तन किया—'अहो ! रागानुगामी ये चेष्टाएं कष्टकर है, जिनके द्वारा
विचार शून्य नर क्षण मात्र में नीचे फेंक दिये जाते हैं—
स्त्रीति नामेन्द्रियार्थोऽयमिन्द्रियार्था यथा परे ।
तथैव सर्वसामान्या वशिनामत्र काः क्रुधः २ ॥ ५१४ ॥
५१४. 'स्त्रीनाम की वस्तु इन्द्रियार्थ २ है; जैसे अन्य वस्तुएँ इन्द्रिय योग्य होती है,
उसी प्रकार वे सर्व सामान्य हैं, अतः यहाँ जितेन्द्रियों के लिये क्रोध का कौन अवसर है ?
निसर्गतराला नारीः को नियन्त्रयितुं क्षमः ।
नियन्त्रणेन किं वा स्याद्यत्सतां स्मरणोचितम् १ ॥ ५१५ ॥
५१५. 'निसर्ग तरल नारी को नियन्त्रित करने में कौन समर्थ है ? अथवा
नियन्त्रण से क्या होगा जो कि सज्जनों के लिये स्मरणीय हो ।
पाठभेद : पादटिप्पणियाँ :
श्लोक संख्या ५११ में 'क्षुभ्यन्त्र' का पाठभेद ५१४ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का
'क्षुभ्यन्त्र' मिलता है । यह ८९ वाँ श्लोक है। यह पद सुभाषित है ।
पादटिप्पणियाँ : (२) इन्द्रियार्थ : यहाँ पर विषयों के अर्थ
५१२ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का में प्रयुक्त किया गया है। न्याय शास्त्र के अनुसार
यह ८८ वा श्लोक है । रूप, शब्द, गन्ध, रस तथा स्पर्श है। 'स्त्री' यहा
पाठभेद : पर मालूम होता है छठे विषय के रूप में कल्हण
श्लोक संख्या ५१३ में 'कष्टा श्चेष्टा' का ने प्रयोग किया है ।
पाठभेद 'कष्टाः' श्चेष्ठा' मिलता है । ५१५ (१) राज तरंगिणी सूक्ति संग्रह का
यह ९० वा श्लोक है । यह पद सुभाषित है ।

६०८ राजतरंगिणी
यः शुनोरिव संघर्ष एकार्थाभिनिविष्टयोः ।
रागिणोर्यदि मानः स कोऽवमानस्ततः परः' ॥ ५१६ ॥
५१६. 'किसी एक वस्तु पर अभिनिवेश रखने वाले दो श्वानतुल्य दो रागियों का
जो संघर्ष है, वह यदि मान है, तो उससे बढ़कर अपमान क्या हो सकता है ?
ममकाग्रे मृगाक्षीषु क इत्यायं सचेतसाम् ।
स्वदेहेऽनुपपन्नोऽपि यः सोऽन्यत्र कथं मतः ॥ ५१७ ॥
५१७. 'बुद्धिमान् जनों का मृगाक्षियों में अपनत्व कैसे ठीक हो सकता है, जो कि
अपने देह में ही अनुपपन्न है, वह अन्यत्र कैसे संगत हो सकता है ?
उद्वेगोत्पादनादेषा वध्या चेत्प्रतिभाति मे ।
रागस्तद्विस्मृतः कस्मान्मूलमुद्वेगशाखिनः ॥ ५१८ ॥
५१८. 'उद्वेग उत्पन्न करने के कारण यह यदि मुझे वधयोग्य प्रतीत हो रही है तो,
वह राग कैसे भूल जाऊँ जो उद्वेग वृक्ष का मूल है।
सप्तपातालक्षिप्तमूलो रागमहीरुहः ।
भूमिभूतमनुत्पाट्य द्वेषमुन्मूल्यते कथम्' ॥ ५१६ ॥
५१९. "राग महीरुह का मूल सप्त पाताल यावत् निक्षिप्त है, अतएव भूमिभूत
रागोत्पाटन के बिना द्वेष का उन्मूलन कैसे सम्भव है ?
द्वेषो नामैष दुर्धर्षो जितो येन विवेकिना ।
क्षणार्धेनैव रागस्य तेन नामापि नाशितम् ॥ ५२० ॥
५२०. 'जिस विवेकी ने इस दुर्धर्ष द्वेष को विजित कर लिया, उसने क्षणार्ध में ही,
राग का नाम मिटा दिया ।
वीक्ष्यैतद्दिव्यया दृष्ट्या रागिणां वाच्यमौषधम् ।
ईर्ष्या जेया ततो रागः स्वयमाशाः पलायते ॥ ५२१ ॥
५२१. 'दिव्य दृष्टि पूर्वक देखकर इसे रागियों का औषध कहना चाहिए, ईर्ष्या विजय
करो, उससे राग स्वयं दिशाओं में पलायित हो जाता है।'
५१६ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का ५१९ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह
यह ११ वाँ श्लोक है। १३ वा श्लोक है।
५१७ (१) राज तरंगिणी सूक्ति संग्रह का ५२० (१) राज तरंगिणी सूक्ति संग्रह का
यह १२ वा श्लोक है। यह १४ वा श्लोक है।
पाठभेद : पाठभेद :
श्लोक संख्या ५१९ में 'नुनाट्य' का पाठभेद श्लोक संख्या ५२१ में 'वाच्य' का पाठभेद
'नुन्माद' मिलता है। 'शस्य' मिलता है।

तृतीय तरंग ६०९
इति ध्यात्वाऽलिखद्वर्णान् खङ्खस्यांशुकपल्लवे ।
'वध्योऽपि न हतो यत्त्वं स्मर्तव्यं तच्चवेत्यसौ' ॥ ५२२ ॥
५२२. इस प्रकार ध्यान कर खंख के अंशुक पल्लव पर इन वर्णों को लिखा—
'वध्य भी, जो तुम नहीं वध हुए, यह स्मरण रखना।'
जनैरलक्ष्यमाणेऽथ याते दुर्लभवर्धने ।
त्यक्तनिद्रः स मन्त्री तान् दृष्ट्वा वर्णानवाचयत् ॥ ५२३ ॥
५२३. बिना किसी के देखे दुर्लभवर्धन के चले जानेपर जागृत उस मंत्री (खंख)
उन वर्णों को देखकर पढ़ा।
दाक्षिण्यात्प्राणदस्त्यास्य खङ्खः स मनसा तदा ।
विसस्मारानङ्गलेखां दध्यौ तु प्रत्युपक्रियाम् ॥ ५२४ ॥
५२४. उस समय खंख अनंगलेखा को चित्त से विस्मृत कर दिया और दाक्षिण्य से
प्राण प्रद उसके प्रति प्रत्युपकार भावना धारण किया।
तस्योपकर्तुरचितं प्रतिकारमिच्छोः
चिन्ताऽविशन्न तु मनः स्मरबाणपङ्क्तिः ।
दृग्गोचरे परिचयप्रणयं प्रपेदे
निर्निद्रता न तु कदाचन राजपुत्री ॥ ५२५ ॥
५२५. उस प्रत्युपकारेच्छुक के मन में उपकर्त्ता के योग्य प्रत्युपकार करने की चिन्ता
प्रवेश की, न कि स्मरबाण पंक्ति। उसकी दृष्टि में अनिद्रता ने परिचय प्रणय प्राप्त किया,
न कि कभ' उस राजपुत्री ने।
धृत्वा सप्तत्रिंशतिमब्दान्स चतुर्भि-
र्मासैर्वन्ध्यां मूर्धनि रत्नं नृपतीनाम् ।
तस्मिन्काले लोकमवापोज्ज्वलकृत्यो
बालादित्यो बालशशाङ्काङ्कितमौलेः ॥ ५२६ ॥
५२६. वह चार मास न्यून सैंतीस वर्ष राजाओं का शिरोरत्न होकर उज्ज्वल कृत्य
शील बालादित्य, बाल शशांकांकित मौलि का लोक प्राप्त किया।
श्लोक संख्या ५२२ में 'तान्' का 'तद्' पाठ एवं ज्ञानेन्द्रियो के बाण सूचक है। क्योंकि किसी
भेद मिलता है। प्रकार का कर्म इन्हीं इन्द्रियों के द्वारा होता है।
पादटिप्पणियाँ : काम भावना की जागृति में इन्द्रियां ही सहायक
५२५ (१) स्मर : काम के हाथों में पाच होती हैं। इन्हीं इन्द्रियों के माध्यम से काम आक्रमण
पुष्प बाण होते हैं। समझता हूँ कि पांचो कर्म करता है।
७७

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परिशिष्ट 'क'
नीलमत पुराण
( तरंग : १ : १४ : पृष्ठ-१० )
कश्मीर के पुरा कालीन इतिहास पर प्रकाश नीलमत पुराण द्वारा पड़ता है। कल्हण ने राजतरंगिणी
को बहुत कुछ सामग्री नीलमत पुराण से प्राप्त की है। कल्हण ने स्वयं इसे स्वीकार किया है।
नीलमत पुराण वास्तव में पुराणों की परिभाषा में पुराण है अथवा नहीं, उसका ऐतिहासिक महत्त्व
है या नहीं ? उसकी गणना पुराणों में की जा सकती है या नहीं ? यह विद्वानों की चर्चा का विषय रहा है।
कश्मीर में धार्मिक, ऐतिहासिक एवं काव्य ग्रन्थ लिखने की प्राचीन परम्परा रही है। 'योग वासिष्ठ' जैसा
ग्रन्थ भी या तो कश्मीर में लिखा गया था अथवा उसका प्राप्य वर्तमान संस्करण कश्मीरी है। (योग वासिष्ठ
कथा : भूमिका) एक मत है कि विष्णुधर्मोत्तर पुराण वैष्णव पुराण है। कश्मीर में लिखा गया था (स्मृति
तत्त्व : जीवानन्द विद्यासागर : २ : ४६७-४६८)। नीलमत पुराण की रचना कश्मीर उपत्यका में हुई
थी। यह निर्विवाद सिद्ध हो चुका है। यह पुराण नहीं उपपुराण है। स्थानीय किंवा लौकिक उपपुराण
वर्ग में आता है।
वायु पुराण (१ : १८१) में उल्लेख है : 'इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपवृंहयेत् ।' वेद और पुराण
साथ स्थित थे। दोनों में निकट सम्बन्ध था। अथर्व वेद के व्रात्य सूक्त में इतिहास पुराण का चारों वेदों के
साथ उल्लेख किया गया है। मत्स्य पुराण के अनुसार परम पितामह ब्रह्मा वेद और पुराण दोनों के स्रोत हैं।
एक मत पुराण को वेद से प्राचीन मानता है। पुराणों को सरलतापूर्वक समझाने के लिए वेदों का अभ्युदय
हुआ है। वेद केवल सृष्टि विद्या पर प्रकाश डालता है। पुराणों का क्षेत्र अधिक व्यापक है। उनकी आख्यान
शैली वेदों के समान है। वे लगभग चार लाख श्लोकों में लिपिबद्ध हैं। वेद एवं पुराण दोनों पुराकालीन
आख्यानों पर आधारित हैं।
पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् ।
नित्यं शब्दमयं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम् ॥
अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिस्सृताः॥
—मत्स्य पुराण ३ : ३-४
पुराण वेद के प्राधिकार का आदर करता है। वैदिक सिद्धान्तों की व्याख्या करता है। उसे प्रमाण
मानता है।
'सर्ववेदार्थसाराणि पुराणार्थः ।'—नारदीय १ : ९ : १००
वेदाः प्रतिष्ठिताः सर्वे पुराणे नात्र संशयः ॥—नारदीय २ : २४ : १७ ; स्कन्द, रेवा, ॥२२ पृ०
यो न वेद पुराणं हि न स वेदार्थ किंचन ।—स्कन्द पुराण : रेवा खण्ड
आत्मा पुराणं वेदानाम् ।—स्कन्द पुराण रेवाखण्ड ॥२२ ढ०

२ राजतरंगिणी
पुराणों के लिए निम्नलिखित पाँच लक्षणों का होना आवश्यक माना गया है। इन लक्षणों के आधार
पर नीलमत पुराण को तौलना होगा।
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।
वंशानुचरितं चैव पुराणं पंच-लक्षणम्॥
—मार्कण्डेय पुराण १३५ : १३
पुराण में सृष्टि (सर्ग), प्रलय (प्रतिसर्ग), वंश, मन्वन्तरो तथा वंशानुचरित किंवा पुरातन चरित
का वर्णन किया जाता है। कौटिल्य ने इतिहास वर्ग में इतिवृत्त तथा पुराण को माना है। (अर्थशास्त्र १:३)
इतिवृत्त में ऐतिहासिक घटनायें अधिक रहती हैं। परन्तु पुराण में कथा, गाथा आदि का समावेश होता है।
सामाजिक जीवन को एक ओर प्रवृत्त करने के लिए, सर्वसाधारण को अनुप्राणित तथा उन्हें सुपथ पर
लाने के लिए पुराण ने अनादि काल से मार्ग दर्शन किया है। पुराण वर्णाश्रम धर्म, सदाचार, व्रत, उपवास,
तिथि-कल्प, दान, तीर्थ, श्राद्ध, राजधर्म, देवार्चन पूजा, विनय तथा शील का अद्भुत कोष है।
'नीलमत' पुराण, नील के मत का वर्णन करता है। इसमें भागवत, वायु, गरुड़, ब्रह्म, मार्कण्डेय,
स्कन्दादि पुराणों के समान विशाल ज्ञान-भण्डार, आख्यान तथा वस्तु सामग्री नहीं है। वह लघु ग्रन्थ है।
उसका क्षेत्र व्यापक नहीं है। सीमित है। नीलमत पुराण को महापुराणों की श्रेणी में रखना उचित नहीं
होगा। उसका महत्त्व लौकिक है। प्रादेशिक है। निस्सन्देह उसमें अन्य विषयों का भी उल्लेख है। उसकी
रचना शैली तथा वस्तु सामग्री उसे स्थानीय अथवा उपपुराणों के वर्ग में रखने के लिए प्रेरित करती है।
नीलमत पुराणों की श्रेणी में स्थान प्राप्त कर सकता है। वंशचरित का वर्णन करता है। कल्हण ने
उसमे ऐतिहासिक सामग्री ली है। शैली पुराणों जैसी प्राचीन है। उसमे संवाद प्रतिसंवाद रूप से
घटनाओं तथा कथा वस्तु का वर्णन किया गया है। उसमें माहात्म्यो का वर्णन है। कपटेश्वर, आश्रम स्वामी,
वितस्ता माहात्म्य का विस्तृत उल्लेख है। कुछ विद्वानो ने इसे माहात्म्य की श्रेणी में रखने का प्रयास किया
है। परन्तु कल्हण स्वयं नीलमत को पुराण मानता है न कि माहात्म्य । (अ० १ : १७८-१८३)
इस पुराण का शीर्षक महत्त्वपूर्ण है। 'मत' शब्द का प्रयोग किया गया है। नाम 'नीलमत' है। स्पष्ट
करता है। पुराण नील मुनि के मत का संग्रह है। वायु, मार्कण्डेय, गरुड, ब्रह्म पुराण के समान इसे भी
नील नाम से सम्बन्धित किया गया है।
मैं सन् १९६१ ई० में कश्मीर के भद्रवा स्थान में गया था। जिस समय मैं गया था मार्ग दुरुह था।
सड़कें बन रही थी। इस समय सड़कें बन गई है। यातायात सुगम हो गया है। बस तथा मोटर वहाँ पहुँच
सकती है।
भद्रवा में वासुकी नाग का एक मन्दिर है। मुझे मालूम हुआ कि वासुकी पुराण एक समय वहाँ प्रच-
लित था। अधिक अनुसन्धान पर निष्कर्ष निकला कि वह वासुकी नाम का कोई पुराण नहीं है। इसी प्रकार एक
रत्नाकर पुराण का उल्लेख मिला है। रत्नाकर पुराण का यदि कभी अस्तित्व रहा होगा तो वह भी कश्मीर
में रचित उपपुराण ही था। भारतवर्ष में इस प्रकार के १०० या इससे अधिक पुराण एवं उपपुराण प्रचलित
थे। अनेकों का उल्लेख मिलता है। अनेकों के नाम लोप हो गये है। कश्मीर उपत्यका से भद्रवा क्षेत्र कम सुन्दर
नहीं है। जिस समय में वहाँ गया था शाली अर्थात् धान के खेत लहलहा रहे थे। कटाई निकट होने के कारण
धान कुछ सूख चला था। हरियाली लोप हो रही थी। सुनहलापन आ गया था। मालूम होता था। सुनहले धान

की बालियां खेतो में खड़ी है । किंचित् मरुत् स्पर्श से विस्तृत धान क्षेत्र में सुनहली लहरें लहर लेने लगती थी ।
आधुनिक यन्त्रमय जगत् तथा प्रतिदिन के राजनैतिक उथल-पुथल, सामाजिक वैषम्यों से दूर, हिमाद्रि की
गोद में यह स्थान साधना तथा अध्यात्म चिन्तन के लिए अनुपम स्थान है ।
नीलमत पुराण का नाम—नीलमत, नीलमत पुराण, नील पुराण तथा कहीं-कही कश्मीर माहात्म्य
के रूप में मिलता है । स्वर्गीय डा० भण्डारकर ने इस पुराण को 'कश्मीर माहात्म्य' की संज्ञा दी है । यह
ठीक नही प्रतीत होता ।
कल्हण ने राज तरंगिणी में दो बार नीलमत, दो बार पुराण तथा एक बार नील पुराण नाम से नील-
मत पुराण का उल्लेख किया है । [ रा० त० १:१४,१६,१७१,१७८,१८३२ ]
नीलमत पुराण का ऐतिहासिक महत्त्व है। कुछ विद्वानो का मत है : 'नीलमत पुराण' सन् ६००-
७०० ई० के मध्य लिखा गया है। पुराणों का रचना-काल विवादास्पद है। पुराणों के रचना, संकलन, संस्क-
रणों का निश्चय नहीं हो सका है। कुछ विद्वानों का मत है । वायु पुराण ई० पूर्व ५००, ब्रह्माण्ड पुराण ई०
पूर्व ४००, विष्णुपुराण ७००-४०० ई० पूर्व, मत्स्य पुराण ३०० ई० पूर्व तथा भागवत पुराण का रचना काल
सन् ३१० ई० है । नीलमत पुराण के रचना-काल के विषय में अनेक मत है । यह निर्विवाद है नीलमत की
कथावस्तु अत्यन्त प्राचीन है। उसकी अनेक बातें पुराणों के विपरीत प्रतीत होती हैं। अनेक विषयों में
उसका अपना मत है। अपनी मौलिकता है। सहस्रों वर्ष से कश्मीर में प्रचलित जनश्रुतियो, कथाओं, पर-
म्पराओं, स्थानों, वंशावलियों का उल्लेख है। स्वीकार करना होगा । उसका रचना-काल चाहे प्राचीन न हो
फिर भी उसमें पुरातन तथ्यों का समावेश है ।
कल्हण के उद्धरण से स्पष्ट हो जाता है। नीलमतपुराण प्राचीन ग्रन्थ था। उसका अस्तित्व बारहवीं
शताब्दी के पूर्व था । आभ्यन्तर साक्ष्य से नीलमत की प्राचीनता सिद्ध होती है । क्षेमेन्द्र, जयरथ तथा कल्हण
ने बुद्ध भगवान् के सम्बन्ध के जो विचार प्रकट किये हैं वे नीलमत से सर्वथा भिन्न हैं—नीलमत के भगवान् बुद्ध
को महत्त्वपूर्ण स्थान पूजा, उपासना आदि के प्रसंग में दिया गया है। उसमें बुद्धका प्रादुर्भाव कहा गया है।
अवतार शब्द का न होना नीलमत की प्राचीनता प्रमाणित करता है। बुद्ध को अवतार माननेका समय बहुत
बाद का है। बुद्ध धर्म नीलमत पुराण में हिन्दू-धर्म का विरोधी मत किंवा धर्म रूप में चित्रित नही किया
गया है। नीलमत उस समय की कृति है जब कश्मीर में बुद्धधर्म प्रचलित था। आदर की दृष्टि से देखा
जाता था । हिन्दूधर्म में विस्तार से वर्णित कल्किअवतार, कृष्ण राधा, तुलसी आदि का अभाव नीलमत में खट-
कता है। इस बात की ओर संकेत करता है ग्रन्थ उस समय की रचना है जब कल्कि अवतार, राधा, तथा
तुलसी दल की कल्पना नहीं की गयी थी । हरचरित चिन्तामणि से भी नीलमत पुराण प्राचीन है ।
उसके समकालीन इसे रखना उचित नही है। हरचरित चिन्तामणि मे शिव को महत्त्वपूर्ण विशेष स्थान दिया
गया है। इस बात का प्रमाण है । शैव दर्शन तथा सिद्धान्त का कश्मीर में पर्याप्त विकास हो चुका था।
यह काल नीलमत का पूर्ववर्ती काल है। कल्हण का बौद्धों की तुलना यक्षों से करना साबित करता है ।
कश्मीर में बौद्धधर्म उसके समय प्रायः लोप हो चुका था। आदर खो चुका था। जब कि नीलमत में बुद्ध
तथा बौद्धोंका आदर किया गया है।
श्री लक्ष्मीधर ने कृत्य कल्पतरु ( नियत काल काण्ड ) जो बारहवी शताब्दी के पूर्व अर्धशती की
रचना है, उसमें ब्रह्मपुराण के श्लोकों का उद्धरण दिया है। प्रायः वे ही श्लोक नीलमत पुराण में भी
हैं। इस प्रकार के कम से कम साठ पद है। किन्तु प्रकाशित ब्रह्मपुराण में वे पंक्तियां नहीं मिलती । इससे

४ राजतरंगिणी

प्रतीत होता है, कोई एक और ब्रह्मपुराण का संस्करण उस समय उपलब्ध था अथवा ब्रह्मपुराण नामका कोई
एक और ग्रन्थ था । प्राप्त ब्रह्म पुराण का उल्लेख हेमाद्रि, शूलपाणी, वाचस्पति मिश्र आदि में मिलता है । तथा
दूसरे ब्रह्मपुराण का उल्लेख लक्ष्मीधर, जीमूतवाहन, अपरार्क, हरदत्त, अनिरुद्ध भट्ट आदि में मिलता है ।
निस्सन्देह मानना पड़ेगा । ब्रह्मपुराण में कश्मीर का जो उद्धरण दिया गया है वह कश्मीरी लेखरों की ही
रचना है। उसकी रचना कश्मीर में हुई थी । अधिक सम्भावना है। वह नीलमत पुराण से ली गयी है । नील-
मत के संस्करण होते रहे हैं। नवी दशवी शताब्दी में कश्मीर के शैवदर्शन का नीलमत पुराण में समावेश
करने का प्रयास किया गया है । नीलमत पुराण में विष्णुधर्मोत्तर पुराण के कुछ पद संशोधित किंवा परिवर्तित
रूप में मिलते हैं। इस पुराण का काल चौथी से पाँचवीं शताब्दी का मध्यकाल माना गया है । नीलमत में
वैष्णव, शैव तथा बौद्धधर्म एक साथ विकसित और रहते दिखायी देते हैं । कनिष्क के समय में बौद्धधर्म का
प्राबल्य कश्मीर में हो गया था । अतएव नीलमत का अस्तित्व कश्मीर में चौथी से छठी शताब्दी के पूर्व होना
निर्विवाद प्रतीत होता है । हुयेन्त्सांग (सातवी शताब्दी ) नील के मत का उल्लेख करता है । अतएव हुयेन-
सांग के पूर्व नील मत पुराण का कश्मीर में अस्तित्व था ।

कल्हण ने राजतरंगिणी ( त. १६ ) वर्णित प्रथम चार राजाओं गोनन्द, दामोदर, यशोवती तथा
गोनन्द द्वितीय तथा श्लोक सख्या १ : ५०-८२ नीलमत के श्लोकों से मिलाया जाय तो यह प्रमाणित होता
है कि कल्हण ने उन्हें नीलमत से लिया है। कल्हण ने सुप्त राजाओं का उद्धरण, ज्येष्ठेश की कथा, सोदर तीर्थ
वर्णन, पिशाच कथा, तोर्यों तथा सतीसर, नीलजा अर्थात् वितस्ता का वर्णन नील मत पुराण के आधार पर
किया है ।

पुराणो के समय-समय पर अनेक लेखको तथा सम्पादकों द्वारा संस्करण होते रहे हैं । कोई भी कागज
अथवा भोजपत्र पर लिखी गयी पुस्तक एक सहस्र किंवा दो सहस्रों वर्षों से अधिक काल तक स्थायी नही रह
सकती । अतएव उनका पुनर्लेखन अथवा संस्करण समय-समय पर होता रहा है । संस्करण किंवा पुनर्लेखन
करने वाले के लिये अपने समय की घटना अथवा अपने मतके प्रतिपादन हेतु कुछ न कुछ पुस्तकों में परिवर्धन,
परिवर्तन किंवा संशोधन कर देना असंभव नही है। पाठान्तर हो जाना स्वाभाविक है । नीलमत पुराण के पाठ
के विषय में भी यही बात कही जा सकती है ।

नीलमत पुराण का ऐतिहासिक महत्त्व निम्नलिखित कारणों से बढ़ जाता है :
( १ ) नीलमत पुराण तत्कालीन कश्मीर संस्कृति, तथा सभ्यता का जीता-जागता चित्र उपस्थित
करता है ।
( २ ) तत्कालीन धार्मिक कृत्यों, एवं संस्कारों आदि को प्रभावित किया है ।
( ३ ) कश्मीर के स्थानो, सरोवरों, जलप्रपातो, संगमों, मन्दिरो, देव स्थानों तथा तीर्थों का तथ्य
पूर्ण सच्चा भौगोलिक वर्णन, इन स्थानों से सम्बन्धित प्राचीन तथा तत्कालीन गाथाओ का
उल्लेख सत्यता के साथ करता है । जिस प्रकार जरूसलम का वास्तविक भूगोल स्वयं बाइबिल
है, उसी प्रकार कश्मीर का भूगोल स्वयं नीलमत पुराण है ।
( ४ ) कश्मीर की जनता का चरित्र चित्रण करता है ।
( ५ ) अनेक लुप्त राजाओं के चरित्र तथा उनके वंशो का उल्लेख करता है ।
( ६ ) अनेक जातियो, गोत्रों, उनके कश्मीर में आने, निवास करने, तथा उनके पारस्परिक आन्त-
रिक एवं बाह्य संबंधों तथा जीवन पर प्रकाश डालता है ।

परिशिष्ट क ५
( ७ ) कश्मीर के भौगोलिक चित्रण के साथ-साथ भूगर्भीय तथ्य का उल्लेख करता है। वे आधुनिक
अनुसन्धानों से सत्य प्रमाणित हुए हैं।
( ८ ) कश्मीर की जनता के लिए एक आचार संहिता उपस्थित करता है।
( ९ ) प्राचीन सनातन धर्म को संक्षिप्त रूप से कश्मीरी जनता के सम्मुख रखता है।
नीलमत पुराण में अन्य पुराणों के श्लोकों का किंचित् रूपान्तर के साथ उल्लेख मिलता है। नील-
मत पुराण के रचनाकार को पुराणों, तत्कालीन प्रचलित ग्रन्थो तथा शास्त्रों का ज्ञान था। पुराणो के
कुछ श्लोकों का नीलमत पुराण में उल्लेख मिलता है। (ब्रह्म० ४३४, १, २, २९)
विष्णुधर्मोत्तर पुराण के विषय में मत हैं कि लगभग ४४०-५५० ईस्वी मे लिखा गया था। इस पुराण के
श्लोक नीलमत पुराण में मिलते हैं। अनेक स्थानों, घटनाओ तथा प्रसंगो का उल्लेख नीलमत तथा इस पुराण
में एक जैसे लगते हैं।
राजा मिहिरकुल के लगभग १०० वर्ष पश्चात् तक कश्मीर मे अन्तर्द्रोह चलता रहा है। आन्तरिक
द्वेषो के कारण राजा लोग पीड़ित थे। कश्मीर का कोई विकास नही हो सका था। यही काल नीलमत
पुराण के प्रस्तुत संस्करण का हो सकता है। नीलमत पुराण का किसी दूसरे रूप में पूरा काल में अस्तित्व
होना सम्भव है। किन्तु वर्तमान नीलमत पुराण संस्करण का यहाँ काल है। नीलमत में उल्लेख आया है।
नीलमत इस ओर संकेत करता है---स्वभेदेनेह नश्यन्ति बद्धमूला नराधिपा. ( नी० 835 )
कश्मीर भूमण्डल की किस प्रकार रचना हुई ? उसकी वर्तमान भौगोलिक स्थिति का क्या कारण है ?
इन प्रश्नों का उत्तर नीलमत पुराण देता है। गाथा रूप में यह सब बातें नीलमत पुराण में कही गयी है।
कश्मीर के तीर्थों, देव स्थानों तथा देश की रचना आदि का विषय नीलमत पुराण के लगभग दो-तिहाई
भागो में वर्णित है ( रा० १. १४. )
कल्हण ने राजतरंगिणी मे नीलमत के आधार पर सतीसर तथा जलोद्भव की गाथा का वर्णन
किया है। (रा० १: २५-२८) यही गाथा किंचित् परिवर्तित रूपमें महावश, सर्वास्तिवादी, चीनी विनय
सम्प्रदाय तथा हुयेन सांग ने दी है। आधुनिक भूगर्भीय अनुसन्धानो से प्रमाणित हो गया है। नीलमत वर्णित
गाथा तथ्यपूर्ण है। वह केवल कपोलकल्पना नहीं है।
नीलमत कश्मीर का भूगोल है। विश्वभूगोल का अन्य पुराणो के समान नीलमत वर्णन करता है।
सप्त द्वीप, नव वर्ष, सात कुल पर्वत, आदि का उसमें उल्लेख है। उसमें तीर्थों का भो उल्लेख है। कश्मीर
के पवित्र देव स्थानों, तीर्थ स्थानो का वर्णन नीलमत में यथायत् मिलेगा। उसमें नाग, शिव देवस्थान,
विष्णु देवस्थान, तीर्थ, वितस्ता के उद्गम स्थान से वारहमूला तक के तीर्थों, देवस्थानो, उसकी सहायक नदियों
का उल्लेख है। और कश्मीर के नामकरण पर भी नीलमत प्रकाश डालता है। नदियों तथा उनके स्थलों
का विस्तृत उल्लेख करता है। कश्मीर बाहर भारतवर्ष के तीर्थों तथा देवस्थानों का उल्लेख करता है।
उससे प्रतीत होता है। कश्मीर के भूगोल के साथ भारत के भूगाल का भी ज्ञान नीलमत रचनाकार
को था।
नीलमत में प्राचीन जातियों का वर्णन मिलता है। उनमें मुख्य नाग, पिशाच, दार्व, अभिसार,
गान्धार, जुहुन्द्रा, शक, खस, तंगण, माण्डव, मद्र, अन्तर्गिरि तथा बहिर्गिरि का उल्लेख है। नाग तथ पिशाच
जातियाँ कश्मीर में निवास करती थी। शेष जातियाँ कश्मीर की सीमावर्ती है। यवन शब्द का नाम के
लिये उल्लेख किया गया है।

६ राजतरंगिणी
काश्मीर के तत्कालीन सामाजिक तथा आर्थिक संगठन एवं व्यवस्था पर नीलमत प्रकाश
डालता है। वर्ण तथा आश्रम की उत्पत्ति तथा दर्शन पर नीलमत विचार नहीं करता । किन्तु उनकी मुख्य
प्रक्रियाओं तथा अंगों पर प्रकाश डालता है। चारों वर्णों के कर्त्तव्य का वर्णन करता है (नील० १४-१६ श्लोक)
कर्मकाण्ड, वेदाध्ययन, पुराण पाठ आदि, दान-दक्षिणा, राजनीति, तथा ब्राह्मणों के सम्बन्ध में
समाज की साधारण स्थिति क्या थी प्रकाश डालता है। क्षत्रियों को समाज में क्या स्थिति थी क्या
कर्त्तव्य था, ब्राह्मणों से क्या सम्बन्ध था आदि का वर्णन नीलमत में मिलता है। वैश्य तथा शूद्रों के कर्त्तव्य
पर प्रकाश डालता है। शूद्रों की निम्नस्थिति उस समय नहीं थी। जैसी आज है और समझी जाती है। ये
राजाओं के अभिषेक में भाग लेते थे। ये अस्पृश्य किंवा समाज में निम्नस्तरीय वर्ग नहीं थे। नीलमत में
विभिन्न जातियों का उल्लेख यथा औरभ्रुष, मल्ल, नट, एवं नर्तक, है। वर्णसंकर का उल्लेख नहीं मिलता ।
सूत, मागध, वन्दी का उल्लेख मिलता है ।
चारों आश्रमों के धर्म एवं कर्त्तव्यो के विषय पर नीलमत प्रकाश नहीं डालता । ब्रह्मचारी शब्द का प्रयोग
किया गया है। परन्तु उसका सम्बन्ध आचार से अधिक है, न कि विद्यार्थी जीवन से। नीलमत में बाल
विवाह प्रथा का उल्लेख नहीं है। संन्यास तथा वानप्रस्थ आश्रमों का उल्लेख है। नीलमत गृहस्थाश्रम तथा
तत्सम्बन्धी विधियों का विशेष वर्णन करता है।
तत्कालीन महिलाओं की स्थिति तथा समाज में इनका क्या स्थान था नीलमत वर्णन करता है। वह
ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। कश्मीर की स्त्रियाँ परदा नहीं करती थीं। विरक्तों के मतानुसार नरक
का साधन नहीं थी। मनुष्यों के पतन का कारण नहीं थी। ये पुरुषों के समान समाज के सभी कार्यों
में समान भाग लेती थीं। वे घरों में बन्द नहीं थी। उनका स्थान, पर्वों, उत्सवों, धार्मिक कृत्यों
में पुरुष के समान था। वे कौमुदी उत्सव में भाग लेती थी। वे सुयोग्य गृहिणी रूप में चित्रित की गयी
हैं। वह खेतों के जोतने के उत्सव में गाती थी, नाचती थी, बाजा बजाती थी, इरामंजरी पूजा में वह वृक्ष
देवता के पास पूजन हेतु जाती थी। कश्मीर में प्रचुर मात्रा में सर्वत्र जल है। नाग, सरोवर, तड़ाग, हृद
एवं सरिताओं के तट पर सर्वदा कोई न कोई उत्सव होता रहता था। नर नारी जल क्रीड़ा साथ करते थे।
नीलमत आदेश देता है। कुमारी विशेषतः इन जल उत्सवों में अवश्य भाग लें। यह उत्सव श्रावणी के दिन
होता था। महिलायें सुसज्जित होती थी। पुरुषों के साथ क्रीडा करती थी। इस उत्सव का नाम महिमान
था । विभिन्न वर्ग की स्त्रियों की पूजा के लिये विभिन्न दिन निश्चित थे। माघ शुक्ल चतुर्थी, आश्वयुज, ज्येष्ठ
की चौथ, मार्गशीर्ष पूर्णमासी को महिलाओ की विभिन्न रूपों एवं प्रकारों से पूजा की जाती थी । मदन
त्रयोदशी के दिन पत्नी पति से पवित्र जल प्राप्तकर स्नान करती थी। दीप मालिका के दिन शय्या गृह सजाया
जाता था। महिलायें अकेले भी चन्द्रोदेव की पूजा करती थी। नीलमत में देवताओं के साथ ही साथ उनकी
देवियों का नाम है। उनकी पूजा का भी विधान किया गया है। कश्मीर की नदियां विभिन्न देवियों के रूप
हैं। उनके पूजा का विधान तथा समय निश्चित किया गया है। अन्य पुराणों में महिलाओं को वह स्थान
नहीं दिया गया है, जो नीलमत पुराण में प्राप्त होता है। नीलमत देवदासी प्रथा को मानता है। परन्तु उनका
काम मन्दिरों में नृत्य एवं गान करना भी भगवान की सेवा करना था। वह काम की साधन नहीं मानी
जाती थी। अतिथियों की सेवा तथा उनके सुख के लिये कार्य करना पुण्य कर्म माना जाता था ।
कश्मीर की आर्थिक समृद्धि केवल कृषि पर ही निर्भर नहीं थी। कश्मीर का व्यापार, तिब्बत,
तुर्किस्तान, मध्यएशिया, अफगानिस्तान तथा पंजाब से था । कुशान राजाओं के काल में यह व्यापार बहुत

परिशिष्ट क [top right: ७]

-वृद्धि कर गया था। हूण आक्रमणों के पश्चात् कश्मीर का बहिर्व्यापार मार्ग प्रायः बन्द हो गया। और
आर्थिक ढाँचा का आधार केवल कृषि तथा पंजाब और तिब्बत से व्यापार रह गया था। नीलमत के अनुसार
व्यापारी तथा व्यवसायी गणों का समाज में समादर होता था।
नीलमत पुराण कश्मीर के सामाजिक जीवन के उल्लासमय, आह्लादमय, आनन्दमय जीवन का
चित्रण करता है। प्रकृति की गोद में काश्मीरी पर्वों, उत्सवों की श्रृंखलाओं में प्रसन्नता पूर्ण जीवन, खेल-
कूद, पठन पाठन, आदि में व्यतीत करते थे। उनका समाज प्रगतिशील था। नीलमत सभी उत्सवों की
पीठिका में धर्म को स्थित रखता है। संगीत का सम्बन्ध गन्धर्वों से जोड़ा गया है। प्रत्येक पर्व एवं उत्सवों
पर संगीत का कार्यक्रम होता था। शास्त्रीय संगीत प्रचलित था।
पेशेवर गायक, सूत, मागध, वन्दी एवं चारण थे। वाद्य, वादिन एवं वाद्य भाण्ड प्रचलित था। घन,
वितत, तत, शुषिर, तन्तु तथा चर्म वाद्य उस समय भारत में प्रचलित थे। नीलमत आनद्धवाद्य तथा तन्त्रि-
वाद्य का उल्लेख करता है। इसके अतिरिक्त वेणु, शंख, घण्टा का भी उल्लेख मिलता है।
वीणा का नीलमत पुराण तीन बार उल्लेख करता है। कश्मीर का सत्तूर वीणा का ही विकसित
रूप है। वेणु का उल्लेख केवल एक बार नीलमत में भगवान् विष्णु के जगाने के सम्बन्ध में किया गया है।
शंख का उल्लेख दो बार किया गया है। पटह का उल्लेख नीलमत में दो बार वीणा के प्रसंग में किया गया
है। पटह नगाड़ा या दुग्गी की तरह बाजा है। इसका प्रचलन आज भी कश्मीर में है।
नृत्य संगीत के साथ होता था। नीलमत नृत्य के प्रकार का वर्णन नहीं करता परन्तु नृत्य धार्मिक
उत्सवों, सामाजिक गोष्ठियों, ऋतुओं के आगमन, कृषि उत्सवों, फलों के पकने के समय होता था। हरवान
के पुरातत्त्व खनन कार्य में एक टाइल मिला है। उसपर खरोष्ट्री लिपि अंकित है। मध्यवर्ती मूर्ति झांझ बजा
रही है। वामवर्ती बंशी बजा रही है। और दक्षिणवर्ती एक जोड़ा नगाटा अर्थात् दुक्कड़ बजा रहा है। एक
में नृत्यशील स्त्री चित्रित की गयी है। एक महिला ढोल बजा रही है। कोटिसर मन्दिर से भी महिला नर्तकी
की मूर्ति मिली है। धार्मिक कृत्यों के साथ नृत्य खूब प्रचलित था। कश्मीर के नृत्यों ने सीमावर्ती देशों तथा
अंचलों की नृत्य कला को प्रभावित किया था। सावित्री विसर्जन पर्व आज भी काश्मीरी महिलायें मानती हैं।
किसी नदी के तट पर सात बार मूर्धा पर हाथ रख कर जाती और आती हैं। वह प्राचीन नृत्य का प्रती-
कात्मक रूप रह गया है। वसन्त आगमन काल में इरा पुष्प की मालाओं से विभूषित काश्मीरी महिलायें नृत्य
एवं गान करती थीं। अशोकाष्टमी पर्व पर भी नृत्य तथा गान होता था।
खेलों का काश्मीरी जीवन में बहुत महत्त्व था। श्रावणी पर्व पर कुमारियाँ जल क्रीडा करती थीं।
नीलमत में मल्ल विद्या अर्थात् कुष्टतोप्रियता का उल्लेख मिलता है। दीपावली पर जूआ खेलने की परिपाटी
प्रचलित थी। शिकार खेलने की प्रथा थी। हरवान के टाइल्स पर शिकारी बाण चलाता दिखाया गया है।
इसे नीलमत धनुर्घोष शब्द से व्यक्त करता है। नीलमत में स्कन्द पूजा के दिन खिलौना तथा पक्षियों के पैर
में सूत बाँधकर उड़ाना प्रचलित था।
नीलमत में भवन, गृह, आलय, वेश्म, आयतन, अट्टालक आदि शब्द विभिन्न शैलियों के मकानों के
लिये प्रयुक्त हुए हैं। श्रमणों के निवास स्थान को शाक्यवास तथा पूजा स्थान को चैत्य कहा जाता था। हिन्दू
मन्दिरों के बहुत नाम मिलते हैं। परन्तु उनकी रचना शैली पर नीलमत प्रकाश नहीं डालता। हरवान के
भग्नावशेष देखने से पता चलता है। मण्डप तथा गर्भ गृह मन्दिरों में होता था। मकानों पर सफेदी की जाती
थी। वे पुष्प, माला, फल, पत्तों तथा शाली से सजाये जाते थे। सडकों तथा चतुष्पथ का उल्लेख मिलता है।

८ राजतरंगिणी
वितस्ता माहात्म्य में सेतु अर्थात् पुल का उल्लेख आता है । परन्तु पुल की शैली तथा प्रकार पर कोई प्रकाश
नहीं पड़ता ।
नीलमत प्रतिमा बनाने का उल्लेख करता है। मूर्तियाँ पाषाण, मृत्, स्वर्ण, रजत, ताम्र, कांस्य, दारु,
बालुका, ग्रास तथा घृत की बनायी जाती थी । विष्णु की शयन मूर्ति का उल्लेख मिलता है । विष्णु की चतु-
रानन मूर्ति तथा आयुध पुरुष का वर्णन मिलता है ।
चित्रकला का प्रचार था । बुद्ध जन्म के दिन चैत्य सुन्दर चित्रसारियों से सजाये जाते थे। चित्र यन्त्र,
भूमि तथा भित्ति पर बनाये जाते थे । भूमिशोभा अर्थात् भूमि पर चित्र बनाना खूब प्रचलित था ।
नीलमत में परिधान का उल्लेख—वस्त्र, अम्बर, वासा, वसन, सवित, चीनांशुक, कम्बल तथा प्रावरण
रूप में मिलता है । चीनांशुक चीन से आयात किया रेशमी वस्त्र था । शाबरन का महाभारत में भी उल्लेख
मिलता है । पाणिनि तथा कौटिल्य को भी इसका ज्ञान था । पौटिस्य इम प्रावरक बहुता है । नये वस्त्र के
लिये 'अहत' शब्द का प्रयोग किया गया है । श्रमणों के चीवर तथा बिस्तर के चादर का भी वर्णन नीलमत
करता है । उद्वर्तन, उत्सादन तथा अनुलेपन का शृंगार के प्रसंग में वर्णन किया गया है ।
भोजन में सभी प्रकार के खाद्य पदार्थों का वर्णन मिलता है। शाक में सभी सब्जियाँ तथा शस्य में
सभी अन्न पदार्थों का समावेश हो जाता है । मास भोजन का भी उल्लेख मिलता है । विष्णु के पाँच दिन
पूजा के अवसर पर मास भोजन निषेध किया गया है । एक स्थान पर विष्णु पूजा के प्रसंग में बलि का
उल्लेख किया गया है । पिशाच, चन्दोदेव तथा भद्र काली को आमिष प्रसाद चढ़ाया जाता था । सुरापान
तथा असुरापान दोनों का उल्लेख मिलता है ।
राज्य की सात प्रकृति मानी गयी है । नीलमत में स्वामी तथा राष्ट्र की प्रकृति पर ही प्रकाश डाला
गया है । राजा के दैवी सिद्धान्त को नीलमत मानता है । उसे धर्म तथा राजशास्त्र के अनुसार व्यवहार करने
का आदेश देता है। नीलमत मन्त्रियों का उल्लेख करता है। परन्तु उनके कर्त्तव्याकर्त्तव्य पर प्रकाश नहीं डालता।
नीलमतपुराण सेना तथा युद्ध के प्रकार तथा संघटन पर प्रकाश डालता है । चतुरंग बल में, पदा-
तिक, अश्वारोही, गज तथा रथ सेना थी । युद्ध नियम के सम्बन्ध में नीलमत विस्तृत वर्णन उपस्थित करता
है । बालक राजा युद्ध में भाग नहीं ले सकता था । युद्ध क्षेत्र में भयभीत तथा भागते हुए शत्रु पर प्रहार
वर्जित था । पराजित राजा के राज्य का अपहरण नहीं किया जाता था। उसके उत्तराधिकारी को राज्य
वापस कर दिया जाता था । सन्तानहीन गर्भवती रानी अपने पति के सिंहासन को ले सकती थी । कश्मीर
में राजतन्त्र था तथापि उसमें लोक तन्त्र का अंश दिखायी देता है । राजाविहीन नगर के यात्रोत्सव में
प्रधान सब संस्कार तथा राजोचित कार्यों को करता था । राजा के वार्षिक अभिषेक के समय गणमुख्य,
वारमुख्य, पौरमुख्य का उल्लेख आता है । गणमुख्य गणराज्य के मुखिया थे ।
नीलमत पुराण कश्मीर के धार्मिक सम्प्रदाय तथा मतों का उल्लेख करता है । यह मत-मतान्तर
वैदिक देवताओं को केन्द्र मानकर चलते थे । बौद्ध भी भिन्न धर्म के स्थान पर एक सम्प्रदाय माना जाता था ।
मुख्य सम्प्रदाय, विष्णु तथा उसके अवतारों को लेकर चला था । नील मत में मत्स्य, कूर्म, हंस, अश्वशिर
अर्थात् हयग्रीव, नरसिंह, वामन, राम, कृष्ण का वर्णन मिलता है । राम नवमी पर ब्राह्मण तथा बुद्ध जन्म
पर शाक्यों को पूजा का विधान है किन्तु कृष्ण जन्म तथा तत्सम्बन्धी उत्सव का उल्लेख नीलमत में नहीं है ।
प्रतीत होता है कि कृष्ण को अवतार प्रारम्भ में नहीं माना गया था। दूसरा सम्प्रदाय शैव था। नीलमत