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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 792, कुल 984 में से

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पृष्ठ 792

तृतीय तरंग ६०७
ततस्तथाविधः क्षुभ्यन् प्रकोपावेशसागरः ।
विचारवेलया तस्य वलाच्छममनीयत ॥ ५११ ॥
५११. तथाविध उस क्षुब्ध होते प्रकोपावेश सागर को उसकी विचार (वेला तट) ने
बलात् शान्त कर दिया ।
नमस्तस्मै ततः कोऽन्यो गण्यते वशिनां धुरि ।
जीर्यन्ते येन पर्याप्ता ईर्ष्याविषविषूचिकाः १ ॥ ५१२ ॥
५१२. उसे नमस्कार है—उसके 'अतिरिक्त अन्य कौन जितेन्द्रियों में अग्रणी है जो
पर्याप्त ईर्ष्याविष विसूचिका को नष्ट कर देता है ।
सोऽचिन्तयदहो कष्टश्चेष्टा रागानुगा इमाः ।
विचारवन्ध्याः क्षिप्यन्ते क्षिप्रं याभिरधो नराः ॥ ५१३ ॥
५१३. उसने चिन्तन किया—'अहो ! रागानुगामी ये चेष्टाएं कष्टकर है, जिनके द्वारा
विचार शून्य नर क्षण मात्र में नीचे फेंक दिये जाते हैं—
स्त्रीति नामेन्द्रियार्थोऽयमिन्द्रियार्था यथा परे ।
तथैव सर्वसामान्या वशिनामत्र काः क्रुधः २ ॥ ५१४ ॥
५१४. 'स्त्रीनाम की वस्तु इन्द्रियार्थ २ है; जैसे अन्य वस्तुएँ इन्द्रिय योग्य होती है,
उसी प्रकार वे सर्व सामान्य हैं, अतः यहाँ जितेन्द्रियों के लिये क्रोध का कौन अवसर है ?
निसर्गतराला नारीः को नियन्त्रयितुं क्षमः ।
नियन्त्रणेन किं वा स्याद्यत्सतां स्मरणोचितम् १ ॥ ५१५ ॥
५१५. 'निसर्ग तरल नारी को नियन्त्रित करने में कौन समर्थ है ? अथवा
नियन्त्रण से क्या होगा जो कि सज्जनों के लिये स्मरणीय हो ।
पाठभेद : पादटिप्पणियाँ :
श्लोक संख्या ५११ में 'क्षुभ्यन्त्र' का पाठभेद ५१४ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का
'क्षुभ्यन्त्र' मिलता है । यह ८९ वाँ श्लोक है। यह पद सुभाषित है ।
पादटिप्पणियाँ : (२) इन्द्रियार्थ : यहाँ पर विषयों के अर्थ
५१२ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का में प्रयुक्त किया गया है। न्याय शास्त्र के अनुसार
यह ८८ वा श्लोक है । रूप, शब्द, गन्ध, रस तथा स्पर्श है। 'स्त्री' यहा
पाठभेद : पर मालूम होता है छठे विषय के रूप में कल्हण
श्लोक संख्या ५१३ में 'कष्टा श्चेष्टा' का ने प्रयोग किया है ।
पाठभेद 'कष्टाः' श्चेष्ठा' मिलता है । ५१५ (१) राज तरंगिणी सूक्ति संग्रह का
यह ९० वा श्लोक है । यह पद सुभाषित है ।