राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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मिलती है। शिव के रथ में रस्सो के रूप में इनका
प्रयोग किया गया था। (म० पर्व : ४ : २९)
यह भगवान् बलराम के स्वधाम गमन के समय
उपस्थित था। (म० मौ० ४ : १७)
अथर्व वेद में कार्कोट नाग का उल्लेख विषहर
के रूप में किया गया है। प्रमुख नागो के वर्णन में
नागराज कर्कोट का गौरवपूर्ण स्थान है।
यह राजवंश का संरक्षक माना जाता है।
नेपाल में आज भी कार्कोट नाग को पूजा कहीं-कहीं
की जाती है। नेपाली गाथाओं में उसे लोक प्रिय
स्थान प्राप्त है।
नेपाल के नागाओं में यह एक प्रमुख नाग माना
जाता है। बंगाल के कायस्थों की एक शाखा अपने
को नागवंशीय कहती है। अपने नाम के साथ नाग
मल्ल धारण करते हैं।
मध्य प्रदेश के गोंड़ लोग अपने को नागवंशीय
मानते है। आसाम की सूरमाघाटी में नाग जाति
की आबादी है। उन्ही के नाम पर भारत के एक
प्रदेश का नाम 'नागालेण्ड' पड़ा है।
नागवश सम्बन्धी अनेक गाथायें चान, दक्षिण
पूर्व एशिया, जापान में प्रचलित हैं। बौद्ध तथा हिन्दू
गाथाओ में नाग गाथाओ का तथा उनसे सम्बन्धित
अनेक प्रसंगो का वर्णन मिलता है। अजन्ता को
भित्तिचित्र पर उनका अस्तित्व मिलता है।
तक्षक नाग मुख्य नाग रहा है। उसी के नाम
पर तक्षशिला नाम पड़ा था। अफगानिस्तान
के प्राचीन गान्धार देश में नाग जाति का अस्तित्व
था। अफगानिस्तान का एक बहुत बड़ा समाज
अपने को पूर्व कालीन नाग वंशीय मानता है।
नाग तथा नागा प्रायः शिव तथा शैवमत से
सम्बन्धित किये गये हैं। शिव का आभूषण ही
नाग है। दक्षिण भारत का शैवमत उत्तर भारत
में पहुँचा। उनकी स्मृति नागा तथा नेपाल की
नायर जाति में अभी तक अक्षुण्ण है। अनेक नगर
नाग के नामपर बसे हैं—जैसे नागपुर ।
उत्तर भारत में नाग पंचमी का पर्व बड़े धूम-
धाम से मनाया जाता है। कहा है कि नागपंचमी
ब्राह्मणों का, चित्तर दूजको क्षत्रियों का, दोपावलो
वैश्यो का और होली शुद्र का पर्व है।
नाग पंचमी के दिन नाग पूजा होती है।
सखो तथा गशी के रहने की जहाँ सम्भावना होती
है वहाँ दूध में धान का लावा डालकर दोना अथवा
मिट्टी की दीया में रख दिया जाता है। मैं पात्नो
बाल्यवस्था में अपने सोनियादह वारानसी शहर
के बरोघा, तालाब, भीत तथा कूँवों पर रखता
रहा। मेरे घर में अब भी नागपंचमी के दिन थाली
में कोटोरियो तथा पौधम के वृक्ष के टूथ में धान
का लावा तथा दूध रखा जाता है। काशो में बालक
नाग पंचमी के दिन कागज पर छोटे नाग के चित्र
को बेचते कहते हैं—'बड़े गुरु' का 'छोटे गुरु' का
नाग लो।
गुरु शब्द महत्वपूर्ण है। काशी में नाग कूँवाँ
एक मुहल्ला है। यहाँ हजारो वर्ष पुरानो विशान
शाखला है। काशी के ब्राह्मण लोग वहाँ पर एकत्रित
होते हैं। शास्त्रार्थ होता है। गुरु तथा शिष्य सभी
शास्त्रार्थ में सम्मिलित होते हैं। यह स्थान अब
मुसलमानी मुहल्ले में पड़ गया है। समय परिवर्तन
के कारण अब न तो यहाँ पहले जैसा मेला लगता है
और न तो शास्त्रार्थ के लिये उत्साह पूर्वक गुरु शिष्य
आते हैं। दो चार ब्राह्मण आ जाते हैं। पुरानी
बातें दुहरायी जाती हैं।
महाभारत के अनुसार शेष नाग सर्व प्रथम
उत्पन्न हुए थे। तत्पश्चात् वासुकी, ऐरावत, तक्षक
कार्कोटक तथा धनञ्जयादि नाग उत्पन्न हुए थे।
कार्कोटक नाग के अर्जुन के जन्म दिवसपर जाने का
उल्लेख मिलता है। (म० भा० १२९ : ७१)
शेषस्तु प्रथमो जातो वासुकिस्तदनन्तरम्।
ऐरावतस्तक्षकश्च कार्कोटकधनञ्जयौ ॥
—म० आ० ३५:५