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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 789, कुल 984 में से

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पृष्ठ 789

६०४ राजतरंगिण
पित्रोः प्रेयस्तयोद्वृत्ता तारुण्यादिमदेन च ।
राजपुत्री यथावत्तु गणयामास नैव तम् ॥ ४९५ ॥
४९५. माता पिता की प्रियता, तारुण्य आदि के मद के कारण प्रमत्त राजपुत्री ने
उसे ( पति को ) यथोचित सम्मान नहीं दिया ।
स्वैरिणीसंगमो भोगा युवानोऽग्रे पितुर्गृहम् ।
पत्युर्मृदुत्वमित्यस्याः किं नाभूच्छीलविघ्नकृत् ॥ ४९६ ॥
४९६. स्वैरिणी-संगम, भोग, युवापुरुष-सहवास, पितृगृह, पति की मृदुता
इसे प्राप्त थे । इसमें कौन इसे शीलच्युत करने वाला नहीं थी ?
सा नित्यदर्शनाभ्यासाच्छनकैर्विशता मनः ।
अनङ्गलेखा खङ्गेन संप्रायुज्यत मन्त्रिणा ॥ ४९७ ॥
४९७. नित्यदर्शन अभ्यास से धीरे धीरे ( उसके ) मनमें प्रविष्ट मन्त्री खङ्ग पर
अनंगलेखा आसक्त हो गयी ।
छन्नप्रेमसुखाभ्यासनष्टभीतिसंभ्रमा ।
धाष्टर्यं दिनाद्दिनं यान्ती ततस्तन्मयतां ययौ ॥ ४९८ ॥
४९८. प्रच्छन्न प्रेम, सुख के अभ्यास से लज्जा, भय, सम्भ्रम रहित, वह दिन प्रति
दिन धृष्ट होती हुई, तन्मय हो गयी ।
स मन्त्री दानमानाभ्यां वशीकृतपरिच्छदः ।
अन्तःपुरे यथाकामं विजहार तया सह ॥ ४९९ ॥
४९९. उस मन्त्री ने दान-मान, द्वारा परिजनों को स्वाधीन करके अन्तःपुर में उसके
साथ स्वेच्छापूर्वक विहार किया ।
उपलेभे च शनकैस्तस्यास्तं शीलविप्लवम् ।
विरागलिङ्गैरूद्बुद्धिः धीमान् दुर्लभवर्धनः ॥ ५०० ॥
५००. बुद्धिमान दुर्लभवर्धन ने धीरे-धीरे (स्त्रीके) प्रकट होते विराग आदि चिन्हों
से उसके उस शील विप्लव को जान लिया ।
पादटिप्पणियाँ : पादटिप्पणियाँ :
४९६ (१) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह ४९८ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह
८५ वाँ श्लोक है । ८६ वाँ श्लोक है ।
पाठभेद : पाठभेद :
श्लोकसंख्या ४९७ में 'संप्रायु' का पाठभेद श्लोकसंख्या ४९९ में 'सह' का पाठभेद
'सप्रयु' मिलता है। 'समम्' मिलता है ।