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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

१० सूचीपत्र ।
पृष्ठ
९० चन्द का मंत्र की परीक्षा करना और वीरों का प्रगट होना ॥ ... ... ,,
९१ वीरों के रूप आदि का वर्णन ॥ ... ... ... ३०४
९२ चन्द का वीरों को देख कर प्रसन्न होना ॥ ... ... ... ३०६
९३ चन्द का वीरों की पूजा करना ॥ ... ... ... ,,
९४ चन्द का पृथ्वीराज के लिये शत्रुशमन मंत्र ग्रहण करना ॥ ... ... ,,
९५ क्षेत्रपालों (वीरों) का पूछना कि हम लोगों को क्यों बुलाया है ॥ ... ... ,,
९६ चन्द का यह उत्तर देना कि हमने पृथ्वीराज की सहायता के लिये आप लोगों को बुलाया है ॥ ३०७
९७ चन्द का प्रार्थना करना कि जैसे श्र प राम रावण आदि की लड़ाई में रक्षा करते आए ऐसे ही
पृथ्वीराज की भी करना ॥ ... ... ... ,,
९८ वीरों का प्रसन्न होकर कहना कि जब गाढ़ पड़े तब स्मरण करना ॥ ... ... ,,
९६ भैरव का एक वीर को आज्ञा देना कि सब वीरों का नाम बतला कर चन्द को पहिचनवा दो ॥ ३०८
२० सब वीरों का नाम गुण कथन ॥ ... ... ... ,,
२१ चन्द का बावनो वीरों को पहिचान कर प्रणाम करके विदा करना और आप पृथ्वीराज से
मिलने के लिये आगे बढ़ना ॥ ... ... ... ३११
२२ चन्द का उस जङ्गल का वर्णन करना जहां पृथ्वीराज आखेट खेलता है ॥... ... ,,
२३ पृथ्वीराज के शिकार की प्रशंसा ॥ ... ... ... ३१२
२४ कन्ह चौहान आदि सब सरदारों का आकर पृथ्वीराज से मिलना और कहना कि आज यहीं
शिकार हो ॥ ... ... ... ३१५
२५ पृथ्वीराज का शिकार से घर की ओर लौटना ॥ ... ... ... ,,
२६ गोठ (भोजन) के स्थान पर ठहरना ॥ ... ... ... ,,
२७ चन्द वरदाई का आकर पृथ्वीराज से मिलना और पिछला सब वृत्तान्त एकान्त में लेजाकर कहना ,,
२८ पृथ्वीराज का भोजन करना और फिर आगे बढ़ना ॥ ... ... ... ३१६
२६ सब सरदारों को एक एक घोड़ा बांट दिया उसी पर सब चढ़ कर चले ॥ ... ... ,,
३० कवि चन्द को एक हाथी देना जो महा बलवान था ॥ ... ... ... ,,
३१ कवि चन्द का पृथ्वीराज की स्तुति करना ॥ ... ... ... ३१७
३२ सब लोगों को अपने अपने घर बिदा करना ॥ ... ... ... ३१८
३३ वीरों के मिलने के समाचार से पृथ्वीराज का प्रसन्न होना ॥ ... ... ,,
३४ पृथ्वीराज की प्रशंसा ॥ ... ... ... ,,
३५ दूसरे दिन सबेरे पृथ्वीराज का उठना और नित्य कृत्य करना ॥ ... ... २१६
३६ महा कर दस गोदान दस तोला सोना और बहुत सा अन्नदान देना ॥ ... ... ,,
३७ महल में पृथ्वीराज का विराजना और सरदारों का आना ॥ ... ... ,,
३८ वीरों के वश होने की बात से पृथ्वीराज का पेट फूलता है पर किसी से कह नहीं सकता ॥ ३२०
३६ कैमास का हाथ जोड़ कर पूछना कि आपको मुख पर कुछ उत्साह दिखाई देता है पर आप
खुल कर कहते क्यों नहीं ॥ ... ... ... ,,
४० पृथ्वीराज का चन्द के वीरों को वश करने का समाचार कहना ॥ ... ... ,,
४१ सरदारों का उपहास करके कहना कि भाट, नट, चारन, ये सब आरत हैं इनकी बात सत्य
नहीं माननी चाहिए ॥ ... ... ... ३२१
४२ कैमास ने कहा कि चन्द को देवो ने वरदान दिया है यह सचमुच कोई अवतार है ॥ ... ,,
४३ कन्ह ने कहा कि चन्द छूट गया था यह बात सच है, इसी पर उसने यह बात प्रसन्न करने
के लिये गढ़ी है ॥ ... ... ... ,,
४४ पृथ्वीराज के मन में सन्देह हो जाना ॥ ... ... ... ३२२
४५ इतने में चन्द का आकर आसीस देना ॥ ... ... ... ,)
४६ पृथ्वीराज का चन्द को पास बुलाकर वीरों की बात छेड़ना ॥ ... ... ,,
४७ पृथ्वीराज का चन्द की बड़ाई करके कहना कि हम लोगों की बड़ी अभिलाषा है सो आज
वीरों का दर्शन करवाओ ॥ ... ... ... ,,
४८ कवि चन्द का मंत्र जपना और होम करना ॥ ... ... ... ३२३
४६ वीरों का प्रगट होना ॥ ... ... ... ,,

सूचीपत्र । ११
पृष्ठ
५० वीरों के शब्द से सामंतों का डरकर सोचना कि बिना काम उनको बुलाना ठीक नहीं हुआ ॥ "
५१ दो मत्त हाथी दर्बार के बाहर बांधे थे वीरों का भयानक शब्द सुनकर चौंके ॥ ... ३२४
५२ दोनों हाथियों का तुड़ाकर लड़जाना और दर्बार में खलबली मचना ॥ ... "
५३ सरदारों का बहुत उपाय करना पर हाथियों का वश में न आना ॥ ... ३२५
५४ चन्द का बावन वीरों से प्रार्थना करना कि आप लोग इन हाथियों को छुड़ाकर बांध दीजिये ॥ "
५५ भैरव की आज्ञा से वीरों का हाथियों को जंजीर में बांध देना ॥ ... "
५६ यह कौतुक देख कर सरदारों का आश्चर्य में होना और सबका दर्बार में आकर बैठना ... ३२६
५७ पृथ्वीराज का सब वीरों को प्रणाम करना, चन्द का नाम ले लेकर सब वीरों को पहिचनवाना ॥ "
५८ चन्द का पृथ्वीराज से कहना कि बिना कारण इन को बुलाया है इससे इनको बलि दो
पृथ्वीराज का ५ वन घड़ा मदिरा बावन बकरे मंगाकर बलि देना और भैरव आदि की पूजा करना॥,,
५६ वीरों का प्रसन्न होकर पृथ्वीराज से कहना कि वर मांगो सो हमदें और अब हमको विदा करो ३२७
६० पृथ्वीराज की ओर से चन्द का कहना कि लड़ाई के समय हमारी सहायता कीजियगा ॥ "
६१ भैरव का चन्द को बुलाकर कहना कि जब तुम्हें टेढ़ा समय आवे तब हमको याद करना ॥ "
६२ बचन देकर वीरों का विदा होना, सरदारों का चन्द की बात पर प्रतीत करना और पृथ्वीराज
का चन्द पर अधिक प्रेम बढ़ना ॥ ... ... ३२८
६३ पृथ्वीराज का चन्द से कहना कि सब सरदारों को मन्त्र बतला दो चन्द का सबको मन्त्र बतलाना "
६४ चन्द को बीस गांव और एक घोड़ा पृथ्वीराज ने दिया ॥ ... ... "
[७] नाहर राय कथा वर्णन ।
( पृष्ठ ३२६ से पृष्ठ ३६८ तक)
१ सोमेश्वर देव का शिवरात्रि व्रत जागरण करके सोने की तुला दान करना और उसे बांट देना ॥ ३२६
२ शिवजी की स्तुति करना ॥ ... ... ... ३३०
३ शिवजी की स्तुति करके सोमेश्वर देव का अपने कुमार के विवाह के लिये नाहर राय के पास
दूत भेजना ॥ ... ... ... ३३१
४ शामदामादि में निपुण दूत का पत्र दरसाना ॥ ... ... ... "
५ कवि का सनोघरी दृष्टि के योग पर से भुंचव्य में बैर दोष होने का कथन करना ॥ ... "
६ कवि का कहना कि स्त्री के कारण से बैर दोष आगे रामादि बड़ों बड़ों को हो चुका है ॥ ३३२
७ कामधेनु का चरित्र ॥ ... ... ... "
८ प्रात समय जगते ही दूत का पत्र पढ़ना ॥ ... ... ... "
६ उस पत्र में वीर रूप देवस्थान हिंगुलाज के प्रभाव से पृथ्वीराज के बलवान होने और नाहर
राय के बल प्रताप का वर्णन ॥ ... ... ... ३३३
१० पट्टन में चौलुक्य भीमदेव, आक पर जेत (सलख, ) पंवार, मेवाड में समरसिंह, दिल्ली में
अनङ्गपाल जैसे-बलवानों में मण्डोवर में नाहरराय के राज्य करने का वर्णन ॥ ... ३३४
११ पृथ्वीराज का आठ वर्ष की अवस्था में दिल्ली ननिहाल में आना, दिल्लीश अनङ्ग पाल के
आधीन राजाओं का वर्णन ॥... ... ... ... "
१२ मंडोवर के नाहर राय का दिल्लीश्वर की भेट को दिल्ली आना, पृथ्वीराज का रुप देख कर
प्रसन्न होना और माला पहिरा कर कहना कि जब पृथ्वीराज सोलह वर्ष का होगा तब मैं
अपनी कन्या इसको विवाह दूंगा ॥ ... ... ... ३३५
१३ नाहर राय का मत पलट जाना अर्थात् कन्या देना अस्वीकार करना ॥ ... ... "
१४ नाहर राय का उत्तर लिखना कि तुम्हारा कुल आदि हमारे योग्य नहीं है ॥ ... ३३६
१५ दूत का यह पत्र लाकर पृथ्वीराज के हाथ में देना ॥ ... ... ... "
१६ पृथ्वीराज का क्रोध करना, सोमेश्वर देव का समझाना ॥ ... ... ... "
१७ सरदारों का पत्र सुन कर क्रोध करना ॥ ... ... ... ३३७
१८ पृथ्वीराज का चढ़ाई के लिये सेना सजना ॥ ... ... ... "

१२ सूचीपत्र ।
पृष्ठ पृष्ठ
१९ सेना का वर्णन ॥ ... ... ... ... ... ३३८ "
२० पिता की आज्ञा लेकर अष्टमी को पृथ्वीराज का लड़ाई के लिये यात्रा करना ॥ ... २४० "
२१ नाहरराय के दूतों का पृथ्वीराज की चढ़ाई और सेनाबल का समाचार नाहर राय को देना ॥ " ३०४
२२ पृथ्वीराज का प्रताप सुन कर नाहर राय का चौकन्ना होना ॥ ... ३४१ ३०६
२३ अपने सरदारों से नाहर राय का कहना कि अब क्या करना चाहिये पहिले चौहानों से हमसे
और बात थी पर अब तो बिगड़ गई ॥ ... ... ... " "
२४ सरदारों का कहना कि लड़ना चाहिए ॥ ... ... ... ३४२ "
२५ नाहर राय का कहना कि आगे से बढ़कर एक बारगी उन पर चढ़ाई करना चाहिये नहीं ३०७
तो जीत न होगी ॥ ... ... ... ... " "
२६ नाहर राय का सेना सजना ॥ ... ... : ... ... " "
२७ पृथ्वीराज की सेना की प्रशंसा ॥... ... ... ... ३४३ "
२८ पृथ्वीराज का आगे से बढ़कर लड़ने के लिये सोभनराय को आज्ञा देना ॥ " ३०८
२६ सोभन राय का उत्तर दे कहना कि नाहरराय का पथ बांधा सो वह रणभूमि को तिरछी
छोड़ कहीं चला गया ॥ ... ... ... " "
३० सबेरे नाहरराय के भग जाने पर सांझ को पृथ्वीराज का पहुंचना और उसकी खोज करना ॥ ३४४ ३११
३१ चालुक के प्रधान (टीथान) के घर नाहरराय का पता मिलना और सामन्त सहित पृथ्वीराज
का नदी उतरना ॥ ... ... ... " ३१५
३२ सुभट सहित सेना में पृथ्वीराज कैसा शोभता है ॥ ... ... ३४५ "
३३ पृथ्वीराज के पास पहुंचने का समाचार नाहरराय का सुनना और सेना इकट्ठी करना ॥ " ३१५
३४ घाटी पर पर्षतराव को रास्ता रोकने के लिये भेजना ॥ ... ... " "
३५ पर्षतराय का घाटी रोकना ॥ ... ... ... ... " "
३६ पर्षतराय कैसे घाटी रोक कर बैठा है ॥ ... ... ... ३४६ "
३७ घाटी रुकने का समाचार पृथ्वीराज को मिलना ॥ ... ... ... " ३१६
३८ क्रोध करके पृथ्वीराज का पर्षतराय से लड़ने को कन्ह चौहान को भेजना ॥ ... " "
३६ कन्ह का पर्षत से युद्ध और उसमें पर्षत राय का मारा जाना ॥ ... ... ३४७ "
४० पर्षत के मारे जाने पर नाहरराय का स्वयं टूट पड़ना ॥ ... ... ३४८ ३१७
४१ पृथ्वीराज का भी चढ़ चलना ॥ ... ... ... ... " ३१८
४२ इधर पृथ्वीराज इधर नाहर राय का सन्मुख युद्ध ॥ ... ... ... ३४६ "
४३ उसमें पृथ्वीराज का नाहरराय के घोड़े को मार डालना ॥ ... ... ३५० "
४४ रनबीर का सन्नुख हो पृथ्वीराज से जुद्ध करना ॥ ... ... ... " २१६
४५ मोछन परिहार और पवांर का सम्मुख हो लड़ना ॥ ... ... ... " "
४६ चामंड का युद्ध ॥ ... ... ... ... ३५१ "
४७ नाहर से नाहर राय का लड़ना ॥ ... ... ... ... ३५२ ३२०
४८ बलराय का खेत में मँडना ॥ ... ... ... ... ३५३
४६ घोर युद्ध वर्णन ॥ ... ... ... ... ... " "
५० लोहाना आजानु बाहु के युद्ध वर्णन ॥ ... ... ... ३५४ "
५१ कन्ह चौहान के युद्ध का वर्णन ॥ ... ... ... ३६६
५२ नाहरराय का भागना और पृथ्वीराज का पीछा करना ॥ ... ... ३६२ ३२१
५३ पट्टन में पृथ्वीराज का राज्याभिषेक होना ॥ ... ... ... ३६३ "
५४ नाहर राय का हार कर अपनी कन्या का विवाह का लग्न लिखवा कर भेजना ॥ ३६४
५५ पृथ्वीराज का ब्याहने को जाना ॥ ... ... ... ३६५
५६ पृथ्वीराज का तोरन की वंदना करना ॥ ... ... ... " ३२२
५७ पृथ्वीराज का नाहर राय की कन्या से विवाह होना ॥ ... ... " "
५८ नाहर राय का कहना कि आपके काम में सीस देने के सिवाय और कुछ देने के योग्य हम नहीं हैं ॥ ३६६ "
५६ नाहर राय की कन्या का गुण और रूप वर्णन ॥ ... ... ... " "
६० पृथ्वीराज का जीत कर स्त्री के साथ लौटना ॥ ... ... ... " "
६१ पृथ्वीराज का ग्यारह डोलों सहित होना ॥ ... ... ... ३६७ ३२३

सूचीपत्र । १३
पृष्ठ
६२ पृथ्वीराज का विश्राध कर घर पहुंचना ॥ ... ... ... ... ३६७
६३ पृथ्वीराज की प्रशंसा ॥ ... ... ... ... "
[ ८ ] मेवाती मुगल कथा ॥
(पृष्ठ ३६६ से पृष्ठ ३८४ तक)
१ सोमेश्वर के मंडोवर जीतने और लूट को सरदारों में बांट कर प्रचल प्रताप के साथ राज्य करने
का वर्णन ॥ ... ... ... ... ३६६
२ सोमेश्वर के गुणों और उसकी गुणग्राहकता का वर्णन ॥ ... ... "
३ सोमेश्वर का मेवात के राजा मुगल (मुद्गल राय) के पास कर लेने के लिये दूत भेजना ॥ ३७०
४ राजा मुद्दल का यह पत्र पाकर क्रोध प्रगट करके दूत को लोटा देना और सोमेश्वर का पत्रोत्तर
पाकर क्रोध करना और उन पर चढ़ाई करने की आज्ञा देना ॥ ... ...
५ ज्योतिषियों से मुहूर्त्त दिखाकर पुष्य नक्षत्र में चढ़ाई के लिये निकलना ॥ ... ... ३७१
६ घर की रक्षा के लिये पृथ्वीराज को घर पर छोड़ा ॥ ... ... ... "
७ यात्रा के समय अच्छे शगुन मिलने ॥ ... ... ... ३७२
८ पृथ्वीराज को राज्य में छोड़कर सोमेश्वर का मेवात पर चढ़ाई करना और उसकी सूचना पत्र
द्वारा मुद्दल राय को दे कहना कि लड़ो वा दंड दे आधीन हो ॥ ... "
६ मुद्दलराय का पत्रोत्तर देकर सोमेश्वर और पृथ्वीराज दोनों से लड़ाई मांगना ॥ ... ३७३
१० सोमेश्वर का अपने लड़के के वध के विषय में संशय करना ॥ ... ... "
११ और पृथ्वीराज के पास मुद्दल राय के पत्र का संदेसा भेजना और उसका रोष में आकर पिता के
पास रण में आ मिलना ॥ ... ... ... ... "
१२ पृथ्वीराज का पिता के पास पहुंच कर सब सेना को सोते हुए पाना और सोमेस का उससे न
बोलना ॥ ... ... ... ... ३७४
१३ उसका पिता को निद्रा में और शत्रु की सेना को देख भाल कर उत्तापित होना ॥ ... "
१४ और उसका शत्रु की सेना पर झपटना ॥ ... ... ... "
१५ पृथ्वीराज और मुद्दल राय का युद्ध ॥ ... ... ... "
१६ ऐसे पृथ्वीराज के अन्य सूर मुद्दल के योद्धाओं से लड़े ॥ ... ... ३७५
१७ कन्ह का मेवातियों से युद्ध ॥ ... ... ... "
१८ कैमास का पठान वाजीद खां से युद्ध ॥ ... ... ... ३७६
१६ लूंभ से राम गूजर का युद्ध ॥ ... ... ... "
२० इतने में पृथ्वीराज का रण के बीच में अचानक जा पहुंचना और घोर युद्ध का होना ॥ ... "
२१ मुद्दलराय की फौज का तितर बितर होना और उसका पकड़ा जाना ॥ ... ... ३७७
२२ कवि का सोमेश्वर की सेना और घोड़े हाथी की यज्ञादि अनेक उपमाओं के साथ प्रशंसा करना ॥ "
२३ रण में मरे और घायल कैसे दीखते थे और कौन कौन योद्धा किस किस से घायल हुए और
मारे गए ॥ ... ... ... ... ३७६
२४ जयजयकार का उपमाओं के सहित वर्णन ॥ ... ... ... ३८१
२५ पृथ्वीराज की विजय ॥ ... ... ... ... ३८३
( ६ ) हुसेन कथा ॥
(पृष्ठ ३८५ से पृष्ठ ४२४ तक)
१ मभरि नरेश (पृथ्वीराज) और गज़नी के शाह (शहाबुद्धीन) से कैसे बेर हुआ इसका वर्णन ॥ "
२ शहाबुद्दीन के भाई मीर हुसेन के गुणों और उसकी वीरता की प्रशंसा ॥ ... ... ३८५
३ शहाबुद्दीन की पातुर चित्ररेषा की प्रशंसा, शहाबुद्दीन का उसपर प्रेम, मीर हुसेन का भी उसपर
आसक्त होना और चित्ररेषा का भी मीर को चाहना ॥ ... ... ... ३८६

१४ सूचीपत्र ।
पृष्ठ
४ शाह का यह समाचार सुन कर क्रोध करना ॥ ... ... ... ३८६
५ हुसेन का शाह की बात न मानना और शाह का आज्ञा देना कि या तो मेरा राज्य छोड़ दो नहीं
मारे जाओगे ॥ ... ... ... ... "
६ मीर हुसेन का देश छोड़ कर परिवार आदि के साथ नागौर की ओर आना ॥ ... ३८७
७ मीर हुसेन का पृथ्वीराज के यहां आना ॥ ... % ... "
८ मीर हुसेन को आदर के साथ पृथ्वीराज का बुलाना और मीर का आकर सलाम करना ॥ "
९ पृथ्वीराज का शिकार खेलना और मीर हुसेन का सुन्दरदास को पृथ्वीराज के पास भेजना ॥ ३८८
१० सुन्दर छाया का स्थान देख कर मीर का डेरा डालना ॥ ... ... ... "
११ हरम (स्त्रियों) का डेरा पीछे की ओर डालना ॥ ... "
१२ सुन्दर दास का पृथ्वीराज के पास जाना, पृथ्वीराज का मीर का कुशल समाचार पूछना और उसका
सब हाल कहना ॥ ... ... ... "
१३ मंत्री, कैमास, चन्द, पुंडीर आदि को बुलाकर पृथ्वीराज का पूछना कि क्या करें क्योंकि दोनों तरह
विपत्ति है एक शाह का कोप दूसरे शरण आए को न रखना धर्म विरुद्ध है ॥ ३८६
१४ चन्द का सलाह देना कि जैसे शरणागत होने पर विष्णु भगवान ने मत्स्य रूप धर कर पृथ्वी को अपनी
सींग पर रक्खा था वैसेही आप भी कीजिए ॥ ... ... ... "
१५ जैसे शिवजी गले में विष धारण किए हैं वैसे ही मीर को आप भी रखिए ॥... ३६०
१६ सुन्दरदास से पूछना कि सब स्त्रियां तो सुख से हैं और शाह से झगड़ा होने की बात क्या सच है ॥ "
१७ सुन्दरदास का कहना कि घूर की ऐसी एक पातुर शहाबुद्दीन के पास थी उस को लेकर हुसेन
यहां चौहान की शरण में आया है ॥ ... ... ... "
१८ चन्द का पृथ्वीराज की प्रशंसा करना कि जैसे मोरध्वज के यहां अर्जुन ब्राह्मण बनकर शरण में गया,
भगवान ने सिंह बन कर मांस मांगा, शरणागत द्रोपदी का चीर बढ़ाया, वैसेही तुमने शरणागत
को रखकर क्षत्रिय धर्म की रक्षा की तुम्हारे माता पिता धन्य हैं ॥ ... ... "
१९ शाहहुसेन का पृथ्वीराज से मिलना, पृथ्वीराज का आदर देना ॥ ... ... ३६१
२० हुसेन को दक्षिण की ओर नागौर की जागीर देना ॥ ... ... ... "
२१ पृथ्वीराज का हुसेन को घोड़े हाथी आदि देना और दोनों का परस्पर प्रेम बढ़ना ॥ ... "
२२ शहाबुद्दीन का चार दूत अजमेर भेजना ॥ ... ... ... ३६२
२३ पृथ्वीराज का हुसेन को कैथल हांसी हिसार का पर्गना देना और शिकार में साथ रखना, यह सब
समाचार दूतों का शहाबुद्दीन से कहना ॥ ... ... ... ३६२
२४ शहाबुद्दीन का क्रोध करना और अरबखां को पृथ्वीराज के पास भेजना कि भला चाहो तो हुसेन
को निकाल दो ॥ ... ... ... ... ३६३
२५ अरबखां से कहना कि पहिले हुसेन के पास जाना जो वह पातुर को दे दे तो हम क्षमा कर देंगे,
जो वह गर्व करके न माने तो पृथ्वीराज के पास जाकर हमारा पत्र देकर समझाना ॥ "
२६ तीन सौ सवार और रथ देकर अरबखां को रवाना करना ॥ ... ... ... ३६४
२७ एक महीने में अरबखां का नागौर पहुंचना ॥ ... ... ... "
२८ अरबखां का हुसेन से मिलकर समझाना, हुसेन का न मानना ॥ ... ... "
२९ अरबखां का पृथ्वीराज के पास जाना ॥ ... ... ... "
३० पृथ्वीराज का सुलतान की कुशल पूछना ॥ ... ... ... "
३१ अरबखां का कहना कि हुसेनखां को निकाल देने के लिये सुलतान ने कहा है ॥ ... ३६५
३२ शहाबुद्दीन का संदेसा सुनकर पृथ्वीराज का मुख लाल होगया भौहें चढ़ गईं ॥ ... "
३३ कैमास ने डपट कर कहा कि आर्य लोगों का धर्म सुलतान नहीं जानता इससे ऐसा कहता है, हुसेन
पृथ्वीराज के शरणागत है, चत्री का धर्म उसे छोड़ने का नही है ॥ ... ... "
३४ कन्ह चौहान, सूरसिंह, गोयंदराज चन्द, पुंडीर आदि का भी यही कहना और सुलतान से लड़ने को
हम प्रस्तुत हैं यह कहना ॥ ... ... ... ... "
३५ अ. रखां. का अपना निरादर होता देख उठ आना और ग़ज़नौ को कूच करना तथा शहाबुद्दीन से
सब समाचार कहना ॥ ... ... ... ... ३६६
३६ दर्बार करके शहाबुद्दीन का तातारखां, अरबखां, मीरजमाम, कमाम, खुरासाखां, रचनमद्दनखां,

सूचीपत्र । १५

पृष्ठ
रुस्तमखां, हाजीखां, गाज़ीखां ज़म्मनखां ग़ज़नीखां, मुहव्यतखां, मीरखां, आदि सरदारों को
बुलाकर सलाह करना ॥ ... ... ३६६
३७ तातारखां का कहना कि तुरन्त पृथ्वीराज पर चढ़ाई करनी चाहिए ॥ ... ... ३६७
३८ खुरासानखां का तातारखां से कहना कि उसके बल को भी विचार लो, जल्दी न करो ॥ ... ,,
३९ अक़बरखां का कहना कि उसका बल अतुल है तुम लोगों ने देखा नहीं है इससे ऐसा कहते हो ॥ ,,
४० शाह का बल पराक्रम का हाल पूछना ॥ ... ... ... ,,
४१ अरब खां का पृथ्वीराज के बल की प्रशंसा करना ॥ ... ... ३६८
४२ तातार खां का अरब खां की बात को हंसी में उड़ा देना, अरब खां का कहना कि अपनी
आंख से न देखने से ऐसा कहते हो ॥ ... ... ... ,,
४३ शाह का क्रोध करके तातार खां को चढ़ाई के लिये प्रस्तुत होने की आज्ञा देना ॥ ... ,,
४४ शाह के जी में रात दिन चौहान की चिंता लगी रहना ॥ ... ... ३६६
४५ सेना के साथ चढ़ाई के लिये शाह का तयार होना ॥ ... ... ,,
४६ अशकुन होना ॥ ... ... ... ... ,,
४७ अरब खां का कहना कि आज ठहर जाइये, शकुन अच्छा नहीं है ॥ ... ४००
४८ सुलतान का कहना कि काफ़िर चौहान को जीतना कौन बड़ी बात है जो इतना विचार करते हो ,,
४९ शाह का चौहान की ओर जाना और दूतों का यह समाचार नागोर में हुसैन को देना ॥ ,,
५० पृथ्वीराज का चढ़ाई का समाचार सुन कर सरदारों को बुला कर सिंध तक शाह के पहुंचने
का हाल कहना ॥ ... ... ... ... ,,
५१ लड़ने के लिये प्रस्तुत होने का सब का मत होना ॥ ... ... ४०१
५२ युद्ध की तयारी होना ॥ ... ... ... ... ,,
५३ गुरुराम ब्राह्मण का आकर आशीर्वाद देना, बहुत कुछ दान करना और वेद मंत्र से तिलक करना ,,
५४ भगवान का स्मरण कर यात्रा करना ॥ ... ... ... ४०२
५५ हुसैन का भी अपनी सेना के साथ पृथ्वीराज से आ मिलना ॥ ... ... ,,
५६ दस कोस पर डेरा देना ॥ ... ... ... ... ,,
५७ दूतों का सुलतान को पृथ्वीराज के चढ़ आने का समाचार देना ॥ ... ... ४०३
५८ सुलतान का चढ़ाई के लिये धूम धाम से चलना ॥ ... ... ,,
५९ सुलतान की चढ़ाई का वर्णन ॥ ... ... ... ,,
६० सारुंड अचल पुर में सुलतान का डेरा डालना ॥ ... ... ४०४
६१ कैमास का यह समाचार घड़ी रात रहते पृथ्वीराज को देना ॥ ... ... ,,
६२ पृथ्वीराज का उसी समय चढ़ाई करने को तयार होना ॥ ... ... ४०५
६३ चढ़ाई की तयारी, भगवत् स्मरण तथा दान देना ॥ ... ... ,,
६४ पृथ्वीराज का सवार होना ॥ ... ... ... ४०६
६५ पृथ्वीराज का मीर हुसैन के डेरे में आना, मीर हुसैन का अपने साथियों के साथ तयार होकर
पृथ्वीराज को सलाम करना ॥ ... ... ... ,,
६६ पृथ्वीराज और मीर हुसैन के मिल कर चलने का वर्णन ॥ ... ... ,,
६७ सुलतान के चरों का सुलतान को जाकर समाचार देना कि शत्रु की सेना एक योजन पर आ गई ४०७
६८ सुलतान की सेना की तयारी का वर्णन ॥ ... ... ४०८
६९ सारुंडे के वाद्य और सजकर सुलतान का खड़ा होना ॥ ... ... ४०६
७० सुलतान की सेना देखकर पृथ्वीराज का मीर हुसैन की ओर देखना, हुसैन का अपने सरदारों
के साथ तयार होकर पृथ्वीराज को सलाम करना ॥ ... ... ,,
७१ मीर हुसैन का कहना कि आपने हमारे लिये कष्ट उठाया है तो हमारा सिर भी आपके लिये
तयार है देखिए कैसी लड़ाई लड़ता हूं, पृथ्वीराज का कहना कि इसमें आश्चर्य क्या है मैं
भी तुम्हें ग़ज़नी का सुलतान बनाता हूं ॥... ... ४१०
७२ मीर हुसैन का सलाम करके बाईं ओर सेना सजना, पृथ्वीराज का अपने सरदारों को आज्ञा
देना कि तुम लोग मीर हुसैन की सहायता करो और सामन्तों का आज्ञा पालन करना ॥ ,,
७३ कैमास आदि सामन्तो का चार सहस्र सेना के साथ पृथ्वीराज के दक्षिण ओर सेना सजना ॥ ४११
७४ पृथ्वीराज के आगे की ओर गोविन्दराय आदि सरदारों का पांच सहस्र सेना के साथ खड़े होना ॥ ,,

१६ सूचीपत्र ।
पृष्ठ
७५ दोनों सेनाओं का सामना होना और निशान बज उठना ॥... ... ... ४१८
७६ हुसेन और तातार खां की सेनाओं की लड़ाई होना अंत को तातार खां की फौज का भागना ॥ ... ,,
७७ खुरासान खां का आगे बढ़कर लड़ना ॥ ... ... ... ४१४
७८ खुरासान खां की फौज का भागकर सुलतान की फ़ौज के साथ मिलना और कैमास का चढ़ाई करना ४१५
७६ बाई ओर से जमान, दाहिनी ओर से कैमास और सामने से पृथ्वीराज का चढ़ना ॥ ... ,,
८० युद्ध का वर्णन ॥ ... ... ... ... ,
८१ पृथ्वीराज की सेना का बढ़ना और मण्डलीक का मारा जाना ॥ ... ... ४१७
८२ शहाबुद्दीन की सेना का भड़कना और पृथ्वीराज की सेना का पीछा करना ॥ ... ४१८
८३ घोर युद्ध का वर्णन ॥ ... ... ... ... ,,
८४ पृथ्वीराज के सामन्तों का शहाबुद्दीन का पीछा करना ॥ ... ... ४१६
८५ सुलतान का पकड़ा जाना, उसकी सेना का भागना और पृथ्वीराज की विजय ॥ ... ४२०
८६ सूर्योदय से एक घड़ी पांच पल पर लड़ाई श्रारम्भ हुई और चार घड़ी दिन रहे सुलतान पकड़ा
गया, बीस हज़ार मीर और सात हज़ार हाथी घोड़े मारे गए, हिन्दू तेरह सौ मरे, तीन कोस
में लड़ाई हुई, सुलतान को अपने डेरे में लाए ॥ ... ... ,,
८७ रणक्षेत्र में ढूंढकर पृथ्वीराज का मीर हुसेन की लाश निकलवाना ॥ ... ... ४२१
८८ पातुरि का जीते जी हुसेन के क़ब्र में गड़ जाना ॥ ... ... ,,
८६ पृथ्वीराज का शहाबुद्दीन को पांच दिन आदर के साथ रख कर, तीन शेर सलाम कराके मीर
हुसेन के बेटे ग़ाज़ी को उसको सौंप कर यह प्रण कराके कि अब हिन्दुओं पर न चढूंगा, छोड़ना.
शाह का ग़ाज़ी को लेकर कुशल से गज़नी पहुंचना ॥ ... ... ,,
६० अमीरों का सुलतान के जीते जागते लौटने पर बधाई देना और कुशल पूछना ॥ ... ४२२
६१ उपसंहारणी टिप्पण ॥ ... ... ... ... ४२३.
(१०) आखेटक चूक वर्णन ।
(पृष्ठ ४२५ से ४३८ तक )
१ एक वर्ष बीत गया, परन्तु शहाबुद्दीन के हृदय में पृथ्वीराज का वैर सालता रहा ॥ ... ४२५
२ एक महीना पांच दिन गजनी में रह कर फिर हुसैन का पृथ्वीराज के पास आप आना ॥ ... ,,
३ फिर पृथ्वीराज का आखेटक माड़ना और शहाबुद्दीन का चूक करने को आना ॥ ... ,,
४ नीतिराव क्षत्रिय का शहाबुद्दीन को पृथ्वीराज के आखेट का समाचार देना ॥ ... ४२६
५ आखेट का अच्छा अवसर पाकर शहाबुद्दीन का भेद लेने को दूत भेजना, दूत का समाचार देना, शाह
का सरदारों को आज्ञा देना कि छिप कर पृथ्वीराज पर चढ़ाई करो ॥ ... ... ,,
६ हाजी खां आदि का तयारी करना ॥ ... ... ... ४२७
७ शहाबुद्दीन का आज्ञा देना कि इस बात का भेद लो कि कितनी सेना चौहान के साथ है क्योंकि
बिना भेद कुछ काम नहीं बनता ॥ ... ... ... ,,
८ सब सरदारों का मत होना कि बिना धोखा दिये चौहानो को जीतना कठिन है ॥ ... ,,
६ पृथ्वीराज कां वेशटंक आनन्द से आखेट खेलना ॥ ... ... ४२८
१० पृथ्वीराज के आखेट का वर्णन ॥ ... ... ... ,,
११ आठ हजार सेना और सरदारों के साथ शहाबुद्दीन का दट्टूवन में छिप कर पहुंचना ॥ ४२६
१२ सबेरे के समय चढ़ाई करने का विचार करना ॥ ... ... ,,
१३ पांच सरदारों जो साथ लेकर आखेट को पृथ्वीराज का निकलना ॥ ... ४३०
१४ कवि चन्द का कहना कि हमें शहाबुद्दीन के आने का सन्देह है और खोज करने पर चारों ओर
यवनो को पाना ॥... ... ... ... ,,
१५ शाह की ओर से आक्रमण प्रारम्भ होना ॥ ... ... ... ३१

सूचीपत्र । १०
पृष्ठ
१६ युद्धारम्भ, युद्ध वर्णन ॥ ... ... ... ... ... ... ४३१
१७ पांच सरदारों का पृथ्वीराज की रक्षा में चारों ओर हो जाना और इन सभों का यवनों के बीच में घिर
कर युद्ध करना ॥ ... ... ... ... ... ... "
१८ पृथ्वीराज का कमान सँभाल कर यवन सरदारों को गिराना ॥ ... ... ... ४३२
१९ पृथ्वीराज का तलवार लेकर यवनों का विनाश करना ॥ ... ... ... "
२० सुलतान की ७७५ सेना का कट कर आगे गिरना ॥ ... ... ... ... "
२१ चानुका का घोर युद्ध करके वीरता के साथ मारा जाना ॥ ... ... ... "
२२ क्रोध करके पृथ्वीराज का तलवार से युद्ध करना, पृथ्वीराज को सब सेना का इकट्ठा होजाना ॥ ४३२
२३ सुलतान का बढ़कर लड़ना दो घड़ी युद्ध करना ॥ ... ... ... ... ४३४
२४ यवन सरदारों का माराजाना, पृथ्वीराज की विजय ॥ ... ... ... "
२५ हारकर शहाबुद्दीन का गज़नी की ओर लौटजाना ॥ ... ... ... "
२६ चौहान की विजय पर चन्द कवि का जे जे कार करना ॥ ... ... ... ४३५
२७ उपसंहारकी टिप्पणी ॥ ... ... ... ... ... ४३६

[११] चित्ररेखा समय ।
( पृष्ठ ४३६ से ४४५ तक )
१ चित्ररेखा की उत्पत्ति पूछना ॥ ... ... ... ... ... ४३६
२ शहाबुद्दीन के विक्रम का वर्णन ॥ ... ... ... ... "
३ शहाबुद्दीन का अरव खां पर चढ़ाई करने की इच्छा कर सरदारों से पूछना ॥ ... "
४ अरव खां नमता नहीं है इसलिये उस पर चढ़ाई होनी चाहिये यह आज्ञा देना ॥ ... ४४०
५ चढ़ाई की सेना की संख्या ॥ ... ... ... ... ... "
६ सेना की धूम का वर्णन ॥ ... ... ... ... "
७ शाह का निसुरति खां को अरबखां के पास भेजना कि चित्ररेखा को देकर पैर पर गिरे तो हम
क्षमा करदें ॥ ... ... ... ... ४४१
८ अरब खां का सादर आज्ञा मानना और चित्ररेखा को देना स्वीकार करना ॥ ... "
९ निसुरति खां का अरब खां को शाबसी दे कहना कि तुमने शाह के वचन माने और हिंदू धर्म को ⎬ ४४२
न मान कर म्लेच्छ कुल कर्म को धारण किया सो ठीक किया ॥ ⎭
१० शहाबुद्दीन का सेना समेत सजकर चलना ॥ ... ... ... "
११ चलते समय शाह का चित्त चित्ररेखा में मत्त गयंद की भांति लगा हुआ था ॥ ... "
१२ सेना की शोभा का वर्णन ॥ ... ... ... ... ४४३
१३ शाह की सेना की प्रबलता देखकर अरब का अपना बल भंग होना बाहना ॥ ... "
१४ अरव खां का आज्ञा मानकर चित्ररेखा को भेंट में देना ॥ ... ... ... ४४४
१५ चित्ररेखा वेश्या के रूप का वर्णन ॥ ... ... ... "
१६ विना युद्ध चित्ररेखा को देखकर गोरी का लौट आना ॥ ... ... ... "
१७ चित्ररेखा के साथ शाह के आदर और प्रेम का वर्णन ॥ ... ... ... "
१८ चित्ररेखा के सुलतान को वश करने का वर्णन ॥ ... ... ... ४४५
१९ चित्ररेखा को कथा सुनकर कवि का आनन्दित होना ॥ ... ... ... "

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THE PRITHÍVÍRÁJ RÁSÁU.
पृथ्वीराजरासौ।
मोहनी टिप्पणी सहित ।
आदि पर्व।
॥ आदिदेव, गुरू, वाणी, लक्ष्मीश, सुरनाथ और सर्वेश का ॥
॥ मंगलाचरण ॥
साटक-छँ ॥ आदी देव प्रमत्थ नम्य गुरयं, वानीय बंदे पयं ।
सिष्टं धारन धारयं वसुमती, लच्छीस चर्नाग्रयं ॥
तं गुं तिष्ठति ईस दुष्ट दछनं, सुरनाथ सिद्धिग्रयं ।
थिर्चजंगल जीव चंद नमयं, सर्वैस वर्दामयं ॥ छंद ॥ १ ॥ रूपक ॥ १ ॥
१ यह मंगलाचरण जिस छंद में चंद कवि ने कहा है उस का नाम उन ने साटक प्रयोग
किया है और इस नाम से यह छंद आज कल जो छंद ग्रंथ प्रायः उपलब्ध हैं उन में नहीं मिलता।
यद्यपि उस की परीक्षा करने से वह निःसंदेह शार्दूलविक्रीड़ित नामक छंद मालूम होता है परंतु
जब तक उस का लक्षण अथवा नामान्तर होने का कोई प्रमाण नहीं दिखलाया जावे तब तक
पुरातत्त्ववेत्ता विद्वान संतुष्ट नहीं हो सक्ते। अतएव बहुत खोज करने से मेरी मातृभाषा गुजराती
के काव्यों में इस नाम के छंद मुझे मिले और The Revd. Joseph Van. S. Taylor साहब अपने
गुजराती भाषा के व्याकरण के पद्यबंध अथवा छंदविन्यास नामक प्रकरण के पृष्ठ २२३ में उसको
साटका नाम से कुल्ल ३८ अक्षर के दो तुक का छंद होना लिखते हैं कि जिसके प्रत्येक तुक
में १२ + ७ = १९ अंतर होते हैं। इस के सिवाय प्राकृतभाषा के किसी छंदग्रंथ से अनुवाद होकर
सं० १७७६ में जो एक रूपदीप पिंगल नामक छंद ग्रंथ बना है उस में केवल ५२ छंदों के लक्षण
कहे हैं उस में भी साटक का यह लक्षण लिखा हैः-
॥ साटक छंद लक्षण ॥
फर्में द्वादश अंक आद संग्या, मांचा खिवो सागरे ।
दुज्जी वी करिके कलाष्ट दस वी, अर्को विरामाधिकं ॥ १ ॥
अंते गुर्वे निहार धार सब के, औरों कछू भेद ना।
तीखां मत्त उन्नीस अंक चरने, सेखो भणै साटिकं ॥

२ पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व

मैं इस साटक छंद को पिंगल छंद सूत्रम् नामक ग्रंथ में कहे शार्दूलविक्रीडित छंद का
नामान्तर होना मानता हूं और उस का लक्षण बहुत प्राचीन अमर और भरत कृत छंद ग्रंथों में
अवश्य होना अनुमान करता हूं क्योंकि चंद कवि ने भी अपने इसी ग्रंथ के आदि पर्व के रूपक ३७
में जो कुछ कहा है उस से स्पष्ट मालूम होता है कि उस ने अपने इस महाकाव्य के रचन में
पिंगल अमर और भरत के छंद ग्रंथों का आश्रय किया है ॥
इस छंद के लक्षण का पता लगाकर अब मैं इस रूपक के पाठ को शोधता हूं । उस की
पहिली पंक्ति का पाठ A. S. B. की छापी हुई पुस्तक की Fasiculus I जिस को Mr. John Beames
साहब ने शोध कर छपाई है उस में "आदि प्रनम्य नम्य गुरयं वानीय वंदे परं" ऐसा पाठ है
और जो Mr. F. S. Growse C. S. M. A. ने रासे के प्रारंभ के छंदों का अनुवाद करने में पाठ
लिखा है वह भी ऐसा ही है । निदान साटक के लक्षण के अनुसार इस तुक में १२+७=१९
अक्षर होने चाहिये परंतु उस में १०+७=१७ अक्षर हैं। अब यह अत्यावश्यक है कि घटते हुए
दो अक्षरों का पता लगाया जावे । जिस में यह कल्पना करना कि चंद कवि अथवा उस के नाम
से कोई यह जाली ग्रंथ बनानेवाला छंद ग्रंथों में भले प्रकार व्युत्पन्न न होने के कारण मूल में
ही भूल गया है सर्वरीत्या अयोग्य और आश्चर्यदायक बात है । क्योंकि वर्तमान् पृथ्वीराजरासे
का बिगड़ा हुआ काव्य भी अपने कर्त्ता का एक बड़ा व्युत्पन्न कवि होना स्वयम् स्पष्ट प्रकाश करता
है अतएव उस का ऐसी भूलों का करना निर्मल प्रज्ञावाले विद्वानों के ध्यान में सर्वथा असंभव है ।
इस प्रथम तुक में जो दो अक्षर घटते हैं वे पंक्ति भर में किस स्थान में लेखक अथवा शोधक
की भूल से लोप हो गये हैं। इस बात को शोध लेने के लिये यह एक बड़ी सरल युक्ति है कि
हम इस तुक के अर्थ को ध्यान में लेकर उस के वाक्यखंडों को पृथक् २ कर दें कि जिस से
अपूर्ण वाक्यखण्ड अपने आप हम को घटते हुए अक्षर बतला देवे जैसे कि वानीय वंदे परं और
नम्य गुरयं और आदि प्रनम्य । ऐसा करने से हम को मालूम हो गया कि आदि प्रनम्य वाक्यखंड
अपूर्ण है और उस में कोई संज्ञावाचक शब्द घटता है । अब विचारना चाहिये कि वह संज्ञा-
वाचक शब्द आदि शब्द के पहिले घटता है अथवा पीछे । जो हम आदि शब्द के पहिले उस
का होना कल्पना करें तो 'आदिः पदान्ते गण सूचकः" से दोष प्राप्त होकर हमारी कल्पना
अन्यथा हो जाती है अतएव मानना चाहिये कि आदि शब्द के पीछे कोई संज्ञावाचक शब्द है
क्योंकि ऐसा मानने में आदि शब्द उस शब्द के साथ मिलकर हम को कर्म्मधारयः समास का
होना स्पष्ट विदित करता है। जब कि यह निश्चय हो गया कि आदि शब्द के पीछे अर्थात्
आदि और प्रनम्य के बीच में कोई संज्ञावाचक शब्द गया है तब हम को फिर सूक्ष्म विचार में
निमग्न होना चाहिये कि वह संज्ञावाचक शब्द कौन सा है कि जिस को चंद कवि ने प्रयोग किया
था। मैं निःसंदेह कल्पना करता हूं कि यहां देव शब्द था अर्थात् आदि देव ऐसा पाठ चंद ने
प्रयोग किया था क्योंकि प्रथम तो "आदिः कारणं स च देवश्चेति कर्म्मधारयः" तथा "जग
दुपादानादिगुणवान् नारायणः" दूसरे आदिदेव शब्द हमारी संस्कृतभाषा के प्रामाणिक ग्रंथों में
मंगलाचरणों तथा ईश्वर की स्तुति तथा ईश्वर के ध्यान के वाक्यों में बहुधा प्रयोग किया गया
है कि हम उदाहरण के लिये केवल दोही प्रमाण यहां दिखाते हैं जैसे :- "परं ब्रह्म परं धाम ।
पवित्रं परमं भवान् ॥ पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुं" ॥ तथा "त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण ।
स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानं" ॥ तीसरे चंद कवि ने स्वयम् अपने इस महाकाव्य में इस आदि
देव शब्द का प्रयोग अनेक स्थानों में किया है जैसा कि:- "प्रनम्य प्रथम मंम आदि देवू । ॐकार

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३
शब्द जिन करि अच्छेव' ॥ चौथे इस तुक में प्रथम मगण होने के कारण तीनों अक्षर दीर्घ होने
चाहियेँ, अतएव कवि ने आदी देव ऐसा पाठ कहा है। आदि शब्द संस्कृत में इकारान्त है परंतु
उसे कवि ने यहां मगण होने के कारण के अतिरिक्त गानविद्या संबंधी दोष दूर करने के अभि-
प्राय से भी ईकारान्त किया है क्योंकि चंद गानविद्या में भी निपुण था और साटक के गाने में
तुक की पहिली चौथी मात्रा पर ताल आता है। यद्यपि मेरी कल्पना तौ यह है परंतु जब मैंने
इस ग्रंथ का कुछ भाग कोटा राज्य के विद्वान कविराज श्री चंडीदानजी से पढा था तब उनों ने
यह बतलाया था कि आदि के पहिले ओ३म् शब्द का प्रयोग कवि चंद ने किया था और उस का
अर्थ आदि ओ३म् प्रनम्य अर्थात "पहिले ओंकार को नमन करके" किया था। यद्यपि यह प्रयोग
भी कुछ बैठ जाता है और ठीक सा मालूम होता है और जितनी पुस्तकें रासे की मेरे देखने में
आईं हैं उन में प्रायः ऐसा ही पाठ मिलता भी है परंतु मैं इस की अपेक्षा मेरी कल्पना को अधिक
बलवान और युक्त मानता हूं और आशा करता हूं कि यदि वे अब विद्यमान होते तौ मेरी इस
कल्पना को प्रसन्नतापूर्वक मान लेते। यदि कोई ओ३म् आदि प्रनम्य ऐसा भी पाठ मानें तथापि
कुछ हानि नहीं है। और जब तक कि किसी बहुत प्राचीन पुस्तक में हमारे इस मानने के विरुद्ध
कोई अन्य पाठ न मिल जावे तब तक मैं इस को मानना अयोग्य नहीं समझता हूं ॥
अब दूसरी पंक्ति का पाठ "सिट्टं धारन धारयं वसुमती लच्छीस चरनाश्रयं" है । इस
में १२ + ८ = २० अक्षर हैं किं यहां चरनाश्रयं शब्द को मैंने चरणाश्रयं किया है क्योंकि कोई छंद गान
से खाली नहीं है और साटक की छांन के अनुसार उच्चारण में यहां रकार स्वर रहित हो जाता
है और जैसा उच्चारण और गान में रूप हो वैसा काव्य में लिखने में भी कोई दोष नहीं है ।
जो कवि गान के नियमों से अपरिचित हैं उन के काव्य में ऐसे स्थलों में अनेक दोष रह जाते हैं
क्योंकि गान छंद के लिये एक कसौटी है और ऐसे ही मौकों को कवि का अधिकार अर्थात्
Poetical Licence कहते हैं । कोई २ विद्वान कवि के अधिकार की छूट अर्थात् Poetical Licence
को दोष मानते हैं परंतु वह एक भ्रम है क्योंकि सस्वर अक्षर का खोड़ा कर देना और खोड़े को
सस्वर कर देना व्याकरणादि भिन्न शास्त्रों में दोष समझना चाहिये परंतु छंद रचन और गान में
तौ यह दोष नहीं कहाता है देखेः चंद के इन वचनों के भीतरी आशयों से भी हम यही
अनुमान कर सक्ते हैं :-
लघु गुर मंडित खंडिय हि । पिंगल अमर भरत्थ ॥ ३७ ॥ १
चरन नींम अच्छिर सुरंग । पाट लघु गुरु विधि मंडिय ॥
सुर विकास जारी सु मुष । उक्ति रस गौरब नि छंडिय ॥ ४० ॥ १
तीसरी पंक्ति के पाठ तम गुन तिष्ठति ईस दुष्ट दहनं । सुरनाथ सिद्धिश्चर्यं में १४ + ८ = २२
अक्षर हैं । इस में उपर कही हुई युक्तियों के सिवाय थोड़ा सा और ध्यान देने से ज्ञात हो सक्ता
है कि ग्रंथकर्त्ता ने तम गुन और सुरनाथ पाठ नहीं प्रयोग किये थे किन्तु जैसे हम ने अनुमान कर
शुद्ध किये हैं तं गुं और सुरनाथ क्योंकि प्रथम तौ इस साटक छंद में मगण होने के कारण तं
और गुं ही होने चाहियेँ और दूसरे चंद के ऐसे प्रयोग इस काव्य में बहुत से स्थलों पर दृष्टि
आवेंगे । यह भी हमारे देखने में आवेगा कि त्वम् और अहम् के स्थान में तं और हुं जैसे प्रयोग
चंद ने किये हैं । इस में हम को कुछ भी आश्चर्य नहीं करना चाहिये क्योंकि चंद के इस नीचे
लिखे वाक्य से हम अच्छी तरह समझ सक्ते हैं कि उस ने अपने इस महाकाव्य की भाषा में षट
भाषा और कुरान की भाषा का आश्रय किया है:-

४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
श्लोक ॥ उक्ति धर्म विशालस्य । राजनीति नवं रसं ।
षट भाषा पुराणं च । कुरानं कथितं मया ॥ १ ॥ ३६
अब शेष चौथी पंक्ति का पाठ “थिर चर जंगम जीव चंद नमयं सर्वस वरदा मयं” में १४ + ८
= २२ अक्षर हैं । इस के स्थान में जो यह पाठ “थिर्चजंगम जीव चंद नमयं संर्वस वर्दामयं” शुद्ध
किया गया है उस के लिये ऊपर कही हुई युक्तियों से ही हमारा शोधन करना ठीक मालूम हो
सक्ता है । इस में इतना कहना और भी आवश्यक है कि सोसाइटी की मुद्रित कियी पुस्तक में
जो चंदनमयं पदच्छेद किया है वह अयुक्त है और मिस्टर ऐफ. ऐम. ग्राउज साहब ने जो चंद
और नमयं पदच्छेद किये हैं वह ठीक हैं और मैं भी मिस्टर ग्राउज के पदच्छेद से सम्मत हूं ॥
जो पाठ हमने जिस रीति से इस रूपक में शुद्ध किये हैं वह अथवा वैसे ही और भी पाठ
जो कहीं आगे इस ग्रंथ भर में आवेंगे तो हम उन पर सर्वत्र टिप्पण नहीं करेंगे किन्तु वहां का
मूल पाठ हमारे यहां पर वर्णन किये शोधन प्रकार के अनुसार शुद्ध रहेगा । पाठक महाशय इन
ही नियमों से उन पाठों को सिद्ध कर समझ लें अर्थात् जिस नियम को एक स्थान पर टिप्पण में
वर्णन कर देंगे वह अन्यत्र नहीं कहा जावेगा । किन्तु जहां कोई नवीन प्रयोग आवेगा वहां उस
का वर्णन कर दिखावेंगे ॥
जैसे कि चंद के प्रयोग किये हुए छंदों के नाम और उन के लक्षणों के शोध करने में
पुरातत्त्ववेत्ताओं को परिश्रम पड़ता है वैसे ही उस के इस महाकाव्य के अर्थ लगाने में भी अनेक
प्रकार की अडचनें उपस्थित होती हैं । यद्यपि हमारा मुख्य काम इस ग्रंथ के मुद्रित करने में
केवल इतना ही है कि उस के मूलपाठ को सार्थक शोध दें परंतु यह महाकाव्य वर्तमान समय
में ऐसी बिगड़ी हुई दशा में उपस्थित है कि जो उस पर इतना परिश्रम न किया जावे कि जितना
हम यह करते हैं तो हमारा किया हुआ शोधन पुरातत्त्ववेत्ता विद्वानों को भली भांति संतुष्ट नहीं
कर सक्ता । अतएव हम चंद के काव्य की अर्थ संबन्धी कठिनता को दिखलाने के लिये केवल इस
मंगलाचरण के रूपक का अर्थ उदाहरण के लिये करते हैं कि जिस से हमारे पाठकों को मालूम
हो कि मूलपाठ का शुद्ध होना अर्थ पर दृष्टि दिये बिना असंभव है । महाकवि चंद अपने इस
महाकाव्य के आरंभ में इस मंगलाचरण के रूपक में आदिदेव, गुरु, वाणी, लक्ष्मीश, सुरनाथ और
सर्वेश को नमस्कार करता; है वह कहता है कि “आदिदेव को नमन कर के और गुरु को नमस्कार
करके; वाणी के पादों को वंदन; स्वर्ग, पाताल, (और) पृथ्वी के सृष्टा लक्ष्मीश के चरणों का
आश्रय, दुष्टों के दहन करने को तम गुण (जिस) ईश में रहता है (उस) सुरनाथ की पादुका का
सेवन (और) थिर, चर, जंगम, (और) जीव के वरदामय सर्वेश को (मैं) चंद नमन करता हूं” ।
हमारे किये इस अर्थ को विचारने से विद्वानों को मालूम हो सकेगा कि यद्यपि इस के
अनेक प्रकार के अर्थ हो सक्त हैं परंतु यह अर्थ चंद के व्याकरण शास्त्र संबन्धी जो नियम उस के
इस ग्रंथ से मालूम होते हैं उनके अनुसार सरल और कवि की उक्ति के अनुकूल है । इस में कितनेक
शब्द ऐसे २ भी हैं कि जो अर्थ करने वाले को चमका और भड़का देते हैं परंतु हम इस रूपक के
सब शब्दों के विषय में अर्थात् जिसके विषय में जितना कहना आवश्यक है वह कहते हैं :-
आदिदेव (सं. पु. आदिदेवः । आदौ दीव्यति स्वयं राजते) नारायण । इस शब्द के विषय में हम
ने ऊपर कहा है अतएव यहां विशेष नहीं कहते किन्तु उस के प्रयोग के दो प्रमाण और भी
यहां देते हैं:-सहस्त्रात्मा मया योव आदिदेव उदाहृतः॥ या. स्मृ. ॥ वासुदेवो बहृद्दानुरादि
देवः पुरंदरः ॥ वि. सहस्रनाम.॥

आदि पर्व ] : पृथ्वौराजरासौ । ५
प्रणम्य (सं० प्रणम्य) नमन करके अथवा प्रणाम कर के ॥
नम्य (सं० अ० नमः अथवा नम्=नमना) नमस्कार कर के इस शब्द के भी म्य पर साटक की ध्वनि
के अनुसार ताल है अर्थात् यहां भी स्वर उदात्त है ॥
गुरुयं गुरू को यह चंद की हिन्दी के पुल्लिंग गुरु शब्द की द्वितीया का निज प्रयोग है। चंद के ऐसे
निज प्रयोगों को देख कर हम को आश्चर्य के वश न हो जाना चाहिये किन्तु इस बात की
खोज करनी चाहिये कि चंद की हिन्दी के व्याकरण संबन्धी नियम क्या और कैसे हैं। और
ऐसे अनुस्वार सहित शब्दों को देख कर यह अनुमान भी नहीं करना चाहिये कि रासे का
ग्रंथ कर्ता ऐसा निर्बोध था कि उस को अनुस्वार और विसर्ग तक का ज्ञान नहीं था। हमारे
यह अन्वेषण ध्यान में लाने योग्य हैं कि प्रथमतः चंद की हिन्दी तीन प्रकार की है पट-भाषा-
और-कुरान की-भाषा की-योनिव़ाली १ पट-भाषा-और-कुरान की-भाषा के सम २ और देशी
प्रसिद्ध ३। दूसरे संप्रत हिन्दी में तो नपुंसकलिंग नहीं है परंतु चंद की हिन्दी में तीनों लिंग हैं।
तीसरे जितनी संज्ञा अनुस्वार सहित उस में प्रयोग हुई हैं वे पुल्लिंग अथवा नपुंसकलिंग ही
हैं। देखो यहां नम्य गुरुयं वाक्यखंड में कवि के अर्थ को ध्यान में लाने से गुरुयं शब्द पुल्लिंग में
प्रयोग किया गया मालूम होता है और पांचवें रूपक की इस तुक गुरं सब्व कव्वौ लहू चंद कव्वी।
जिनैं दर्सियं देवि सा अंग हुव्वी ॥ में गुरं शब्द चंद ने अपनी हिन्दी के नपुंसकलिंग की प्रथमा में
प्रयोग किया है। और जहां क्रिया शब्दों में अनुस्वार हैं जैसे इसी प्रमाण में प्रवेश कियी गई तुक
में दर्शियं शब्द है वह संस्कृत दर्शितं से है। बहुत से शब्दों पर लेखकों ने अपने अव्युत्पन्न होने के
कारण जो अनुस्वार लगा दिये हैं उन का सूक्ष्म विचार करने से विद्वान स्पष्ट जान सक्ते हैं कि
यहां कवि ने अनुस्वार का प्रयोग नहीं किया था किन्तु लेखकों ने अपनी अज्ञानता से लगा दिये हैं
और कहीं २ उनों ने कवि के प्रयोग किये हुए अनुस्वारों को उड़ा दिये हैं जैसे पांचवें रूपक के
भुजंगप्रयात छंद की पहिली तुक में चंद ने ऐसा प्रयोग किया था कि प्रथमं भुजंगी सुधारी यहनं ।
जिनैं नाम एकं अनेकं कहनं ॥ उस के स्थान में एशियाटिक सोसाईटी की छापी हुई पुस्तक १ के
पत्र ३ में देखो कि जिस लिखित पुस्तक से वह छापी गई है उसके लेखक ने प्रथम भुजंगी सुधारी
यहनं । जिनै नाम एकं अनेकं कहनं ॥ पाठ कर दिया है। इस के अतिरिक्त चंद के अनुस्वार
सहित शब्दों के प्रयोग करने के और भी अनेक कारण हैं परंतु वह जब मेरे संकलन किये हुए चंद
के व्याकरण संबन्धी नियम मैं कुछ समय में प्रकाश करूंगा तब स्पष्ट रीति से हमारे पाठकों को
मेरे बड़े परिश्रम से सिद्ध किये हुए अन्वेषण मालूम हो जांयगे ॥
वानीय (सं० स्त्री० वाणिः=सरस्वत्याम्) सरस्वती के । यह चंद की हिन्दी में षष्ठी के एकवचन
का रूप है और जैसे संस्कृत में श्रीः शब्द के रूप में षष्ठी का श्रियः होता है उसी तरह चंद
ने अपनी हिन्दी में वानीय किया है ॥
वंढे-वंदन करता हूं ॥ चेत रखना चाहिये कि हम ऊपर गुरुयं शब्द की व्याख्या में चंद की हिन्दी
तीन प्रकार की होना बतला आये हैं उस में से यहां यह वंढे संस्कृत-सम के रूप का प्रयोग
चंद ने किया है ॥
पयं (सं० पय = गतौ) चरणों को ॥ यह चंद की हिन्दी के पुल्लिंग की द्वितीया का रूप है। कोई २
कवि जो पय शब्द को पैर का वाचक होना बिलकुल नहीं बताते और उस का अर्थ यहां
“दूध जैसो श्वेत अथवा जल जैसी निर्मल सरस्वती को वंदन करता हूं”, करते हैं वह भूल
हैं। पय शब्द पैर का वाचक संप्रत हिन्दी में भी रात्रि दिन बोलचाल में आता है जैसे पयलगी,

पैलगी, पालागन पाय और पयदल इत्यादि । और संस्कृत में भी पद्य = गतौ है । मिस्टर ग्राउज
साहब ने जो इस शब्द को पैर का वाचक अपने अंग्रजी अनुवाद में माना है वह बहुत ठीक
है और मैं उन से इस में सम्मत हूं ॥
सिष्टं (सं० त्रि० सृष्टः = निर्मिते । रचिते) सृजनेवाला । यह चंद की हिन्दी में सं० सृष्ठः सृजनेवाले
का नपुंसकलिंग की प्रथमा का एकवचन है । इस को शिष्ठ अथवा श्रेष्ठ आदि शब्दों का
अपभ्रंश मानना अयुक्त है किन्तु वह चंद की हिन्दी में सं० त्रि० सृष्टः का सिष्टं बना है इसी
तरह सं० भृष्ट, भ्रष्ट, धृष्ट, दृष्ट, के अपभ्रंश रूप हिन्दी में भिष्ट, घिष्ट, दिट्ट, होते हैं ॥
धारणं (सं० पु० धारक = स्वर्लोके) स्वर्गलोक ॥ धारयं (सं० त्रि० धारय = धारके । नाग देशे ॥
धारयैः कुसुमोर्म्मांणाम् । भट्टिः) पाताल लोक ॥ वसुमती (सं० स्त्री० भूलोक । स्पष्टम्) भूलोक ॥
यहां थोड़ा सूक्ष्म विचार कर हमारे किये अर्थ की सत्यता जांचने का काम है क्योंकि सिष्टं
धारणं धारयं वसुमती लच्छीस चर्नाश्रयं का अर्थ अनेक कवि अनेक प्रकार का करते हैं परंतु
मैं उन को चंद के अभिप्राय के अनुकूल नहीं समझता हूं। इन शब्दों को पृथक् २ अर्थ तो हम
ने संस्कृत कोषों से लेकर वर्णन कर ही दिये हैं। इस के सिवाय लच्छीस शब्द जो विष्णु का
वाचक है वह हम को यह अर्थ करने की स्पष्ट लक्षणा कराता है कि धारणं = स्वर्गलोक ॥
धारयं = पाताल लोक ॥ और वसुमती = भूलोक का सिष्टं = सृजनेवाला (जो) लच्छीस = विष्णु
(उस के) चर्नाश्रयं = चरणों का सेवन (करता हूं) यही बहुत ठीक अर्थ है क्योंकि यहां तत्पुरुष
समास है और लच्मीश का अर्थ कोशों में विष्णु का है और विष्णु के विषय में शास्त्रों में नीचे
लिखे प्रमाण कहा है उस से भी हमारा किया हुआ अर्थ अच्छी तरह पुष्ट होता है :—
यस्मात् विश्वमिदं सर्व्वं । तस्य शक्त्यामहात्मनः ।
तस्मात् देवोच्यते विष्णु । र्व्विशधातोः प्रवेशनात् ॥
ज्योतींषि विष्णुर्भुवनानि विष्णु । र्व्वनानि विष्णुर्गिरयो दिशश्च ।
नद्यः समुद्राश्च स एव सर्व्वौ । यदस्ति यन्नास्ति च विप्रवर्येति ॥
अनादि निधनं विष्णुं । सर्व्वलोक महेश्वरं ।
लोकाध्यक्षं स्तुवं नित्यं । सर्व्व दुःखाति गो भवेत् ॥ ६ ॥
लोकनाथं महद्भूतं । सर्व्वभूत भवोद्भवं ॥ १० ॥
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृतः कृतः ॥ ३१ ॥
लक्ष्मीवान् समितिं जयः ॥ ५६ ॥ श्रीमाल्लोक त्रयाश्रयः ॥ ८२ ॥
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः । केशवः कैशिहा हरिः ॥ ८६ ॥
लोकस्वामी त्रिलोक धृत् ॥ ८७ ॥ लोकाधिष्ठानमद्भूतः ॥ ११२ ॥
त्रीन् लोकान् व्याप्यं भूतात्मा । भुंक्ते विश्व भुगव्ययः ॥ १४४ ॥
वासनाद्वासुदेवस्य । वासितं भुवन त्रयं ॥ १५१ ॥
चर्णाश्रयं (सं० चरण + चाश्रयं = ) चरणों का सेवन ॥ यह अनुस्वार सहित शब्द भी चंद की हिन्दी
का संस्कृत - सम नपुंसकलिंग है ॥
सं । गुं (सं० न० तमः और पु० गुणः) तम । गुण । चंद को हिन्दी के नपुंसकलिंग ॥ प्राकृत-भाषा
सम का प्रयोग ॥

[आदि पर्व] पृथ्वीराजरासौ । ७

तिष्ठति (सं० तिष्ठति) रहता है । चंद की हिन्दी के संस्कृत-समभेद का रूप है ॥
ईसं-(सं० पु० ईशः = महादेवे) महादेव । सदाशिव ॥
दुष्ट (सं० न० दुष्टं = अधमे । वंचके) दुष्टं ॥ दुष्ट दहनं = दुष्टों के दहन करने के लिये अथवा
दुष्टों के दहनार्थ ॥
दहनं (सं० पु० दहनः = दाहे । भस्मी करणे ।) दहन के लिये चंद की हिन्दी का नपुं० है ॥
सुर्नाथ (सं० पु० सुर + नाथ = रुद्रे) महादेव की ॥
सिद्धि (सं० स्त्रो० सिद्धिः = पादुकांयाम्) पादुका का ॥
अयं (सं० पु० अयः = अयणे । आये ॥ श्रिञ् = सेवायाम्) सेवनं ॥ सिद्धि अयं = पादुका का सेवन ॥
थिर (सं० पु० स्थिरः = स्थिर पदार्थेः) स्थिर वस्तु जैसे:- पर्वत और पृथ्वी आदि ॥
चर (सं० पु० चरः = चले) चर वस्तु अथवा पदार्थ जैसे वस्तु और जलादि ॥
जंगम (सं० त्रि० जंगमः = पशुपत्ती) कीट पतंगादि ॥
जीव (सं० पु० जीवः = प्राणिनि) मनुष्यादि ॥ ध्यान में लेने की बात है कि पंडितों ने सब पदार्थों
को स्थावर और जंगम नामक दो भेदों में ही विशेष करके विभक्त किये हैं । परंतु चंद ने सब
पदार्थों के चार भेद माने हैं । प्रथम स्थिर, जो सदैव स्थिर रहते हैं, जैसे पर्वतादि; दूसरे
चर, जो सदैव स्थिर नहीं रहते, जैसे स्थानादि; तीसरे जंगम, जो जीव दूध नहीं पीते, जैसे
कीट पतंगादि; और चौथे जीव, जो दूध पीते हैं, जैसे मनुष्यादि । हम ने किसी २ कवि को
इन चारों शब्दों के प्रयोग करने के कारण चंद कवि को दोष देते हुए सुने हैं परंतु यह उनको
भूल है, क्योंकि उन्होंने कवि के सूक्ष्म आशय को ध्यान देकर नहीं समझा है ॥
चंद वरदई=इस महाकाव्य का ग्रंथ-कर्त्ता कि जो हिन्दुओं के अंतिम बादशाह पृथ्वीराज
जी चौहान का लंगोटिया मित्र और उन के दरबार का कविराज था । वह भट्ट जाति जो
आज कल राव करके कहलाते हैं उस के जगत नामक गोत्र का था और उस के पूर्व पंजाब
देश के लाहौर नगर के रहने वाले थे और उन की यजमानी अजमेर के चौहानों की थी ।
उस की जैसी शूरवीरता इस महाकाव्य से विदित होती है उस का मुख्य कारण यहो है कि
वह पंजाब देश की अद्यावधि प्रसिद्ध वीर भूमि के तत्त्वों से उत्पन्न हुआ था और राजपूताने
के हृदयरूपी अजमेर नगर में बड़ा हुआ था । वह षट-भाषा, व्याकरण, काव्य, साहित्य, छंद
शास्त्र, ज्योतिष, वैद्यक, मंत्रशास्त्र, पुराण, नाटक, और गान आदिक विद्याओं में अच्छा
व्युत्पन्न पंडित था । उस के पिता का नाम वेण और विद्या-गुरु का नाम गुरुप्रसाद था ।
उस की दो स्त्रियों के नाम कमला अर्थात् मेवा और गौरी अर्थात् राजोरा और एक लड़की
का नाम राज बाई और दश लडकों के नाम सूर १ सुन्दर २ सुजान ३ जल्ह ४ बल्ह ५
बलिभद्र ६ केहरि ७ बीरचंद ८ अवधूत अर्थात् योगराज ९ और गुनराज १० थे । इस
महाकाव्य के विषयों को वैसे तो उस ने समय २ पर बना कर कंठ कर रक्खे थे परंतु उन को
ग्रंथाकार में उस ने ६०॥ दिन में रचा था और अंत को उस ने रासे की पुस्तक अपने लड़के
जल्ह नामक को दियो थी । इस रासे के अतिरिक्त उस के रचे और भी कई एक ग्रंथ सुनने
में आते हैं परंतु उन में सब से बड़ा ग्रंथ यह रासा है और अन्य सब ग्रंथ अब विल्कुल्ल
नहीं मिलते हैं । उस का सविस्तर जीवनचरित्र और वंशावली जहां तक हमारे जानने में
ख्यातादि से आई है वह हम इस ग्रंथ के समाप्त होने पर छाप कर प्रसिद्ध करेंगे ॥

[आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ६
॥ कर्म्म-स्तुति ॥
कवित्त ॥ प्रथम मंगल्ल प्रमान । निगम संपजय वेद धुर ॥
त्रिगुन साख चिहुँ चक्र । वरन लग्गो सु पत्त कर ॥
त्वचा भ्रम्म उड्डरिय । सत्त फूल्यो चावहिसि ॥
क्रम्म सुफल उदयत्त । अमृत सुम्रत मध्य वसि ॥
डुलै न वाय नृप नीति अति । खाद अमृत जीवन करिय ॥
कलि जाय न लगै कलंक इहि । सत्ति मत्ति आठति धरिय ॥
कं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥
इस छंद की प्रथम तुक की प्रथम यति के प्रथम टुकड़े में बीय पाठ अशुद्ध है उस के स्थान
में हम ने बिय किया है । और दूसरी यति के दूसरे टुकड़े में सिंचियइ के स्थान में सिंचिय और
धम्मं के स्थान में धम्म और यत के स्थान में पत्त, बारहै को बारह, और परस को पारस शुद्ध
किये हैं और यह शोधन ऐसे साधारण हैं कि जिनके लिये कोई तर्क लिखने की आवश्यकता नहीं है ॥
इस रूपक में ग्रंथकर्त्ता वृत्त के रूपकानकार से धर्म की स्तुति करता है ॥
३ कवि ने इस रूपक के छंद को कवित्त संज्ञा दियो है । संप्रत काल में यह छप्पय, छप्पै, षट-
पद, षटपदी आदिक नामों से प्रसिद्ध है परंतु सत्रहवीं शताब्दी के पहिले वह कवित्त नाम से ही
प्रसिद्ध था । रूपदीप पिंगल वाले ने भी जो नीचे लिखा छप्पय का लक्षण कहा है उस में उस ने
भी यह कहा है कि:-“सुन गरुड पंख पिंगल कहैं । छप्पे छंद कवित्त यह” इस से सिद्ध होता है
कि इस ग्रंथ के बनने के समय तक छप्पै का नामान्तर कवित्त करके प्रसिद्ध था ॥
छप्पै लक्षण ।
लघु दीरघ नहि नेम । मत्त चौबीस करीजै ॥
ऐसे ही तुक सार । धार तुक चार भरीजै ॥
नाम रसावल होय । और वस्तु कभि जानहु ॥
उल्लाला की विरत । फेर तिथ तेरह आनहु ॥
द्वै तुक बनावो अंत की । यत यत में अठ बीस गहु ॥
सुन गरुड़ पंख पिंगल कहै । छप्पै छंद कवित यह ॥
इस के अतिरिक्त मंच्छ कवि कृत रघुनाथ रूपक में भी उस ने छप्पै छंदों को कवित्त कर के
ही लिखे हैं ॥
इस के पाठ को शोधन करने में ध्यान में लेने जैसी बात है कि प्रथम और मंगल शब्दों के
बीच में जो बहुत सी पुस्तकों में किय शब्द है वह अधिक होने से अशुद्ध है क्योंकि उस पाद में
कुल्ल ११ मात्रा होनी चाहियें । बेदले वाली पुस्तक में संपजय शब्द है और एशियाटिक सोसाइटी
की छापी हुई पुस्तक में तो संपूर्जय किया गया है-इस में मेरी सम्मति यह है कि पाठ में तो
संपजय ही रखना चाहिये परंतु अर्थ करने में संपूर्जय समझना चाहिये-क्योंकि संपूर्जय पाठ रखने

५० . पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
मुक्ति-स्तुति ।
कवित्त ॥ भुगति भूमि किय क्यार । वेद सिंचिय जल पूरन ॥
बीय सुबय लय मध्य । ग्यांन अंकू रस जूरनं ॥
चिगुन साख संगहिय । नाम बहु पत्त रत्त क्खिति ॥
सुक्रम सुमन फुल्ल्यै । सुगति पक्की द्रव संगति ॥
दुज सुमन उसिय बुध पक्क रस । वट विस्वास गुन पस्तंरिय ॥
तरु इक्कसाख चय लोक मद्धि । अजय विजय गुन विस्तरिय ॥
कं० ॥ ४ ॥ रु० ॥ ४ ॥
पूर्व कवियों की स्तुति और उच्छिष्ट संज्ञा कथन ॥
॥ भुजंगप्रयात ॥
प्रथमं भुजंगी सुधारी ग्रहंनं । जिनें नाम एकं अनेकं कहंनं ॥
से छंद टूटता है । गुजराती भाषा में ऐसे शब्द बहुत आते हैं जैसे मुकुन्दराम का मक्रन्दराम,
तुलसी का तलशी, और शिव का शव । ऐसे मुख दोष के कारण से बिगड़े हुए शब्दों के रूपों के
लिये एक यह श्लोक भी प्रसिद्ध है :-
गुर्जरा मुख दोषेण । शिवोपि शवतां गताः ॥
तुलसी तलशी जाता । मुकुन्दोपि मक्रन्दतां ॥
इस के अतिरिक्त चंद की हिन्दी में ऐसे प्रयोग बहुत से आवेंगे जैसे "विन्दलालाट प्रसेद
कियो" यहां प्रस्वेद का प्रसेद हुआ है । चिहुं के स्थान में चिहुँ किया है क्योंकि यहां अर्ध अनुस्वार
प्राप्त है । लगे के स्थान में लग्गो, उद्यत के स्थान में उदयत्त । लागे के स्थान में लगे । और
सति मति के स्थान में सत्ति मत्ति सुधारे हैं क्योंकि ऐसे पाठ सुधारने को छंद के टूटने का दोष
हम को स्वयम् सचेत करता है ॥
इस रूपक में भी चंद कवि रूपकालंकार से कर्म की स्तुति करता है ॥
४ इस के पाठ में एशियाटिक सोसाइटी आदि की पुस्तकों में जो अंकूर और सजूरन पाठ
हैं वह एक बालक भी जान सक्ता है कि बड़े ही अशुद्ध हैं किन्तु दृष्टि देने से हमारे किये
पदच्छेद से सार्थक पाठ हो जाते हैं अर्थात् अंकू रस जूरन । हम ने रत के स्थान में रत्त क्खित्ति
के स्थान में क्षिति पाठ किये हैं । हमारे उसिय पाठ के स्थान में आगरा कालेज और बेदले आदि
की पुस्तकों में असिय पाठ है परंतु वह अशुद्ध है । मालूम होता है कि उन के लेखकों ने उ को
ऐसा ऊ समझ कर अशुद्ध पाठ लिख दिया है और अर्थ पर दृष्टि देकर प्रति नहीं कियी है ॥
स्मरण में रखना चाहिये कि इस रूपक में कवि रूपकालंकार से मुक्ति की स्तुति करता है ।
अर्थात् चंद ने दूसरे तीसरे और इस चौथे रूपकों में क्रम से धम्मेश्वर, कम्मेँश्वर, और मुक्तेश्वर
नामक ईश्वरों के मंगलाचरण किये हैं ॥
५ इस भुजंगप्रयात नामक छंद का लक्षण चंद कवि के माने हुए छंद ग्रंथों में से पिंगल मुनि

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ११
दुती लम्भयं देवनं जीवतेसं । जिनैं विश्व राख्यो बली मंच सेसं ॥
चवं वेद बंभं हरी कित्ति भाखी । जिनैं ध्रम्म साधम्म संसार साखी ॥
तृती भारती व्यास भारत्य भाख्यौ । जिनैं उत्त पारत्थं सारत्थ साख्यौ ॥
चवं सुखदेवं परीखत्त पायं । जिनैं उड्डयौ अ्रब्ब कुवेंस रायं ॥
नरं रूप पंचम्म श्रीहर्ष सारं । नलैराय कंठं दिने पल्ल धारं ॥
षटं कालिदासं सुभाखा सुबद्धं । जिनैं बागवानी सुबानी सुबद्धं ॥
कियो कालिका मुख वासं सुसुद्धां । जिनैं सेत बंध्योति भोज प्रबंधं ॥
सतं डंडमाली उछाली कविंत्तं । जिमैं बुद्धि तारंग गंगा सरित्तं ॥
जयदेव अ्ठं कवी कब्बिरायं । जिनैं केवलं कित्ति गोविंद गायं ॥
गुरं सब्ब कब्बीं लहू चंद कब्बी । जिनैं दर्सियं देवि सा अंग छब्बी ॥
कवी कित्ति कित्ती उकत्ती सुदिक्खी । तिनैं की उच्छिष्टी कवी चंद भक्खी ॥
, कूं० ॥ १० ॥ रू० ॥ ५ ॥
यह लिखते हैं कि “भुजंग प्रयातं यः ॥ ३८ ॥ अर्थात् जिस के पाद में चार यकार (यगण) हों वह
भुजंगप्रयात नामक छंद कहाता है ॥
इस पांचवें रूपक के जो पाठ एशियाटिक सोसाईटी की और अन्य पुस्तकों में बहुत अशुद्ध
हैं वह यह हैं:- प्रथम । यहनं । कहनं । लम्भयं । भारथं । उतपारथ । सारथ । सुखदेवं । परीक्षंत ।
उट्टयौ अब्र । कुरुवंस । पल्ल । कालिदास । मुख्य । सुसुद्ध । वंध्यौ । तिभोजन । बुद्धितारंग । गंगासरित्तं ।
जयदेवं । अठं । केवलं । दरसिय । उकति । तिन । कवि । और भष्थी । इन में से प्रत्येक को सिद्ध
करने के लिये जो हम सतर्क विवेचना करें तौ बहुत स्थान चाहिये परंतु मैं आशा करता हूं कि
पुरातत्त्ववेत्ता इन को हमारे शुद्ध पाठों से मिलाकर और जो कुछ चंद कवि की हिन्दी के नियम
हम ने संक्षेप में पहिले प्रकाश किये हैं उन से विचार कर सिद्ध कर लेंगे ।
इस रूपक में चंद कवि अपने से पहिले हुए मुख्य २ कवियों की स्तुति करके अंत की दो तुकों
में उन को अपने गुरु मान कर और आप निरभिमानी होकर अपने काव्य को उनके कहे काव्य की
उच्छिष्टी होने की संज्ञा देता है । जैसे कि इस महाकाव्य के किसी २ रूपक में चंद के समय के
पीछे वरते हुए वृत्त लिखे प्राप्त होते हैं और उन पर से इस ग्रंथ की प्रामाणिकता में संदेह किया
जाता है वैसे ही यह रूपक क्या इस ग्रंथ की प्रामाणिकता के सिद्ध करनेवाला एक प्रमाण रूप
नहीं है? और अन्य कवि जैसे श्रीहर्ष और जयदेवादि के समय के निश्चय और निर्णय करने में
पुरातत्त्ववेत्ताओं का सहायक और उपकारी नहीं हो सक्ता है ?
इस के अतिरिक्त इस छंद की तीसरी तुक में जो एक बंभ शब्द चंद कवि ने प्रयोग किया
है उस को देख कर चारण राव और भाट जाति के अच्छे २ कवियों को हम ने आश्चर्य करते हुए
देखे हैं और वे इस का अर्थ अंड बंड करते हैं । कोई उस को ब्रह्म शब्द का अपभ्रंश बतलाते हैं
और कोई चारों वेदों के ब्राह्मण ग्रंथों का वाचक बतलाते हैं और कोई कहते हैं कि महादेव की
मूर्ति के आगे जो गाल बजा के बंब शब्द मुख से करते हैं और ऐसा करने से महादेव प्रसन्न हो

१२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ चंद की स्त्री अपने पति के उच्छिष्ट संज्ञा
कथन से शंका करती है ॥
दूहा ॥ उच्छिष्ट चंद छंदह बयन । सुनत सु जंपिय नारि ॥
तनु पवित्र पावन कविय । ऊकति अनूठ उधारि ॥
छं० ॥ ११ ॥ रू० ॥ ६ ॥
कवित्त ॥ कहै कंति सम कंत । तंत पावन बड़ कब्बिय ॥
तंत संत उच्चार । देवि दरसिय मक्खि छब्बिय ॥
जाते हैं उस का वाचक है परंतु इस शब्द का हम पता लगाकर बताते हैं कि यह बंभं चंद की
हिन्दी का भूतकालिक क्रियावाचक शब्द है और संस्कृत भाषा में यङ्लुगन्तप्रक्रिया के प्रयोगों
में जो बंभणीत नर्भति प्रयोग सिद्ध होता है उस से बना है और उस का यहां फिर २ वा बार २
पढ़ा वा भणा का अर्थ है । क्योंकि "चवं वेद बंभं हरी कित्ति भाखी" इस तुक का अर्थ यह है
कि जिस "जीवतेस ने चारों वेदों को बार २ पढ़े वा भणे और हरी की कीर्ति को भाखी"। जो
मनुष्य संस्कृत भाषा में अच्छा व्युत्पन्न और पक्षपात और हठ जैसे दोषों से विमुक्त और सत्य का
दृढ़ अवलंबन करनेवाला है वह मैं आशा करता हूं कि ऐसे प्रयोगों को देख कर कदापि यह नहीं
कहैगा कि इस महाकाव्य का ग्रंथकर्त्ता चंद संस्कृत भाषा में अव्युत्पन्न था ॥
इस रूपक में चंद कवि आठ कवियों को अपने गुरु मान कर उन की स्तुति और उन की
काव्य रचना-शक्ति का वर्णन करता है वह सब से पहिले भुजंगी नाम से परमेश्वर को कवि ग्रहण
करता है क्योंकि वेदादिक में उस का कवि नाम कहा है यथा:-
"होता वा देव्या कवी०" यजुः "प्रथम वरजं भेषजं कविम्०" यजुः
"कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूः०" ईशोपनिषत्
"कविः क्रान्तदर्शी सर्वदृक् नान्यतोऽस्ति द्रष्टा" स्मृतिः ॥ शा० भा०
"कवि पुराणमनुशासितारम्०" गीता ॥
दूसरे जीवतेश से प्राणनाथ अर्थात् ब्रह्मा कि जो आदि कवि कहाता है जैसे भागवत में
कहा है कि "तेने ब्रह्महृदा य आदि कविये मुह्यन्ति यत् सूरय"
बाकी सब कवियों के विषय में कुछ विशेष कहने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि सर्व साधारण
लोग व्यासादि के नाम से भले प्रकार ज्ञात हैं ॥
६-९-कवि चंद ने जो पहिले रूपक में अपने काव्य को अपने से पहिले हुए कवियों के काव्य
का उच्छिष्ट होना कहा है उसे सुन कर उस की स्त्री उच्छिष्ट संज्ञा में आश्चर्य के साथ शंका और
अपने पति के गुणों का वर्णन करती है अर्थात् इन रूपकों में कवि चंद ने अपनी स्त्री के प्रश्नोत्तर
के प्रसंग से अपने काव्य की उच्छिष्ट संज्ञा के हेतु और अपने गुण प्रकाश किये हैं। इन में सम,
कंति और कंत शब्दों के प्रयोग विद्वानों की दृष्टि में रहने योग्य हैं। सम (सं० अ० सम् = संगे, -
सम्बन्धे, समुच्चये,) को अथवा प्रति, और सम ब्रह्मरूप में सम शब्द तुल्य के अर्थ में कवि ने प्रयोग
किया है; कंति (सं० स्त्री० कम् = ति) पत्नी अथवा स्त्री, और कंत (सं० पु० कम् + त) पुरुष अथवा