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सर्वकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 470 में से

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पृष्ठ 26

पैलगी, पालागन पाय और पयदल इत्यादि । और संस्कृत में भी पद्य = गतौ है । मिस्टर ग्राउज
साहब ने जो इस शब्द को पैर का वाचक अपने अंग्रजी अनुवाद में माना है वह बहुत ठीक
है और मैं उन से इस में सम्मत हूं ॥
सिष्टं (सं० त्रि० सृष्टः = निर्मिते । रचिते) सृजनेवाला । यह चंद की हिन्दी में सं० सृष्ठः सृजनेवाले
का नपुंसकलिंग की प्रथमा का एकवचन है । इस को शिष्ठ अथवा श्रेष्ठ आदि शब्दों का
अपभ्रंश मानना अयुक्त है किन्तु वह चंद की हिन्दी में सं० त्रि० सृष्टः का सिष्टं बना है इसी
तरह सं० भृष्ट, भ्रष्ट, धृष्ट, दृष्ट, के अपभ्रंश रूप हिन्दी में भिष्ट, घिष्ट, दिट्ट, होते हैं ॥
धारणं (सं० पु० धारक = स्वर्लोके) स्वर्गलोक ॥ धारयं (सं० त्रि० धारय = धारके । नाग देशे ॥
धारयैः कुसुमोर्म्मांणाम् । भट्टिः) पाताल लोक ॥ वसुमती (सं० स्त्री० भूलोक । स्पष्टम्) भूलोक ॥
यहां थोड़ा सूक्ष्म विचार कर हमारे किये अर्थ की सत्यता जांचने का काम है क्योंकि सिष्टं
धारणं धारयं वसुमती लच्छीस चर्नाश्रयं का अर्थ अनेक कवि अनेक प्रकार का करते हैं परंतु
मैं उन को चंद के अभिप्राय के अनुकूल नहीं समझता हूं। इन शब्दों को पृथक् २ अर्थ तो हम
ने संस्कृत कोषों से लेकर वर्णन कर ही दिये हैं। इस के सिवाय लच्छीस शब्द जो विष्णु का
वाचक है वह हम को यह अर्थ करने की स्पष्ट लक्षणा कराता है कि धारणं = स्वर्गलोक ॥
धारयं = पाताल लोक ॥ और वसुमती = भूलोक का सिष्टं = सृजनेवाला (जो) लच्छीस = विष्णु
(उस के) चर्नाश्रयं = चरणों का सेवन (करता हूं) यही बहुत ठीक अर्थ है क्योंकि यहां तत्पुरुष
समास है और लच्मीश का अर्थ कोशों में विष्णु का है और विष्णु के विषय में शास्त्रों में नीचे
लिखे प्रमाण कहा है उस से भी हमारा किया हुआ अर्थ अच्छी तरह पुष्ट होता है :—
यस्मात् विश्वमिदं सर्व्वं । तस्य शक्त्यामहात्मनः ।
तस्मात् देवोच्यते विष्णु । र्व्विशधातोः प्रवेशनात् ॥
ज्योतींषि विष्णुर्भुवनानि विष्णु । र्व्वनानि विष्णुर्गिरयो दिशश्च ।
नद्यः समुद्राश्च स एव सर्व्वौ । यदस्ति यन्नास्ति च विप्रवर्येति ॥
अनादि निधनं विष्णुं । सर्व्वलोक महेश्वरं ।
लोकाध्यक्षं स्तुवं नित्यं । सर्व्व दुःखाति गो भवेत् ॥ ६ ॥
लोकनाथं महद्भूतं । सर्व्वभूत भवोद्भवं ॥ १० ॥
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृतः कृतः ॥ ३१ ॥
लक्ष्मीवान् समितिं जयः ॥ ५६ ॥ श्रीमाल्लोक त्रयाश्रयः ॥ ८२ ॥
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः । केशवः कैशिहा हरिः ॥ ८६ ॥
लोकस्वामी त्रिलोक धृत् ॥ ८७ ॥ लोकाधिष्ठानमद्भूतः ॥ ११२ ॥
त्रीन् लोकान् व्याप्यं भूतात्मा । भुंक्ते विश्व भुगव्ययः ॥ १४४ ॥
वासनाद्वासुदेवस्य । वासितं भुवन त्रयं ॥ १५१ ॥
चर्णाश्रयं (सं० चरण + चाश्रयं = ) चरणों का सेवन ॥ यह अनुस्वार सहित शब्द भी चंद की हिन्दी
का संस्कृत - सम नपुंसकलिंग है ॥
सं । गुं (सं० न० तमः और पु० गुणः) तम । गुण । चंद को हिन्दी के नपुंसकलिंग ॥ प्राकृत-भाषा
सम का प्रयोग ॥