पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ चंद की स्त्री अपने पति के उच्छिष्ट संज्ञा
कथन से शंका करती है ॥
दूहा ॥ उच्छिष्ट चंद छंदह बयन । सुनत सु जंपिय नारि ॥
तनु पवित्र पावन कविय । ऊकति अनूठ उधारि ॥
छं० ॥ ११ ॥ रू० ॥ ६ ॥
कवित्त ॥ कहै कंति सम कंत । तंत पावन बड़ कब्बिय ॥
तंत संत उच्चार । देवि दरसिय मक्खि छब्बिय ॥
जाते हैं उस का वाचक है परंतु इस शब्द का हम पता लगाकर बताते हैं कि यह बंभं चंद की
हिन्दी का भूतकालिक क्रियावाचक शब्द है और संस्कृत भाषा में यङ्लुगन्तप्रक्रिया के प्रयोगों
में जो बंभणीत नर्भति प्रयोग सिद्ध होता है उस से बना है और उस का यहां फिर २ वा बार २
पढ़ा वा भणा का अर्थ है । क्योंकि "चवं वेद बंभं हरी कित्ति भाखी" इस तुक का अर्थ यह है
कि जिस "जीवतेस ने चारों वेदों को बार २ पढ़े वा भणे और हरी की कीर्ति को भाखी"। जो
मनुष्य संस्कृत भाषा में अच्छा व्युत्पन्न और पक्षपात और हठ जैसे दोषों से विमुक्त और सत्य का
दृढ़ अवलंबन करनेवाला है वह मैं आशा करता हूं कि ऐसे प्रयोगों को देख कर कदापि यह नहीं
कहैगा कि इस महाकाव्य का ग्रंथकर्त्ता चंद संस्कृत भाषा में अव्युत्पन्न था ॥
इस रूपक में चंद कवि आठ कवियों को अपने गुरु मान कर उन की स्तुति और उन की
काव्य रचना-शक्ति का वर्णन करता है वह सब से पहिले भुजंगी नाम से परमेश्वर को कवि ग्रहण
करता है क्योंकि वेदादिक में उस का कवि नाम कहा है यथा:-
"होता वा देव्या कवी०" यजुः "प्रथम वरजं भेषजं कविम्०" यजुः
"कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूः०" ईशोपनिषत्
"कविः क्रान्तदर्शी सर्वदृक् नान्यतोऽस्ति द्रष्टा" स्मृतिः ॥ शा० भा०
"कवि पुराणमनुशासितारम्०" गीता ॥
दूसरे जीवतेश से प्राणनाथ अर्थात् ब्रह्मा कि जो आदि कवि कहाता है जैसे भागवत में
कहा है कि "तेने ब्रह्महृदा य आदि कविये मुह्यन्ति यत् सूरय"
बाकी सब कवियों के विषय में कुछ विशेष कहने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि सर्व साधारण
लोग व्यासादि के नाम से भले प्रकार ज्ञात हैं ॥
६-९-कवि चंद ने जो पहिले रूपक में अपने काव्य को अपने से पहिले हुए कवियों के काव्य
का उच्छिष्ट होना कहा है उसे सुन कर उस की स्त्री उच्छिष्ट संज्ञा में आश्चर्य के साथ शंका और
अपने पति के गुणों का वर्णन करती है अर्थात् इन रूपकों में कवि चंद ने अपनी स्त्री के प्रश्नोत्तर
के प्रसंग से अपने काव्य की उच्छिष्ट संज्ञा के हेतु और अपने गुण प्रकाश किये हैं। इन में सम,
कंति और कंत शब्दों के प्रयोग विद्वानों की दृष्टि में रहने योग्य हैं। सम (सं० अ० सम् = संगे, -
सम्बन्धे, समुच्चये,) को अथवा प्रति, और सम ब्रह्मरूप में सम शब्द तुल्य के अर्थ में कवि ने प्रयोग
किया है; कंति (सं० स्त्री० कम् = ति) पत्नी अथवा स्त्री, और कंत (सं० पु० कम् + त) पुरुष अथवा