पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] : पृथ्वौराजरासौ । ५
प्रणम्य (सं० प्रणम्य) नमन करके अथवा प्रणाम कर के ॥
नम्य (सं० अ० नमः अथवा नम्=नमना) नमस्कार कर के इस शब्द के भी म्य पर साटक की ध्वनि
के अनुसार ताल है अर्थात् यहां भी स्वर उदात्त है ॥
गुरुयं गुरू को यह चंद की हिन्दी के पुल्लिंग गुरु शब्द की द्वितीया का निज प्रयोग है। चंद के ऐसे
निज प्रयोगों को देख कर हम को आश्चर्य के वश न हो जाना चाहिये किन्तु इस बात की
खोज करनी चाहिये कि चंद की हिन्दी के व्याकरण संबन्धी नियम क्या और कैसे हैं। और
ऐसे अनुस्वार सहित शब्दों को देख कर यह अनुमान भी नहीं करना चाहिये कि रासे का
ग्रंथ कर्ता ऐसा निर्बोध था कि उस को अनुस्वार और विसर्ग तक का ज्ञान नहीं था। हमारे
यह अन्वेषण ध्यान में लाने योग्य हैं कि प्रथमतः चंद की हिन्दी तीन प्रकार की है पट-भाषा-
और-कुरान की-भाषा की-योनिव़ाली १ पट-भाषा-और-कुरान की-भाषा के सम २ और देशी
प्रसिद्ध ३। दूसरे संप्रत हिन्दी में तो नपुंसकलिंग नहीं है परंतु चंद की हिन्दी में तीनों लिंग हैं।
तीसरे जितनी संज्ञा अनुस्वार सहित उस में प्रयोग हुई हैं वे पुल्लिंग अथवा नपुंसकलिंग ही
हैं। देखो यहां नम्य गुरुयं वाक्यखंड में कवि के अर्थ को ध्यान में लाने से गुरुयं शब्द पुल्लिंग में
प्रयोग किया गया मालूम होता है और पांचवें रूपक की इस तुक गुरं सब्व कव्वौ लहू चंद कव्वी।
जिनैं दर्सियं देवि सा अंग हुव्वी ॥ में गुरं शब्द चंद ने अपनी हिन्दी के नपुंसकलिंग की प्रथमा में
प्रयोग किया है। और जहां क्रिया शब्दों में अनुस्वार हैं जैसे इसी प्रमाण में प्रवेश कियी गई तुक
में दर्शियं शब्द है वह संस्कृत दर्शितं से है। बहुत से शब्दों पर लेखकों ने अपने अव्युत्पन्न होने के
कारण जो अनुस्वार लगा दिये हैं उन का सूक्ष्म विचार करने से विद्वान स्पष्ट जान सक्ते हैं कि
यहां कवि ने अनुस्वार का प्रयोग नहीं किया था किन्तु लेखकों ने अपनी अज्ञानता से लगा दिये हैं
और कहीं २ उनों ने कवि के प्रयोग किये हुए अनुस्वारों को उड़ा दिये हैं जैसे पांचवें रूपक के
भुजंगप्रयात छंद की पहिली तुक में चंद ने ऐसा प्रयोग किया था कि प्रथमं भुजंगी सुधारी यहनं ।
जिनैं नाम एकं अनेकं कहनं ॥ उस के स्थान में एशियाटिक सोसाईटी की छापी हुई पुस्तक १ के
पत्र ३ में देखो कि जिस लिखित पुस्तक से वह छापी गई है उसके लेखक ने प्रथम भुजंगी सुधारी
यहनं । जिनै नाम एकं अनेकं कहनं ॥ पाठ कर दिया है। इस के अतिरिक्त चंद के अनुस्वार
सहित शब्दों के प्रयोग करने के और भी अनेक कारण हैं परंतु वह जब मेरे संकलन किये हुए चंद
के व्याकरण संबन्धी नियम मैं कुछ समय में प्रकाश करूंगा तब स्पष्ट रीति से हमारे पाठकों को
मेरे बड़े परिश्रम से सिद्ध किये हुए अन्वेषण मालूम हो जांयगे ॥
वानीय (सं० स्त्री० वाणिः=सरस्वत्याम्) सरस्वती के । यह चंद की हिन्दी में षष्ठी के एकवचन
का रूप है और जैसे संस्कृत में श्रीः शब्द के रूप में षष्ठी का श्रियः होता है उसी तरह चंद
ने अपनी हिन्दी में वानीय किया है ॥
वंढे-वंदन करता हूं ॥ चेत रखना चाहिये कि हम ऊपर गुरुयं शब्द की व्याख्या में चंद की हिन्दी
तीन प्रकार की होना बतला आये हैं उस में से यहां यह वंढे संस्कृत-सम के रूप का प्रयोग
चंद ने किया है ॥
पयं (सं० पय = गतौ) चरणों को ॥ यह चंद की हिन्दी के पुल्लिंग की द्वितीया का रूप है। कोई २
कवि जो पय शब्द को पैर का वाचक होना बिलकुल नहीं बताते और उस का अर्थ यहां
“दूध जैसो श्वेत अथवा जल जैसी निर्मल सरस्वती को वंदन करता हूं”, करते हैं वह भूल
हैं। पय शब्द पैर का वाचक संप्रत हिन्दी में भी रात्रि दिन बोलचाल में आता है जैसे पयलगी,