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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

( ४ )

शाला में उसका परीक्षण करना पड़ता था । कालान्तर में केवल उपासना
और अनुष्ठान-पद्धति रह गयी । उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि को लोग भूल
गये । स्यात् कुछ इने गिने ऐसे साधक अब भी थे जो मौखिक परम्परा द्वारा
उसके दार्शनिक सिद्धान्त को जानते थे, किन्तु इतिहास के द्वारा उस सिद्धान्त
को लिखित रूप में प्रस्तुत करनेवाले जिस चिन्तक का पता चलता है वह
वसुगुप्त थे । विद्वानों का मत है कि वह ईसवी आठवीं शती के अन्त अथवा
नवीं शती के प्रारम्भ में हुये थे । तब से कश्मीर में दार्शनिक ग्रन्थ सक्रिय रूप
से और लगातार चार शतियों तक लिखे गये । इस दर्शन का वाङ्‌मय अब
इतना इकट्ठा हो गया है कि उसका अध्ययन करने के लिए पूरा एक जीवन-
काल चाहिए । इस दर्शन के कुछ ग्रन्थ अभी तक नहीं प्रकाशित हुये हैं ।

शैव दर्शन का वाङ्‌मय
शैव दर्शन का वाङ्‌मय तीन शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता
है :-
(क) आगम शास्त्र
(ख) स्पन्द शास्त्र
(ग) प्रत्यभिज्ञा शास्त्र
(क) आगम शास्त्र :-
यह दैवीज्ञान माना जाता है जो कि गुरु-शिष्य परम्परा से चला आया
है । इस कोटि के निम्नलिखित ग्रंथ हैं :-
मालिनी विजय, स्वच्छन्दतंत्र, विज्ञानभैरव, मृगेन्द्र, रुद्रयामल, शिवसूत्र ।
शिवसूत्र पर वृत्ति, भास्कर और वर्धराज के वार्तिक और क्षेमराज की विम-
र्शिनी व्याख्याएं मिलती हैं । मालिनी विजय, स्वच्छन्दतंत्र और विज्ञान भैरव
पर भी व्याख्याएं हैं ।
(ख) स्पन्द शास्त्र :-
इसमें इस दर्शन के मुख्य सिद्धान्त हैं । स्पन्द संबंधी निम्नलिखित ग्रन्थ
मिलते हैं :
स्पन्दसूत्र जिसका दूसरा नाम है स्पन्दकारिका । इसमें शिवसूत्र में प्रतिपा-
दित मुख्य सिद्धान्तों का विस्तृत विवेचन है । स्पन्दकारिका पर निम्नलिखित
टीकाएं उपलब्ध हैं :-

( ५ )
रामकण्ठ की विवृत्ति, उत्पल वैष्णव की प्रदीपिका, क्षेमराज का स्पन्द-
सन्दोह और स्पन्द निर्णय । स्पन्द सन्दोह में केवल प्रथमकारिका पर टीका है ।
(ग) प्रत्यभिज्ञा शास्त्र :-
यह शैव दर्शन के मुख्य सिद्धान्तों का मानव की तार्किक बुद्धि के लिए
व्याख्या करता है । इसमें आगम के दार्शनिक पक्ष का प्रतिपादन हुआ है ।
इसमें तर्क, वाद-प्रतिवाद का प्रयोग किया गया है ।
इस शास्त्र का मूल ग्रन्थ सोमानन्द की शिवदृष्टि है। सोमानन्द के शिष्य
उत्पल देव ने 'ईश्वर प्रत्यभिज्ञा' लिखी । इस पर निम्नलिखित व्याख्याएं हैं :-
स्वयं उत्पलदेव द्वारा लिखी वृत्ति, अभिनवगुप्त द्वारा लिखी हुई प्रत्यभिज्ञा
विमर्शिनी और प्रत्यभिज्ञा विवृति विमर्शिनी । क्षेमराज ने 'प्रत्यभिज्ञा हृदयम्'
लिखा जिसमें प्रत्यभिज्ञा शास्त्र का सार आ गया है ।
अभिनवगुप्त ने १२ खण्डों में तंत्रालोक' और एक पृथक् ग्रन्थ 'तंत्रालोक
सार' लिखा जिनमें शैव दर्शन के सभी सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया
है । ऊपर जो शैव दर्शन का ऐतिहासिक विवरण दिया गया है उसके लिए
मैं जे० सी० चैटर्जी के 'काश्मीर शैविज्म' का ऋणी हूँ ।
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् :-
जैसा कि ऊपर कहा गया है 'प्रत्यभिज्ञाहृदय' में क्षेमराज ने समस्त
प्रत्यभिज्ञादर्शन का सार प्रस्तुत किया है । क्षेमराज अभिनवगुप्त के प्रति-
भाशाली शिष्य थे । अभिनवगुप्त की बहुमुखी प्रतिभा थी । वह तंत्र, योग,
दर्शन, काव्य और नाट्यशास्त्र के अनुपम विशेषज्ञ थे । डा० कान्तिचन्द्र
पाण्डेय के अनुसार अभिनवगुप्त ईसवी दशवीं शती में हुये थे । क्षेमराज उनके
शिष्य थे । अतः उनका भी काल दशवीं शती है। उन्होंने निम्नलिखित
ग्रन्थ लिखे ।
प्रत्यभिज्ञाहृदयम्, स्पन्दसन्दोह, स्पन्दनिर्णय, स्वच्छन्दोद्योत, नेत्रोद्योत,
विज्ञानभैरवोद्योत, शिवसूत्रविमर्शिनी, स्तवचिन्तामणिटीका, पराप्रावेशिका,
तत्त्वसन्दोह ।
उनके वंश और जीवन के सम्बन्ध में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है ।
यह मत बिलकुल ठीक है कि उनके 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' ग्रन्थ का शैव या त्रिक
वाङ्मय में वही स्थान है जो वेदान्त में वेदान्तसार का है । इस ग्रन्थ में
विवादग्रस्त बातों को छोड़ दिया गया है और प्रत्यभिज्ञादर्शन के सिद्धान्तों का

( ६ )

बहुत संक्षिप्त रूप में कुशलता से प्रतिपादन किया गया है। क्षेमराज ने
ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही कहा है :-
'इह ये सुकुमारमतयोऽकृततीक्ष्णतर्कशास्त्रपरिश्रमाः शक्तिपातोन्मिषितपा-
रमेश्वरसमावेशाभिलाषिणः कतिचित् भक्तिभाजः तेषामीश्वरप्रत्यभिज्ञोप
देशतत्त्वं मनाक् उन्मील्यते'।
“इस जगत् में कुछ ऐसे भक्त लोग हैं जो सुकुमारबुद्धि के हैं, जिन्होंने
कठिन तर्कशास्त्र में परिश्रम नहीं किया है किन्तु जो परमेश्वर के साथ उस
समावेश की अभिलाषा करते हैं जो कि शक्तिपात से विकसित होता है, उनके
लिए ईश्वरप्रत्यभिज्ञा में जो उपदेश है उनके तत्त्व को थोड़ा खोला जा रहा है।
वह उत्पलाचार्य की 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' को इस दर्शन का एक उत्तम
ग्रन्थ मानते थे । जो प्रभु के अनुग्रह से 'प्रत्यभिज्ञा' के मुख्य सिद्धान्तों को
जानना चाहते हैं परन्तु जो कठिन तर्क के अभ्यास के न होने के कारण उत्प-
लाचार्य के महान् ग्रन्थ को समझने में असमर्थ हैं उनके लिए उन्होंने एक
सुखसाध्य और सरल पुस्तक प्रस्तुत की है। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' के कठिन
तार्किक विवेचन को छोड़कर मुख्य सिद्धान्तों को थोड़े से पृष्ठों में संक्षिप्त
करने में उनको अपूर्व सफलता मिली है। जो लोग प्रत्यभिज्ञा के प्रारम्भिक
ज्ञान को प्राप्त करना चाहते हैं उनके लिए यह पुस्तक बहुत काम की है।
उन्होंने स्वयं सूत्रों का भी ग्रथन किया है और व्याख्या भी लिखी है।
'प्रत्यभिज्ञा' का अर्थ है 'पहचान'। जीव वस्तुतः शिव है, किन्तु वह
अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गया है और अपने देह और मन से अपना
तादात्म्य माने बैठा है। 'प्रत्यभिज्ञा' का उपदेश उसको अपने वास्तविक
स्वरूप को समझने में सक्षम बनाने के लिए है, उसको यह सत्य हृदयंगम
कराने के लिए है कि उसका वास्तविक स्वरूप शिव के अतिरिक्त और कुछ
नहीं है और उसको वह साधना सुझाने के लिए है जिससे उसको शिव में
समावेश की प्राप्ति हो जाय। उस उपदेश का विस्तृत वर्णन पुस्तक के भीतर
मिलेगा। यहाँ पर हम इस दर्शन के मुख्य मन्तव्यों का निम्नलिखित शीर्षकों
के अन्तर्गत सिंहावलोकन करेंगे :-
१-परमार्थ या चरम तत्त्व, २-जगत्, ३-स्वातन्त्र्यवाद और आभास-
वाद, ४-षडध्वा, ५-शांकर अद्वैतवाद के साथ तुलना, ६-जीव, ७-बन्ध,
८-मोक्ष ।

( ७ )
१-परमार्थ :-
परमार्थ अपने चरम रूप में चित् या परासंवित् है । चित् सब परिवर्तन
शील पदार्थों का निर्विकार तत्त्व है । इस चित् या परासंवित् में वेदना के
समान अव्यवहितत्व होता है जिसमें अहं ( मैं ) और इदं ( यह ) का, ज्ञाता
और ज्ञेय का भेद नहीं रहता । इसमें अहं और इदं की अविभाजित एकता
रहती है । यह वह चेतना है जिसको सदा अपनी चेतना बनी रहती है। प्रत्य-
भिज्ञाशास्त्र के शब्दों में यह 'प्रकाशविमर्शमय' है ।
परमार्थ या चरमतत्त्व को इस शास्त्र में परमशिव या महेश्वर या परमेश्वर
कहते हैं । यह 'प्रकाश' मात्र नहीं है । 'प्रकाश' वह है जिसके द्वारा सब कुछ
प्रकाशित होता है । कठोपनिषद् के शब्दों में 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं, तस्य
भासा सर्वमिदं विभाति' । 'उसी के प्रकाशमान होने के कारण ही सब कुछ
प्रकाशित होता है, उसी के प्रकाश से सब कुछ प्रकाशमान है ।"
शांकरवेदान्त भी उसको 'प्रकाश' कहता है । किन्तु सूर्य भी तो प्रकाश
है, हीरा भी तो प्रकाश है, तो फिर चरमतत्त्व और इसमें (सूर्य या हीरा में)
क्या भेद है ? शैवदर्शन कहता है कि चरमतत्त्व प्रकाश मात्र नहीं है,
वह जड़ हीरे के समान प्रकाश नहीं है, वह विमर्श भी है अर्थात् वह अपना
ईक्षण भी करता है । जैसा कि क्षेमराज ने पराप्रावेशिका (पृ०२) में कहा है,
यह विमर्श, 'अकृत्रिमाहं विस्फुरणम्' है, यह अकृत्रिम, शुद्ध स्वाभाविक अहं
( मैं ) का स्फुरण है, अर्थात् यह अहं और इदं के व्यवधान से शून्य, अव्यवहित
'स्व' का बोध है । इस अकृत्रिम अहं पर टिप्पणी में प्रकाश डाला गया है ।
यदि चरमतत्त्व प्रकाश मात्र होता और विमर्श न होता, तो वह निरीश्वर
और जड हो जाता । 'यदि निर्विमर्शः स्यात् अनीश्वरो जडश्च प्रसज्येत' ।
( प०प्रा० पृ०२ ) इसी विमर्श ही द्वारा जगत् की सृष्टि, स्थिति और संहार
होता है ।
चित् अपने को चित्-रूपिणी शक्ति के रूप में जानता है । यही विमर्श है ।
विमर्श के कई नाम हैं यथा पराशक्ति. परावाक्, स्वातंग्य, ऐश्वर्य, कर्तृत्व,
स्फुरत्ता, सार, हृदय, स्पन्द ( दे० पराप्रावेशिका पृ० २) ।
इससे स्पष्ट है कि चरमतत्व चिन्मात्र नहीं है, चित्शक्ति भी है । यह
सर्वसंग्राही चित् अनुत्तर भी कहलाता है, क्योंकि उससे बढ़कर और कुछ है
नहीं । यह विश्वोत्तीर्ण भी है और विश्वमय भी ।

( ८ )
२-जगत् :-
परमार्थ रिक्त या अभिव्यक्तिरहित नहीं है । उसकी अनन्त शक्तियां हैं।
उसमें भूत, भवत्, भविष्यत् सब कुछ बीज रूपेण विद्यमान है। यदि परमार्थ,
चित् संवित् या महेश्वर में प्रव्यक्त या प्रकट होने की क्षमता न होती, तब
तो वह चित् या संवित् ही नहीं कहा जा सकता था, तब तो वह जड़ पदार्थ
के समान हो जाता
"अस्थास्यदेकरूपेण वपुषा चेन्महेश्वरः
महेश्वरत्वं संवित्वं तदत्यक्ष्यद् घटादिवत्”
( तंत्र० ३, १०० श्लो० )
“यदि महेश्वर एक रूप में पड़ा रह जाता, यदि वह अनन्त रूपों में प्रकट
न होता, तब तो उसका महेश्वरत्व और संवित्व ही समाप्त हो जाता और
वह एक जड़ घट के समान हो जाता”।
यह ऊपर कहा जा चुका है कि परमशिव "प्रकाश विमर्शमय" है। उस
अवस्था में अहं ( मैं ) और इदं ( यह ), शिव और विश्व एक अभिन्न ऐक्य
में होते हैं । अहं प्रकाश रूप है और अहं का अहंरूपेण प्रत्यवमर्श ( अनु-
चिन्तन ) विमर्श रूप है । यही विमर्श स्वातंत्र्य या अबाधित शक्ति है ।
पराप्रावेशिका में क्षेमराज ने इसी को परम शिव का हृदय कहा है ( हृदयं
परमेशितुः ) । शक्ति शक्तिमान् से भिन्न नहीं है, उसी का प्ररूप है । परम
अनुभूति में जो इदं कहा जाता है वह अहं ही है । यह विमर्श या शक्ति शून्य
नहीं है । इसमें सब कुछ है ।
यथा न्यग्रोधबीजस्थः शक्तिरूपो महाद्रुमः ।
तथा हृदयबीजस्थं विश्वमेतच्चराचरम् ।।
( पराप्रावेशिका में क्षेम राज द्वारा उद्धृत )
जैसे बरगद का बड़ा वृक्ष अपने बीज में शक्तिरूप में विद्यमान रहता है,
उसी प्रकार यह चराचर विश्व शक्तिरूप में महेश्वर के हृदय ( विमर्श ) में
विद्यमान रहता है । दूसरा उदाहरण जो प्रायः दिया जाता है वह मयूर
(मोर) का है । मयूर जैसे अपने सारे चित्रित पिच्छकलाप सहित मयूराण्डरस
में सम्भाव्यता के रूप में विद्यमान है, वैसे ही समस्त विश्व महेश्वर की शक्ति
में विद्यमान है । महेश्वर की शक्ति को ही चिति, पराशक्ति या परावाक्
कहते हैं ।

( ६ )
परमशिव की शक्ति तो अनन्त है, किन्तु निम्नलिखित पाँच शक्तियां
मुख्य हैं :-
१. चित्-आत्मप्रकाशन की शक्ति । इस प्ररूप में वह शिव कहलाता है ।
२. आनन्द-इसको स्वातंत्र्य भी कहते हैं । ( स्वातंत्र्यमानन्द-शक्तिः
तंत्रालोकसार भा० १) । इस प्ररूप में महेश्वर शक्ति कहलाता है ।
एक प्रकार से चित् और आनन्द महेश्वर का स्वरूप ही है । शेष सब
उसकी शक्तियां हैं ।
३. इच्छा-सर्जन की प्रवृत्ति । इस प्ररूप में वह सदाशिव और सादाख्य
कहलाता है ।
४. ज्ञान-इस प्ररूप में वह ईश्वर कहलाता है ।
५. क्रिया-कोई भी आकार ग्रहण करने की शक्ति ( सर्वाकारयोगित्वं
क्रिया शक्तिः तंत्रालोकसार भा० ) इस प्ररूप में वह सद्विद्या या
शुद्ध विद्या कहलाता है ।
विश्व महेश्वर की शक्ति का उन्मेष या प्रसर के अतिरिक्त और कुछ
नहीं है ।
(i) अपरिमित अनुभव के तत्त्व : १-५:
हम यह देख चुके हैं कि परमशिव के दो प्ररूप. हैं विश्वोत्तीर्ण और विश्व-
मय । उसका विश्वमय सर्जनात्मक रूप है। यह विश्वमय सर्जनात्मक रूप
शिवतत्त्व' कहलाता है ।
१. शिवतत्त्व-परमशिव का स्पन्द है । जैसा कि षट्त्रिंशत्-तत्व-सन्दोह
में कहा गया है ।
यदद्यमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छयाखिलमिदं जगत्स्रष्टुम् ।
पस्पन्दे स स्पन्दः प्रथमः शिवतत्त्वमुच्यते तज्ज्ञैः ।
( पृ० १, श्लोक० १ )
जब अनुत्तर (परमशिव) अपनी इच्छा से जगत् के सर्जन के लिए स्पन्द-
मान होता है तो उसका आद्य स्पन्द उसके जानकारों द्वारा 'शिव तत्त्व' कह-
लाता है ।
२-शक्तितत्व -यह शिव की ही शक्ति है । शक्ति 'निषेधव्यापाररूपा'
कही गई है। शक्ति पहले इदं ( यह ) या वेद्य का निषेध कर देती है । इस
स्थिति को शून्यातिशून्य कहते हैं। चित् या परासंवित् में अहं और इदं

( १० )
अभिन्न हैं। शिवतत्त्व में से शक्ति के व्यापार से इदं प्रत्याहृत हो जाता है,
केवल अहं रह जाता है। क्षेमराज ने इस स्थिति को अनाश्रित शिव कहा है।
उनके शब्द हैं :
श्री परमशिवः ---- पूर्वं चिदैक्याख्यातिमयानाश्रितशिवपर्याय
शून्यातिशून्यात्मतया प्रकाशाभेदेन प्रकाशमानतया स्फुरति ।
इस अवस्था में शिव इदं से रहित केवल अहं के रूप में रहता है। शिव
विश्वरूप में भासित हो, इसके लिए 'अहमिदम्' के एकात्म अनुभव में एक
व्यवधान आवश्यक हो जाता है। परन्तु यह एक अस्थायी अवस्था है। वेदक
से वेद्य पृथक् होकरपुनः अहमिदम्-एकात्मरूप में नहीं, किन्तु अहं इदं इस रूप
में प्रकट होता है जिसमें अहं और इदं विविक्त तो हैं, किन्तु विच्छेद्य नहीं हैं
क्योंकि वे एक ही आत्मा या चित् के अंग है।
शक्ति चित् को अहं और इदं में, वेदक और वेद्य में अभिस्पन्दित कर
देती है। शक्ति शिव से भिन्न नहीं है, वह शिव की सर्जनोन्मुखता मात्र है।
वह शिव का अहंविमर्श है। जैसा कि महेश्वरानन्द ने अपने महार्थमञ्जरी
में कहा है ।
'स एक विश्वमेषितुं ज्ञातुं कर्तुं चोन्मुखो भवन् ।
शक्तिस्वभावः कथितो हृदयत्रिकोणमधुमांसलोल्लासः
( पृ० ४० ) ।
वही (शिवही) अपने हृदय के इच्छा-ज्ञान-क्रिया रूपी त्रिकोण के माधुर्य
से परिवर्धित उल्लास द्वारा अपने में ही स्थित विश्व को ईक्षण करने के लिये
उन्मुख होने पर शक्ति स्वभाव वाला कहलाता है ।
महेश्वरानन्द इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं :
यदास्वहृदयवर्तिनमुक्त रूपमर्थतत्त्वं बहिः कर्तुमुन्मुखो भवति
तदा शक्तिरिति व्यवह्रियते ।
( पृ० ४० )।
जब शिव अपने हृदय में (बीजरूपेण) विद्यमान अर्थतत्त्वको बाहर करने
के लिए उन्मुख होता है तब वह शक्ति कहलाता है ।
शक्ति चित् की क्रियाशीलता या गतिशीलता है। विमर्श या उन्मुखता
के सदृश विचार छान्दोग्योपनिषत् के निम्नलिखित वाक्य में मिलता है :-

( ११ )
"सदेव सौम्य इदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्—
तदैक्षत, बहु स्याम्, प्रजायेय इति ।
(६, २, १-३)
पहले एक, द्वितीय के बिना सत् ही था। उसने ईक्षण किया' बहु हो जाऊँ,
प्रजनन करूं।
यह ईक्षितृत्व विमर्श या उन्मुखता के सदृश है, किन्तु शांकरवेदान्त
ने इसके निहितार्थ को प्रस्फुटित नहीं किया।
शैवदर्शन परम शिव को एक शुष्कतार्किक के रूप में नहीं मानता, वह
उसे एक कलाकार के रूप में देखता है। जैसे एक कलाकार अपने आनन्द
को अपने भीतर ही नहीं रख सकता, किन्तु उसे गान, चित्र या कविता में
उड़ेल देता है, इसी प्रकार सर्वोच्चकलाकार परमशिव अपने वैभव के आनन्द-
पूर्ण चमत्कार को प्रव्यक्ति या सृष्टि में उड़ेल देता है। क्षेमराज ने उत्पलदेव
की स्तोत्रावली की व्याख्या में इसी विचार को निम्नलिखित रूप में व्यक्त
किया है।
'आनन्दोच्छलिता शक्तिः सृजत्यामानमात्मना'
अर्थात् शक्ति आनन्द से उच्छलित होकर अपने को अपने ही द्वारा सृष्टि
के रूप में प्रकट करती है। समस्त सृष्टि शिव की सृष्टिकल्पना की बाह्या-
भिव्यक्ति है।
शक्ति तत्त्व में महेश्वर के आनन्द का प्राधान्य है। शिव और शक्ति तत्त्व
कभी पृथक् नहीं रह सकते। वे सृष्टि और संसार दोनों में संयुक्त रहते हैं—
शिव ईक्षिता के रूप में और शक्ति आनन्द के रूप में। वस्तुतः शिव-शक्ति
तत्त्व आभास नहीं है, सभी आभासों का बीज है।
३-सदाशिव अथवा सादाख्य तत्त्व :—
इदं के प्रतिज्ञापन की इच्छा सदाशिव तत्त्व अथवा सादाख्य तत्त्व है।
सदाशिव में इच्छा का प्रधान्य है। इस अवस्था का अनुभव है 'मैं हूँ'
यतः इस अवस्था में होने का प्रतिज्ञापन होता है अतः यह सादाख्यतत्त्व
कहलाता है। सत् का अर्थ है होना, और होने में इदं (यह) ध्वनित है। मैं
हूं -क्या हूं-यह (इदं) हूं। इस अवस्था का अनुभव है 'अहं इदं' (मैं यह हूं)
किन्तु इदं (यह) अभी अस्फुट है। अहं (मैं) ही अभी प्रधान है। इस
अवस्थामें विश्व अभी अस्फुट इदं मात्र है। इसीलिए इस अवस्था को प्रायः
निमेष कहा गया है (निमेषोऽन्तः सदाशिवः ) । इस अवस्था में अहं जो

( १२ )
अस्फुट रूप में 'इदं' है उसको अपनाही अंश समझता है। अभी प्रमुखता
अहं की ही है। जैसे चित्रकार के मन में चित्र प्राथमिक अवस्था में एक
अस्फुट, धुंधले रूप में रहता है वैसे ही सदाशिव में इदं अर्थात् विश्व अभी
अस्फुट रूप में रहता है। राजानक आनन्द ने षट्त्रिंशत्तत्व सन्दोह पर लिखे
हुए अपने विवरण में ठीक ही कहा है :—
“तत्र प्रोन्मीलितमात्रचित्रकल्पतया इदमंशस्य
अस्फुटत्वात् इच्छाप्राधान्यम्”
(पृ० ३')
अर्थात् इस अवस्था में इदं अंश (विश्व) वैसे ही अस्फुट रहता है जैसे
एक चित्रकार का चित्र जो कि बनाया जाने वाला है पहले मन में धुँधले
रूप में रहता है। अतः इस अवस्था में इच्छा का ही प्राधान्य है। क्षेमराज
प्रत्यभिज्ञाहृदय में कहते हैं :
“सदाशिवतत्त्वेऽहन्ताच्छादितास्फुटेदन्तामयं विश्वम्”
अर्थात् सदाशिवतत्त्व में इदन्तामय विश्व अभी अस्फुट (अस्पष्ट) रहता,
है, अभी वह अहन्ता से आच्छादित रहता है अर्थात् अभी अहंभाव का ही
प्राधान्य रहता है। सदाशिव प्रथम आभास है। आभास के लिए एक द्रष्टा
या प्रमाता होना चाहिए और एक दृश्य या प्रमेय होना चाहिए। इस सर्वव्यापी
दशा में प्रमाता और प्रमेय दोनों चेतना ही है, क्योंकि इस दशा में चेतना के
अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। चेतना इस दशा में स्वयं अपना प्रमेय है;
प्रमाता भी वही है, प्रमेय भी वही है।
४ ईश्वरतत्त्वः—
पारमेश्वरीय अनुभव की परवर्ती अवस्था वह है जिसमें समग्र अनुभव का
इदमंश और अधिक स्फुट हो जाता है। इसको ईश्वरतत्त्व कहते हैं। यह
उन्मेष है अर्थात् यह विश्व का स्फुट रूप से खिल उठना है। इस अवस्था में
ज्ञान का प्राधान्य रहता है। राजानक आनन्द अपने विवरण में कहते हैं :—
“अत्र वेद्यजातस्य स्फुटावभासनात् ज्ञानशक्त्युद्रेकः'
अर्थात् इस अवस्था में वेद्य या प्रमेय अधिक स्फुट होता है, इसलिए
ज्ञानशक्ति का प्राधान्य है। जैसे चित्रकार के मन में प्रदर्श्य चित्र की पहले
एक धुँधली सी रूपरेखा होती है, फिर उसका अधिक स्पष्ट रूप उमगने
लगता है, वैसे ही सदाशिव की अवस्था में विश्व अस्फुट रहता है और ईश्वर

( १३ )
की अवस्था में वह अधिक स्फुट हो उठता है। सदाशिव का परामर्श है'
'अहम् इदम्' । ईश्वर का परामर्श है 'इदम् अहम्' ।
५- सद्विद्या अथवा शुद्धविद्यातत्त्व :-
सद्विद्यातत्वमें अहम् और इदम् दोनोंपरामर्श एक समान होते है जैसे
समाधृत तुला के दोनों पलड़े बराबर होते हैं (समाधृततुलापुटन्यायेन) । इस
अवस्था में क्रिया शक्ति का प्राधान्य होता है। इस अवस्था में अहम् और
इदम् दोनों का परामर्श इस प्रकार समानरूप से स्फुट होता है कि यद्यपि अब
भी अहम् और इदम् दोनों एकसम हैं तथापि दोनों की पृथक् विशिष्टता
प्रतीत होती है। उस अवस्था का अनुभव भेदाभेदविमर्शानात्मक होता है
अर्थात् यद्यपि ईदम् का अहम् से भेद प्रतीत होता है तथापि इदम् अहम्
का अंग ही जान पड़ता है। अहम् और इदम् का सामानाधिकरण्य जान
पड़ता है।
शिव तत्त्व में 'अहं' परामर्श है; सदाशिव तत्त्व में 'अहमिदम्' परामर्श है;
ईश्वर तत्त्व में 'इदमहं' परामर्श है। इन सब परामर्शों में पहले पद की प्रमुखता
होती है। शुद्धविद्यातत्त्व में दोनों पदों का परामर्श समानरूप से होता है (अहम्
अहम्, इदम् इदम् अथवा अहं च, इदंच ) यह परामर्श पर ( अभेद की दशा )
और अपर (भेद की दशा) दोनों के मध्य का है। इसलिए इसको परापरदशा
कहते हैं । इसको 'सद्विद्या या शुद्धविद्या' इसलिए कहते हैं क्योंकि इस अवस्था
में पदार्थों के वास्तविक सम्बन्ध का परामर्श होता है। इस अवस्था तक सभी
परामर्श मानसिक या चैत्य होता है। इसलिए यहां तक शुद्धाध्वा कहलाता हैं,
क्योंकि यहां तक महेश्वर का स्वरूप-गोपन नहीं होता।
(ii) परिमित अनुभव के तत्त्व :- ६-११ माया और उसके पांच कंचुक :-
अब माया तत्त्व का कार्य प्रारम्भ होता है। यहाँ से अशुद्धाध्वा का
प्रारम्भ होता है जिसमें महेश्वर का स्वरूप-गोपन होता है। यह स्वरूप-गोपन
माया और उसके कंचुकों द्वारा होता है। माया शब्द 'मा' धातु से निष्पन्न
हुआ है जिसका अर्थ होता है मापना, माप कर पृथक् कर देना, परिमित कर
देना। जो अनुभव को मेय या परिमित बना देती है, अहम् को इदम् से और
इदम् को अहम् से पृथक् कर देती है, भेद उत्पन्न कर देती है, वस्तुओं को
एक दूसरे से भिन्न कर देती है, वह माया है।
सद्विद्या तक अनुभव सार्वभौमिक होता है, अपरिमित होता है 'इदं'
का भाव होता है- 'यह सब कुछ' 'समस्तविश्व' । माया के प्रभावसे 'इदं' का

( १४ )
अर्थ हो जाता है 'केवल यह' 'अन्य सब वस्तुओं से भिन्न एक परिमित वस्तु' ।
यहीं माया के द्वारा पूर्ण संकोच या परिमितत्व प्रारम्भ हो जाता है । माया
आत्मा पर एक आवरण डाल देती है और भेद-बुद्धि उत्पन्न कर देती है ।
माया के परिणाम पांच कंचुक हैं । संक्षेप में वे इस प्रकार हैं :-
१. कला-परमेश्वर का स्वरूप गोपित होने पर, अणु बनने पर, जिसके
द्वारा उसका सर्वकर्तृत्व संकुचित होकर किंचित्कर्तृत्व में परिणत
हो जाता है उसे 'कला' कहते हैं ।
२. विद्या-जिसके द्वारा परमेश्वर का सर्वज्ञत्व संकुचित होकर किंचित् ज्ञत्व
में परिणत हो जाता है उसे 'विद्या' कहते हैं ।
३. राग-जिसके द्वारा परमेश्वर की पूर्णतृप्ति संकुचित होकर यत्किंचित
भोगों में आसक्त हो जाती है उसे 'राग' कहते हैं ।
४. काल-जिसके द्वारा परमेश्वर का नित्यत्व संकुचित होकर अतीत,
वर्तमान, और अनागत में परिच्छिन्न हो जाता है उसे काल कहते हैं ।
५. नियति-जिसके द्वारा परमेश्वर का स्वातंत्र्य संकुचित होकर विशिष्ट
कार्य के लिए विशिष्ट कारण का नियम धारण करता है और उसका
व्यापकत्व संकुचित होकर किसी विशिष्ट देश में परिच्छिन्न हो जाता
है उसे नियति कहते हैं ।
(iii) परिमित व्यक्ति या जीवन के तत्त्व-वेदक-वेद्य
१२ पुरुष
शिव जब कंचकों सहित माया को स्वीकार कर लेता है तब उसका
सार्वभौम ज्ञान और ऐश्वर्य संकुचित हो जाता है और वह पुरुष या एक
परिमित व्यक्ति बन जाता है । पुरुष से तात्पर्य केवल मानवीय व्यक्ति से नहीं
है, अपितु प्रत्येक संकुचित वेदन-शील प्राणी से है ।
पुरुष को अणु भी कहते हैं । अणु कोई दैशिक बिन्दु नहीं है । महेश्वर
के पूर्णत्व के परिमितत्व के कारण ही कोई जीव अणु कहलाता है । "पूर्णत्वा-
भावेन परिमितत्वादणुत्वम् ।"
१३ प्रकृति :
सद्विद्या की 'अहं च इदं च' की जो अनुभूति है उसमें से अहं अंश की
अभिव्यक्ति पुरुष है और इदं अंश की अभिव्यक्ति प्रकृति है । त्रिक के अनुसार
प्रकृति या प्रधान कला का वेद्यरूप कार्य है । ( वेद्यमात्रं स्फुटं भिन्नं प्रधानं
सूयते कला-तंत्रालोक, आ०६ ) ।

( १५ )
पुरुष वेदक है, प्रकृति वेद्यमात्र है। प्रकृति अपने गुणों की साम्यावस्था में
रहती है। प्रकृति की अवधारणा सांख्य और त्रिक की थोड़ी भिन्न है। सांख्य
यह मानता है कि प्रकृति एक है और सभी पूरुषों के लिए सामान्य है। त्रिक
यह मानता है कि प्रत्येक पुरुष की प्रकृति भिन्न है। प्रकृति वेद्य की योनि है।
प्रकृति के तोन गुण हैं-सत्व, रजस् और तमस्। प्रकृति शिव की सान्ता
शक्ति है और सत्व, रजस् और तमस् उनकी ज्ञान, इच्छा और क्रिया शक्ति
के स्थूल रूप हैं। पुरुष भोक्ता और प्रकृति भोग्या है।
iv-मानस व्यापार के तत्व:
१४-१६ बुद्धि, अहंकार और मनस्
प्रकृति के विशेष हैं - अन्तः करण, इन्द्रिय और भूत ।
अन्तःकरण का अर्थ है आन्तरिक साधन । इसमें बुद्धि, अहंकार और
मनस् अन्तर्भूत हैं ।
१. बुद्धि प्रकृति का प्रथम तत्त्व है। यह व्यवसायात्मिका (निश्चयात्मिका)
होती हैं। बुद्धि के दो प्रकार के अनुभव हैं : (१) बाह्य जो इन्द्रियों
द्वारा ग्राह्य है, जैसे घट (२) आन्तरिक-संस्कारों द्वारा उद्भूत
कल्पनाएं ।
२. अहंकार-जिसके द्वारा अहं प्रतीति होती है और सब ग्राह्य यां वेद्य
अभिमत होते हैं अर्थात् वे अपने माने जाते हैं। अहंकार बुद्धि का
परिणाम है।
३. मनस्-यह अहंकार का परिणाम है। यह इन्द्रियों के सहयोग से
प्रत्यक्ष का अनुभव करता है और संकल्प-विकल्प करता रहता है।
v-vii-प्रत्यक्ष करने के तत्व : १७-३१:
(क) ज्ञानेन्द्रियां या बुद्धीन्द्रियां - ये अहंकार के परिणाम हैं । ये निम्न-
लिखित हैं :-
१. घ्राणेन्द्रिय २--रसनेन्द्रिय, ३--चक्षुरिन्द्रिय ४--स्पर्शनेन्द्रिय, ५-
श्रवणेन्द्रिय ।
(ख) कर्मेन्द्रियां-ये भी अहंकार के परिणाम हैं । ये निम्नलिखित हैं:-
१. वागिन्द्रिय, २-हस्तेन्द्रिय ३-पादेन्द्रिय ४-पायु (इन्द्रिय) ५-उपस्थ
( इन्द्रिय )

१. प्रथम भाग (सूत्र १-६): चिति-शक्ति स्वरूप, जगत्-उन्मीलन एवं संकोच-विकास

( १६ )
ये सब इन्द्रियां शक्तियां हैं जो भिन्न इन्द्रियावयवों द्वारा अपना कार्य
करती हैं।
(ग) पंचतन्मात्राएं-ये भी अहंकार के परिणाम हैं। ये विशेष प्रत्यक्ष के
सामान्य तत्त्व हैं :-
१. शब्दतन्मात्र, २-स्पर्शतन्मात्र ३-रूपतन्मात्र ४-रसतन्मात्र, ५-गन्ध-
तन्मात्र।
viii-भौतिक तत्त्व : ३२-३६ : पंचमहाभूत । ये पंचमहाभूत पंचतन्मात्राओं
के परिणाम हैं।
(१) शब्दतन्मात्र का परिणाम है आकाश
(२) स्पर्शतन्मात्र ” ” वायु
(३) रूपतन्मात्र ” ” अग्नि या तेज
(४) रसतन्मात्र ” ” आप (जल)
(५) गन्धतन्मात्र ” ” पृथिवी
३-स्वातंत्र्यवाद और आभासवाद :-
इस दर्शन में परमार्थ या परमसत् को चित्, परमशिव या महेश्वर कहते
हैं। प्रकृति में दिखलाई देनेवाली प्ररचना और विन्यास के आधार पर साधा-
रणतः जो ईश्वरनामक एक आद्य कारण का अनुमान किया जाता है उस अर्थ
में इस दर्शन में परमार्थ को महेश्वर नहीं कहते हैं। परम सत् को उसकी इच्छा
की निरपेक्ष पूर्ण प्रभुता अथवा स्वातंत्र्य की दृष्टि से महेश्वर कहते हैं।
निरपेक्ष, निर्बाध प्रभुता या स्वातंत्र्य एक अन्ध शक्ति नहीं है। यह चित्
का स्वभाव है। यह स्वातंत्र्य ही महेश्वर की कल्पना का वेद्यरूपेण उपस्थापन
करता है। यह शक्ति स्वतंत्र इसलिए कहलाली है क्योंकि यह अपने से बाह्य
किसी उपादान या उपकरण पर आश्रित नहीं है। यह कुछ भी होने या करने
में स्वतंत्र और समर्थ है। यह देश, काल कारण इत्यादि से परे है, क्योंकि
इनकी अपनी सत्ता उसी के द्वारा है।
“चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता
स्वातंत्र्यमेतन्मुख्यम् तदैश्वर्य परमात्मनः”
(ई० प्र० वि० १ पृ० २० ३-४)
'महेश्वर की शक्ति चिति कहलाती है। इसका स्वरूप स्वसंवित्ति है।
इसे परावाक् भी कहते हैं। यह स्वयं नित्योदित है। यही स्वातंत्र्य है। यही

२ ( १७ )
परमात्मा का मुख्य ऐश्वर्य है'। परावाक्, विमर्श, ऐश्वर्य इत्यादि स्वातंत्र्य के
पर्यायवाची शब्द हैं।
“सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी
सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः”
(ई० प्र० वि० १,२०७-८)
यह (चिति) वह स्फुरत्ता है जो अपने में विकार-हीन होते हुए सब
विकारों की जननी है। यह महासत्ता है, क्योंकि सब कुछ होने में यह स्वतंत्र
है। यह देश और काल से परे है। यह परमशिव का हृदय-स्वरूप है।
स्वातंत्र्य या माहेश्वर्य का भाव है 'बिना किसी बाह्य उपादान के, बिना
किसी बाधा के अपने आप सब कुछ कर डालने का सामर्थ्य ।'
“स्वातंत्र्यं च नाम यथेच्छं तत्रेच्छाप्रसरस्य अविघातः”
स्वातंत्र्य का भाव है अपनी इच्छा के अनुसार, उस इच्छा के प्रसर
में बिना किसी रुकावट के सब कुछ कर डालने का सामर्थ्य ।
स्वातंत्र्यवाद की व्याख्या अभिनवगुप्त ने बहुत सुन्दर शब्दों में इस प्रकार
की है। “तस्मादनपह्नवनीयः प्रकाशविमर्शात्मा संवित्स्वभावः परमशिवो
भगवान् स्वातंत्र्यादेव रुद्रादिस्थावरान्तप्रमातृरूपतया नीलसुखादिप्रमेयरूप-
तया च अनतिरिक्त्यापि अतिरिक्त्या इव स्वरूपानाच्छादिकया संविद्रूपनान्तरी-
यकस्वातंत्र्यमहिम्ना प्रकाश इति अयं स्वातंत्र्यवादः प्रोन्मीलितः (ई० प्र०
वि० वि० पृ०६) ।
“इसलिए प्रकाशविमर्शस्वरूप संविद्रूपी परमशिव जिसका कभी भी
अपलाप नहीं किया जा सकता, जो सदा उदित है अपने स्वातंत्र्य के माहात्म्य
से ही जो कि संवित् से पृथक् नहीं है रुद्र से लेकर स्थावर तक प्रमाता के रूप
में और नील, सुख इत्यादि प्रमेय के रूप में प्रकट होता है। ये प्रमाता और
प्रमेय उससे अभिन्न होते हुए भी भिन्न की भांति भासित होते हैं, किन्तु ये
उसके स्वरूप को कभी ढक नहीं सकते। इस प्रकार स्वातंत्र्यवाद का प्रस्तुती-
करण किया गया है।
आभासवाद :-
महेश्वर के सर्जन की दृष्टि से यह दर्शन स्वातंत्र्यवाद कहलाता है,
उसकी अभिव्यक्ति या आविर्भाव की दृष्टि से यह आभासवाद कहलाता है।
जैसे मयूर का सुन्दर रंग-बिरंगा पिच्छकलाप (पंख) उसके अंडे के रस
में अविभिन्नरूप से निहित रहता है वैसे ही समस्त विश्व महेश्वर में अविभिन्न

( १८ )
रूप से विद्यमान रहता है। इस सादृश्य को इस दर्शन में मयूराण्डरस न्याय
कहते हैं।
समस्त विश्व का अधिष्ठान चित् या संवित् है। चित्र-विचित्र, सदा
परिवर्तनशील आभास उसी चित् के आविर्भाव मात्र हैं। जो कुछ भी किसी
भी रूप में प्रकट है, चाहे प्रमेय के रूप में, चाहे प्रमाताके रूप में, चाहे ज्ञान के
रूप में, चाहे ज्ञान के साधन या इन्द्रियों के रूप में, वह सब कुछ उसी परमचित्
का 'आभास' मात्र है। 'आभास' का अर्थ है 'आ' ( ईषत् अर्थात् संकुचित
रूप में) 'भासः (प्रकाशन) 'कुछ संकुचित रूप में भासन या प्रकाशन' आभास
कहलाता है। सभी प्रकार का आविर्भाव परिसीमित होता है। जो कुछ भी
विद्यमान है वह आभासों का विन्यास मात्र है।
दर्पणबिम्बेयद्वन् नगरग्रामादिचित्रमविभागि ।
भातिविभागेनैव च परस्परं दर्पणादपि च ॥
विमलतमपरमभैरवबोधात् तद्वत् विभागशून्यमपि ।
अन्योन्यं च ततोऽपि च विभक्तमाभाति जगदेतत्
( परमार्थसार : श्लो० १२, १३) ।
जैसे स्वच्छ दर्पण में चित्र-विचित्र नगर, ग्राम इत्यादि के प्रतिबिम्ब दर्पण
से अभिन्न होते हुए भी, परस्पर और दर्पण से भी भिन्न भासित होते हैं, वैसे
ही यह जगत् परमशिव के विमल संवित् से अभिन्न होते हुए भी परस्पर
और उस संवित् से भी भिन्न भासित होता है।
आभास दर्पण में प्रतिबिम्बित आकारों के समान हैं। जैसे दर्पण में
प्रतिबिम्ब उससे भिन्न नहीं किन्तु भिन्न भासित होता है, इसी प्रकार आभास
भी शिव से भिन्न नहीं हैं, किन्तु भिन्न भासित होते हैं। जैसे दर्पण में प्रति-
बिम्बित नगर, ग्राम, नदी, वृक्ष इत्यादि यद्यपि दर्पण से अभिन्न हैं तथापि
उससे भिन्न भासित होते हैं, उसी प्रकार महेश्वर के संवित् में प्रतिबिम्बित
जगत् उससे भिन्न नहीं है। इस दर्पण की उपमा में दो अपवाद मननीय हैं।
(१) दर्पण में कोई बाह्य पदार्थ प्रतिबिम्बित होता है। महेश्वर की
सार्वभौम चेतना में उसी की ही सृष्टिकल्पना प्रतिबिम्बित होती है, कोई
बाह्य पदार्थ नहीं। दर्पण में एक बाह्य प्रकाश के द्वारा ही प्रतिबिम्ब सम्भव
है, महेश्वर की सार्वभौम चेतना स्वयं अपना प्रकाश है, वह सब प्रकाशों का
प्रकाश है, उसे किसी बाह्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं है।

( १६ )

(२) दर्पण अचेतन है। उसे अपने भीतर के प्रतिबिम्बों का बोध नहीं
है, किन्तु महेश्वर तो चेतन है। उसकी चेतना में जो प्रतिबिम्बवत् कल्पनाएं
प्रकट होती हैं उनका उसको पूरा बोध रहता है। आभास जो कि पशु या
परिच्छिन्न जीवों को बाह्य रूप में प्रतीत होते हैं परम चेतना की कल्पनाओं
के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं।
अन्तर्विभाति सकलं जगदात्मनीह यद्वद् विचित्ररचना मुकुरान्तराले ।
बोधः पुननिजविमर्शनसारयुक्त्या विश्वं परामृशति नो मुकुरस्तथा ॥
( प० सा० में योगराज द्वारा उद्धृत पृ० ३६ )
जैसे चित्र-विचित्र पदार्थ दर्पण के भीतर प्रकट होते हैं, वैसे ही परम
संवित् में जगत् प्रकट होता हैं। किन्तु परमसंवित् को विमर्शशक्ति के द्वारा
उसका बोध रहता है, दर्पण में उस प्रकार अपने में प्रतिबिम्बित पदार्थ का
बोध नहीं रहता ।
समुद्र में तरंग के समान चेतना में आभास उठते हैं। जैसे तरंगों के उत्थान
और पतन से, समुद्र को न तो कोई लाभ है, न हानि, वैसे ही आभासों के
उत्थान और पतन से परम चेतना को न कोई लाभ है, न हानि । आभास
प्रकट और लीन होते रहते हैं, किन्तु उनकी अधिष्ठानरूपी चेतना में कोई
विकार या परिवर्तन नहीं होता ।
अभास महेश्वर की कल्पनाओं का वहिः प्रक्षेप मात्र हैं।
चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद्बहिः
योगीव निरूपादानमर्थजातं प्रकाशयेत्
( ई० प्र० वि० पृ० १८५ )
चित्स्वरूप देव अन्तः स्थित पदार्थ समूह को अपनी इच्छा द्वारा बाहर प्रका-
शित करता है जैसे योगी (संकल्प द्वारा कोई वस्तु बाहर आभासित कर देता है)।
जैसे कुम्भकार मिट्टी लेकर बर्तन बनाता है उस प्रकार महेश्वर सृष्टि
नहीं करता। सृष्टि का केवल अर्थ है अन्तः स्थित कल्पनाओं को बाहर आभा-
सित कर देना । महेश्वर को इसके लिए किसी बाह्य उपादान की आव-
श्यकता नहीं होती। वह अपनी इच्छा द्वारा ही ऐसा करने में समर्थ है। जो
पदार्थ महेश्वर के ज्ञान-स्वरूप हैं वे उसकी इच्छा से ज्ञेय के रूप में प्रकट होते
हैं, जो उसके अहं स्वरूप हैं वे इदं या विश्व के रूप में प्रकट होते हैं। जीवों
को वे बाह्य रूप में आभासित होते हैं ।

( २० )
चित्स्वरूप महेश्वर ही प्रमाता और प्रमेयों के रूप में आभासित होता
है। इसलिए आभास मिथ्या नहीं कहे जा सकते। आभास महेश्वर की पूर्णता
में कोई अन्तर नहीं ला सकता।
इस दर्शन का स्वातंत्र्यवाद विवर्तवाद के विपरीत है, और आभासवाद
परिणामवाद के विपरीत है।
४-षडध्वा :-
परा-शक्ति की दृष्टि से, इस दर्शन में सृष्टि का वर्णन निम्नप्रकार से
किया जाता है। सृष्टि के मूल में एक असीम प्रभविष्णुता या शक्ति का अटूट
क्रम है जिसे नाद कहते हैं। यह एक क्रियाशील बिन्दु में घनीभूत हो जाता
है। यही सब अभिव्यक्ति या सृष्टि का मूल है। सृष्टि की परावस्था में वाचक
और वाच्य, पद और अर्थ एक हैं। उसके अनन्तर सृष्टि का छः अध्वा या
अवस्थाएं होती हैं जिन्हें षडध्वा कहते हैं। प्रथम अध्वा वर्ण और कला का
है। वैसे मुख्यतः कला परमार्थ या अनुत्तर का वह प्ररूप है जिसके द्वारा वह
सृष्टि के लिए शक्तिरूप में प्रकट होती है। परमशिव की विश्वोत्तीर्ण अवस्था
निष्कल कही जाती है, क्योंकि वह कला या सृष्टि के प्राकट्य से परे है।
शिव की विश्वमय अवस्था सकल कही जाती है, क्योकि वह सृष्टि से
सम्बद्ध है।
किन्तु इस संदर्भ में नाद-बिन्दु के अनन्तर जो कला का प्रयोग है उसका
अर्थ है सृष्टि की एक 'क्रमावस्था'। कला वह अवस्था है जहां कि एक के
अनन्तर असदृशता या विभेद प्रकट होने लगता है। परावाक् में वाचक और
वाच्य एक थे, वे अब द्वन्द्व भाव में विभिन्न होने लगते हैं। इस द्वन्द्वभाव या
विभिन्नता का पहला अध्वा है वर्ण और कला की विपरीतता। स्वामी प्रत्या-
गात्मानन्द सरस्वती ने अपने एक लेख में बहुत ठीक कहा है कि इस सन्दर्भ
में वर्ण का अर्थ अक्षर, रंग या वर्ग नहीं है, प्रत्युत बिन्दु से जो वेद्य या अर्थ
प्रक्षिप्त होता है उसका एक प्रक्रियारूप है। इस लिए वर्ण का भाव है "अर्थ
सेसम्बद्ध प्रक्रिया-रूप का विशिष्ट मान-अभिसूचक' (measure index)"।
वर्ण प्रक्रियाया-रूप ( functiou form ) है, कला विधेय-धर्म ( predi
cable ) है।
सूक्ष्म भूमि में परवर्ती अध्वा मंत्र और तत्त्व है। मंत्र सृष्टि के अगले क्रम
'तत्त्व' का उपयुक्त 'प्रक्रिया-रूप' या 'आधारात्मक व्यवस्था' है। 'तत्त्व'
सूक्ष्म निर्मिति का अन्तर्निहित सूत्र या उत्स है।

( २१ )
तीसरा और अन्तिम द्वन्द्व 'पद' और 'भुवन' का है। 'भुवन' भिन्न-भिन्न
स्तरों पर प्रमाताओं की प्रतीति के योग्य जगत् है। 'पद' उस जगत् की
मानसिक प्रतिक्रिया और शब्द द्वारा वास्तविक निरूपण हैं।
निम्नलिखित सारणी में षडध्वा संक्षेपतः इस प्रकार रखा जा सकता है।
वाचक वाच्य
वर्ण कला
मंत्र तत्त्व
पद भुवन
वाचक की ओर के त्रिक को 'कालाध्वा' कहते हैं, वाच्य की ओर के
त्रिक को 'देशाध्वा' कहते हैं।
'वर्णाध्वा' प्रमास्वरूप है। वह प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय का विश्रान्ति-
धाम है। वर्ण दो प्रकार का होता है। अमायीय और मायीय। मायीय वर्ण
अमायीय से उत्पन्न होते हैं। अमायीय वर्ण अकृत्रिम, संकोच रहित और
अनन्त होते हैं। मायीय वर्णों में अमायीय वर्णों की वाचक शक्ति उसी प्रकार
निहित रहती है जैसे अग्नि में उष्णता।
कला पांच हैं-१. निवृत्तिकला २. प्रतिष्ठाकला, ३. विद्याकला, ४. शान्ता
या शान्तिकला। ५. शान्त्यतीताकला।
प्रत्येक कला में कितने तत्त्व और भुवन हैं इसके लिए टिप्पणी १७४
से संलग्न रेखा चित्र को देखिए। अभिनवगुप्त के अनुसार ११८ भुवन हैं;
कुछ और मत के अनुसार २२४ भुवन हैं।
५-शांकर अद्वैतवाद के साथ ईश्वराद्वयवाद (प्रत्यभिज्ञादर्शन) की
तुलना :-
श्री शंकराचार्य के दर्शन को अद्वैत शैववाद में प्रायः शान्तब्रह्मवाद,
अथवा केवलाद्वैतवाद अथवा कभी-कभी मायावेदान्तवाद कहते हैं। अद्वैत
शैववाद के ईश्वराद्वयवाद, प्रत्यभिज्ञादर्शन, या त्रिकदर्शन ये नाम प्रसिद्ध हैं।
शंकराचार्य यह मानते हैं कि ब्रह्म निष्क्रिय है। अतः अद्वैत शैववाद
शंकराचार्य के दर्शन को शान्तब्रह्मवाद कहता है।
शान्तब्रह्मवाद और ईश्वराद्वयवाद का प्रथम मुख्य भेद यह है कि शान्तब्रह्मवाद
के अनुसार चित् या ब्रह्म का वैशिष्ट्य है प्रकाश या ज्ञान, जब कि ईश्वरा-
द्वयवाद के अनुसार चित् 'प्रकाश और विमर्श'-स्वरूप है। दूसरे शब्दों में

( २१ )
शंकर के अनुसार ब्रह्म ज्ञान मात्र है, किन्तु ईश्वराद्वयवाद के अनुसार उसका
वैशिष्ट्य ज्ञातृत्व और कर्तृत्व दोनों है। शंकर समझते हैं कि क्रिया केवल
जीव का धर्म है, ब्रह्म में क्रिया नहीं है। शंकर ने क्रिया शब्द को बहुत ही
संकुचित अर्थ में लिया है। शैव दर्शन कर्तृत्व को बहुत व्यापक अर्थ में लेता
है; इसके अनुसार ज्ञान भी प्रभु की एक क्रिया है। कर्तृत्व के बिना चित् या
परमेश्वर जड़ के समान हो जायगा और कुछ भी घटित नहीं कर सकता।
परमशिव या परमेश्वर स्वतंत्र है, इसीलिए वह कर्ता है। पाणिनि ने ठीक ही
कहा है 'स्वतंत्रः कर्ता' जो स्वतंत्र होता है, वही कर्ता होता है। स्वातंत्र्य
और कर्तृत्व प्रायः एक ही अर्थ के बोधक हैं।
शान्तब्रह्मवाद के अनुसार ब्रह्म बिलकुल शान्त है, निष्क्रिय है। जब ब्रह्म
अविद्या से उपहित हो जाता है, तब वह ईश्वर कहलाता है और तभी उसमें
कर्तृत्व आता है। वास्तविक कर्तृत्व अविद्या का है। ईश्वर जब अविद्या से
अनुपहित रहता है, तब उसमें कोई कर्तृत्व नहीं रहता। शंकर स्पष्ट रूप से
कहते हैं "तदेवमविद्यात्मकोपाधिपरिच्छेदापेक्षमेश्वरस्येश्वरत्वं सर्वज्ञत्वं सर्व-
शक्तित्वं च, न परमार्थतो विद्यायापास्तसर्वोपाधिस्वरूपे आत्मनीशित्रीशितव्य-
त्वादि व्यवहार उपपद्यते"। (२-१-१४) अर्थात् ईश्वर का ईश्वरत्व, सर्वज्ञत्व
और सर्वशक्तित्व उसकी अविद्या उपाधि-जन्य परिमितता पर अवलम्बित
है। परमार्थ में जब विद्या के द्वारा आत्मा में से सभी उपाधियां निरस्त हो
जाती हैं तब उसके लिए ईशितृ, ईशितव्य, सर्वज्ञत्व आदि व्यवहार उपयुक्त
नहीं हो सकता। तो शंकर के अनुसार ईश्वर में जो कुछ कर्तृत्व है, वह
अविद्या के कारण है।
इसके विपरीत, ईश्वराद्वयवाद के अनुसार ज्ञातृत्व और कर्तृत्व परमेश्वर
का स्वरूप ही है। कृतृत्व के बिना परमेश्वर की कल्पना ही नहीं की जा
सकती। इस दर्शन में शांकर वेदान्त के समान कृतृत्व ईश्वर की उपाधि नहीं
है, प्रत्युत उसका स्वरूप ही है। संक्षेपतः उसके कृतृत्व को हम उसके पंचकृत्य
में संगृहीत कर सकते हैं। वह पंचकृत्य है सृष्टि, स्थिति, संहार, विलय और
अनुग्रह। उसका यह पंचकृत्य सदा चलता रहता है। जब वह जीव का रूप
धारण करता है तब भी उसका उपर्युक्त पंचकृत्व बराबर चलता रहता है।
ईश्वराद्वयवाद के अनुसार शिव सदा पंचकृत्यकारी है। शांकर वेदान्त के
अनुसार ब्रह्म निष्क्रिय है। महेश्वरानन्द का कहना है कि निष्क्रिय ब्रह्म तो
असत् के समान हो जायगा। "तथाहि परमेश्वरस्य ह्ययमेवासाधारणस्वभावो

( २३ )

यत् सर्वदा सृष्ट्यादिपंचकृत्यकारित्वम्। एतदनंगीकाराद्धिमायावेदान्तादिनि-
र्णीतस्यात्मनः स्वस्फुरणामोदमान्द्यलक्षणमसत्कल्पत्वापतितम्" । (म० मं०
पृ० ५२) अर्थात् परमेश्वर का यही असाधारण स्वभाव है कि वह सदा सृष्टि
इत्यादि पंचकृत्य करता रहता है । यदि यह स्वीकार न किया जाय तो माया-
वेदान्तादि द्वारा निर्णीत आत्मा अपने स्फुरण का पता न होने से असत् के
समान हो जायगा ।
ईश्वराद्वयवाद भी अविद्या और माया को मानता है, किन्तु उसके अनु-
सार अविद्या या माया कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो ईश्वर को ग्रस्त कर लेती है,
प्रत्युत वह अपने स्वातंत्र्य द्वारा, अपनी ही शक्ति द्वारा, अपनेही द्वारा आरोपित
आत्मसंकोच है । शंकर के अनुसार ब्रह्म सर्वथा निष्क्रिय है, जो कुछ कर्तृत्व
है वह सब अविद्या अथवा तज्जन्य माया का है। ईश्वराद्वयवाद के अनुसार
सब कर्तृत्वईश्वर का है, माया भी उसी के कर्तृत्व का एक प्ररूप है ।
शान्त ब्रह्मवाद के अनुसार माया अनिर्वचनीय है, किन्तु ईश्वराद्वयवाद
के अनुसार माया शिव की शक्ति होने के कारण यथार्थ है और नानात्व और
भेद-दृष्टि उत्पन्न करती है ।
शान्तब्रह्मवाद के अनुसार जगत् मिथ्या है, किन्तु ईश्वराद्वयवाद के अनुसार
जगत् सत्य है, वह ईश्वर की शक्ति का विलास है। यतःशक्ति यथार्थ है, अतः
शक्ति द्वारा घटित विश्व भी यथार्थ है। शंकर माया को सत् और असत् दोनों
से अनिर्वचनीय मानते हैं ( सदसद्भ्यामनिर्वचनीया ), अतः उनका अद्वैतवाद
व्यावृत्तिमूलक (exclusive) है, अनुवृत्तिमूलक (all inclusive) नहीं है ।
ईश्वराद्वयवाद माया को शिवमयी (शिव का ही प्ररूप) मानता है। अतः शैव
अद्वैतवाद पूर्ण है, सर्वसंग्राही और अनुवृत्तिमूलक है। जैसा कि शंकर मानते हैं
कि ब्रह्म सत्य है और माया अन्ततोगत्वा असत्य है, यदि यह शंकर वेदान्त का
आधारभूत मत है तो उनके दर्शन में द्वैताभास अनिवार्य हो जायगा ।
शंकर के विवर्तवाद के अनुसार जगत् में जो कुछ है वह सब नामरूप है
और वस्तुतः सत्य नहीं समझा जा सकता। ईश्वराद्वयवाद के अनुसार, आभास
परमशिव की कल्पना या अनुभव होने के कारण सत्य हैं। यद्यपि वे परमशिव
में उसी रूप में नहीं रहते जिस रूप में परिमित प्रमाता या जीव उनका अनु-
भव करते हैं, तथापि वे परमशिव के अनुभव या कल्पना के रूप में उसमें
विद्यमान रहते हैं। इसलिए वे वस्तुतः यथार्थ हैं। जो परमशिव का अनुभव
या प्रत्ययन है वह असत्य नहीं हो सकता ।