प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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रामकण्ठ की विवृत्ति, उत्पल वैष्णव की प्रदीपिका, क्षेमराज का स्पन्द-
सन्दोह और स्पन्द निर्णय । स्पन्द सन्दोह में केवल प्रथमकारिका पर टीका है ।
(ग) प्रत्यभिज्ञा शास्त्र :-
यह शैव दर्शन के मुख्य सिद्धान्तों का मानव की तार्किक बुद्धि के लिए
व्याख्या करता है । इसमें आगम के दार्शनिक पक्ष का प्रतिपादन हुआ है ।
इसमें तर्क, वाद-प्रतिवाद का प्रयोग किया गया है ।
इस शास्त्र का मूल ग्रन्थ सोमानन्द की शिवदृष्टि है। सोमानन्द के शिष्य
उत्पल देव ने 'ईश्वर प्रत्यभिज्ञा' लिखी । इस पर निम्नलिखित व्याख्याएं हैं :-
स्वयं उत्पलदेव द्वारा लिखी वृत्ति, अभिनवगुप्त द्वारा लिखी हुई प्रत्यभिज्ञा
विमर्शिनी और प्रत्यभिज्ञा विवृति विमर्शिनी । क्षेमराज ने 'प्रत्यभिज्ञा हृदयम्'
लिखा जिसमें प्रत्यभिज्ञा शास्त्र का सार आ गया है ।
अभिनवगुप्त ने १२ खण्डों में तंत्रालोक' और एक पृथक् ग्रन्थ 'तंत्रालोक
सार' लिखा जिनमें शैव दर्शन के सभी सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया
है । ऊपर जो शैव दर्शन का ऐतिहासिक विवरण दिया गया है उसके लिए
मैं जे० सी० चैटर्जी के 'काश्मीर शैविज्म' का ऋणी हूँ ।
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् :-
जैसा कि ऊपर कहा गया है 'प्रत्यभिज्ञाहृदय' में क्षेमराज ने समस्त
प्रत्यभिज्ञादर्शन का सार प्रस्तुत किया है । क्षेमराज अभिनवगुप्त के प्रति-
भाशाली शिष्य थे । अभिनवगुप्त की बहुमुखी प्रतिभा थी । वह तंत्र, योग,
दर्शन, काव्य और नाट्यशास्त्र के अनुपम विशेषज्ञ थे । डा० कान्तिचन्द्र
पाण्डेय के अनुसार अभिनवगुप्त ईसवी दशवीं शती में हुये थे । क्षेमराज उनके
शिष्य थे । अतः उनका भी काल दशवीं शती है। उन्होंने निम्नलिखित
ग्रन्थ लिखे ।
प्रत्यभिज्ञाहृदयम्, स्पन्दसन्दोह, स्पन्दनिर्णय, स्वच्छन्दोद्योत, नेत्रोद्योत,
विज्ञानभैरवोद्योत, शिवसूत्रविमर्शिनी, स्तवचिन्तामणिटीका, पराप्रावेशिका,
तत्त्वसन्दोह ।
उनके वंश और जीवन के सम्बन्ध में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है ।
यह मत बिलकुल ठीक है कि उनके 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' ग्रन्थ का शैव या त्रिक
वाङ्मय में वही स्थान है जो वेदान्त में वेदान्तसार का है । इस ग्रन्थ में
विवादग्रस्त बातों को छोड़ दिया गया है और प्रत्यभिज्ञादर्शन के सिद्धान्तों का