प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 19, कुल 187 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६ )
परमशिव की शक्ति तो अनन्त है, किन्तु निम्नलिखित पाँच शक्तियां
मुख्य हैं :-
१. चित्-आत्मप्रकाशन की शक्ति । इस प्ररूप में वह शिव कहलाता है ।
२. आनन्द-इसको स्वातंत्र्य भी कहते हैं । ( स्वातंत्र्यमानन्द-शक्तिः
तंत्रालोकसार भा० १) । इस प्ररूप में महेश्वर शक्ति कहलाता है ।
एक प्रकार से चित् और आनन्द महेश्वर का स्वरूप ही है । शेष सब
उसकी शक्तियां हैं ।
३. इच्छा-सर्जन की प्रवृत्ति । इस प्ररूप में वह सदाशिव और सादाख्य
कहलाता है ।
४. ज्ञान-इस प्ररूप में वह ईश्वर कहलाता है ।
५. क्रिया-कोई भी आकार ग्रहण करने की शक्ति ( सर्वाकारयोगित्वं
क्रिया शक्तिः तंत्रालोकसार भा० ) इस प्ररूप में वह सद्विद्या या
शुद्ध विद्या कहलाता है ।
विश्व महेश्वर की शक्ति का उन्मेष या प्रसर के अतिरिक्त और कुछ
नहीं है ।
(i) अपरिमित अनुभव के तत्त्व : १-५:
हम यह देख चुके हैं कि परमशिव के दो प्ररूप. हैं विश्वोत्तीर्ण और विश्व-
मय । उसका विश्वमय सर्जनात्मक रूप है। यह विश्वमय सर्जनात्मक रूप
शिवतत्त्व' कहलाता है ।
१. शिवतत्त्व-परमशिव का स्पन्द है । जैसा कि षट्त्रिंशत्-तत्व-सन्दोह
में कहा गया है ।
यदद्यमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छयाखिलमिदं जगत्स्रष्टुम् ।
पस्पन्दे स स्पन्दः प्रथमः शिवतत्त्वमुच्यते तज्ज्ञैः ।
( पृ० १, श्लोक० १ )
जब अनुत्तर (परमशिव) अपनी इच्छा से जगत् के सर्जन के लिए स्पन्द-
मान होता है तो उसका आद्य स्पन्द उसके जानकारों द्वारा 'शिव तत्त्व' कह-
लाता है ।
२-शक्तितत्व -यह शिव की ही शक्ति है । शक्ति 'निषेधव्यापाररूपा'
कही गई है। शक्ति पहले इदं ( यह ) या वेद्य का निषेध कर देती है । इस
स्थिति को शून्यातिशून्य कहते हैं। चित् या परासंवित् में अहं और इदं