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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 187 में से

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( ४ )

शाला में उसका परीक्षण करना पड़ता था । कालान्तर में केवल उपासना
और अनुष्ठान-पद्धति रह गयी । उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि को लोग भूल
गये । स्यात् कुछ इने गिने ऐसे साधक अब भी थे जो मौखिक परम्परा द्वारा
उसके दार्शनिक सिद्धान्त को जानते थे, किन्तु इतिहास के द्वारा उस सिद्धान्त
को लिखित रूप में प्रस्तुत करनेवाले जिस चिन्तक का पता चलता है वह
वसुगुप्त थे । विद्वानों का मत है कि वह ईसवी आठवीं शती के अन्त अथवा
नवीं शती के प्रारम्भ में हुये थे । तब से कश्मीर में दार्शनिक ग्रन्थ सक्रिय रूप
से और लगातार चार शतियों तक लिखे गये । इस दर्शन का वाङ्‌मय अब
इतना इकट्ठा हो गया है कि उसका अध्ययन करने के लिए पूरा एक जीवन-
काल चाहिए । इस दर्शन के कुछ ग्रन्थ अभी तक नहीं प्रकाशित हुये हैं ।

शैव दर्शन का वाङ्‌मय
शैव दर्शन का वाङ्‌मय तीन शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता
है :-
(क) आगम शास्त्र
(ख) स्पन्द शास्त्र
(ग) प्रत्यभिज्ञा शास्त्र
(क) आगम शास्त्र :-
यह दैवीज्ञान माना जाता है जो कि गुरु-शिष्य परम्परा से चला आया
है । इस कोटि के निम्नलिखित ग्रंथ हैं :-
मालिनी विजय, स्वच्छन्दतंत्र, विज्ञानभैरव, मृगेन्द्र, रुद्रयामल, शिवसूत्र ।
शिवसूत्र पर वृत्ति, भास्कर और वर्धराज के वार्तिक और क्षेमराज की विम-
र्शिनी व्याख्याएं मिलती हैं । मालिनी विजय, स्वच्छन्दतंत्र और विज्ञान भैरव
पर भी व्याख्याएं हैं ।
(ख) स्पन्द शास्त्र :-
इसमें इस दर्शन के मुख्य सिद्धान्त हैं । स्पन्द संबंधी निम्नलिखित ग्रन्थ
मिलते हैं :
स्पन्दसूत्र जिसका दूसरा नाम है स्पन्दकारिका । इसमें शिवसूत्र में प्रतिपा-
दित मुख्य सिद्धान्तों का विस्तृत विवेचन है । स्पन्दकारिका पर निम्नलिखित
टीकाएं उपलब्ध हैं :-