प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७ )
१-परमार्थ :-
परमार्थ अपने चरम रूप में चित् या परासंवित् है । चित् सब परिवर्तन
शील पदार्थों का निर्विकार तत्त्व है । इस चित् या परासंवित् में वेदना के
समान अव्यवहितत्व होता है जिसमें अहं ( मैं ) और इदं ( यह ) का, ज्ञाता
और ज्ञेय का भेद नहीं रहता । इसमें अहं और इदं की अविभाजित एकता
रहती है । यह वह चेतना है जिसको सदा अपनी चेतना बनी रहती है। प्रत्य-
भिज्ञाशास्त्र के शब्दों में यह 'प्रकाशविमर्शमय' है ।
परमार्थ या चरमतत्त्व को इस शास्त्र में परमशिव या महेश्वर या परमेश्वर
कहते हैं । यह 'प्रकाश' मात्र नहीं है । 'प्रकाश' वह है जिसके द्वारा सब कुछ
प्रकाशित होता है । कठोपनिषद् के शब्दों में 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं, तस्य
भासा सर्वमिदं विभाति' । 'उसी के प्रकाशमान होने के कारण ही सब कुछ
प्रकाशित होता है, उसी के प्रकाश से सब कुछ प्रकाशमान है ।"
शांकरवेदान्त भी उसको 'प्रकाश' कहता है । किन्तु सूर्य भी तो प्रकाश
है, हीरा भी तो प्रकाश है, तो फिर चरमतत्त्व और इसमें (सूर्य या हीरा में)
क्या भेद है ? शैवदर्शन कहता है कि चरमतत्त्व प्रकाश मात्र नहीं है,
वह जड़ हीरे के समान प्रकाश नहीं है, वह विमर्श भी है अर्थात् वह अपना
ईक्षण भी करता है । जैसा कि क्षेमराज ने पराप्रावेशिका (पृ०२) में कहा है,
यह विमर्श, 'अकृत्रिमाहं विस्फुरणम्' है, यह अकृत्रिम, शुद्ध स्वाभाविक अहं
( मैं ) का स्फुरण है, अर्थात् यह अहं और इदं के व्यवधान से शून्य, अव्यवहित
'स्व' का बोध है । इस अकृत्रिम अहं पर टिप्पणी में प्रकाश डाला गया है ।
यदि चरमतत्त्व प्रकाश मात्र होता और विमर्श न होता, तो वह निरीश्वर
और जड हो जाता । 'यदि निर्विमर्शः स्यात् अनीश्वरो जडश्च प्रसज्येत' ।
( प०प्रा० पृ०२ ) इसी विमर्श ही द्वारा जगत् की सृष्टि, स्थिति और संहार
होता है ।
चित् अपने को चित्-रूपिणी शक्ति के रूप में जानता है । यही विमर्श है ।
विमर्श के कई नाम हैं यथा पराशक्ति. परावाक्, स्वातंग्य, ऐश्वर्य, कर्तृत्व,
स्फुरत्ता, सार, हृदय, स्पन्द ( दे० पराप्रावेशिका पृ० २) ।
इससे स्पष्ट है कि चरमतत्व चिन्मात्र नहीं है, चित्शक्ति भी है । यह
सर्वसंग्राही चित् अनुत्तर भी कहलाता है, क्योंकि उससे बढ़कर और कुछ है
नहीं । यह विश्वोत्तीर्ण भी है और विश्वमय भी ।