प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
२. अध्याय ४-६: मण्डप, स्तम्भ, गर्भगृह एवं द्वार-प्रमाण
द्वितीयोऽध्याय
त्रिदेव स्थापना क्रम—
रुद्रस्त्रिपुरुषे मध्ये रुद्राद्वामगतो हरिः ।
दक्षिणाङ्गे भवेद् ब्रह्मा विपर्यासे भयावहः ॥४६॥
त्रिपुरुष प्रासाद मे महादेव को मध्य मे स्थापित करें। उसकी बायीं ओर विष्णु और
दाहिनी ओर ब्रह्मा को स्थापित करें। इसमे विपरीत स्थापन करेंगे तो भयकारक होगे ॥४६॥
त्रिदेवों का न्यूनाधिक मान—
रुद्रवक्त्रत्रिभागोनो हरिरर्द्धे पितामहः ।
तत्तुल्या पार्वतीदेवी सुखदा सर्वकामदा ॥४७॥
इति त्रिपुरुषन्यासः ।
इति श्री सूत्रधार मण्डनविरचिते वास्तुशास्त्रे प्रासादमण्डने जगती-
दृष्टिदोपायतनाधिकारे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
शिवमुख का एक तृतीयांश भाग कम करके दो तृतीयांश भाग तक विष्णु की
ऊंचाई रक्खे । और विष्णु के मुखाद्धं भाग तक ब्रह्मा की ऊंचाई रक्खें । ब्रह्मा की ऊंचाई
के बराबर पार्वती देवी की ऊंचाई रक्खे । यह नियम सुखदायक और सब इच्छितफल
देनेवाला है ॥४७॥
अपराजित पृच्छा में भी कहा है कि—
“ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्र-स्त्वेकस्मिन् वा पृथग्गृहे ।
भूयो न्यूनन्यूनतश्च रुद्रो हरिः पितामहः ॥
अंशोनश्च हराद्विष्णु-र्विष्णोरर्धं पितामहः ।
वामदक्षिणयोगेन मध्ये रुद्रं च स्थापयेत् ॥
संस्थाप्य च शुभं कर्त्ता नृपाद्याः सुजनाः प्रजा ।
प्रकर्त्तव्यं त्यज विप्राद्याः समे यान्ति समन्वितम् ?॥
ताभ्यां ह्रस्वो यदा रुद्रः क्षयो राज्ञि जने मृतिः ।
राष्ट्रक्षोभो नृपयुद्धं ब्रह्मविष्णू समौ यदा ॥
अनावृष्टिर्जने मारि-र्ब्रह्मह्रस्वे जनार्दने ।
विपर्यये नृपाद्याश्च अस्वस्था भ्रमति प्रजा ॥” सूत्र १३६
४० प्रासादमण्डने
त्रिपुरुष प्रासाद में ब्रह्मा विष्णु और महादेव ये तीनों देव एक ही गर्भगृह में या अलग २
गर्भगृह में स्थापित करना हो तो महादेव से न्यून विष्णु और विष्णु से न्यून ब्रह्मा की ऊंचाई
रखनी चाहिये । महादेव से एक भाग न्यून विष्णु और विष्णु से आधा भाग न्यून ब्रह्मा की
ऊंचाई रखनी चाहिये । मध्य मे महादेव, उसकी बायी ओर विष्णु और दाहिनी ओर ब्रह्मा
को स्थापित करने से राजा और प्रजा का कल्याण होता है । विष्णु और ब्रह्मा की ऊंचाई से
महादेव की ऊंचाई कम हो तो राजाओं का विनाश और मनुष्यों का मरण होता है। ब्रह्मा
और विष्णु की ऊंचाई बराबर हो तो देश में उत्पात और राजाओं का युद्ध होता है।
ब्रह्मा की ऊंचाई से विष्णु की ऊंचाई कम हो तो अनावृष्टि और मनुष्यों में महामारी आदि
रोग की उत्पत्ति होती है। इसलिये कहे हुए मानके अनुसार ही इन्हे बनाना चाहिये, विपरीत
करने से राजा और प्रजा अस्वस्थ रहते है ।
इति श्री पं० भगवानदास जैन विरचित प्रासाद मण्डन के
दूसरे अध्याय की सुबोधिनी नाम्नी भाषा टीका समाप्त ॥२॥
अथ प्रासादमण्डने तृतीयोऽध्यायः
प्रासादधारिणी खरशिला—
अतिस्थूला¹ सुविस्तीर्णा प्रासादधारिणी शिला ।
अतीवसुदृढा कार्या इष्टिकाचूर्णवारिभिः² ॥१॥
प्रासाद को धारण करनेवाली जो आधार शिला है, यह जगती के दासा के ऊपर और
प्रथम भिट्ट के नीचे जो बनायी जाती है, उसको खरशिला कहते है। वह अतिस्थूल और अच्छी
तरह विस्तारवाली बनावे, तथा ईंट, चूना और पानी से बहुत मजबूत बनावे ॥१॥
खरशिला का मान—
"प्रासादच्छन्दमस्योर्ध्वं दृढखरशिलोत्तमा ।
एकहस्ते पादहस्तः पञ्चान्तेऽङ्गुलवृद्धितः ॥
अर्धार्द्धाङ्गुलं तदूर्ध्वे तु नवान्तं सुदृढोत्तमा ।
पादवृद्धि पुनर्द्दद्याद् हस्ते हस्ते तथा पुनः ॥
हस्तानां त्रिंशतिर्याव-दर्द्धपादा तदूर्ध्वतः ।
विशत्यङ्गूलपिण्डा च शतार्द्धे तु खरा शिला ।।” अप० सू० १२३
प्रासादतल के ऊपर बहुत मजबूत और उत्तम खरशिला बनावे । वह एक हाथ के
विस्तार वाले प्रासाद मे छः अगुल के उदयवाली बनावे । पीछे दो से पाच हाथ तक के प्रासाद
मे प्रत्येक हाथ एक २ अंगुल, छह से नव हाथ तक आधा २ अंगुल, दस से तीस हाथ तक पाव २
अंगुल और इकतीस से पचास हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद में प्रत्येक हाथ एक २ जब
बढ़ा करके बनावे । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद के लिये लगभग बीस अंगुल के ऊंचाई
की खरशिला होनी चाहिये । क्षी०रार्णव अध्याय १०२ में कहा है कि—
“प्रथमभिट्टस्याधस्तात् पिण्डो वर्गा (कूर्म ?) शिलोत्तमा ।
तस्य पिण्डस्य चार्धेन खरशिलापिण्डमेव च ॥”
प्रथम भिट्ट के नीचे कूर्मशिला की मोटाई से अर्धमान की खरशिला की मोटाई रक्खे ।
(१) अतिस्थूलातिविस्तीर्णा । (२) 'इष्टका' ।
प्रा० ६
४२ प्रासादमण्डने
भिट्टमान—
शिलोपरि भवेद् भिट्ट-मेकहस्ते युगाङ्गुलम् ।
अर्धाङ्गुला भवेद् वृद्धि-र्यावद्धस्तशताद्धर्कम् ॥२॥
खरशिला के ऊपर भिट्ट नाम का थर बनावे । एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद को
चार अंगुल के उदय का बनावे । पीछे दोसे पचास हाथ तक के प्रासाद के लिये प्रत्येक हाथ
आधा २ अंगुल बढा करके बनावे ॥२॥
प्रकारन्तर से भिट्टमान—
अङ्गुलेनांशहीनेन अर्द्धे नार्द्धे न च क्रमात् ।
पञ्चदिग्विंशतिर्याव-च्छताद्धं च विवर्द्धयेत् ॥३॥
एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद को चार अंगुल का भिट्ट बनावे । पीछे दो से पांच हाथ
तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ एक २ अंगुल, छह से दस हाथ तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ
पौन २ अंगुल, ग्यारह से बीस हाथ तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल और इक्कीस से
पचास हाथ तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ पाव २ अंगुल बढा करके भिट्ट का उदय रक्खे ॥३॥
यही मत क्षीरार्णव, अपराजित पृच्छा वास्तुविद्या और वास्तुराज आदि शिल्पग्रन्थों में
दिया गया है ।
भिट्टका निर्गम—
एकद्वित्रीणि भिट्टानि हीनहीनानि कारयेत् ।
स्वस्वोदयप्रमाणस्य चतुर्थांशेन निर्गमः ॥४॥
इति भिट्टमानम् ।
उपरोक्त कथन के अनुसार भिट्टका जो उदयमान आया हो, उसमें एक, दो अथवा तीन
भिट्ट बना सकते है । परन्तु ये एक दूसरे से हीनमान का बनाना चाहिये । राजसिंहकृत वास्तु-
राज में कहा है कि—“युगांशह्रस्वं द्वितीयं तदर्धोच्चं तृतीयकम् ।” अर्थात् प्रथम भिट्ट से दूसरा
भिट्ट पौन भाग का, और तीसरा भिट्ट आधा उदय में रक्खें । तथा अपने २ उदय का चौथा
भाग बराबर निर्गम रक्खे ॥४॥
क्षीरार्णवमें कहा है कि—
“प्रथमं निर्गमं कार्यं चतुर्थांशे महामुने ! ।
द्वितीय तृतीयांशेन तृतीयं च तदर्घतः ॥”
प्रथम भीट का निर्गम अपने चौथे भाग, दूसरे भिट्टका निर्गम अपने तीसरे भाग और
तीसरे भिट्टका निर्गम अपने उदय से आधा रक्खे ।
तृतीयोऽध्यायः ४३
पीठ का उदय मान—
पीठमर्धं त्रिपादांशै-रेकद्वित्रिकरे गृहे ।
चतुर्हस्ते त्रिसार्धांशं पादांश पञ्चहस्तके ॥५॥
दशविंशतिषट्त्रिंश-च्छतार्थं हस्तकावधिः ।
वृद्धिर्वेदत्रियुग्मेन्दु-संख्या स्यादङ्गुलैः क्रमात् ॥६॥
पञ्चाशं हीनमाधिक्य-मेकैकं तु त्रिधा पुनः ।
भीट के ऊपर पीठ बनाया जाता है, उसका उदयमान-एक हाथ के विस्तार वाले
प्रासाद की पीठका उदय बारह अंगुल, दो हाथ के प्रासाद की पीठका उदय सोलह अंगुल,
तीन हाथ के प्रासाद की पीठ अठारह अंगुल, चार हाथ के प्रासाद की पीठ अपने साढ़े तीन
भाग (साढे सत्ताईश अंगुल) की, पांच हाथ के प्रासाद की पीठ अपने चौथे भाग (तीस अंगुल)
की उदय मे बनावे। छह से दस हाथ तक के प्रासाद की पीठ प्रत्येक हाथ चार २ अंगुल,
ग्यारह से बीस हाथ तक के प्रासाद की पीठ प्रत्येक हाथ तीन २ अंगुल, इक्कीस से छत्तीस
हाथ तक के प्रासाद की पीठ प्रत्येक हाथ दो २ अंगुल और सेतीस से पचास हाथ तक के
प्रासाद की पीठ प्रत्येक हाथ एक २ अंगुल बढ़ा करके बनावें। इस प्रकार पचास हाथ के
विस्तार वाले प्रासाद की पीठ का उदय पांच हाथ और छह अंगुल होता है।
उदय का पांचवां भाग उदय में कम करे तो कनिष्ठ मान की ओर बढा देवे जो ज्येष्ठ
मान की पीठ होती है। ज्येष्ठ मान की पीठ का पांचवां भाग ज्येष्ठ पीठ मे बटावे तो ज्येष्ठ ज्येष्ठ,
कम करे तो ज्येष्ठ कनिष्ठ, मध्यम मान के पीठ का पांचवां भाग मध्यम में बढावे तो ज्येष्ठ मध्यम
और कम करे तो कनिष्ठ मध्यम, कनिष्ठ मान की पीठ का पांचवां भाग कनिष्ठ पीठ में बढावे
तो ज्येष्ठ कनिष्ठ और कम करे तो कनिष्ठ कनिष्ठ मान की पीठ होती है। ऐसे नव प्रकार से
पीठ का उदयमान समझना चाहिये ॥६॥
वास्तुमंजरी में कहा है कि—
“प्रासादस्य समुत्सेध एकविंशतिभाजिते ।
पञ्चादिनवभागान्ते पञ्चधा पीठसमुच्छ्रयः ॥”
प्रासाद की (मंडोवरकी) ऊंचाई का इक्कीस भाग करे। इनमे से पांच, छह, सात, आठ
अथवा नव भाग के मान का पीठ का उदय रखें। ये पांच प्रकार के पीठ के उदय है।
यह मत अपराजित पृच्छा सूत्र १२३ श्लोक ७ में भी लीखा है। तथा श्लोक २५ से २६
तक जो पीठ का मान लिखा है, उसमे चार हाथ के प्रासाद की पीठ अर्द्ध, तृतीयांश और
चतुर्थांश मान की लिखा है।
४४ प्रासादमण्डने
क्षीरार्णव मत से पीठमान—
"एकहस्ते तु प्रासादे पीठं वै द्वादशाङ्गुलम् ।
हस्तादिपञ्चपर्यन्तं हस्ते हस्ते पञ्चाङ्गुला ॥
पञ्चोर्ध्वं दशपर्यन्तं वृद्धिर्वेदाङ्गुला भवेत् ।
दशोर्ध्वं विंशयावत्तु हस्ते हस्ते त्रयाङ्गुला ॥
विंशोर्ध्वं षट्त्रिंशान्तं वृद्धिस्तु चाङ्गुलद्वया ।
षट्त्रिंशोर्ध्वं शताध्र्दान्तं हस्तहस्तैकमङ्गुल ।
पञ्चमांशे ततो हीनं कनिष्ठं शुभलक्षणम् ।
पञ्चमांशेऽधिकं चैव ज्येष्ठं त्वष्ट्रा च भाषितम् ॥" अध्याय ३
इसका अर्थ श्लोक पांच और छह के बराबर है। सिर्फ दोसे पांच हाथ तक के प्रासाद
की पीठ प्रत्येक हाथ पांच २ अंगुल बढा करके बनाना लिखा है, यही विशेष है। इस मत से
पचास हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की पीठ का उदय पांच हाथ और आठ अंगुल का होता है !
अपराजितपृच्छा के मतसे पीठ का उदयमान—
"एकहस्ते तु प्रासादे पीठं वै द्वादशाङ्गुलम् ।
द्व्यष्टाङ्गुलं द्विहस्ते च त्रिहस्तेऽष्टादशाङ्गुलम् ॥
अर्द्धं पादं त्रिभागं वा त्रिविधं परिकल्पयेत् ।
त्र्यंशेनार्धेन पादेन चतुर्हस्ते सुरालये ॥
पादं पीठोच्छ्रयं कार्यं प्रासादे पञ्चहस्तके ।
पञ्चोर्ध्वं दशपर्यन्तं रसाशं हस्तवृद्धये ॥
ततो हस्ते चाष्टमांशो वृद्धिः स्याद् द्वाविंशावधि ।
षट्त्रिंशदन्तं वृद्धिस्तु हस्ते वै द्वादशांशिका ॥
चतुर्विंशत्यंशिका तदूर्ध्वं यावच्छतार्धकम् ।
मध्ये न्यूनेऽधिके पञ्चमाशे ज्येष्ठं कनिष्ठकम् ॥
त्रिज्येष्ठमिति च ख्यातं त्रिमध्यं त्रिकनिष्ठकम् ।
तस्याभिधानं वक्ष्येऽह-मुदितं नवधोच्छ्रयात् ॥" सूत्र० १२३
एक हाथ के प्रासाद को बारह अंगुल, दो हाथ के प्रासाद को सोलह अंगुल, तीन हाथ
के प्रासाद को अठारह अंगुल पीठ का उदय रक्खे। अर्थात् एक हाथ के अर्द्ध भाग, दो हाथ के
तीसरे भाग और चार हाथ के चौथे भाग पीठ का उदय रक्खे। चार हाथ के प्रासाद को
अर्द्ध भाग (४८ अंगुल), तीसरे भाग (३२ अंगुल) अथवा चौथे भाग (२४ अंगुल) पीठ का
उदय रखना चाहिये। पांच हाथ के प्रासाद को चौथे भाग (३० अंगुल), छह से दस हाथ के
प्रासाद को प्रत्येक हाथ चार २ अंगुल, ग्यारह से बाईस हाथ के प्रासाद को तीन २ अंगुल,
तेईस से छत्तीस हाथ के प्रासाद को दो दो अंगुल और सेंतीस से पचास हाथ के प्रासाद को
तृतीयोऽध्याय ४५
प्रत्येक हाथ एक २ अंगुल बढ़ा करके पीठ का उदय रखना चाहिये। यह पीठ की ऊंचाई का
मध्यम मान माना गया है। इसमें इसका पांचवां भाग बढ़ावे तो ज्येष्ठमान और घटावे तो
कनिष्ठ मान होता है। ज्येष्ठ मान का पांचवां भाग ज्येष्ठ मे बढ़ावे तो ज्येष्ठ ज्येष्ठ, घटावे तो
ज्येष्ठ कनिष्ठ, मध्यम का पाचवा भाग मध्यम मे बढ़ावे तो ज्येष्ठ मध्यम घटावे तो कनिष्ठ मध्यम,
कनिष्ठ मान का पाचवा भाग कनिष्ठ मे बढावे तो ज्येष्ठ कनिष्ठ और घटावे तो कनिष्ठ कनिष्ठ,
इस प्रकार पीठ के उदय का नव भेद होते है। इन नव भेदो के नाम बतलाते है—
"शुभद सर्वतोभद्रं पद्मकं च वसुन्धरम् ।
सिंहपीठं तथा व्योम गरुडं हंसमेव च ॥
वृषभं यद्भवेत् पीठं मेरोराधारकारणम् ।
पीठमानमिति ख्यातं प्रासादे आदिसोमया ॥” सूत्र० १२३
शुभद, सर्वतोभद्र, पद्मक, वसुन्धर, सिंहपीठ, व्योम, गरुड, हंस और वृषभ ये नव नाम
पीठोदय के है। इनमे वृषभपीठ मेरुप्रासाद का आधार रूप है ।
दि० वसुनंदीकृत प्रतिष्ठासार मे पीठ का मान—
“प्रासादविस्तराद्धेन स्वोच्छ्रितं पीठमुत्तमम् ।
मध्यमं पादहीनं स्याद् उत्तमाद्धेन कन्यसम् ॥”
प्रासाद के विस्तार के अर्द्ध मान का पीठ का
उदय रक्खे । इसे उत्तम मान की पीठ माना है। इस
उत्तम मान की पीठ के उदय का चार भाग करके
उनमे से तीन भाग के मान का पीठ का उदय रक्खे
तो मध्यम मान की और दो भाग के मान का पीठ का
उदय रक्खे तो कनिष्ठ मान की पीठ माना है।
पीठोदय का थरमान—
त्रिपञ्चाशत् समुत्सेधे द्वाविंशत्यंशनिर्गमे ॥७॥
नवांशो जाडद्यकुम्भश्च सप्तांशा १कर्णिका २भवेत् ।
सान्तरालं कपोतालिः सप्तांशा ग्रासपट्टिका ॥८॥
सूर्यदिग्वसुभागैश्च गजवाजिनराः क्रमात् ।
वाजिस्थानेऽथवा कार्यं स्वस्वदेवस्य वाहनम् ॥६॥
पीठ का जो उदयमान आया हो, उसमें ५३
भाग करे। उनमे से बाईस भाग के मान का पीठ प्रासाद की महापीठ
(१) सप्तांश । (२) कणिकं ।
४६ प्रासादमण्डने
का निर्गम रक्खे। उदय के तरेपन भाग में से नव भाग का जाड्यकुम्भ, सात भाग की
अन्तरपत्र के साथ कर्णिका, सात भाग की कपोतालि के साथ ग्रासपट्टी, इसके ऊपर बारह
भाग का गजथर, दश भाग का अश्वथर, और आठ भाग का नरथर बनावे। अश्वथर के स्थान
पर देव के वाहन का भी थर बना सकते है ॥७ से ६॥
थरों का निर्गममान—
पञ्चांशा कर्णिकाग्रे तु निर्गमो जाड्यकुम्भकः ।
त्रिसाद्धा कर्णिका सार्धा चतुर्भिर्ग्रासपट्टिका ॥१०॥
कुञ्जराश्वनरा वेदा रामयुग्मांशनिर्गमाः ।
अन्तशालमधस्तेषा-मूर्ध्वाधः कर्णयुग्मकम् ॥११॥
कर्णिकासे आगे पांच भाग निकलता जाड्यकुम्भ, ग्रासपट्टी से आगे साढे तीन भाग
निकलती कर्णिका, गजथर से आगे साढे चार भाग निकलती ग्रासपट्टी, अश्वथरसे आगे चार
भाग निकलता गजथर, नर थरसे आगे तीन भाग निकलता अश्वथर और खुरासे आगे दो भाग
निकलता नर थर रखे। इस प्रकार बाईस भाग पीठ का निर्गम जाने। इन गजादि थरों के
नीचे अंतराल रक्खे और अंतराल के ऊपर और नीचे दो दो कर्णिका बनावें ॥१०-११॥
कामदपीठ और कणपीठ (साधारणपीठ)—
गजपीठं विना स्वल्प-द्रव्ये पुण्यं महत्तरम् ।
जाड्यकुम्भश्च कर्णाली ग्रासपट्टी तदा भवेत् ॥१२॥
कामदं कणपीठं च जाड्यकुम्भश्च कर्णिका ।
लतिने निर्गमं हीनं सान्धारे निर्गमाधिकम् ॥१३॥
गज आदि थरो वाली पीठ को गजपीठ कहते है। ऐसी रूपवाली पीठ बनाने में द्रव्य
का अधिक खर्च होता है, इसलिये अपनी शक्ति के अनुसार अल्प द्रव्य से साधारण पीठ बनाने
से भी बड़ा पुण्य होता है। गज अश्व आदि रूपोंवाली पीठ को छोड़कर जाड्यकुम्भ, कर्णिका
और केवाल के साथ ग्रासपट्टी वाली साधारण पीठ बनावे, उसको कामदपीठ कहते है। तथा
जाड्यकुम्भ और कर्णिका ये दो थरवाली पीठ बनावे, उसको कणपीठ कहते है। लतिनजाति के
प्रासाद के पीठ का निर्गम कम होता है और सांधार जातिके प्रासाद के पीठ का निर्गम अधिक
होता है ॥१२-१३॥
सर्वेषां पीठमाधारः पीठहीनं निराश्रयम् ।
पीठहीनं त्रिनाशाय प्रासादभुवनादिकम् ॥१४॥
इति पीठम् ।
तृतीयोऽध्याय ४७
कामद पीठ करणपीठ
प्रासाद और भवन ( गृह ) आदि सब मे पीठका आधार हैं, यदि पीठ न होवे तो ये
निराधार माने जाते है। इसलिये विना पीठ वाले ये प्रासाद और गृह आदि थोडे समय मे ही
नष्ट हो जाते है ॥१४॥
प्रासाद का उदयमान ( मंडोवर )—
हस्तादिपञ्चपर्यन्तं विस्तारेणोदयः समः ।
स क्रमान्नवसप्तेषु-रामचन्द्राङ्गुलाधिकः ॥१५॥
पञ्चादिदशपर्यन्तं त्रिंशाद्यावच्छताद्र्धकम् ।
हस्ते हस्ते क्रमाद् वृद्धिर्मनुसूर्य्यनवाङ्गुला ॥१६॥
एक से पांच हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय विस्तार के बराबर मान का
बनावें, परन्तु उनमे क्रमश: नव, सात, पाच, तीन और एक अंगुल बढ़ा करके बनावे । अर्थात्
प्रासाद का विस्तार एक हाथ का हो तो उसका उदय एक हाथ और नव अंगुल ( कुल
३३ अंगुल ), दो हाथ का हो तो दो हाथ और सात अगुल ( कुल ५५ अंगुल ), तीन हाथ का
हो तो तीन हाथ और पांच अंगुल ( कुल ७७ अंगुल ), चार हाथ का हो तो चार हाथ और
तीन अगुल ( कुल ९९ अंगुल ) और पाच हाथ का हो तो पाच हाथ और एक अंगुल ( कुल
१२१ अंगुल ) का उदय रक्खे । छह से दस हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय प्रत्येक
हाथ चौदह २ अंगुल, ग्यारह से तीस हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय प्रत्येक हाथ
४८ प्रासादमण्डने
बारह २ अंगुल और इकतीस से पचास हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय प्रत्येक
हाथ नव २ अंगुल की वृद्धि करके रक्खे । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद की कुल ऊंचाई
पचीस हाथ और ग्यारह अंगुल होती है ॥१५-१६॥ देखो अपराजित पृच्छा सूत्र १२६
अन्य प्रकार का उदय मान—
एक हस्तादिपञ्चान्तं पृथुत्वेनोदयः समः ।
हस्ते सूर्याङ्गुलार्वृद्धि-र्यावत् त्रिंशत्करावधि ॥१७॥
नवाङ्गुला करे वृद्धि-र्यावद्धस्तशतार्धकम् ।
पीठोर्ध्वे उदयश्चैव छाद्यान्ते नागरादिषु¹ ॥१८॥
एक से पांच हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय विस्तार के बराबर रक्खें ।
पीछे छह से तीस हाथ तक के प्रासाद का उदय प्रत्येक हाथ बारह २ अंगुल बढाकर के और
इकतीस से पचास हाथ तक के प्रासाद का उदय प्रत्येक हाथ नव २ अंगुल बढ़ाकर के रक्खें ।
यह प्रासाद का उदय पीठ के ऊपर खुरा से लेकर छज्जा के अंत भाग तक माना
गया है ॥१७-१८॥
प्रासाद के उदय के लिये अपराजित पृच्छा सूत्र १२६ मे श्लोक १० मे अन्य प्रकार से
लीखा है कि—
“कुम्भकादि प्रहारान्तं प्रयुक्तं वास्तुवेदिभिः ।
तदधस्तात्तु पीठं च ऊर्ध्वे स्याच्छिखरोदयः ॥”
कुम्भा के थर से लेकर छाद्य के प्रहार थर के अंत तक ऊंचाई जाननी चाहिये, ऐसा
वास्तुशास्त्र के जानने वाले विद्वानो ने कहा है । कुम्भा के नीचे पीठ और प्रहार थर के ऊपर
शिखर का उदय होता है ।
क्षीरार्णव के मतानुसार पासाद का उदयमान—
“एकहस्ते तु प्रासादे त्रयस्त्रिंशाङ्गुलोदयः ।
द्विहस्ते तूदयः कार्यो सप्ताङ्गुलः करद्वयः ॥
त्रिहस्ते च यदा माना-दधिकश्च पञ्चाङ्गुलः ।
चतुर्हस्तोदयः कार्य एकेनाङ्गुलेनाधिकः ॥
विस्तरेण समः कार्यः पञ्चहस्तोदये भवेत् ।
षड्हस्ते तूदयः कार्यो न्यूनौ द्वावङ्गुलौ तथा ॥
उदयः सप्तहस्ते च न्यूनः सप्ताङ्गुलस्तथा ।
अष्टहस्तोदयः कार्यः षोडशाङ्गुलहीनकः ॥
हीन एकोनत्रिंशः स्यात् प्रासादे नवहस्तके ।
दशहस्तेषूदयः कार्योऽष्टहस्तप्रमाणतः ॥
(१) 'नागरोचितः ।'
सपाददश हस्तश्च प्रासादे दशपञ्चके ।
विंशहस्तोदये कार्यः सार्द्धद्वादशहस्तकः ॥
पञ्चविंशोदये ज्ञेयः पादोनदशपञ्चकः ।
त्रिंशहस्ते महाप्राज्ञ ! सप्तदशोदयस्तथा ॥
सपादेकोनविंशतिः पञ्चत्रिंशे मुनीश्वर ! ।
व्योमवेदे यदा हस्ते सार्धः स्यादेकविंशतिः ॥
चतुविंशतिः पादोनः पञ्चचत्वारिंशद्धस्तके ।
शताद्धोदये मान तु हस्ताः स्युः पञ्चविंशतिः ॥''
प्रासाद का विस्तार एक हाथ हो तो ३३ अंगुल, दो हाथ हो तो ५५ अंगुल, तीन हाथ
हो तो ७७ अगुल, चार हाथ हो तो ६७ अगुल, पांच हाथ का हो तो पाच हाथ, छह हाथ का हो तो
पांच हाथ और २२ अगुल, सात हाथ का हो तो छह हाथ और १७ अगुल, आठ हाथका हो तो
सात हाथ और आठ अंगुल, नव हाथ का हो तो सात हाथ और १६ अंगुल, दस हाथ का हो तो
आठ हाथ, पंद्रह हाथ का हो तो दस हाथ और छह अंगुल, बीस हाथ का हो तो बारह हाथ
और बारह अगुल, पचीस हाथ का हो तो चौदह हाथ और १८ अंगुल, तीस हाथ का हो तो
सत्रह हाथ, पेतीस हाथ का हो तो १६ हाथ और छह अंगुल, चालीस हाथ का हो तो २१ हाथ
और १२ अंगुल, पैतालीस हाथ का हो तो २३ हाथ १८ अंगुल, और पचास हाथ का हो तो
२५ हाथ का उदय करना चाहिये । अर्थात् दश हाथ के बाद पाच पांच हाथ मे सवा दो २ हाथ
उदय क ने का विधान है।
प्रासाद के उदय से पीठका उदयमान—
एकविंशत्यंशभक्ते प्रासादस्य समुच्छ्रये ।
पञ्चादिनवभागान्तं पीठस्य पञ्चधोदयः ॥१६॥
प्रासाद का खुरा से लेकर छज्जा तक जो उदयमान आवे, उसका इक्कीस भाग करके
पाच, छह, सात, आठ अथवा नव भाग जितना पीठ का उदय रखे। इस तरह पाच प्रकार से
पीठ का उदयमान होता है ॥१६॥
१४४ भाग के मंडोवर (दीवार) के थरों का उदयमान—
वेदवेदेन्दुभक्ते तु छाद्यान्तं पीठमस्तकात् ।
खुरकः पञ्चभागः स्याद् विंशतिः कुम्भकस्तथा ॥२०॥
कलशोऽष्टौ द्विसाङ्घं तु कर्त्तव्यमन्तरालकम् ।
कपोतिकाष्टौ मञ्ची च कर्त्तव्या नवभागिका ॥२१॥
प्रा० ७
५० प्रासादमण्डने
पञ्चत्रिंशत्पदा¹ जङ्घा तिष्यंशैरूद्गमो भवेत् ।
वसुभिर्भरणी कार्या दिग्भागैश्च² शिरावटी ॥२२॥
अष्टांशोर्ध्वा कपोतालि-द्विसाद्धॆ मन्तरालकम् ।
छाद्यं त्रयोदशांशोच्चं दशभागैर्वनिर्गमः ॥२३॥
इति मण्डोवरः ।
पीठ के ऊपर से छज्जा के अंत भाग तक पूर्वोक्त प्रासाद के उदय का जो मान आया हो,
उसका एक सौ चउआलीस (१४४) भाग करें। उनमें से पांच भाग का खुरा, बीस भाग का कुम्भा,
आठ भाग का कलश, ढाई भाग का अंतराल, आठ भाग का केवल, नव भाग की मंची, पैंतीस
भाग की जंघा, पंद्रह भाग का उद्गम (उरःजंघा), आठ भाग की भरणी, दस भाग की
शिरावटी, आठ भाग की कपोतिका (केवल), ढाई भाग का अंतराल और तेरह भाग का छज्जा
का उदय रक्खे और छज्जा का निर्गम दस भाग का रक्खे ॥२० से २४॥
इन १४४ भाग के मडोवर के थरों मे जो रूप किया जाता है, उसका वर्णन अपराजित
पृच्छा सूत्र १२२ के अनुसार ज्ञानप्रकाश दीपार्णव के पांचवें अध्याय में लिखा है कि—
"खुरकः पञ्चभागस्तु विंशतिः कुम्भकस्तथा ।
पूर्वमध्यपरे भागे ब्रह्मविष्णुमुद्रादयः ॥
त्रिसन्ध्या भद्रे शोभाढ्या चित्रपरिकरैर्वृताः ।
नासके रूपसंघाटा गर्भे च रथिकोत्तमा ॥
मृणालपत्रं शोभाढ्यं स्तम्भिका तोरणान्विता ।"
पीठ के ऊपर खुरा पांच भाग और कुम्भा बीस भाग रक्खें । कुम्भा मे ब्रह्मा, विष्णु
और महादेव का स्वरूप बनावे, इन तीन देवो में से एक मध्य मे और उसके दोनों बगल में
एक २ देव बनावे । भद्र के कुम्भा मे तीन संध्या देवी, अपने परिवार के साथ बनावें, कोणे के
कुम्भा मे अनेक प्रकार के रूप बनावे, तथा भद्र के मध्यगर्भ मे सुन्दर रथिका (गवाक्ष) बनावे ।
कमल के पान के आकार और तोरण वाले स्तंभ बनावें ।
"कलशो वसुभागस्तु सार्धद्वौ चान्तःपत्रकम् ॥
वसुभिश्च कपोतालि-र्मञ्चिका नवभागिका ।
पञ्चत्रिंशदुच्छ्रिता च जङ्घा कार्या विचक्षण ! ॥
भ्रमनिर्वाणतः स्तम्भै-र्नासकोपाङ्गफालनाः ।
मूननासकसर्वेषु स्तम्भाः स्युश्चतुरस्रकाः ॥
गजैः सिंहैर्वरालैश्च मकरैः समलङ्कृताः ।"
(१) 'त्रिंशत्त्र्ययुता' । (२) 'शिरावटी दशांशिका ।'
तृतीयोऽध्यायः ५१
गवाक्ष
नागरादि मंडोवर, भाग १४४
१४४ भाग का मडोवर (प्रासाद की दीवार)
५२ प्रासादमण्डने
आठ भाग का कलश, ढाई भाग का अंतरपत्र, आठ भाग का केवल, नव भाग की
मंचिका और पैतीस भाग की जंघा करें। कोना और उपांग आदि फालना की जंघा मे भ्रमवाले
स्तंभ बनावे, सब मुख्य कोने की जंघा में समचोरस स्तंभ बनावें, तथा गज, सिंह, वरालुक
और मकर के रूपों से शोभायमान बनावें ।
“कर्णेषु च दिक्पालाष्टौ प्राच्यादिषु प्रदक्षिणे ॥
नाट्येशः पश्चिमे भद्रे अन्धकेश्वरो दक्षिणे ।
चण्डिका¹ उत्तरे देव्यो दंष्ट्रासुविकृताननाः ॥
प्रतिरथे तस्य देव्यः कर्त्तव्याश्च दिशांपतेः ।
वारिमार्गे मुनीन्द्राश्च प्रलीनाः तपः साधने ॥
गवाक्षाकारो भद्रेषु कुर्यान्निर्गमभूषितः ।”
कर्ण की जंघा मे आठ दिक्पाल पूर्वादि दिशा के प्रदक्षिण क्रम से रक्खें। नाट्येश
(नटराज) पश्चिम भद्र में, अंधकेश्वर दक्षिण भद्र में, विकराल मुख वाली और भयंकर
दांत वाली चंडिका देवी उत्तर दिशा के भद्र मे रक्खें। प्रतिरथ के भद्र में दिक्पालों की देवियां
बनावे। वारिमार्ग मे तपः साधना में लीन ऐसे ऋषियों के रूप बनावे। भद्र के गवाक्ष बाहर
निकलता हुआ शोभायमान बनावें।
चार प्रकार की जंघा—
“नागरी च तथा लाटी वैराटी द्राविडी तथा ॥
शुद्धा तु नागरी ख्याता परिकर्मविवर्जिता ।
स्त्रीयुग्मसंयुता लाटी वैराटी पत्रसङ्कुला ॥
मञ्जरी बहुला कार्या जङ्घा च द्राविडी सदा ।
नागरी मध्यदेशेषु लाटी लाटे प्रकीर्त्तिता ॥
द्राविडी दक्षिणे देशे वैराटी सर्वदेशजा ।”
नागरी, लाटी, वैराटी और द्राविडी ये चार प्रकार की जंघा हैं। उनमे नागरी जंघा
बिना किसी प्रकार के रूप की और शुद्ध सादी है। स्त्री युगल के रूप वाली लाटी जंघा है।
कमल पत्रो वाली वैराटी जघा है। बहुत मञ्जरी (शृङ्गो) वाली द्राविडी जंघा है। मध्यप्रदेश
(१) अपराजित पृच्छा सूत्र १२७ श्लोक २४ मे 'वितरागे च शासनदेव्यः ।' अर्थात् वितराग देव के
देवालय मे चण्डिका के स्थान पर उनकी शासन देवियो को रखना लीखा है ।
तृतीयोऽध्यायः ५३
में नागरी जंघा, लाटदेश मे लाटी जंघा, दक्षिण देश में द्राविडी जंघा और सारे देश मे वैराटी
जंघा प्रसिद्ध है ।
"उद्गमः पञ्चदशांशैः कपिश्रासैरसङ्कृतः ॥
भरणी वसुभागा तु शिरावटी पञ्चेव च ।
तदूर्ध्वं पञ्चभिः पट्टं कपोतालिवसुस्मृता ॥
द्विसार्धमन्तःपत्रं च त्रिदशं कूटच्छाद्यकम् ।
निर्गम वसुभागे तु मेर्वादीनामतः शृणु ॥"
पंद्रह भाग का उद्गम बनावे, एवं उसमे वन्दरो के रूप
बनावे । आठ भाग की भरणी, पांच भाग की शिरावटी, उसके
ऊपर पांच भाग का पाट, आठ भाग का केवाल, ढाई भाग का
अंतरपत्र और तेरह भाग का छज्जा का उदय रखना चाहिये ।
छज्जा का निर्गम आठ भाग रखे ।
मेरु मंडोवर—
मेरुमण्डोवरे मञ्ची भरण्यूर्ध्वेऽष्टभागिका ।
पञ्चविंशतिका जङ्घा उद्गमश्च त्रयोदश ॥२४॥
अष्टांशा भरणी शेषं पूर्ववत् कल्पयेत् सुधीः ।
सप्तभागा भवेन्मञ्ची कूटच्छाद्यस्य मस्तके ॥२५॥
षोडशांशा पुनर्जङ्घा भरणी सप्तभागिका ।
शिरावटी चतुर्भागा पट्टः स्यात् पञ्चभागिकः ॥२६॥
सूर्यांशैः कूटच्छाद्यं च सर्वकामफलप्रदम् ।
कुम्भकस्य युगांशेन स्थावराणां प्रवेशकः ॥२७॥
इति मेरुमंडोवरः ।
जिस मंडोवर मे एकसे अधिक जंघा होवे, उसको मेरुमडोवर
कहते है । उसमें भरणी के ऊपर खुर, कुम्भ, कलश, अंतराल
और केवाल, ये प्रथम के पांच थर नहीं बनाये जाते, किन्तु मञ्ची
आदि सब थर बनायं जाते है । इसलिये प्रथम खुरा से लेकर भरणी
रेखाचित्र-विवरण (चित्रान्तर्गत पाठ)
- मेरुमण्डोवर भाग २४९
- [अधः से ऊर्ध्व क्रम]:
- खुरक
- कुंभ (२० १/२)
- कलश (४)
- अन्तराल (२)
- कपोतली (७)
- मंचिका (३)
- जंघा (२५)
- उद्गम (१३)
- भरणी (८)
- मंचिका (७)
- जंघा (१६)
- उद्गम
- भरणी (७)
- शिरावटी (४)
- कपोतली (७)
- पाटन
- कूटछाद्य (१२)
- जंघा
- भरणी (७)
- शिरावटी
- पाटन
- छाद्य
५४ प्रासादमण्डने
तक सब थर १४४ भाग के मान से बनाकर के पीछे उसके ऊपर मञ्ची आदि थर बनायें
जाते है, उनका मान इस प्रकार है—
उपरोक्त १४४ भाग के मण्डोवर के खुरासे लेकर भरणी
तक के सब थर बना करके उसके ऊपर मंची आठ भाग की,
जंघा पचीस भाग की, उद्गम तेरह भाग का और भरणी आठ
भाग की बनानी चाहिये । इसके ऊपर शिरावटी केवल, अंतराल
और छज्जा, ये चार थर १४४ भाग के मंडोवर के मान का
बनावें । फिरसे इस छज्जा के ऊपर सात भाग की मचो, सोलह
भाग की जंघा, सात भाग की भरणी, चार भाग की शिरावटी,
पांच भाग का पाट और बारह भाग का कूटछाद्य बनावे ।
यह मेरुमंडोवर सब इच्छित फल देने वाला है। कुम्भा का एक
चतुर्थांश भाग जितना सब थरों का निर्गम रक्खे ॥२२४ से २७॥
क्षीरार्णव में कहा है कि—
- "अस्योदये च कर्त्तव्यं प्रथमं षट्कच्छाद्यकम् ।
यावत्समोदयः प्राज्ञ ! तावन्मण्डोवरं कृतम् ॥
तथाद्यच्छाद्यसस्थाने द्वे जङ्घे परिकीर्त्तिते ।
"भवेयुर्द्वादशजङ्घा यावत्तु शतार्धोदये ॥
षड्विधं कूटच्छाद्यं च द्विभूम्योरन्तरे मुने ! ।
भरण्यूर्ध्वं भवेन्माञ्ची छाद्योर्ध्वं न च मञ्चिका ॥
पुनर्जङ्घा प्रदातव्या यावद् द्वादशसंख्यया ।
किञ्चित् किञ्चिद् भवेन्न्यूनं कर्तव्यो भूमिकोच्छ्रयः ॥
शतार्द्धोदये माने च महामेरुः प्रदापयेत् ।" अध्याय १०४॥
जितना प्रासाद का उदय हो, उतना ही ऊंचा मंडोवर रक्खें।
इस मंडोवर के उदय मे छह छज्जे बनावे। प्रथम छज्जा दो
जंघा वाला बनावे । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद में बारह
जंघा और छह छज्जा बनाया जाता है। दो दो भूमि के फासले
पर एक २ छज्जा बनाना चाहिये । भरणी के ऊपर मांची रक्खें,
किन्तु छज्जा के ऊपर मांची नहीं रखनी चाहिये। नीचे की
भूमि से ऊपर की भूमि की ऊंचाई कम कम रखनी चाहिये । यह
[चित्र-शीर्षक: सामान्य मण्डोवर नक्शा] महामेरु मंडोवर पचास हाथ के प्रासाद के लिये बनाना चाहिये ।
तृतीयोऽध्यायः ५५
सामान्य मंडोवर—
शिरावट्युद्गमो मञ्ची जङ्घा रूपाणि वर्जयेत् ।
अल्पद्रव्ये महत्पुण्यं कथितं विश्वकर्मणा ॥२८॥
इति सामान्यमंडोवरः ।
शिरावटी, उद्गम, मंची और जंघा, इन थरों मे जो जो रूप बनाये जाते हैं, इनसे द्रव्य
का अधिक व्यय होता है। इसलिये ये थर बिना रूप का बनावे ताकि खर्च कम हो। विश्वकर्माजी
के कथनानुसार इससे पुण्य भी महान् होता है। ॥२८॥
२७ भाग का मंडोवर—
पीठतश्छाद्यपर्यन्तं सप्तविंशतिभाजिते ।
द्वादशानां खुरादीनां भागसंख्या क्रमेण तु ॥२६॥
स्यादेकवेदसार्धार्ध-सार्द्ध¹मार्द्धाष्टभिस्त्रिभिः ।
सार्द्धसार्द्धार्ध भागैश्च सार्धद्वौ द्वयंशनिर्गमः॥ ३०॥
इति प्रकारान्तरे मण्डोवरः ।
पीठ के ऊपर से छज्जा के ऊपर तक मंडोवर के उदय का
सत्ताईस (२७) भाग करे। उनमें खुरा आदि बारह थरो की
भाग संख्या क्रमशः इस प्रकार है-एक भाग का खुरा, चार भाग
का कुंभ, डेढ भाग का कलश, आधा भाग का अंतराल, डेढ़
भाग का कंवाल, डेढ भाग की माची, आठ भाग की जंघा, तीन
भाग का उद्गम, डेढ भाग की भरणी, डेढ भाग का केवाल,२
आधा भाग का अंतराल और ढाई भाग का छज्जा का उदय रक्खे,
छज्जा का निर्गम दो भाग मे करे । ॥२६॥३०॥
मडोवर की मोटाइ—
पादांशोनेष्टके पञ्च-षडंशैः शैलदारुजे ।
सान्धारे चाष्टभिर्भागै³-र्दशांशैर्धातुरत्नजे ॥३१॥
प्रकारान्तरे मंडोवर-भाग २७
(१) द्विसार्धे ।
(२) भरणी के ऊपर कितनेक प्रासादो मे शिरावटी है और कितनेक
प्रासादो में केवाल देखने मे आता है। (३) ऽष्टाशतौ भित्तिः ।
५६ प्रासादमण्डने
ईंटों के प्रासाद की दीवार प्रासाद के विस्तार के चौथा भाग जितनी, पाषाण के और
लकड़ी के प्रासाद की दीवार पांचवें भाग अथवा छठ्ठे भाग जितनी, सांधार प्रासाद की दीवार
आठवें भाग, धातु और रत्न के प्रासाद की दीवार दसवें भाग जितनी मोटी बनावें ॥३१॥
अपराजित सूत्र १२६ में कहा है कि-
“मृदिष्टिकाकर्मयुक्तां भित्ति पादां प्रकल्पयेत् ।
पञ्चमांशेऽथवा सा तु षष्ठांशे शैलजे भवेत् ॥
दारुजे सप्तमांशे च सान्धारे चाष्टमांशके ।
धातुजे रत्नजे भित्तिः प्रासादे दशमांशतः ॥”
मिट्टी और ईंट के प्रसाद की दीवार चौथे भाग, पाषाण के प्रासाद की दीवार पांचवे
अथवा छठ्ठे भाग, लकड़ी के प्रासाद की दीवार सातवे भाग, सान्धार जाति के प्रासाद की
दीवार आठवे भाग, धातु और रत्न के प्रासाद की दीवार दसवे भाग जितनी मोटी बनावें ।
अन्य प्रकार से मंडोवर की मोटाई—
चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे दशभागैर्विभाजिते ।
भित्तिर्द्विभागकर्त्तव्या षड्भागं गर्भमन्दिरम् ॥३२॥
समचोरस प्रासाद की भूमि के दस भाग करे । उनमे से दो २ भाग की दीवार की मोटाई
रक्खे । बाकी छह भाग का गभारा बनावे ॥३२॥
शुभाशुभगर्भगृह—
मध्ये युगास्रं भद्राढ्यं सुभद्रं प्रतिभद्रकम् ।
फालनीयं गर्भगेहं दोषंदं गर्भमायतम् ॥३३॥
गर्भगृह चार कोने वाला समचोरस बनावे । उसमे भद्र, सुभद्र और प्रतिभद्र आदि
फालना (खाचा) बताना शुभ है। परन्तु लंबचोरस गभारा बनाने पर दोष होता है ॥३३॥
अपराजित पृच्छा सूत्र १२६ में कहा है कि—
“एकद्वित्रिकमात्राभि-र्गर्भगेहं यदायतम् ।
यमचुल्ली तदा नाम भर्तृगृहविनाशिका ॥”
यदि गर्भगृह एक, दो, तीन अंगुल भी सम्मुख लंबा हो तो यह यमचुल्ली नाम का
गर्भगृह कहा जाता है । यह स्वामी के गृह का विनाश कारक है ।
तृतीयोऽध्यायः ५७
लंबचोरस शुभ गर्भगृह—
“दारुजे वलभीना तु आयतं च न दुष्येत् ।
प्रशस्त सर्वकृत्येषु चतुरस्रं शुभप्रदम् ॥” अप० सू० १२६
दारुजादि (लकड़ी के बने हुए) और वलभी (स्त्रीलिंग) जाति के प्रासाद में गर्भगृह
लंबा हो तो दोष नही लगता है । बाकी समस्त जाति के प्रासादों मे समचोरस गर्भगृह बनाना,
सब कार्यों में प्रशंसनीय और शुभ है ।
स्तम्भ और मंडोवर का समन्वय—
कुम्भकेन समा कुम्भी स्तम्भप्रान्तेन तूद्गमः ।
भरण्या भरणीं शीर्षं कपोताल्या समं भवेत् ॥३४॥
पेटके¹ कूटच्छाद्यस्य कुर्यात् पटस्य पेटकम् ।
मंडोवर का कुम्भ और स्तंभ की कुम्भी, स्तंभ का मथाला और मंडोवर का उद्गम,
स्तभ की भरणी और मडोवर की भरणी, मंडोवर की कपोताली और स्तंभ की शिरावटी, ये
सब समसूत्र मे रखने चाहिये और पाट के पेटा भाग तक छज्जा की नमन (छज्जा नमता)
रखनी चाहिये ।
गर्भगृह के उदय का मान और गुम्बज—
सषडंशः सपादः स्यात् सार्धो गर्भस्य विस्तरात् ॥३५॥
वृहद्देवालये पट्ट-पेटान्तं हि त्रिधोदयः ।
भजेदष्टभिरेकांशा कुम्भी स्तम्भोऽद्ध्र्पञ्चभिः ॥३६॥
अर्द्धेन भरणी शीर्ष-मेकं पट्टस्तु सार्धकः ।
व्यासार्धेन करोटः स्याद् दर्दरी त्रिषमा शुभा ॥३७॥
इति गुर्भगृहोदयप्रमाणम् ।
गर्भगृह (गभारे) के विस्तार मे विस्तार का षष्ठांश युक्त सवाया अथवा डेढा गर्भगृह
का उदय रखे । यह गभारे के तल से पाट के पेटा भाग तक गर्भगृह के उदय का तीन प्रकार का
मान हुआ । (अपराजित पृच्छा सू० १२६ श्लो० ५ मे गभारे का उदय पौने दुगुणा तक रखने
(१) 'अधस्तात्'
प्रा० ८
५८ प्रासादमण्डने
को कहा है ) जो उदयमान आया हो, उसका आठ भाग करें, उनमें से एक भाग की कुम्भी,
साढ़े पांच भाग का स्तंभ, आधे भाग की भरणी और एक भाग की शिरावटी बनावें। इसके
ऊपर डेढ भाग का केवाल ( पाट ) रखें। गर्भगृह के विस्तार से आधा करोट ( गूम्बज ) का
उदय रखना चाहिये, उसमें दर्दरी का थर विषम संख्या में रखें ।।३५ से ३७॥
उदुम्बर (देहली) की ऊँचाई—
मूलकर्णस्य सूत्रेण कुम्भेनोदुम्बरः समः ।
तदधः पञ्चरत्नानि स्थापयेच्छिल्पिपूजया ॥३८॥
प्रासाद के कोने के समसूत्र में उदुम्बर ( देहली ) बनावें । यह कुम्भा के उदय के
बराबर ऊंचाई मे रखें। इसको स्थापना करते समय नीचे पचरत्न रखे और शिल्पियों का
सम्मान करे ॥३८॥
उदुम्बर की रचना—
द्वारव्यासत्रिभागेन मध्ये मन्दारको भवेत् ।
वृत्तं मन्दारकं कुर्याद् मृणालं पद्मसंयुतम् ॥३६॥
जाड्यकुम्भः कणाली च कीर्तिवक्त्रद्वयं तथा ।
उदुम्बरस्य पार्श्वे च शाखायास्तलरूपकम् ॥४०॥
द्वार के विस्तार का अर्थात् देहली का तीन भाग करें। उनमे से एक भाग का मध्य मे
मंदारक बनाये। यह अर्धचंद्र के आकार वाला गोल और पद्मपत्र युक्त बनाना चाहिये।
बदुम्बर की ऊंचाई के अर्धभाग में जाड्यकुम्भ और कणी, ये दो थर वाली कणपीठ बनावें।
मंदारक के दोनों तरफ एक २ भाग का कीर्तिमुख ( ग्रासमुख ) बनावें और उसके बगल में
शाखा के तलका रूपक बनावें ॥३६-४०॥
कुभा से हीन उदुम्बर और तल—
कुम्भस्यार्द्धे त्रिभागे वा पादे हीन उदुम्बरः ।
तदर्धे कर्णकं मध्ये पीठान्ते बाह्यभूमिका ॥४१॥
इति उदुम्बर ।
उदुंबर का उदय कुम्भ के उदय के बराबर रखना चाहिये। परन्तु कम करना चाहे तो
कुम्भ के उदय का आधा एक तृतीयांश अथवा चौथा भाग जितना कम कर सकते है। उदय के
आधे भाग तक कणपीठ करना और गर्भगृह का तल रखना चाहिये और बाहर के मंडपों के
तल पीठ के उदयान्त बराबर रक्खे ॥४१॥