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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 278 में से

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पृष्ठ 85

४८ प्रासादमण्डने
बारह २ अंगुल और इकतीस से पचास हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय प्रत्येक
हाथ नव २ अंगुल की वृद्धि करके रक्खे । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद की कुल ऊंचाई
पचीस हाथ और ग्यारह अंगुल होती है ॥१५-१६॥ देखो अपराजित पृच्छा सूत्र १२६
अन्य प्रकार का उदय मान—
एक हस्तादिपञ्चान्तं पृथुत्वेनोदयः समः ।
हस्ते सूर्याङ्गुलार्वृद्धि-र्यावत् त्रिंशत्करावधि ॥१७॥
नवाङ्गुला करे वृद्धि-र्यावद्धस्तशतार्धकम् ।
पीठोर्ध्वे उदयश्चैव छाद्यान्ते नागरादिषु¹ ॥१८॥
एक से पांच हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय विस्तार के बराबर रक्खें ।
पीछे छह से तीस हाथ तक के प्रासाद का उदय प्रत्येक हाथ बारह २ अंगुल बढाकर के और
इकतीस से पचास हाथ तक के प्रासाद का उदय प्रत्येक हाथ नव २ अंगुल बढ़ाकर के रक्खें ।
यह प्रासाद का उदय पीठ के ऊपर खुरा से लेकर छज्जा के अंत भाग तक माना
गया है ॥१७-१८॥
प्रासाद के उदय के लिये अपराजित पृच्छा सूत्र १२६ मे श्लोक १० मे अन्य प्रकार से
लीखा है कि—
“कुम्भकादि प्रहारान्तं प्रयुक्तं वास्तुवेदिभिः ।
तदधस्तात्तु पीठं च ऊर्ध्वे स्याच्छिखरोदयः ॥”
कुम्भा के थर से लेकर छाद्य के प्रहार थर के अंत तक ऊंचाई जाननी चाहिये, ऐसा
वास्तुशास्त्र के जानने वाले विद्वानो ने कहा है । कुम्भा के नीचे पीठ और प्रहार थर के ऊपर
शिखर का उदय होता है ।
क्षीरार्णव के मतानुसार पासाद का उदयमान—
“एकहस्ते तु प्रासादे त्रयस्त्रिंशाङ्गुलोदयः ।
द्विहस्ते तूदयः कार्यो सप्ताङ्गुलः करद्वयः ॥
त्रिहस्ते च यदा माना-दधिकश्च पञ्चाङ्गुलः ।
चतुर्हस्तोदयः कार्य एकेनाङ्गुलेनाधिकः ॥
विस्तरेण समः कार्यः पञ्चहस्तोदये भवेत् ।
षड्‌हस्ते तूदयः कार्यो न्यूनौ द्वावङ्गुलौ तथा ॥
उदयः सप्तहस्ते च न्यूनः सप्ताङ्गुलस्तथा ।
अष्टहस्तोदयः कार्यः षोडशाङ्गुलहीनकः ॥
हीन एकोनत्रिंशः स्यात् प्रासादे नवहस्तके ।
दशहस्तेषूदयः कार्योऽष्टहस्तप्रमाणतः ॥
(१) 'नागरोचितः ।'