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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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तृतीयोऽध्यायः ५५
सामान्य मंडोवर—
शिरावट्युद्गमो मञ्ची जङ्घा रूपाणि वर्जयेत् ।
अल्पद्रव्ये महत्पुण्यं कथितं विश्वकर्मणा ॥२८॥
इति सामान्यमंडोवरः ।
शिरावटी, उद्गम, मंची और जंघा, इन थरों मे जो जो रूप बनाये जाते हैं, इनसे द्रव्य
का अधिक व्यय होता है। इसलिये ये थर बिना रूप का बनावे ताकि खर्च कम हो। विश्वकर्माजी
के कथनानुसार इससे पुण्य भी महान् होता है। ॥२८॥
२७ भाग का मंडोवर—
पीठतश्छाद्यपर्यन्तं सप्तविंशतिभाजिते ।
द्वादशानां खुरादीनां भागसंख्या क्रमेण तु ॥२६॥
स्यादेकवेदसार्धार्ध-सार्द्ध¹मार्द्धाष्टभिस्त्रिभिः ।
सार्द्धसार्द्धार्ध भागैश्च सार्धद्वौ द्वयंशनिर्गमः॥ ३०॥
इति प्रकारान्तरे मण्डोवरः ।
पीठ के ऊपर से छज्जा के ऊपर तक मंडोवर के उदय का
सत्ताईस (२७) भाग करे। उनमें खुरा आदि बारह थरो की
भाग संख्या क्रमशः इस प्रकार है-एक भाग का खुरा, चार भाग
का कुंभ, डेढ भाग का कलश, आधा भाग का अंतराल, डेढ़
भाग का कंवाल, डेढ भाग की माची, आठ भाग की जंघा, तीन
भाग का उद्गम, डेढ भाग की भरणी, डेढ भाग का केवाल,२
आधा भाग का अंतराल और ढाई भाग का छज्जा का उदय रक्खे,
छज्जा का निर्गम दो भाग मे करे । ॥२६॥३०॥
मडोवर की मोटाइ—
पादांशोनेष्टके पञ्च-षडंशैः शैलदारुजे ।
सान्धारे चाष्टभिर्भागै³-र्दशांशैर्धातुरत्नजे ॥३१॥
प्रकारान्तरे मंडोवर-भाग २७
(१) द्विसार्धे ।
(२) भरणी के ऊपर कितनेक प्रासादो मे शिरावटी है और कितनेक
प्रासादो में केवाल देखने मे आता है। (३) ऽष्टाशतौ भित्तिः ।