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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 278 में से

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पृष्ठ 89

५२ प्रासादमण्डने

आठ भाग का कलश, ढाई भाग का अंतरपत्र, आठ भाग का केवल, नव भाग की
मंचिका और पैतीस भाग की जंघा करें। कोना और उपांग आदि फालना की जंघा मे भ्रमवाले
स्तंभ बनावे, सब मुख्य कोने की जंघा में समचोरस स्तंभ बनावें, तथा गज, सिंह, वरालुक
और मकर के रूपों से शोभायमान बनावें ।
“कर्णेषु च दिक्पालाष्टौ प्राच्यादिषु प्रदक्षिणे ॥
नाट्येशः पश्चिमे भद्रे अन्धकेश्वरो दक्षिणे ।
चण्डिका¹ उत्तरे देव्यो दंष्ट्रासुविकृताननाः ॥
प्रतिरथे तस्य देव्यः कर्त्तव्याश्च दिशांपतेः ।
वारिमार्गे मुनीन्द्राश्च प्रलीनाः तपः साधने ॥
गवाक्षाकारो भद्रेषु कुर्यान्निर्गमभूषितः ।”
कर्ण की जंघा मे आठ दिक्पाल पूर्वादि दिशा के प्रदक्षिण क्रम से रक्खें। नाट्येश
(नटराज) पश्चिम भद्र में, अंधकेश्वर दक्षिण भद्र में, विकराल मुख वाली और भयंकर
दांत वाली चंडिका देवी उत्तर दिशा के भद्र मे रक्खें। प्रतिरथ के भद्र में दिक्पालों की देवियां
बनावे। वारिमार्ग मे तपः साधना में लीन ऐसे ऋषियों के रूप बनावे। भद्र के गवाक्ष बाहर
निकलता हुआ शोभायमान बनावें।
चार प्रकार की जंघा—
“नागरी च तथा लाटी वैराटी द्राविडी तथा ॥
शुद्धा तु नागरी ख्याता परिकर्मविवर्जिता ।
स्त्रीयुग्मसंयुता लाटी वैराटी पत्रसङ्कुला ॥
मञ्जरी बहुला कार्या जङ्घा च द्राविडी सदा ।
नागरी मध्यदेशेषु लाटी लाटे प्रकीर्त्तिता ॥
द्राविडी दक्षिणे देशे वैराटी सर्वदेशजा ।”
नागरी, लाटी, वैराटी और द्राविडी ये चार प्रकार की जंघा हैं। उनमे नागरी जंघा
बिना किसी प्रकार के रूप की और शुद्ध सादी है। स्त्री युगल के रूप वाली लाटी जंघा है।
कमल पत्रो वाली वैराटी जघा है। बहुत मञ्जरी (शृङ्गो) वाली द्राविडी जंघा है। मध्यप्रदेश

(१) अपराजित पृच्छा सूत्र १२७ श्लोक २४ मे 'वितरागे च शासनदेव्यः ।' अर्थात् वितराग देव के
देवालय मे चण्डिका के स्थान पर उनकी शासन देवियो को रखना लीखा है ।