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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 278 में से

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पृष्ठ 79

४२ प्रासादमण्डने
भिट्टमान—
शिलोपरि भवेद् भिट्ट-मेकहस्ते युगाङ्गुलम् ।
अर्धाङ्गुला भवेद् वृद्धि-र्यावद्धस्तशताद्धर्कम् ॥२॥
खरशिला के ऊपर भिट्ट नाम का थर बनावे । एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद को
चार अंगुल के उदय का बनावे । पीछे दोसे पचास हाथ तक के प्रासाद के लिये प्रत्येक हाथ
आधा २ अंगुल बढा करके बनावे ॥२॥
प्रकारन्तर से भिट्टमान—
अङ्गुलेनांशहीनेन अर्द्धे नार्द्धे न च क्रमात् ।
पञ्चदिग्विंशतिर्याव-च्छताद्धं च विवर्द्धयेत् ॥३॥
एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद को चार अंगुल का भिट्ट बनावे । पीछे दो से पांच हाथ
तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ एक २ अंगुल, छह से दस हाथ तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ
पौन २ अंगुल, ग्यारह से बीस हाथ तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल और इक्कीस से
पचास हाथ तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ पाव २ अंगुल बढा करके भिट्ट का उदय रक्खे ॥३॥
यही मत क्षीरार्णव, अपराजित पृच्छा वास्तुविद्या और वास्तुराज आदि शिल्पग्रन्थों में
दिया गया है ।
भिट्टका निर्गम—
एकद्वित्रीणि भिट्टानि हीनहीनानि कारयेत् ।
स्वस्वोदयप्रमाणस्य चतुर्थांशेन निर्गमः ॥४॥
इति भिट्टमानम् ।
उपरोक्त कथन के अनुसार भिट्टका जो उदयमान आया हो, उसमें एक, दो अथवा तीन
भिट्ट बना सकते है । परन्तु ये एक दूसरे से हीनमान का बनाना चाहिये । राजसिंहकृत वास्तु-
राज में कहा है कि—“युगांशह्रस्वं द्वितीयं तदर्धोच्चं तृतीयकम् ।” अर्थात् प्रथम भिट्ट से दूसरा
भिट्ट पौन भाग का, और तीसरा भिट्ट आधा उदय में रक्खें । तथा अपने २ उदय का चौथा
भाग बराबर निर्गम रक्खे ॥४॥
क्षीरार्णवमें कहा है कि—
“प्रथमं निर्गमं कार्यं चतुर्थांशे महामुने ! ।
द्वितीय तृतीयांशेन तृतीयं च तदर्घतः ॥”
प्रथम भीट का निर्गम अपने चौथे भाग, दूसरे भिट्टका निर्गम अपने तीसरे भाग और
तीसरे भिट्टका निर्गम अपने उदय से आधा रक्खे ।