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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

प्रथमोऽध्यायः १३
शङ्कोर्नेत्रगुणे तु मण्डलवरे छायाद्वयान्मत्स्ययो-
र्जाता यत्र युतिस्तु शङ्कु तलतो याम्योत्तरे स्त* स्फुटे ॥'*
राज० अ० १ श्लो० ११
रात्रि में दिक् साधन—
सप्तर्षि और ध्रुव के बीच मे एक गज के अन्तर वाले दो तारा है जो ध्रुव के चारो
तरफ घूमते है उनको मर्कटिका कहते है। यह मर्कटिका और ध्रुव जब बराबर समसूत्र मे आवे,
तब एक अवलम्ब लटकावे और उसके सामने दक्षिण की तरफ एक दीपक रखें । यदि दीपक का
अग्र भाग, अवलंब और ध्रुव ये तीनो बराबर समसूत्र में दिखाई पड़े तो उसे उत्तर दिशा आने ।
अवलंब और दीपक के समसूत्र एक रेखा खींची जाय तो वह उत्तर दक्षिण रेखा होगी * ।
दिन मे दिक्साधन करना हो तो समतल भूमि के ऊपर बत्तीस अंगुल का एक गोल चक्र
बनावें, उसके मध्य बिन्दु पर एक बारह अंगुल के नाप का शंकु रखें । पश्चात् दिन के पूर्वार्ध
मे देखे कि शंकुकी छाया गोल मे जिस जगह प्रवेश करे, वहां एक चिह्न करे वह पश्चिम दिशा
होगी और दिन के उत्तरार्ध में जहां बाहर निकले वहा एक बिन्दु करे यह पूर्व दिशा होगी ।
पीछे पूर्व और पश्चिम की इन दोनो बिन्दुओ तक एक सरल रेखा खीची जाय तो यह पूर्व
पश्चिम रेखा होगी, इसको व्यासार्ध मान करके दो गोल बनावें, जिसे एक मत्स्य के जैसी आकृति
होगी, उसके ऊपर और नीचे के योग बिन्दु से एक सरल रेखा खीची जाय तो यह उत्तर
दक्षिण रेखा होगी । देखो नीचे का दिक्साधन चक्र—
चक्र परिचय—
बत्तीस अंगुल का 'इ उ ए' एक गोल है, उसका मध्य बिन्दु 'अ' है । उसके ऊपर बारह
अंगुल का एक शंकु रखकर दिन के पूर्वार्द्ध में देखा गया तो शंकुकी छाया गोल के 'क' बिन्दु
के पास प्रवेश करती है, यह पश्चिम दिशा जाने और दिनार्द्ध के बाद 'च' बिन्दु के पास बाहर
निकलती है, यह पूर्व दिशा जाने । इन 'क' और 'च' दोनों बिन्दु तक एक सरल रेखा खीची
जाय तो यह पूर्व पश्चिम रेखा होती है । इसको व्यासार्द्ध मान कर 'क' बिन्दु से 'च छ ज' और
दूसरा 'च' बिन्दु से 'क ख ग' ऐसे दो गोल बनावे तो पूर्व पश्चिम रेखा के ऊपर एक मछली
के जैसी आकृति हो जाती है। उसके मध्य बिन्दु 'अ' से एक सरल रेखा खीची जाय जो गोलके
दोनो स्पर्श बिन्दु से बाहर निकल जाय, यह उत्तर दक्षिण रेखा होती है ।

  • उपरोक्त प्रकार से भी वास्तविक दिशा का ज्ञान नहीं होता, क्योकि अयनाश के कारण ध्रुव का
    तारा एव कृत्तिकादि नक्षत्र ठीक दिशा मे उदय नहीं होता । जिसे आजकल नवीन आविष्कार दिक् साधन यन्त्र
    (कुतुबनुमा) से करना चाहिये ।

१४ प्रासादमण्डने
खात विधि—
नागवास्तुं समालोक्य कुर्यात् खातविधिं¹ सुधीः ।
पाषाणान्तं जलान्तं वा ततः कूर्मं निवेशयेत् ॥२४॥
प्रथम शेषनाग चक्र का विचार करके विद्वान् शिल्पी खात विधि करें। नींव को खोदने से
भूमि में पाषाण अथवा पानी निकल जाय, उसके ऊपर कूर्म (कच्छुआ) की स्थापना करें ॥२४॥
नागवास्तु—
“कन्यादौ रवितस्त्रये फणीमुखं पूर्वादि सृष्टिकमात्”
ऐसा राजवल्लभ मण्डन के अध्याय प्रथम श्लोक २२ मे कहा है कि—
कन्या, तुला और वृश्चिक राशि का सूर्य हो तब शेषनाग का मुख पूर्व दिशा मे; धन, मकर कुम्भ
राशि का सूर्य हो तब दक्षिण दिशा मे; मीन, मेष और वृष राशि का सूर्य हो तब पश्चिम दिशा
मे, मिथुन कर्क और सिंह राशि का सूर्य हो तब उत्तर मे शेषनाग का मुख रहता है।
“पूर्वास्येऽनिलखातनं यममुखे खातं शिवे कारये-
च्छीर्षे पश्चिमगे च वह्नि खननं सौम्ये खनेन्नैर्ऋते।।”
ऐसा राजवल्लभ मण्डन के अध्याय प्रथम श्लोक २४ में कहा है कि-शेषनाग का मुख
पूर्व दिशा मे हो तो वायुकोण में, दक्षिण दिशा मे हो तो ईशानकोण मे, पश्चिम दिशा मे हो तो
अग्निकोण में और उत्तर दिशा मे हो तो नैर्ऋत्य कोण मे खात करना चाहिये।
(१) वास्तुविधि

प्रथमोऽध्याय १५
ज्योतिष शास्त्र के मुहूर्त्त ग्रन्थों मे अन्य प्रकार से कहा है। मुहूर्त्त चिन्तामणि के वास्तु
प्रकरण श्लोक १६ की टीका मे विश्वकर्मा का प्रमाण देकर लिखा है कि—
"ईशानतः सर्पति कालसर्पो, विहाय सृष्टिं गणयेद् विदिक्षु ।
शेषस्य वास्तोर्मुखमध्यपुच्छं, त्रयं परित्यज्य खनेच्च तुर्यम् ॥"
शेषनाग प्रथम ईशानकोण से चलता है, उसका मुख, नाभि और पूंछ सृष्टिमार्ग को
छोड़कर विपरीत विदिशा में रहता है । अर्थात् ईशान मे मुख, वायुकोण में नाभि और नैर्ऋत्य
कोण मे पूंछ रहता है। इसलिये इन तीनों विदिशाओ को छोड़कर चौथा अग्निकोण खाली
रहता है, उसमें प्रथम खात करना चाहिये ।
राहु (नाग) मुख—
'देवालये गेहविधौ जलाश्रये, राहोर्मुखं शम्भुदिशो विलोमतः ।
मीनार्क सिंहार्कमृगार्कतस्त्रिभे, खाते मुखात् पृष्ठविदिकूशुभाभवेत् ॥'
देवालय का खात मुहूर्त्त करते समय राहु का मुख यदि मीन, मेष और वृषभ राशि का
सूर्य हो तब ईशान कोण में, मिथुन, कर्क और सिंह राशि का सूर्य हो तब वायुकोण मे, कन्या
तुला और वृश्चिक राशि का सूर्य हो तब नैर्ऋत्यकोण मे, धन, मकर और कुम्भ राशि का
सूर्य हो तब अग्निकोण मे, राहु का मुख रहता है।
घरके खात मुहूर्त्त के समय नाग का मुख सिंह कन्या और तुला राशि के सूर्य में ईशान
कोण मे, वृश्चिक धन और मकर राशि के सूर्य मे वायुकोण मे, कुम्भ मीन और मेषराशि के
सूर्य मे नैर्ऋत्यकोण मे, वृष मिथुन और कर्क राशि के सूर्य मे अग्निकोण मे राहु का मुख
रहता है।
कुंआ, बावडी, तालाब आदि जलाशयको आरंभ करते समय राहु का मुख मकर कुम्भ
और मीन राशि के सूर्य मे ईशान कोण मे, मेष वृष और मिथुन राशि के सूर्य मे वायुकोण मे,
कर्क सिंह और कन्या राशि के सूर्य मे नैर्ऋत्यकोण मे, तुला वृश्चिक और धन राशी के सूर्य मे
अग्निकोण में राहु का मुख रहता है।
जिस विदिशा में राहु का मुख हो, उसके पीछे की विदिशा मे खात करना शुभ है।
जैसे-ईशान कोण मे मुख है, तो अग्निकोण मे, वायुकोण में मुख हो तो ईशानकोण में,
नैर्ऋत्य कोण में मुख हो तो वायुकोण मे और अग्निकोण मे मुख हो तो नैर्ऋत्य कोण मे
खात करना शुभ है।*

  • राहु मुख याने नागमुख या वास्तुमुख इसमे बहुत मतान्तर है। कोई सृष्टि क्रम से और कोई
    विलोम क्रम से मानते है। विशेष जानने के लिये देखे स्वयं द्वारा अनुवादित 'राजवल्लभ मंडन ग्रंथ'।

१६ प्रासादमण्डने

कूर्ममान—
अर्धाङ्गुलो भवेत् कूर्म एकहस्ते सुरालये ।
अर्धाङ्गुला ततो वृद्धिः कार्या तिथिकरावधि ॥२५॥
एकत्रिंशत्करान्तं च तदर्धा वृद्धिरिष्यते ।
ततोऽर्धापि शतार्धान्तं कूर्मो मन्वङ्गुलोत्तमः ॥२६॥
एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद में आधे अंगुल के नाप का कूर्म ( कच्छूआ ) नींव में
स्थापित करे। दोसे पंद्रह हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके,
(दो हाथ के प्रासाद में एक अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद में डेढ़ अंगुल, चार हाथ के
प्रासाद मे दो अंगुल, इस प्रकार आधा २ अंगुल बढ़ाने से पंद्रह हाथ के प्रासाद में साढ़े सात
अंगुल के मान का कूर्म होता है)। सोलह से इकतीस हाथ के विस्तार वाले प्रासाद मे प्रत्येक
हाथ पाव २ अंगुल बढ़ा करके और बत्तीस से पचास हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ एक २
सूत बढ़ा करके नींव में स्थापित करें। इस प्रकार पचास हाथ के विस्तार वाले प्रासाद में
एक सूत कम चौदह अंगुल के मान का कूर्म होता है ॥२५-२६॥
अपराजितपृच्छा के मत से कूर्ममान—
"एकहस्ते सुरागारे कूर्मः स्याच्चतुरङ्गुलः ।
अर्धाङ्गुला भवेद् वृद्धिः प्रतिहस्तं दशावधिः ॥
पादवृद्धिः पुनः कार्याद् विंशतिहस्ततः करे ।
ऊर्ध्वं वै त्रिशद्धस्तान्तं वसुहस्तैकमङ्गुलम् ॥
ततः परं शतार्धान्तं सूर्यहस्तैकमङ्गुलम् ।
अनेन क्रमयोगेन मन्वङ्गुलः शतार्धके ॥” सूत्र ५२
एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद में कूर्म चार अंगुल के मान का, दोसे दस हाथ के
प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा कर के, ग्यारह से बीस हाथ के प्रासाद में प्रत्येक
हाथ पाव २ अंगुल बढ़ा करके, इक्कीस से तीस हाथ के प्रासाद में प्रत्येक हाथ एक २ सूत
बढा कर के और इकतीस से पचास हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ १/१२ अंगुल बढ़ा कर के
बनावे। इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद में लगभग चौदह अंगुल के मान का कूर्म होता है।
अपराजितपृच्छाके मत से दूसरा कूर्ममान—
“एकहस्ते तु प्रासादे कूर्मश्चार्धाङ्गुलः स्मृतः ।
अर्द्धवृद्धिः प्रकर्त्तव्या पञ्चदशहस्तावधिः ॥
एकत्रिंशच्च हस्तान्तं पादवृद्धिः प्रकीर्त्तिता ।
तदर्धेन 'पुनर्वृद्धि-र्मन्वङ्गुलः शतार्धके ॥” सूत्र १५३

प्रथमोऽध्यायः १७
एक हाथ के प्रासाद मे कूर्म आधा अंगुल का, दोसे पंद्रह हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक
हाथ आधा २ अगुल बढा करके, सोलह से एकतीस हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ पाव २ अंगुल
बढ़ा करके, और बत्तीस से पचास हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ एक २ सूत बढा करके बनावे।
इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद मे एक सूत कम चौदह अंगुल के मान का कूर्म होता है।
क्षीरार्णव के मत से कूर्ममान--
“शिलायाः पञ्चमांशेन कर्तव्यं कूर्ममुत्तमम् ।
सर्वालङ्कारसंयुक्तं दिव्यपुष्पैश्च पूजितम् ॥” अध्याय १०१
धारणी शिला के पाचवे भाग का कूर्म बनावे, यह उत्तम मान है। उसको सब प्रकार के
अलंकारों से युक्त करे और सुगंधित पुष्पो से पूजित करे ।
कूर्म का ज्येष्ठ और कनिष्ठ मान—
चतुर्थांशाधिको ज्येष्ठः कनिष्ठो हीनयोगतः ।
सौवर्णो रूप्यजो वापि स्नाप्यः पञ्चामृतेन स ॥२७॥
तिलैर्यवैस्तथा होम-पूर्णां चैव प्रदापयेत् ।
कूर्मका जो मान आया हो, वह मध्यम मान है, उसमे इस मान का चौथा भाग बढ़ावे
तो ज्येष्ठ मानका और चौथा भाग कम करे तो कनिष्ठ मानका कूर्म होता है। यह कूर्म सुवर्ण
अथवा चांदी का बनाना चाहिये । उसको पञ्चामृत से स्नान कराके, तथा तिल और जवो का
पूर्णा आहुति पूर्वक होम करके स्थापित करे ॥२७॥
शिला और कूर्म का स्थापन क्रम—
ईशानादग्निकोणाद्वा शिलाः स्थाप्याः प्रदक्षिणाः ॥२८॥
मध्ये कूर्मशीला पश्चाद् गीतवादित्रमङ्गलैः ।
बलिदानं च नैवेद्यं विविधाम्नं घृतप्लुतम् ॥
देवताभ्यः सुधीर्दद्यात् कूर्मन्यासे शिलासु च ॥२६॥
इति कूर्म स्थापनम् ।
प्रथम ईशान अथवा अग्नि कोने मे नंदा शिला की स्थापना करके पीछे प्रदक्षिण क्रम से
अन्य शिलाओ को स्थापित करे। पीछे मध्य मे कूर्म शिला (धारणी शिला) को स्थापित करे ।
शिला स्थापन करते समय मांगलिक गीत और वाजींत्रों का नाद करावे। वास्तु के देवों को
बलि बाकुले, नैवेद्य और अनेक प्रकार के धान्य के घृत से पूर्ण मालपूवे आदि चढावें ॥२८-२९॥
प्रा० ३

१८ प्रासादमण्डने
पुनः शिला स्थापन क्रम—
“नन्दां पुरः प्रदातव्यां शिलाः शेषाः प्रदक्षिणो ।
मध्ये च धरणी स्थाप्या यथाक्रमं प्रयत्नतः ॥” क्षीरार्णवे अध्य० १०१
प्रथम नन्दा नाम की शिला को स्थापित करे, पीछे अनुक्रम से भद्रा आदि शिलाओं को
प्रदक्षिण क्रम से स्थापित करे और मध्य मे धरणी शिला को स्थापन करे। ऐसा क्षीरार्णव
ग्रंथ मे कहा है।
शिला के नाम—
‘'नन्दा भद्रा जया रिक्ता अजिता चापराजिता ।
शुक्ला सौभाग्यिनी चैव धरणी नवमी शिला ॥” क्षीरार्णवे अ० १०१
नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता, अजिता, अपराजिता, शुक्ला और सौभाग्यिनी ये अनुक्रम से
दिशाओं की आठ शिलाओ के नाम है। नवमी धरणी नाम की शिला मध्य भाग की है।
अपराजित मत से शिला के नाम—
“नन्दा भद्रा जया पूर्णा विजया पञ्चमी शिला
मङ्गला ह्यजितापरा-जिता च धरणीभवाः ॥”
नन्दा, भद्रा, जया, पूर्णा, विजया, मंगला, अजिता, अपराजिता, ये अनुक्रम से दिशाओं
को शिला के नाम है और मध्य भाग की नववी धरणी नाम की शिला है।
धरणी शिला का मान—
“एक हस्ते तु प्रासादे शिला वेदाङ्गुला भवेत् ।
द्वयङ्गुला च भवेद् वृद्धिर्य्यावच्च दशहस्तकम् ॥
दशोर्ध्वं विंशपर्यन्तं हस्ते हस्ते चैकाङ्गुला ।
अर्द्धाङ्गुला भवेद् वृद्धिर्य्यावत्पञ्चाशद्धस्तकम् ॥
तृतीयांशे कृते पिण्डे तदर्धं रूपपातकम् ।
पुष्पाणि च यथाकारं शिलामध्ये ह्यलंकृतम् ॥” क्षीरार्णवे अ० १०१
एक हाथ के प्रासाद मे चार अंगुल की शिला, दोसे दस हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक
हाथ दो २ अगुल वढा करके, ग्यारह से बीस हाथ तक के प्रासाद में एक एक अंगुल बढ़ा करके,
और इक्कीस से पचास हाथ तक के प्रासाद मे आधा २ अंगुल बढा करके स्थापित करे । इस
प्रकार पचास हाथ के प्रासाद मे ४७ अंगुल के मान की समचोरस धरणी शिला होती है।

प्रथमोऽध्याय १६
शिला का जो समचोरस मान आवे, उसके तीसरे भाग का पिंड (मोटाई) रक्खे। पिंड के आधे
भाग मे शिला के ऊपर रूपो बनावे। तथा पुष्पकी आकृति बनावे।
ज्ञान प्रकाश दीपार्णव के मत से धरणी शिला का मान—
“एकहस्ते तु प्रासादे शिला वेदाङ्गुला भवेत् ।
षडंगुला द्विहस्ते तु त्रिहस्ते ग्रहसंख्यया ॥
द्वादशाङ्गुलं शिलामानं प्रासादे चतुर्हस्तके।
तृतीयांशोदयः कार्यो हस्ताद्याद् वेदहस्तकम् ॥
चतुर्हस्तादितः कृत्वा यावद् द्वादशहस्तकम् ।
पादोनाङ्गुला च वृद्धि-र्हस्ते हस्ते च दापयेत् ॥
सूर्यहस्तादितः कृत्वा यावच्च जिनहस्तकम् ।
अर्धाङ्गुला भवेद् वृद्धि-रुच्छ्रये तु नवाङ्गुल। ॥
चतुर्विंशादितः कृत्वा यावत् षट्त्रिंशहस्तकम् ।
पादोनाङ्गुला च वृद्धिः पिण्डं च द्वादशाङ्गुलम् ॥
षट्त्रिंशादितश्च कृत्वा यावत् पञ्चाशद्धस्तकम् ।
एकाङ्गुला भवेद् वृद्धिः पिण्डं च द्वादशाङ्गुलम् ॥” ग्र० ११
एक हाथ के प्रासाद मे शिला का मान चार अंगुल, दो हाथ मे छः अंगुल, तीन हाथ मे
नव अंगुल और चार हाथ के प्रासाद मे बारह अंगुल शिला का मान है। एक से चार हाथ
तक के प्रासाद मे शिला का जो
मान आवे, उसके तीसरे भाग
शिला की मोटाई रक्खे। पाच से
बारह हाथ तक के प्रासाद मे
प्रत्येक हाथ पौन २ अंगुल बढ़ाकर
के, तेरह से चोबीस हाथ तक के
प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा २
अंगुल बढ़ा करके बनावे। पाच से
चौबीस हाथ तक के प्रासाद मे
शिला का जो मान आवे उसकी
मोटाई नव अंगुल की रक्खे ।
पचीस से छत्तीस हाथ तक पौन २


[चित्रगत विवरण / यन्त्र-मण्डल]:

  • बाह्य आयुध/प्रतीक:
    • ऊपर: ध्वजा, गदा, त्रिशूल
    • दाएँ: वज्र, शक्ति
    • नीचे: दंड, तलवार
    • बाएँ: नागपाश
  • आन्तरिक नवकोष्ठक (३×३) मण्डल:
    • प्रथम पंक्ति: कुम्भ, सर्प, शंख
    • द्वितीय पंक्ति: सिंह, कूर्म, तरङ्ग
    • तृतीय पंक्ति: मकर, मण्डूक, मत्स्य

२० प्रासादमण्डने
अंगुल और सेतीस से पचास हाथ तक प्रत्येक हाथ एक अंगुल बढ़ा करके बनावें । उसकी
मोटाई बारह अंगुल की रक्खे। इस प्रकार समचोरस शिला का कुल मान ४७ अंगुल का
होता है।
अपराजित मत से धारणी शिला का मान—
“नवत्यङ्गुल दैर्घ्यं च पृथुत्वे चतुर्विंशतिः ।
द्वादशाङ्गुलपिण्डं च शिलामानप्रमाणतः ॥” सूत्र ४७ श्लो० १६
नव्वें अंगुल लंबी, चौवीस अंगुल चौड़ी और बारह अंगुल मोटी, यह धरणी शिला का
मान जानें।
दूसरा मत—
“एकहस्ते च प्रासादे शिला वेदाङ्गुला भवेत् ।
षडंगुला द्विहस्ते च त्रिहस्ते च ग्रहाङ्गुला ॥
चतुर्हस्ते च प्रासादे शिला स्याद् द्वादशाङ्गुला ।
तृतीयांशोदयः कार्यो हस्तादौ च युगान्ततः ॥
ततोऽपरेऽष्टहस्तान्तं वृद्धिस्त्र्यङ्गलतो भवेत् ।
पुनद्व्र्यंङ्गुलतो वृद्धिः पञ्चाशद्धस्तकावधि ॥
पादेन चोच्छ्रिता शस्ता तां कुर्यात् पङ्कजान्विताम् ॥” सूत्र १५३
एक हाथ के प्रासाद मे चार अंगुल की, दो हाथ के प्रासाद मे छह अंगुल की, तीन हाथ के
प्रासाद मे नव अगुल की और चार हाथ के प्रासाद मे बारह अंगुल की समचोरस धरणी शिला
स्थापन करना चाहिए। चार हाथ तक के प्रासाद के लिये धरणी शिला का' जो मान आया हो,
उसके तीसरे भाग शिला की मोटाई रखना चाहिये। पांच से आठ हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक
हाथ तीन तीन अंगुल और नव से पचास हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ दो दो अंगुल बढ़ा
करके बनावे । इस प्रकार पचास हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद के लिये १०८ अंगुल के
मान की धरणी शिला होती है। वह चौथे भाग मोटो रक्खें और कमल की आकृतियों से
शोभायमान बनावें।
धरणी शिला ऊपर के रूप—
“लहरं मत्स्यं मण्डूकं मकरी ग्रासमेव च ।
जलं सर्प शंखयुक्तं शिलामध्ये ह्यलङ्कृतम् ॥” क्षीरा० अ० १०१

प्रथमोऽध्याय २१
पानी की लहर, मछली, मेढक, मगर, ग्रास, जल (कलश) सर्प शंख इत्यादि रूप
बना करके शिला को सुशोभित करना चाहिये ।
कूर्मशिला के रूपो के संबंध में सूत्रधार वीरपाल विरचित बेडाया प्रासाद तिलक ग्रंथ
का अध्याय दूसरे मे लीखा है कि—
"कूर्ममानमिदं च गर्भरचनाथाग्नो शिलायां जलम्,
याम्ये मीनमुखं च नैऋर्तिदिशि स्थाप्यं तथा दर्दुरम् ।
वारुण्या मकरश्च वायुदिशि वै ग्रासश्च सौम्ये ध्वनिः,
नागं शङ्करदिक्षु पूर्वविषये कुम्भः शिलावह्नितः ॥”
कूर्म के मान की गर्भ रचना कहता है कि-अग्निकोण मे पाणी की लहर, दक्षिण मे
माछली, नैर्ऋत्य में मेढक, पश्चिम मे मगर, वायुकोण मे ग्रास, उत्तर मे शंख, ईशान मे सर्प
और पूर्व दिशा मे कुम्भ की आकृतिया बनानी चाहिये ।
शिल्पियो की मान्यता वंश परंपरा से लहर को आकृति पूर्व दिशा मे बनाने की है।
सूत्रारंभ नक्षत्र-
सूत्रारम्भो गृहादीना-मुत्तरायां करत्रये ।
ब्राह्मे पुष्ये मृगे मैत्र्ये पौष्ण्ये वासचवारुणे ॥३०॥
प्रासाद और गृह आदि का सूत्रारम तीनो उत्तरा (उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा और
उत्तराभाद्रपद), हस्त, चित्रा, स्वाति, रोहिणी, पुष्य, मृगशीर्ष, अनुराधा, रेवती, धनिष्ठा और
शतभिषा इन नक्षत्रो मे करना चाहिये ॥३०
शिला स्थापन नक्षत्र-
शिलान्यासस्तु रोहिण्यां श्रवणे हस्तपुष्ययोः ।
मृगशीर्षे च रेवत्या-मुत्तरात्रितये शुभः ॥३१॥
रोहिणी, श्रवण, हस्त, पुष्य, मृगशीर, रेवती और तीनो उत्तरा इन नक्षत्रो मे शिलाकी
स्थापना करना शुभ है ॥३१॥
देवालय का निर्माणस्थान-
नद्यां सिद्धाश्रमे तीर्थे पुरे ग्रामे च गह्वरे ।
वापी-वाटी-तडागादि-स्थाने कार्यं सुरालयम् ॥३२॥

२२ प्रासादमण्डने
नदी के तट, सिद्ध पुरुषो के निर्वाण स्थान, तीर्थभूमि, शहर गांव, पर्वत की गुफाओं मे,
बावडी, वाटिका (उपवन) और तालाव आदि पवित्र स्थानों में देवालय बनाना चाहिये ॥३२॥
प्रासाद निर्माण पदार्थ—
स्वशक्त्या काष्ठमृदिष्ट-का शैलधातुरत्नजम् ।
देवतातनं कुर्याद् धर्मार्थकाममोक्षदम् ॥३३॥
अपनी शक्ति के अनुसार काष्ठ, मिट्टी, ईंट, पाषाण, सुवर्ण आदि धातुओं और रत्न,
इन पदार्थों का देवालय बनाना चाहिये । किसी भी पदार्थ का देवालय बनाने से धर्म, अर्थ,
काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥३३॥
देव स्थापन का फल—
देवानां स्थापनं पूजा पापघ्नं दर्शनादिकम् ।
धर्मवृद्धिर्भवेदर्थः कामो मोक्षस्ततो नृणाम् ॥३४॥
देवो की स्थापना, पूजा और दर्शन करने से मनुष्यों के सब पापों का नाश होता है
तथा धर्म की वृद्धि, एवं अर्थ काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥३४॥
देवालय बनाने का फल—
कोटिघ्नं तृणजे पुण्यं मृन्मये दशसङ्गुणम् ।
ऐष्टके शतकोटिघ्नं शैलेऽनन्तं फलं स्मृतम् ॥३५॥
देवालय घास का बनाने से कोटिगुणा, मिट्टी का बनाने से दस कोटिगुणा, ईंटों का
बनाने से सौकोटिगुणा और पाषाण का बनाने से अनन्त गुणा फल होता है ॥३५॥
वास्तु पूजा का सप्त स्थान—
कूर्मसंस्थापने द्वारे पद्माख्यायां च पौरुषे ।
घटे ध्वजे प्रतिष्ठाया-मेवं पुण्याहसप्तकम् ॥३६॥
कूर्म की स्थापना, द्वार स्थापन, पद्मशिला की स्थापना, प्रासाद पुरुष की स्थापना, कलश
और ध्वजा चढाना, और देव प्रतिष्ठा, ये सात कार्य करते समय वास्तु पूजन अवश्य करना
चाहिये । यह पुण्याहसप्तक कहा जाता है ॥३६॥

प्रथमोऽध्यायः २३
शान्तिपूजा का चौदह स्थान—
भूम्यारम्भे तथा कूर्मे शिलायां सूत्रपातने ।
खुरे द्वारोच्छ्रये स्तम्भे पट्टे पद्मशिलासु च ॥३७॥
शुक्रनासे च पुरुषे घण्टायां कलशे तथा ।
ध्वजोच्छ्रये च कुर्वीत शान्तिकानि चतुर्दश ॥३८॥
भूमिका आरंभ, कूर्म न्यास, शिला न्यास और सूत्रपात (तलनिर्माण), खुर शिला
स्थापन, द्वार और स्तंभ स्थापन, पाट चढाते समय, पद्मशिला, शुकनास और प्रासाद पुरुष के
रखते समय, आमलसार, कलश चढाना, और ध्वजा चढाना, ये चौदह कार्य करते समय
शान्तिपूजा अवश्य करनी चाहिये ॥३७-३८॥
प्रासाद का प्रमाण—
एक हस्तादिप्रासादाद् यावद्धस्तशतार्धकम् ।
प्रमाणं कुम्भके मूल-नासिके भित्तिबाह्यतः ॥३९॥
एक हाथ से पचास हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का प्रमाण दीवार के बाहर
कुंभा के मूलनासक (कोणा) तक गिना जाता है ॥३९॥
मण्डोवर के थरों का निर्गम—
कुम्भादिस्थावराणां च निर्गमः समसूत्रतः ।
पीठस्य निर्गमो बाह्ये तथैव छाद्यकस्य च ॥४०॥
कुम्भा से लेकर छज्जा के तल भाग तक जितने थर बनाये जायं, ये सब थरो के निर्गम
समसूत्र मे रखने चाहिये। तथा पीठ और छज्जा का निर्गम थरो के आगे निकलता हुआ रखना
चाहिये ॥४०॥
प्रासाद के अंगों की संख्या—
त्रिपञ्चसप्तनवभिः फालनाभिर्विभाजिते ।
प्रासादस्याङ्गसंख्या च वारिमार्गान्तरस्थितिः ॥४१॥
कर्ण, प्रतिकर्ण और नन्दी आदि फालनाये तीन, पाच, सात अथवा नव संख्या तक
की जाती है, ये प्रासाद की अंग संख्या है। उन्हे वारिमार्ग के अंतराल मे (प्रासाद की दीवार
से बाहर निकलती) रखना चाहिये ॥४१॥

२४ प्रासादमण्डने
फलनाओं का सामान्य मान—
फालना कर्णतुल्या स्याद् भद्रं तु द्विगुणं मतम् ।
सामान्योऽयं विधिस्तुल्यो हस्ताङगुलविनिर्गमः ॥४२॥
इति श्री सूत्रधारमण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्रे
मिश्रलक्षणो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
सब फालनायें कोने के मान के बराबर रखनी चाहिये और भद्र कोने से दुगुना रखना
चाहिये, ऐसा सामान्य नियम है। ये सब फालनाये प्रासाद का जितने हाथ का बिस्तार हो उतने
अंगुल निकलती रखनी चाहिये ॥४२॥
इति श्रीपंडित भगवानदास जैन द्वारा अनुवादित प्रासादमण्डन के मिश्र-
लक्षण नाम के प्रथमाध्याय की सुबोधिनी नाम की भाषाटीका समाप्त ॥१॥

अथ प्रासादमण्डने द्वितीयोऽध्यायः
जगती—
विश्वकर्मोवाच—
प्रासादानामधिष्ठानं जगती सा निगद्यते ।
यथा सिंहासनं राज्ञः प्रासादस्य तथैव सा ॥१॥
प्रासाद की मर्यादित भूमि को जगती कहते है। जैसे—राजा का सिंहासन रखने के लिये
अमुक स्थान मर्यादित रखा जाता है, वैसे प्रासाद बनाने के लिये अमुक भूमि मर्यादित रक्खी
जाती है ॥१॥
अपराजितपृच्छा के सूत्र ११५ मे श्लोक ५ मे लिखा है कि—
"प्रासादो लिङ्गमृत्युक्तो जगती पीठमेव च ॥”
प्रासाद शिवलिङ्गका स्वरूप है। जैसे शिवलिङ्ग के चारों तरफ पीठिका है, वैसे ही
प्रासाद के जगतीरूप पीठिका है ।
जगती का आकार—
चतुरस्रायताष्टास्रा वृत्ता वृत्तायता तथा ।
जगती पञ्चधा प्रोक्ता प्रासादस्यानुरूपतः ॥२॥
समचोरसं, लंब चौरस, आठ कोने वाली, गोल और लंब गोल, ऐसे पांच आकार वाली
जगती है । उनमे से प्रासाद का जैसा आकार हो, वैसी जगती बनानी चाहिये ॥२॥
जगती का विस्तार मान—
प्रासादपृथुमानाच्च त्रिगुणा च चतुर्गुणा ।
क्रमात् पञ्चगुणा प्रोक्ता ज्येष्ठा मध्या कनिष्ठिका ॥३॥
प्रासाद के विस्तार के मान से तीन गुणी, चार गुणी अथवा पांच गुणी जगती बनानी
चाहिये । उनमें तीनगुणी ज्येष्ठमान की, चार गुणी मध्यममान की और पांच गुणी कनिष्ठ-
मान की जगती समझनी चाहिये ॥३॥
प्रा० ४

२६ प्रासादमण्डने
अपराजितपृच्छा सू० ११५ में भी कहा है कि—
"प्रासादपृथुमानेन द्वि ( त्रि ? ) गुणा चोत्तमा तथा ।
मध्यमा चतुर्गुणा ' याधमा पञ्चगुणोच्यते ॥"
प्रासाद के विस्तार से दुगुनी हो तो उत्तम, चार गुनी हो तो मध्यम और पांच गुनी
हो तो कनिष्ठ मान की जगती कही जाती है ।
कनिष्ठे¹ ज्येष्ठा कनिष्ठां ज्येष्ठे मध्ये च मध्यमा ।
प्रासादे जगती कार्या स्वरूपा लक्षणान्विता ॥४॥
कनिष्ठ मान के प्रासाद में ज्येष्ठमान की जगती, मध्यम मान के प्रासाद में मध्यम मान
की. और ज्येष्ठमान के प्रासाद में कनिष्ठ मान की जगती प्रासाद के स्वरूप के लक्षण वाली
बनानी । अर्थात् जिस आकार का प्रासाद हो, उसी आकार की जगती बनानी चाहिये ॥४॥
अपराजितपृच्छा में भी लिखा है कि—
“ज्येष्ठा कनिष्ठप्रासादे मध्यमे मध्यमा तथा ।
ज्येष्ठे कनिष्ठा व्याख्याता जगती मानसंख्यया ॥" सूत्र० ११५
कनिष्ठमान के प्रासाद में ज्येष्ठमान की, मध्यममान के प्रासाद में मध्यममान की और
ज्येष्ठमान के प्रासाद में कनिष्ठ मान की जगती रखनी चाहिये ।
रससप्तगुणाख्याता जिने पर्यायसंस्थिते ।
द्वारिकायां च कर्त्तव्या तथैव पुरुषत्रये ॥५॥
पंच कल्याणक ( च्यवन, जन्म, दीक्षा, ज्ञान और मोक्ष ) वाले अथवा देवकुलिका वाले
जिन प्रासाद में, द्वारिका प्रासाद में और त्रिपुरुष ( ब्रह्मा, विष्णु और शिव ) के प्रासाद में
छहगुणी अथवा सातगुणी जगती रखनी चाहिये ॥५॥
मण्डप की जगती—
मण्डपानुक्रमेणैव सपादांशेन सार्धतः ।
द्विगुणा चायता कार्या सहस्रायतने² विधिः ॥६॥
मंडप के अनुक्रम से सवायी, डेढ़ी अथवा दुगुनी लंबी जगती करनी चाहिये । हजारों
प्रासादों में यही विधि है ॥६॥
(१) कन्यसे कन्यसा ज्येष्ठा", मुद्रित पुस्तकद्वये । (२) 'स्वहस्तायतने' ।

द्वितीयोऽध्याय ३७
भ्रमणी (परिक्रमा)—
त्रिद्व्येकभ्रमसंयुक्ता ज्येष्ठा मध्या कनिष्ठिका¹ ।
उच्छ्रायस्य त्रिभागेन भ्रमणीनां समुच्छ्रयः ॥७॥
जगती मे तीन भ्रमणी (परिक्रमा) हो तो ज्येष्ठा, दो भ्रमणी हो तो मध्यमा और एक
भ्रमणी हो तो कनिष्ठा जगती कहा जाता है। यह भ्रमणी की ऊंचाई जगती की ऊंचाई के
तीसरे २ भाग की होनी चाहिये ॥७॥
"कनिष्ठे भ्रमणी चैका मध्यमे भ्रमणीद्वयम् ।
ज्येष्ठे तिस्रो भ्रमण्यश्च साङ्गोपाङ्गिकसङ्ख्यया ॥" अप० सूत्र० ११५
कनिष्ठ प्रासाद हो तो एक भ्रमणी, मध्यम प्रासाद हो तो दो भ्रमणी, और ज्येष्ठ प्रासाद
हो तो तीन भ्रमणी अपने अंगोपांग वाली बनानी चाहिये ।
जगती के कोने—
चतुष्कोणैस्तथा सूर्य-कोणैर्विंशतिकोणकैः ।
अष्टाविंशति-षट्त्रिंशत्-कोणैः स्युः पञ्च फालनाः ॥८॥
चार कोने वाली, बारह कोने वाली, बीस कोने वाली, अट्ठाईस कोने वाली और
छत्तीस कोने वाली, ये पांच प्रकार के कोने वाली जगती है ॥८॥
जगती की ऊंचाई का मान—
प्रासादाद्धार्कहस्तान्ते त्र्यंशा द्वाविंशतिकरे ।
द्वात्रिंशे चतुर्थांशा भूतांशोच्चा शताद्धके ॥६॥
एक से बारह हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की जगती प्रासाद के अर्ध भाग की ऊंची
बनावें। तेरह से बाईस हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की जगती प्रासाद के तीसरे भाग की,
तेईस से बत्तीस हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की जगती चौथे भाग की, और तैंतीस से पचास
हाथ के प्रासाद की जगती पांचवे भाग की ऊंची बनानी चाहिये ॥६॥
पुनः—
एकहस्ते करेणोच्चा सार्द्ध द्वयंशाश्चतुष्करे ।
सूर्यजैनशताद्धान्तं क्रमाद् द्वित्रियुगांशकैः ॥१०॥
(१) 'कनीयसी' ।

एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की जगती एक हाथ, दो-हाथ के प्रासाद की जगती
डेढ़ हाथ, तीन हाथ के प्रासाद की जगती दो हाथ, चार हाथ के प्रासाद की जगती ढाई हाथ
ऊंची बनावे। पीछे पाँच से बारह हाथ तक के प्रासाद की जगती दूसरे भाग की अर्थात् प्रासाद
से आधी, तेरह से चौबीस हाथ के प्रासाद की जगती तीसरे भाग और पचीस से पचास हाथ
तक के प्रासाद की जगती चौथे भाग जितनी ऊंची बनावें ॥१०॥
(यह अपराजितपृच्छा का मत है। देखें सूत्र ११५ श्लोक २३ से २६)
जगती के उदय का थर मान—
तदुच्छ्रयं भजेत् प्राज्ञ-स्त्वष्टाविंशतिभिः पदैः ।
त्रिपदो जाड्यकुम्भश्च द्विपदं कर्णकं तथा ॥११॥
पद्मपत्रसमायुक्ता त्रिपदा शिरःपत्रिका¹ ।
द्विपदं खुरकं कुर्यात् सप्तभागं च कुम्भकम् ॥१२॥
कलशस्त्रिपदः प्रोक्तो भागेनान्तरपत्रकम् ।
कपोतालिस्त्रिभागा च पुष्पकण्ठो युगांशकः ॥१३॥
पुष्पकाज्जाड्यकुम्भस्य निर्गमश्चाष्टभिः पदैः ।
कर्णेषु च दिशांपालाः प्राच्यादिषु प्रदक्षिणाः ॥१४॥
जगती के उदय के अट्ठाईस भाग करे। उनमे से तीन भाग का जाड्यकुम्भ, दो
की कर्णिका (कणी), तीन भाग का पद्मपत्र (दासा) सहित ग्रासपट्टी, दो भाग का खुरा,
सात भाग का कुम्भ, तीन भाग का कलश, एक भाग का अंतरपत्र, तीन भाग की कपोताली
(केवाल) और चार भाग का पुष्पकंठ बनावे। पुष्पकंठ से जाड्यकुम्भ का निर्गम आठ भाग
रक्खे। जगती के कोने में पूर्वादि सृष्टि क्रम से दिक्पालों को स्थापित करना चाहिये ॥११ से १४॥
जगती के आभूषण—
प्राकारैर्मण्डिता कार्या चतुर्भिर्द्वारमण्डपैः ।
मकरैर्जलनिष्कासैः सोपानैस्तोरणादिभिः ॥१५॥
जगती को किलों से शोभायमान करें, अर्थात् जगती के चारो तरफ किला बनावें । तथा
चारों दिशाओं में मण्डप वाले चार द्वार बनावे। पानी निकलने के लिये मगर के मुख वाली
नाली रक्खे। एवं सीढ़ियां और तोरणों से शोभायमान जगती बनायें ॥१५॥
(१) शीर्षपत्रिका ।

द्वितीयोऽध्यायः २६
जगती का उदय और उसके थरों का दिग्दर्शन—
• वामनदेवालय
नरपीठ
गजपीठ
कपोती
ग्रासपट्टी
कपोतिका
अन्तरपत्र
कलशो
कुंभो
खुरो
जगती उदय भाग २८
जगती मण्डप
तोरण
जगती द्वार
जगती का द्वार और द्वार मंडप तथा जगती के ऊपर प्रासाद की महापीठ

३८ : प्रासादमण्डने
मण्डपाग्रे प्रतोल्‍यग्रे सोपानं शुण्डिकाकृतिम् ।
तोरणं कारयेत्¹ तस्य पदपदानुसारतः² ॥१६॥
मण्डप के आगे और प्रतोली (पोले) के आगे सीढियाँ बनावें, इसके दोनों तरफ हाथी
की आकृति रक्खे। प्रत्येक पद के अनुसार तोरण बनावे ॥१६॥
तोरणस्योभयस्तम्भ-विस्तारं गर्भमानतः ।
भित्तिगर्भप्रमाणेन सम्मानेन³ वा भवेत् ॥१७॥ -
तोरण के दोनों स्तंभ के मध्य का विस्तार प्रासाद के गर्भगृह के मान से, अथवा दीवार
के गर्भमान से, अथवा प्रासाद के मान से रखा जाता है ॥१७॥
वेदिका पीठरूपा च शोभाभिर्बहुभिर्युता ।
विचित्रं तोरणं कुर्याद् दोला देवस्य तत्र च ॥१८॥
यह जगतीरूप वेदिका प्रासाद की पीठरूप है, इसलिये इसे अनेक प्रकार के रूपों तथा
तोरणों से शोभायमान बनाना चाहिये। तोरणों के झूलों में देवों की आकृतियां बनावें ॥१८॥
देवके वाहन का स्थान--
प्रासादाद्वाहनस्थाने करणीया चतुष्किका ।
एकद्वित्रिचतुःपञ्च-रससप्तपदान्तरे ॥१९॥
देवों के वाहन रहने के स्थान पर चौकी बनावें। यह चौकी प्रासाद से एक, दो, तीन,
चार, पाच, छह अथवा सात पद जितनी दूर बनावें ॥१९॥
देवके वाहन का उदय--
अर्चायामे⁴ नवांशे तु पञ्चषट्सप्त भागिकः ।
गुह्यनाभिस्तनान्तं वा त्रिविधो वाहनोदयः ॥२०॥
मूर्त्ति के उदय का नव भाग करे। उनमे से पांच, छह अथवा सात भाग के मान का
वाहन का उदय रख। अथवा गुह्य, नाभि या स्तन पर्यन्त वाहन का उदय रक्खे। ये तीन २
प्रकार के वाहन का उदय कहा गया है ॥२०॥
(१) 'त्रिविध कुर्यात्' (२) 'पट्ट पट्टानुसारतः'। (३) 'तयोर्मध्येऽथवा भवेत्'। (४) 'अर्चाया नवमांशे तु,'

द्वितीयोऽध्याय ३१
देवके वाहन का दृष्टिस्थान—
पादं जानु कटिं याव-दर्चाया वाहनस्य दृक् ।
वृषस्य विष्णुभागान्ते सूर्ये व्योमस्तनान्तकम् ॥२१॥
मूत्ति के चरण, जानु अथवा कमर पर्यन्त ऊंचाई में वाहन की दृष्टि रखनी चाहिये ।
वृषभ (नन्दी) की दृष्टि शिवलिंग के विष्णु भाग तक और सूर्य के वाहन (घोडा) की दृष्टि
मूत्ति के स्तनभाग तक रखनी चाहिये ॥२१॥
अपराजितपृच्छा में कहा है कि—
"वृषस्य चोच्छ्रयः कार्यो विष्णुभागान्तदृष्टिकः ॥-
पादं जानु कटिं याव-दर्चाया वाहनस्य दृक् ।
गुह्यनाभिस्तनान्तं वा सूर्ये व्योमस्तनान्तिकम् ॥
विलोमे कुरुते पीडा-मधोदृष्टिः सुखक्षयम् ।
स्थानं हन्यादूर्ध्वदृष्टिः स्वस्थाने मुक्तिदायिकां ॥" सूत्र० २०८
वृषभ की ऊंचाई शिवलिंग के विष्णुभाग तक दृष्टि रहे, इस प्रकार रखे । देवो के
वाहन की दृष्टि उनके चरण, जानु अथवा कटि तक रहे तथा गुह्य नाभि और स्तन तक दृष्टि रहे,
इस प्रकार ऊंचाई रखे । इससे विपरीत रखने से दुख होवेगा । उपरोक्त मान से नीची दृष्टि
रहने पर सुख का क्षय होगा और यदि ऊंची दृष्टि ही रहेगी, तो, स्थान भ्रष्ट होगा । इसलिये
कहे हुए अपने २ स्थान मे दृष्टि रखने से मुक्तिपद मिलता है।
जिन प्रासाद के मंडपों का क्रम—
जिनाग्रे समोसरणं शुकाग्रे गूढमण्डपः ।
गूढस्याग्रे¹ चतुष्किा तदग्रे नृत्यमण्डपः ॥२२॥
जिन प्रासाद के आगे समवसरण बनाना । शुकनास (कंवलीमण्डप) के आगे गूढ मण्डप,
इसके आगे चौकी मंडप और इसके आगे नृत्यमडप बनाने चाहिये ॥२२॥
जिनप्रासाद में देवकुलिकाका क्रम—
द्विसप्तत्या द्विषष्टौर्वा चतुर्विंशतितोऽपि वा ।
जिनालये चतुर्दिक्षु सहितं जिनमन्दिरम् ॥२३॥
ऐसा जिनमन्दिर बनाना चाहिये की जिनप्रासाद के चारो तरफ बहत्तर, बावन अथवा
चौबीस देवकुलिकाये हो ॥२३॥
(१) 'तस्याग्रे षट्त्रिका वा च' ।

३२ प्रासादमण्डने
परमजैन ठक्कुर 'फेरूं' विरचित वत्थुसारपयरण के तीसरे प्रकरण में देवकुलिका का
क्रम बतलाया है। जैसे-
बावन जिनालय-
"चउतीसं वाम दाहिण नव पुट्ठि अट्ठ पुरओ अ देहरयं ।
मूलपासाय एगं; बावन्नजिनालये एवं ॥"
जिनप्रासाद के बायीं और दाहिनी ओर सत्रह २, पीछे के भाग में नौ और आगे आठ,
ऐसे इकावन देवकुलिका और एक मुख्य प्रासाद मिलकर कुल बावन जिनालय कहा जाता है।
बहत्तर देवकुलिका-
"पणवीसं पणवीसं दाहिणवामेसु पिट्ठि इग्गारं ।
दह अग्गे नायव्वं इअ बंहत्तरि जिणिदालं ॥"
जिनप्रासाद के बांयी और दाहिनी ओर पच्चीस २, पीछे की तरफ ग्यारह और आगे
की तरफ दस, ऐसे इकहत्तर देवकुलिका और एक मुख्य प्रासाद मिलकर कुल बहत्तर जिनालय
कहा जाता है।
चौबीस देवकुलिका-
"अग्गे दाहिण वामे अट्ठट्ठजिणिदगेह चउवीसं ।
मूलसिलागाउ कमं पकीरए जगइ-मज्झम्मि ॥"
मुख्य जिनप्रासाद के आगे, दाहिनी और बायी ओर, ऐसे तीन दिशा में आठ २
देवकुलिका बनाने से कुल चौबीस जिनालय कहा जाता है। ये सब देवकुलिकाएं जगती के
प्रान्त (सरहद) भाग मे की जाती है।
मण्डपाद् गर्भसूत्रेण वामदक्षिणयोर्दिशोः ।
अष्टापदं प्रकर्त्तव्यं त्रिशाला वा बलाणकम् ॥२४॥
मुख्य जिनप्रासाद के गूढ मंडप की बायीं और दाहिनी ओर अष्टापद, त्रिशाला अथवा
वलाणक बनावे। (सामने भी बलाणक बनाया जाता है) ॥२४॥
रथ और मठ का स्थान-
अपरे रथशाला च मठं याम्ये प्रतिष्ठितम् ।
उत्तरे रथरन्ध्रं च प्रोक्तं श्रीविश्वकर्मणा ॥२५॥
देवालय के पीछे की तरफ रथशाला, दक्षिण मे मठ (धर्मगुरु का स्थान) और उत्तर मे
रथ का प्रवेश द्वार बनावें। ऐसा विश्वकर्मा ने कहा है ॥२५॥