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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६७
रत्नसंजयप्रासाद के भद्र के ऊपर चौथा एक उरुशृंग अधिक चढाने से धर्मद नामका
प्रासाद होता है, वह नगर मे धर्म को बढाने वाला है ॥६३॥
शृंगसंख्या-कोणे १०८ प्रतिरथे ११२, कोणी पर ८, नंदी पर ८, भद्रे १६ प्रत्यंग ८,
एक शिखर कुल २६१ शृंग । तिलक पूर्ववत् २० ।
विभक्ति तेरहवीं ।
२५-विमलवलभप्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विंशतिभाजिते ।
पदेन त्रयभागेन कर्णस्तत्र विधीयते ॥६४॥
तद्वज्ज्ञेयः प्रतिकर्णः कोणिका नन्दिका पदा ।
भद्रार्धं तु चतुर्भागं निर्गमं भागमेव च ॥६५॥
समनिर्गमं रथं ज्ञेयं कर्तव्यं चतुरो दिशि ।
कर्णे शृङ्गद्वयं कार्यं प्रतिकर्णे १द्वयमेव च ॥६६॥
नन्दिका कोणिकायां च शृङ्गकूटं सुशोभितम् ।
भद्रे चैवोरुचत्वारि चाष्टौ प्रत्यङ्गानि च ॥६७॥
विमलवलभनामोऽयं प्रासादो विमलप्रियः ।
इति विमलजिनवल्लभप्रासादः ॥२१॥
समचोरस भूमि का चौबीस भाग करे । उन मे तीन भाग का कोण, तीन भाग का
प्रतिकर्ण, कोणिका और नदिका एक एक भाग, और चार भाग का भद्रार्ध बनावें । भद्र का
निर्गम एक भाग रखें । रथ और कर्ण का निर्गम समदल रखे । कोणे के ऊपर तीन शृंग,
प्रतिकर्ण के ऊपर दो शृंग, नदिका और कोणिका के ऊपर एक एक शृंग और एक एक
कूट, भद्र के ऊपर चार उरुशृंग और आठ प्रत्यंग चढावे । यह विमलजिनवल्लभ नामका
प्रासाद विमलजिन को प्रिय है ॥६४ से ६७॥
शृंगसंख्या-कोणे १२, प्रतिरथे १६, कोणी पर ८, नंदी पर ८, भद्रे १६, प्रत्यंग ८, एक
शिखर कुल ६६ शृंग । कूट १६ ।
२६-मुक्तिदप्रासाद—
तद्रूपे च प्रकर्त्तव्यो रथे तिलकं दापयेत् ॥६८॥
१. 'तथैव च ।'

१६८ प्रासादमण्डने
कर्णिकायां च द्वे शृङ्गे प्रासादो जिनवल्लभः ।
मुक्तिदो नाम विज्ञेयो भुक्तिमुक्तिप्रदायकः ॥६६॥
इति मुक्तिदप्रासादः ॥२६॥
विमलजिनवल्लभ नाम के प्रतिरथ ऊपर एक एक तिलक और दोनों नंदीयों के ऊपर
कूट के बदले शृंग चढावे । जिससे मुक्तिद नामका प्रासाद होता है, यह जिनदेव को प्रिय है
और वैभवादि भोगसामग्री और मुक्ति को देने वाला है ॥६६॥
शृंग संख्या—कोणे १२, प्रतिरथे १६, कोणो पर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग
८, एक शिखर, कुल ८५, शृंग और तिलक ८ प्रतिरथ पर ।
विभक्ति चौदहवीं ।
२७-अनन्तजिनप्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे विंशतिपदभाजिते ।
त्रीणि त्रीणि ततस्त्रीणि नन्दी पदेति भद्रके ॥७०॥
निर्गमं पदमानेन त्रिषु स्थानेषु भद्रके ।
कर्णे क्रमत्रयं कार्यं रथोर्ध्वे तत्समं भवेत् ॥७१॥
भद्रे चैवोरुचत्वारि नन्दिकायां क्रमद्वयम् ।
अनन्तजिनप्रासादो धनपुण्यश्रियं लभेत् ॥७२॥
इत्यनन्तजिनप्रासादः ॥२७॥
प्रासाद की समचोरस भूमिका बीस भाग करें । उनमे तीन भाग का कोना, तीन भाग
का उपरथ, तीन भाग का भद्रार्ध और भद्रनन्दी एक भाग जानें । इन अंगों का निकाला एक
भाग का रक्खे । कोण और रथ ऊपर तीन तीन क्रम, भद्र के ऊपर चार उरुशृंग और भद्र
नन्दी के ऊपर दो क्रम चढ़ावे । ऐसा अनन्तजिनप्रासाद धन, पुण्य और लक्ष्मी को देने
वाला है ॥७० से ७२॥
शृंग संख्या--कोणे १०८, प्ररथे २१६, नंदी पर ११२, भद्रे १६, एक सिखर, कुल
४५३ शृंग ।
२८-सुरेन्द्रप्रासाद—
अनन्तस्य सस्थाने रथोर्ध्वे तिलकं न्यसेत् ।
सुरेन्द्रो नाम विज्ञेयः सर्वदेवेषु वल्लभः ॥७३॥
इति सुरेन्द्रनामप्रासादः ॥२८॥

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६६
अनन्तजिन प्रासाद के प्ररथ के ऊपर एक २ तिलक चढाने से सुरेन्द्र नाम का प्रासाद
होता है, यह सर्व देवो के लिए प्रिय है ॥७३॥
शृंग संख्या—पूर्ववत् ४५३ और तिलक ८ प्ररथे ।
विभक्ति पन्द्रहवीं ।
२९—धर्मनाथजिनप्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चाष्टाविंशतिभाजिते ।
कर्णं रथं च भद्रार्धं युगभागं विधीयते ॥७४॥
निर्गमं तत्प्रमाणेण द्विभागा नन्दीकोशिका ।
केसरी सर्वतोभद्रं रथे कर्णै च दापयेत् ॥७५॥
तदूर्ध्वं तिलकं देयं सर्वशोभान्वितं कृतम् ।
नन्दिका कर्णिकायां च शृङ्गोर्ध्वं शृङ्गमुत्तमम् ॥७६॥
भद्रे चैवोरुचत्वारि चाष्टौ प्रत्यङ्गानि च ।
धर्मदो नाम विख्यातः पूरे धर्मविवर्धनः ॥७७॥
इति धर्मनाथजिनप्रासादः ॥२९॥
प्रासाद को समचोरस भूमि का अट्ठावीस भाग करे । उनमे चार भाग का कोण, चार
भाग का प्ररथ, चार भाग का भद्रार्ध, एक भाग की कोणी, और एक भाग की भद्रनंदी
बनावें । ये सब अंग समदल रक्खें । कोण और प्ररथ के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र ये
दो क्रम चढावे और उसके ऊपर शोभायमान एक एक तिलक चढावे । कोणी और नन्दी के
ऊपर दो दो शृंग चढावे । भद्र के ऊपर चार उरुशृंग और आठ प्रत्यंग चढावे । ऐसा धर्म
को देने वाला धर्मद नाम का प्रासाद नगर मे धर्म को बढाने वाला है ॥७४ से ७७॥
शृंग संख्या—कोणे ५६, प्ररथे ११२, कोणी पर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग,
८ एक शिखर, कुल २२५ शृंग और तिलक ४ कोणे और ८ प्ररथे कुल १२ ।
३०—धर्मवृक्षप्रासाद—
तद्रूपे तत्प्रमाणे च कर्त्तव्यः सर्वकामदः ।
रथोर्ध्वं च कृते शृङ्गे धर्मवृक्षोऽयं नामतः ॥७८॥
इति धर्मवृक्षप्रासादः ॥३०॥

२०० प्रासादमण्डने
धर्मनाथ प्रासाद के प्ररथ के ऊपर तिलक के बदले में एक एक शृंग चढ़ाने से धर्मवृक्ष
नाम का प्रासाद होता है ॥६८॥
शृंग संख्या—कोणे ५६.प्ररथे १२०, कोणी पर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग ८,
एक शिखर, कुल २३३ और तिलक ४ कोणे ।
विभक्ति सोलहवीं ।
३१-शान्तिजिन अथवा श्रीलिंग प्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वादशांशविभाजिते ।
कर्णे भागद्वयं कार्यः प्रतिकर्णस्तथैव च ॥७९॥
भद्रार्धे सार्धभागेन नन्दिका चार्धभागिका ।
कर्णे क्रमद्वयं कार्यं प्रतिकर्णे तथैव च ॥८०॥
नन्दिकायां शृङ्गकूट-मुरुशृङ्गाणि द्वादश ।
शान्तिनामश्च विज्ञेयः सर्वदेवेभ्यः कारयेत् ॥८१॥
श्रीलिङ्गं च तदा नाम श्रीपतिषु सुखावहः ।
इति शान्तिवल्लभः श्रीलिङ्गप्रासादः ॥३१॥
प्रासाद की समचोरस भूमिका बारह भाग करें । उनमें दो भाग का कोण, दो भाग का
प्रतिकर्ण, डेढ भाग का भद्रार्ध और आधे भाग की भद्रनंदी करें । कोण और प्रतिकर्ण के
ऊपर दो दो क्रम, भद्रनंदी के ऊपर एक शृंग और एक कूट, चारों भद्रों के ऊपर बारह उरु-
शृंग चढावें । ऐसा शांति नामका प्रासाद जानें, यह सब देवों के लिये बनावें । इसका दूसरा
नाम श्रीलिङ्ग प्रासाद है, वह विष्णु के लिये सुखदायक है ॥७९ से ८१॥
शृंगसंख्या—कोणे ५६, प्ररथे ११२ भद्रनंदी पर ८, भद्रे १२, एक शिखर, कुल १८९
शृंग और ८ कूट नंदो पर ।
३२-कामदायक प्रासाद—
उरुशृङ्गं पुनर्द्यात् प्रासादः कामदायकः ॥८२॥
इति कामदायकः ॥३२॥
शांतिनाथ प्रासाद के भद्र के ऊपर एक उरुशृंग अधिक चढ़ाने से कामदायक प्रासाद
होता है ॥८२॥
शृंग संख्या—भद्रे १६ बाकी पूर्ववत कुल—१९३ शृंग ।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्याय' २०१
विभक्ति सत्रहवीं ।
३३-कुंथुजिनवल्लभ कुमुदप्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चाष्टभागविभाजिते ।
कर्णः स्यादेकभागश्च प्रतिकर्णस्तथैव च ॥८३॥
नन्दिका चैव भागार्धा त्रिपदं भद्रविस्तरम् ।
निर्गमं पदमानेन स्थापयेच्च चतुर्दिशि ॥८४॥
कर्णे च केसरीं दद्यात् तदूर्ध्वे तिलकं न्यसेत् ।
तत्सदृशं प्रतिकर्णे नन्द्यां तु तिलकं न्यसेत् ॥८५॥
भद्रे च शृंगमेकं तु कुमुदो नाम नामतः ।
वल्लभः सर्वदेवानां जिनेन्द्रकुंथुवल्लभः ॥८६॥
इति कुंथुनाथवल्लभः कुमुदप्रासादः ॥३३॥
प्रासाद को समचोरस भूमिका आठ भाग करे। उनमे कोण और प्रतिकर्ण एक एक
भाग का, भद्रार्ध डेढ भाग और भद्रनन्दी आधा भाग बनावे। भद्र का निर्गम एक भाग
रक्खे, इस प्रकार चारो दिशा मे व्यवस्था करें । कोण और प्रतिकर्ण के ऊपर एक एक केसरी
शृंग और उसके ऊपर एक एक तिलक चढावे । भद्रनन्दी के ऊपर तिलक और भद्र के ऊपर
एक उरुशृंग चढावें । यह कुमुदनामका प्रासाद सर्वदेवो को और कुंथुजिनदेव को
वल्लभ है ॥८३ से ८६॥
शृंगसंख्या—कोणे २०, प्ररथे ४०, भद्रे ४, एक शिखर, कुल ६५ शृंग । तिलक संख्या—
कोणे ४, प्ररथे ८, और नन्दी पर ८, कुल २० तिलक ।
३४-शक्तिदप्रासाद—
तद्रूपं च प्रकर्त्तव्यं रथे तिलकं दापयेत् ।
शक्तिदो नाम विज्ञेयः श्रीदेवीषु सुखावहः ॥८७॥
इति शक्तिदप्रासादः ॥३४॥
कुमुदप्रासाद के प्ररथ के ऊपर एक २ तिलक अधिक बढ़ाने से शक्तिद नाम का प्रासाद
होता है । वह लक्ष्मीदेवी को सुखकारक है ॥८७॥
शृंगसंख्या—पूर्ववत् ६५ और तिलक-कोणे ४, प्ररथे १६, नन्दी पर ८ कुल २८ ।
प्रा० २६

२०२ प्रसादमण्डने
३५-हर्षणप्रासाद—
कर्णोर्ध्वे भृङ्गं दातव्यं प्रासादो हर्षणस्तथा ।
इति हर्षणप्रासादः ॥३५॥
शक्तिद प्रासाद के कोणो के ऊपर एक २ शृंग अधिक चढ़ाने से हर्षण नामका प्रासाद
होता है ।
शृंगसंख्या—कोणो २४, प्र रथे ४०, भद्रे ४, एक शिखर, कुल ६९ शृंग । तिलक
पूर्ववत् २८ ।
३६-भूषणप्रासाद—
कर्णोर्ध्वे तिलकं दद्यात् प्रासादो भूषणस्तथा ॥८८॥
इति भूषणप्रासादः ॥३६॥
हर्षणप्रासाद के कोणो के ऊपर एक तिलक अधिक चढावे तो भूषण नामका प्रासाद
होता है ॥८८॥
शृंगसंख्या—पूर्ववत् ६९ और तिलक ३२ ।
विभक्ति अठारहवीं ।
३७-अरनाथजिनवल्लभ-कमलकन्दप्रासाद—
चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे चाष्टभागविभाजिते ।
कर्णो द्विभागिको ज्ञेयो भद्रार्धं च द्विभागिकम् ॥८९॥
कर्णो च शृङ्गमेकं तु केसरीं च निधीयते ।
भद्रे चैवोद्गमः कार्यो जिनेन्द्रे चारनाथके ॥९०॥
इति त्वं विद्धि भो वत्स ! प्रासादो जिनवल्लभः ।
कमलकन्दनामोऽयं जिनशासनमार्गतः ॥९१॥
इति अरनाथजिनवल्लभः कमलकन्दप्रासादः ॥३७॥
प्रासाद की समचोरस भूमिका आठ भाग करें। उनमें दो भाग का कोण और दो भाग
का भद्रार्ध बनावें । कोणो के ऊपर एक २ केसरी शृंग चढ़ावें और भद्र के ऊपर उद्गम बनावें ।
ऐसा अरनाथ जिन के लिये कमलकन्द नाम का प्रासाद हे वत्स ! तूं जान ॥८९ से ९१॥
शृङ्गसंख्या—कोणो २०, एक शिखर, कुल २१ शृंग ।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २०३
३८-श्रीशैलप्रासाद—
कर्णौ च तिलकं ज्ञेयं श्रीशैल ईश्वरप्रियः ।
इति श्रीशैलप्रासादः ॥३८॥
कमलकन्द प्रासाद के कोणे के ऊपर एक २ तिलक भी चढ़ाने से श्रीशैल नाम का
प्रासाद होता है, वह ईश्वर को प्रिय है।
शृंगसंख्या—पूर्ववत् २१ और तिलक ४ कोणे ।
३६-अरिनाशन प्रासाद—
भद्रे चैवोरुचत्वारि प्रासादस्त्वरिनाशनः ॥६२॥
इत्यरिनाशनप्रासादः ॥३६॥
श्रीशैलप्रासाद के भद्र के ऊपर एक २ उरुशृंग चढाने से अरिनाशन नामका प्रासाद
होता है ॥६२॥
शृंगसंख्या—कोणे २०, भद्रे ४, एक शिखर, कुल २५ शृंग और तिलक ४ कोणे ।
विभक्ति उन्नीसवीं ।
४०-श्रीमल्लिजिनवल्लभ-महेन्द्रप्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वादशपदभाजिते ।
कर्णो भागद्वय कार्यः प्रतिरथश्च सार्धकः ॥६३॥
सार्धभागकं भद्रार्धं चार्धं नन्दीद्वयं भवेत् ।
कर्णो क्रमद्वयं कार्यं प्रतिरथे तथैव च ॥६४॥
द्वादश उरुशृङ्गाणि स्थापयेच्च चतुर्दिशि ।
महेन्द्रनामः प्रासादो जिनेन्द्रमल्लिवल्लभः ॥६५॥
इति मल्लिजिनवल्लभो महेन्द्रप्रासाद. ॥४०॥
प्रासाद की समचोरस भूमिका बारह भाग करे । उनमे दो भाग का कोण, डेढ़ भागका
प्रतिरथ, डेढ़ भागका भद्रार्ध, कर्णानंदी और भद्रनन्दी आधे २ भाग की करे । प्रतिरथ और
कोणे के ऊपर केसेरी और सर्वतोभद्र, ये दो क्रम और भद्र के ऊपर बारह उरुशृग चढावे ।
ऐसा महेन्द्र नामका प्रासाद मल्लिजिनेन्द्र को वल्लभ है ॥६३ से ६५॥
शृंगसंख्या—कोणे ५६, प्ररथे ११२, भद्रे १२, एक शिखर, कुल १८१ शृंग ।

२०४ प्रासादमण्डने
४१-मानवेन्द्रप्रासाद—
रथोर्ध्वे तिलकं दद्यान्मानवेन्द्रोऽथ नामतः ।
इति मानवेन्द्रप्रासादः ॥४१॥
महेन्द्रप्रासाद के प्रतिरथ के ऊपर एक २ तिलक भी चढ़ावें तो मानवेन्द्र नामका प्रासाद
होता है। शृंगसंख्या पूर्ववत् १८१ और तिलक ८ प्ररथे ।
४२-पापनाशनप्रासाद—
कर्णोर्ध्वे तिलकं दद्यात् प्रासादः पापनाशनः ॥६६॥
इति पापनाशनप्रासादः ॥४२॥
मानवेन्द्रप्रासाद के कोणे के ऊपर एक २ तिलक भी चढ़ावें तो पापनाशन नामका
प्रासाद होता है ॥६६॥
शृंगसंख्या पूर्ववत् १८१ । तिलक-कोणे ४, और प्ररथे ८ कुल १२ तिलक ।
विभक्ति बीसवीं ।
४३-मानतुष्टि नामका मुनिसुव्रतप्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्दशविभाजिते ।
बाहुद्वयं रथं कर्णं भद्रार्धं त्रयमांगिकम् ॥६७॥
श्रीवत्सं केसरीं देयं कर्णो रथे क्रमद्वयम् ।
द्वादशैवोरुभृङ्गाणि स्थापयेच्च चतुर्दिशि ॥६८॥
मानसतुष्टिनामोऽयं प्रासादो मुनिसुव्रतः ।
इति मानसतुष्टि नाम मुनिसुव्रतप्रासादः ॥४३॥
प्रासाद की समचोरस भूमिका चौदह भाग करे । उनमें दो भागका कोण, दो भागका
प्ररथ और तीन भागका भद्रार्ध करे । कोण और प्ररथ के ऊपर केसरी और श्रीवत्स ये दो क्रम
चढ़ावे । तथा भद्र के ऊपर कुल बारह उरुशृंग चढ़ावें । ऐसा मानसतुष्टि नामका मुनिसुव्रत
प्रासाद है ॥६७-६८॥
शृंगसंख्या-कोणे २४, प्ररथे ४८, भद्रे १२, एक शिखर, कुल ८५ शृंग ।
४४-मनोल्याचन्द्रप्रासाद—
तद्रूपे रथे तिलकं मनोल्याचन्द्रो नामतः ॥६६॥
इति मनोल्याचन्द्रप्रासादः ॥४४॥

or "कोणे"? "कोणे ५६".

Line 28:
कोणे ४ प्ररथे ८ कुल १२ तिलक ।
Wait, does it say "कोणे ४ प्ररथे ८ कुल १२ तिलक ।"?
Yes: "कोणे ४ प्ररथे ८ कुल १२ तिलक ।"

Everything is verified and matches the printed page precisely.अथ जितेन्द्रप्रासादाध्यायः २०५
मानसतुष्टिप्रासाद के प्ररथ के ऊपर एक २ तिलक चढावे तो मनोल्याचन्द्र नामका
प्रासाद होता है ॥६६॥
शृंगसंख्या पूर्ववत् ८५ और तिलक ८ प्ररथे ।
४५-श्रीभवप्रासाद—
मनोल्याचन्द्रसंस्थाने कर्णे न्यसेत् द्विकेसरीम् ।
श्रीभवनामो विज्ञेयः कर्त्तव्यश्च त्रिमूर्त्तये ॥१००॥
इतिश्रीभवनामप्रासादः ॥४५॥
मनोल्याचंद्र प्रासाद के कोणे के ऊपर शृंगो के बदले मे दो केसरी शृंग चढावे
तो श्रीभवनामका प्रासाद होता है। वह त्रिमूर्त्ति (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) के लिये
बनावे ॥१००॥
शृंगसंख्या—कर्ण ४०

२०६ प्रासादमण्डने
विभक्ति इक्कीसवीं B ।
४७-सुमतिकीर्त्तिप्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे षड्विंशपदभाजिते ।
कर्णौ भागाश्च चत्वारः प्रतिकर्णास्तथैव च ॥१०४॥
भद्रं दिग्भागिकं ज्ञेयं चतुर्दिक्षु व्यवस्थितम् ।
कर्णे क्रमत्रयं कार्यं प्रतिकर्णे क्रमद्वयम् ॥१०५॥
द्वादशैवोरुशृङ्गाणि प्रत्यङ्गानि द्वात्रिंशकम् ।
मन्दिरं प्रथमं कर्म सर्वतोभद्रमेव च ॥१०६॥
केसरीं तृतीयं कर्म ऊर्ध्वे मञ्जरी शोभिता ।
सुमतिकीर्त्तिनामोऽयं नमिनाथस्य वल्लभः ॥१०७॥
इति नमिजिनवल्लभः सुमतिकीर्त्तिप्रासादः ॥४७॥
प्रासाद की समचोरस भूमिका छब्बीस भाग करें। उनमें चार भाग का कोण, चार
भाग का प्ररथ और दस भाग का पूरा भद्र करें। कोणो के ऊपर तीन क्रम, प्ररथ के ऊपर
दो क्रम, भद्र के ऊपर कुल बारह उरुशृंग और बत्तीस प्रत्यंग चढ़ावें । उसके ऊपर शिखर
शोभायमान करे, ऐसा सुमतिकीर्त्ति नामका प्रासाद श्रीनमिनाथ जिनको प्रिय है ॥१०४ से १०७॥
शृंगसंख्या—कोणे १५६, प्ररथे ११२, भद्रे १२, प्रत्यंग ३२, एक शिखर, कुल ३१३
शृंग। यदि प्ररथ के ऊपर मंदिर और सर्वतोभद्र ये दो क्रम रखा जाय तो शृंगसंख्या—
कोणे १५६, प्ररथे २७२, भद्रे १२, प्रत्यंग ३२, एक शिखर, कुल ४७३ शृंग।
४८-सुरेन्द्रप्रासाद—
तद्रूपे च प्रकर्त्तव्यो रथे शृङ्गं च दापयेत् ।
सुरेन्द्र इति नामायं प्रासादः सुरवल्लभः ॥१०८॥
इति सुरेन्द्रनामप्रासादः ॥४८॥
सुमतिकीर्त्ति प्रासाद के प्ररथके ऊपर एक शृंग अधिक चढ़ावे तो सुरेन्द्र नामका प्रासाद
होता है, वह देवो को प्रिय है ॥१०८॥
शृंगसख्या—कोणे १५६, प्ररथे २८०, भद्रे १२, प्रत्यंग ३२, एक शिखर कुल ४८१
शृंग।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २०७
४९-राजेन्द्रप्रासाद—
तद्रूपे च प्रकर्त्तव्य उरुशृङ्गाणि¹ षोडश ।
पूजनाल्लभते राज्यं स्वर्गे चैवं महीतले ॥१०९॥
इति राजेन्द्रप्रासादः ॥४९॥
सुरेन्द्रप्रासाद के भद्रके ऊपर बारह के बदले सोलह उरुशृंग चढ़ाने से राजेन्द्र नामका
प्रासाद होता है । उसका पूजन करने से पृथ्वी के ऊपर और स्वर्ग मे राज्य प्राप्त होता
है ॥१०९॥
शृंगसंख्या—भद्रे १६ बाकी पूर्ववत्, कुल ४८५ शृंग ।
विभक्ति बाईसवीं ।
५०-नेमेन्द्रेश्वर प्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वाविंशपदभाजिते ।
बाहुरिन्दुयुग्मरूप-द्वीन्दुभागाः क्रमेण च ॥११०॥
भद्रार्थं च द्वयं भागं स्थापयेत्तु चतुर्दिशि ।
केसरीं सर्वतोभद्रं कर्णयो चैवं क्रमद्वयम् ॥१११॥
केसरीं तिलकं चैव रथोर्ध्वे तु प्रकीर्त्तितम् ।
कर्णिकानन्दिकायां च शृङ्गं च तिलकं न्यसेत् ॥११२॥
भद्रे चैवोरुचत्वारि प्रत्यङ्गानि च षोडश ।
नेमेन्द्रेश्वरनामोऽयं प्रासादो नेमिवल्लभः ॥११३॥
इति नेमेन्द्रेश्वरप्रासादः ॥५०॥
प्रासाद की समचोरस भूमिका बाईस भाग करे । उनमे दो भाग का कोणा, एक भागकी
कोणी, दो भागका प्रतिकर्ण, एक भाग कोणी, दो भाग का उपरथ, एक भागकी नन्दी और
दो भाग का भद्रार्थ रक्खे । कोणे के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र, ये दो क्रम, प्रतिकर्ण और
उपरथ के ऊपर केसरी क्रम और एक तिलक, कोणी और नंदियो के ऊपर एक शृंग और
एक तिलक, भद्र के ऊपर चार २ उरुशृंग, और सोलह प्रत्यग चढावे । ऐसा नेमेन्द्रेश्वर
नाम का प्रासाद श्री नेमिनाथजिनदेव को प्रिय है ॥११० से ११३॥
१. 'उरुशृङ्गं च पञ्चमम्' । पाठान्तरे ।

२०८ प्रासादमण्डने
शृंग संख्या—कोणे ५६, कोणीपर ८, प्ररथे ४०, कोणीपर ८, ऊपरथे ४०, नंदी
पर ८, भद्रे १६, प्रत्यंग १६, एक शिखर कुल १६३ शृंग। तिलक संख्या—प्ररथे ८, ऊपरथे ८,
कर्णनंदी पर ८, प्ररथनंदी पर ८, भद्रनदी पर ८, कुल ४० तिलक ।
५१-यतिभूषणप्रासाद—
तत्तुल्यं तत्प्रमाणं च रथे शृङ्गं च दापयेत् ।
वल्लभः सर्वदेवानां प्रासादो यतिभूषणः ॥११४॥
इति यतिभूषणप्रासादः ॥५१॥
नेमेद्रेश्वर प्रासाद के प्ररथ और उपरथ ऊपर के तिलक के बदले एक एक शृङ्ग चढाने
से यतिभूषण नाम का प्रासाद होता है, वह सब देवों को प्रिय है ॥११४॥
शृंगसंख्या—प्ररथे ४८, उपरथे ४८ बाकी पूर्ववत् कुल २०६ शृंग। तिलक कुल २४
तीनों नन्दी पर ।
५२-सुपुष्पप्रासाद—
तद्रूपं तत्प्रमाणं च रथे दद्याच्च केसरीम् ।
सुपुष्पो नाम विज्ञेयः प्रासादः सुरवल्लभः ॥११५॥
इति सुपुष्पनामप्रासादः ॥५२॥
यतिभूषण प्रासाद के प्ररथ और उपरथ ऊपर के शृंग के बदले में एक एक केसरी
क्रम चढाने से सुपुष्प नामका प्रासाद होता है। वह देवों को प्रिय है ॥११०५॥
शृंग सङ्ख्या—परथे ८०, ऊपरथे ८० बाकी पूर्ववत् कुल २७३ शृंग। तिलक २४ पूर्ववत्
विभक्ति तेईसवीं ।
५३-पार्श्ववल्लभप्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे 'षड्विंशपदभाजिते ।
कर्णात्तु गर्भपर्यन्तं विभागानां तु लक्षणम् ॥११६॥
वेदरूषगुणोन्द्वो२ भद्रार्धं तु चतुष्पदम् ।
श्रीवत्सं केसरीं चैव रथे कर्णो च दापयेत् ॥११७॥
१. 'अष्टविंशति भाजिते' । पाठान्तरे । २. 'द्वय' ।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २०६
कर्णिकायां ततः शृङ्ग-मष्टौ प्रत्यङ्गानि च ।
भद्रे चैवोरुचत्वारि प्रासादः पार्श्ववल्लभः ॥११८॥
इति श्री पार्श्ववल्लभप्रासाद ॥५३॥
प्रासाद की समचोरस भूमिका छब्बीस भाग करे । उन मे
चार भाग का कोण, एक भाग की कोणी, तीन भाग का प्रतिरथ,
एक भाग की नन्दी और भद्रार्ध चार भाग का रखे । कोण और
प्ररथ के ऊपर एक एक केसरीक्रम और एक एक श्रीवत्सशृंग
चढावें । कोणी और नन्दी के ऊपर एक एक शृंग चढावे । आठ
प्रत्यङ्ग और भद्र के ऊपर चार चार उरुशृंग चढावें । ऐसा
पार्श्वनाथवल्लभ नाम का प्रासाद है ॥११६ से ११८॥
शृङ्ग संख्या—कोणे २४, प्ररथे ४८, भद्रे १६ कोणी
पर ८, नंदी पर ८, प्रत्यग ८, एक शिखर कुल ११३ शृंग ।
५४-पद्मावतीप्रासाद—
कर्णों च तिलकं दद्यात् प्रासादस्तत्स्वरूपकः ।
पद्मावती च नामेति प्रासादो देवीवल्लभः ॥११९॥
इति पद्मावतीप्रासादः ॥५४॥
पार्श्ववल्लभ प्रासाद के कोणे के ऊपर एक एक तिलक भी
चढावे तो पद्मावती नामका प्रासाद होता है । यह देवी को
प्रिय है ॥११९॥
शृंग संख्या पूर्ववत् ११३ । तिलक ४ कोणे के पर ।
५५-रूपवल्लभप्रासाद—
तद्रूपं च प्रकर्त्तव्यं प्रतिकर्णों कर्णसादृशम् ।
जिनेन्द्रायतनं चैव प्रासादो रूपवल्लभः ॥१२०॥
इति रूपवल्लभप्रासादः ॥५५॥
पद्मावती प्रासाद के प्ररथ के ऊपर भी एक एक तिलक
चढावे तो रूपवल्लभनामका जिनेन्द्रप्रासाद होता है ॥१२०॥
शृंग संख्या—पूर्ववत् ११३ । तिलक १२ । चार कोणे और आठ प्ररथे ।
प्रा० २७

२१० प्रासादमण्डने
विभक्ति चौबीसवीं ।
५६-वीरविक्रम-महीधरप्रासाद-
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विंशतिभाजिते ।
कर्णस्त्रिभागिको ज्ञेयः प्रतिकर्णश्च तत्समम् ॥१२१॥
कर्णिका नन्दिका भागा भद्रार्धं च चतुष्पदम् ।
श्रीवत्सं केसरीं चैव सर्वतोभद्रमेव च ॥१२२॥
रथे वर्गे च दातव्य-मष्टौ प्रत्यङ्गानि च ।
भद्रे चैवोरुचत्वारि कर्णिकायां शृङ्गोत्तमम् ॥१२३॥
वीरविक्रमनामोऽयं प्रासादो जिनवल्लभः ।
महीधरश्च नामायं पूजिते फलदायकः ॥१२४॥
इति श्री महावीरजिनवल्लभो वीरविक्रमप्रासादः ॥५३॥
प्रासाद की समचोरस भूमिका चौबीस भाग करें। उनमें
कोण और प्रतिकर्ण तीन तीन भाग, कोणी और नन्दी एक एक
भाग और भद्रार्ध चार भाग रखे । कोण और प्ररथ के ऊपर
केसरी और सर्वतोभद्र ये दो क्रम और एक श्रीवत्सशृंग चढावें,
भद्र के ऊपर चार उरुशृंग, तथा कोणी और नंदी के ऊपर एक
श्रीवत्सशृंग और आठ प्रत्यंग चढावे । ऐसा वीरविक्रम नाम का
प्रासाद जिनदेव को प्रिय है ॥१२१ से १२४॥
शृंगसंख्या-कोणे ६०, प्ररथे १२०, प्रत्यंग ८, भद्रे १६,
कोणी पर ८ नंदी पर ८, एक शिखर, कुल २२१ शृंग ।
५७-अष्टापदप्रासाद-
तद्रूपे च प्रकर्त्तव्ये कर्णोर्ध्वे तिलकं न्यसेत् ।,
अष्टापदश्च नामायं प्रासादो जिनवल्लभः ॥१२५॥
इत्यष्टापदप्रासादः ॥५४॥
वीर विक्रम प्रासाद के कोणे के ऊपर एक एक तिलक भी चढावें तो अष्टापद नामका
प्रासाद होता है । वह जिनदेव को प्रिय है ॥१२५॥
शृंग संख्या-पूर्ववत् २२१ । तिलक-४ कोणे के ऊपर ।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २११
५८-तुष्टिपुष्टिदप्रासाद—
तद्रूपं च प्रकर्त्तव्य - मुरुशृङ्गं च पञ्चमम् ।
तुष्टिपुष्टिदनामोऽयं प्रासादो जिनवल्लभः ॥१२६॥
इति तुष्टिपुष्टिदप्रासादः ॥५५॥
अष्टापदप्रासाद के भद्र के ऊपर चार के बदले पाच उरुशृंग चढावे तो तुष्टिपुष्टिद
नामका प्रासाद होता है। वह जिनदेव को प्रिय है ॥१२६॥
शृंग संख्या—भद्रे २० बाकी पूर्ववत् कुल २२५ शृंग और तिलक ४ कोणे
जिनप्रासाद प्रशंसा—
प्रासादाः पूजिता लोके विश्वकर्मणा भाषिताः ।
चतुर्विंशविभक्तीनां जिनेन्द्राणां विशेषतः ॥१२७॥
उपरोक्त विश्वकर्मा ने कहे हुए चौवीस विभक्ति के जिनेन्द्रदेवो के प्रासाद विशेष
प्रकार से पूजनीय हैं ॥१२७॥
चतुर्दिशि चतुर्द्वाराः पुरमध्ये सुखावहाः ।
भ्रमाश्च विभ्रमाश्चैव प्रशस्ताः सर्वकामदाः ॥१२८॥
चारो दिशाओ मे द्वारवाले अर्थात् चार द्वारवाले, भ्रमवाले अथवा बिना भ्रम के जिनेन्द्र
प्रासाद नगर मे हो तो प्रजा को सुख देने वाले है । तथा प्रशस्त हैं और सब इच्छित फल को
देने वाले है ॥१२८॥
शान्तिदाः पुष्टिदाश्चैव प्रजाराज्यसुखावहाः ।
अश्वैर्गजैर्बलियानै-र्महिषीनन्दीभिस्तथा ॥१२६॥
सर्वश्रियमाप्नुवन्ति स्थापिताश्च महीतले ।
जिनेन्द्रदेवो के प्रासाद शान्ति देने वाले है। पुष्टि देनेवाले और राजा प्रजा को सुख
देनेवाले है। एवं इस पृथ्वी के ऊपर जिनेन्द्र देवो के प्रासाद स्थापित करने से घोडे, हाथी, बैल,
भैस और गाय आदि की सब सम्पत्तियो को देनेवाले हैं ॥१२६॥
नगरे ग्रामे पुरे च प्रासादा ऋषभादयः ॥१३०॥
जगत्या मण्डपैर्युक्ताः क्रीयन्ते वसुधातले ।
सुलभं दीयते राज्यं स्वर्गे चैवं महीतले ॥१३१॥

२१२ प्रासादमण्डने
नगर, ग्राम और पुरके मध्य में जगती और मंडप वाले ऋषभ आदि जिनप्रासाद पृथ्वी-
तल मे किया जाता है। जिसे स्वर्ग और पृथ्वी मे राज्य प्राप्ति सुलभ होती है ॥१२० से १३१॥
दक्षिणोत्तरमुखाश्च प्राचीपश्चिमदिङ्मुखाः।
वीतरागस्य प्रासादाः पुरमध्ये सुखावहाः ॥१३२॥
इति श्री विश्वकर्मकृतज्ञानप्रकाशदीपार्णवे वास्तुविद्यायां
जयपृच्छता जिनप्रासादाधिकारः समाप्तः ॥
दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम, इन, चारों दिशा के मुख वाले वीतराग देव के
प्रासाद नगर मे हो तो सुख कारक है ॥१३२॥
इति पं० भगवानदास जैन कृत ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के वास्तु-
विद्या के जिनप्रासादाधिकार की सुबोधिनी नाम्नी
भाषाटीका समाप्ता ।

इस ग्रंथ में आये हुये शब्दों का सार्थ अकारादि क्रम ।
अ
अंश पु. विभाग, गंड ।
अंग्र तन न. द्वार का भाग ।
अघोर पुं. उपरूप नाम के घर का देव
अङ्क न. नवकी संख्या, चिह्न ।
अङ्कित वि० चिह्न किया हुवा ।
अङ्गूल न. इंच, प्रामत ।
अङ्घ्रि पु. पैर, चरण, अनुपांय ।
अजिता स्त्री नींवकी पांचवी शिला का नाम ।
अञ्जिना स्त्री गर्भग्रह के आगे १ भाग के मान की खोली
का नाम ।
अण्डक न. शृंग, शिखर, आमलसार, कलश का
पेट, ईंडा ।
अदिति पु. वास्तु देवता का नाम ।
अद्रि पु. पर्वत, सात की संख्या
अधिष्ठान न. पाथार, जगती
अनन्त पु. ब्याघात के १ भाग के उदयवाला गुंबज ।
अनिल पु. वायु, वास्तुदेव ।
अनुग पु. पहरा, कोने के समीप का दूसरा कोना ।
अन्तरपत्र न. कलश और केवाण ये दोनों घरों के बीच
मन्तर ।
अन्तराल न. देवों मन्तरपण, मन्तर ।
अन्धकारिका स्त्री. परिक्रमा, प्रदक्षिणा ।
अन्धारिका स्त्री. ऐसी द्वार का शब्द ।
अपराजित न. सूत्रसंतान गुणकीर्ति का रचा हुवा
वास्तुशिल्प का बड़ा ग्रंथ ।
अपराजिता स्त्री. नींव की छठी शिला का नाम ।
अमृतोद्भव पु. केसरी जाति का आठना प्रासाद ।
अभिषेक पु. देवों का मंत्र पूर्वक स्नान ।
अम्बर पु. शिखरकी ग्रीवाका देव ।
अयुत न. दस हजार की संख्या ।
अर्क पु. सूर्य, बारह की संख्या ।
अर्कतनया स्त्री. यमुना देवी ।
अर्चन न. पूजा ।
अर्चा स्त्री. देवमूर्ति ।
अर्धचन्द्र पु. प्रासाद की देहली के आगे की अर्द्धगोल
आकृति, शखावटो, मडल विशेष.
अर्यमन् पु. वास्तुदेव, सूर्य, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र ।
अलिन्द पु. बरामदा, दालान ।
अवलम्ब पु. ओलंभा, रस्सी के बधा हुया लोहे का छोटा
सा लट्टू, जिसको शिल्पिवर्ग बाध काम करते
समय अपने पास रखता है ।
अव्यक्त वि. अप्रकाशित, अंधकार मय, अघटित
शिवलिंग ।
अश्वमेध पु यज्ञविशेष का नाम ।
अश्वत्थ पु. ब्रह्मपीपला, पीपल ।
अश्विन् पु. अश्विनीकुमारदेव, अर्द्धचन्द्र के देव
अष्टादश वि. अठारह की संख्या ।
अष्टापद पु चारो दिशामे आठ आठ सीडीवाला पर्वत ।
अष्टास्रक पु आठ कोना वाला स्तंभ
असुर पु. वास्तु देव ।
अस्र पु. कोना, हद ।
आ
आकाश न. वास्तुदेव, गुंबज का देव ।
आगार न. देवालय, घर, स्थान ।
आदित्य पु वास्तुदेव, सूर्य ।
आद्यसूत्रधार पु. विश्वकर्मा ।
आप पु वास्तुदेव, पानी ।
आपवत्स पु. वास्तुदेव ।
आमलसार पु. शिखर के स्कंध के ऊपर कुंभार के
चाक जैसा गोल कलश ।
आमलसारिका स्त्री. आमलसार के ऊपर की चक्रिका
के ऊपर की गोल आकृति ।

( २१४ )
आय पु. संज्ञा विशेष जिसे गृहादि शुभाशुभ देखा जाता
जाता है, आठ की संख्या, लाभ ।
आयत वि लंबाई ।
आयतन न. देवालय, देवो की पंचायतन ।
आरात्रिक न. आरती ।
आर्द्रा स्त्री. छट्ठा नक्षत्र ।
आलय पु. वासस्थान, घर, देवालय ।
आसनपट्ट पु. बैठने का आसन, तकीया ।
इ ई
इन्दु पु. चद्रमा, एक की संख्या ।
इन्द्र पु. पूर्वदिशा का स्वामी, दिक्पाल, वास्तुदेव,
उद्गम घर का देव ।
इन्द्रकील न. स्तंभिका जो ध्वजा दंड को मजबूत रखने
के लिये साथ रखा जाता है ।
इन्द्रजय पु. वास्तुदेव
इन्द्रनील पु. केसरी जाति का तेरहवां प्रासाद, रत्न
विशेष ।
इन्द्रवारुणी स्त्री. बडी इन्द्रफला ओषधि ।
इन्द्रांश पु संज्ञाविशेष जो इमारती काम मे देखा
जाता है ।
इषु पु. पाच की संख्या, बाण.
इष्टका } स्त्री. ईंट
इष्टिका }
ईश पु. नंदी घर का देव, वास्तुदेव, ईशान कोना का
दिक्पाल, महादेव ।
ईश्वर पु. शिखर का देव, महादेव ।
ईश्वरी स्त्री. ओषधि विशेष, शिवलिङ्गी ।
उ ऊ
उच्छ्राय पु. ऊंचाई
उत्क्षिप्त न. गुंबज का ऊंचा उठा हुआ चंदोवा, छत ।
उत्तरंग न. द्वारशाखा के ऊपर का मथाला ।
उत्तरा स्त्री. उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा और उत्तरा-
भाद्रपद ये तीनो नक्षत्र ।
उत्तानपट्ट पु. बड़ा पाट ।
उत्सेध पु. ऊंचाई ।
उदक न. पानी, जल ।
उदच् अो. उत्तरदिशा ।
उदुम्बर न. द्वारशाखा का नीचला भाग देहली ।
उद्गम पु. प्रासाद के दीवार का आठवां थर जो सीडी
के आकार वाला है ।
उद्भिन्न पु. चार प्रकार के जातिकी आकृति वाली छत,
छत का एक भेद ।
उद्भिन्ना स्त्री. सातवी संवरणा ।
उपग्रह पु. नक्षत्रों की एक संज्ञा ।
उपरथ पु. कोने के पास का तीसरा कोना ।
उरुमञ्जरी स्त्री. उरुशृंग
उरुशृङ्ग } न. शिखर के भद्र ऊपर चढायें
उरःशृङ्ग } हुए शृंग
ऊर्ध्व त्रि. ऊंचाई, ऊपर,
ऊर्ध्वार्चा स्त्री. खड़ी मूर्ति ।
ऋ
ऋक्ष न. नक्षत्र, २७ की संख्या ।
ऋत्विज पु. यज्ञ करने वाले, यज्ञ दीक्षित।
ए ऐ
एकादश त्रि. ग्यारह की संख्या ।
ऐरावत पु. केसरी जाति का २१ वां प्रासाद ।
क
कङ्गु न. धान्य विशेष, कांग ।
कटि स्त्री. कमर, शरीर का मध्य भाग ।
कराक न. करणी, जाड्यकुंभ के ऊपर का थर ।
कणापीठ न. जाड्यकुंभ और करणी ये दो थरवाली
प्रासाद की पीठ
कणाली स्त्री. करणी नामका थर
कदाचन अ. कभी ।
कनीयस् त्रि. छोटा, लघु ।
कन्या स्त्री. छठी राशिका नाम ।
कपिली स्त्री. कवली, कोली, शुकनास के दोनो तरफ
शिखर के आकार वाला मंडप ।

( २१५ )
कपोताली } स्त्री. प्रासाद के दीवार का पाचवा थर,
कपोतिका } केवल थर ।
कर पु. हस्तनक्षत्र, हाथ ।
करोटक पु. गुंबज ।
कर्ण न. कोना, पट्टी, सिंहकर्ण ।
कर्णक न. कणी, जो थरो के ऊपर नीचे पट्टी रखी
जाती है ।
कर्णगूठ पु. छीपा हुआ कोना, बद कोना ।
कर्णदर्दरिका स्त्री. गुंबज के उदय मे नीचला थर ।
कर्णसिंह पु. प्रासाद के कोने पर रखा हुआ सिंह ।
कर्णाली स्त्री. कणी, जाड्यकुंभा के ऊपर का थर ।
कर्णिका स्त्री. थरो के ऊपर नीचे की पट्टी, छोटा
कोना, कोणा और प्ररथ के बीच मे कोणी की
फालना ।
कर्म न. समूह वाचक, शृंगो का समूह ।
कलश पु. मडोवर का तीसरा थर, शिखर के ऊपर
रखा हुआ कलश ।
कलशाण्डक न. कलश का पेट ।
कला स्त्री. रेखा विशेष, सोलह की सख्या ।
कलास्र पु. सोलह कोना ।
कपाय पु. ओषधि विशेष ।
कास्य न. कासा, धातु विशेष ।
कामदपीठ न. गज आदि हथयरा से रहित पीठ ।
कारा स्त्री. जेल
काल पु वासुदेव, समय ।
कालन्दी स्त्री. यमुना देवी ।
काष्ठ न. लकडी ।
किसुर पु. किन्नरदेव, पुष्ठकंठ के देव ।
कीर्त्तिवक्त्र न. ग्रासमुख ।
कीर्त्तिस्तंभ पु. विजयस्तम, तोरणवाले स्तम ।
कीलक न. कील, खूटा
कुज पु मगनग्रह ।
कुञ्चिता स्त्री. प्रासाद के डैण्ट भाग के मान की कोली
कुण्ड न. यज्ञकुण्ड, जलकुण्ड ।
कुबेर पु. उत्तर दिशा का दिक्पाल ।
कुंभ पु. मंडोवर का दूसरा थर, कलश ।
कुंभिका स्त्री. स्तंभ के नीचे की कुंभी ।
कुलतिलका स्त्री. पाचवी सवरणा ।
कूटच्छाद्य न. छज्जा ।
कूर्म पु सोना चादी का कछुआ, जो नीव मे रखा
जाता है ।
कूर्म्मशिला स्त्री. कछुए के चिह्नवाली धारणी शिला ।
केसरित् पु. पाच शृंगवाला प्रासाद ।
कैलास पु. केसरी जाति का ग्यारहवा और वैराज्य
जाति का ठारहवा प्रासाद ।
कोटर पु-न. पोलाण ।
कोटि स्त्री करोड सख्या, रेखा की एक भुजा
कोट् पु. किला, दुर्ग ।
कोल न. गुबज के उदय मे गजतालु थर के ऊपर का
थर ।
कोविद पु पंडित, ज्ञानी ।
कोष्ठागार न. कोठार ।
क्षण न. खड, विभाग ।
क्षिति स्त्री. पाटका देवता, पृथ्वी ।
क्षितिवल्लभ पु वैराज्य जातिका सोलहवा प्रासाद ।
क्षिप्त न. लटकती हुई छत ।
क्षीर न. दूध ।
क्षीरार्णव पु. समुद्र, वास्तुग्रन्थ विशेष.
क्षेत्र न. प्रासादतल ।
क्षेत्रपाल पु अमुक मर्यादित भूमिका देव ।
क्षोभणा स्त्री. कोनी
ख
खण्ड पु विभाग, मजिल, खड ।
खर पु छट्ठा ग्राय.
खरशिला स्त्री. जगती के दाशा के ऊपर और भीट
के नीचे बनी हुई प्रासाद को धारण करनेवाली
शिला ।
खल्वशाखा स्त्री. द्वार की नव शाखाओ मे चोथी और
आठवी शाखा ।
खात न. मकान की नीव ।

( २१६ )
खुर } पु. प्रासाद की दीवार का प्रथम थर
खुरक } खुरा.
ग
गगारक न. देहली के आगे अर्द्धचंद्राकृति के दोनो
तरफ की फूलपत्ति वाली आकृति ।
गंज पु. सातवां आय, गजथर ।
गजतालु न. गुंबज के उदय में रूपकंठ के ऊपर का थर ।
गजदन्त न. हाथी दांत की आकृतिवाला मंडल ।
गजधर पु. देवालय और मकान आदि बनाने वाला
शिल्पी ।
गणेश पु. गणपति ।
गण्डान्त पु. तिथि नक्षत्र आदि की संधि का समय
गन्धमादन पु. वैराज्यजातिका बीसवां प्रासाद ।
गन्धमादिनी स्त्री. बीसवी संवरणा ।
गन्धर्व पु. वास्तुदेव ।
गन्धर्वा स्त्री. नवशाखाओ मे दूसरी और पांचवी शाखा ।
गरुड पु. केसरी जाति का तेइसवां प्रासाद ।
गर्भ पु. गर्भगृह ।
गह्वर न. गुफा ।
गान्धर्व पु. केवाल थर का देव ।
गान्धारी स्त्री. चार शाखावाला द्वार ।
गिरि पु. वास्तुदेव, पर्वत ।
गुणा पु. तीन की संख्या, रस्सी, डोरी ।
गुरु पु. बृहस्पति, पांचवा ग्रह ।
गुह पु. कार्तिक स्वामी ।
गूढ पु. गूढमंडप, दीवार वाला मंडप ।
गृह न. घर, मकान ।
गृहक्षत पु वास्तुदेव
गृहित् पु. घरका मालिक ।
गेह न. घर, गर्भगृह ।
गोधूम पु. गेहूॅ. धान्य विशेष ।
गोपुर न. किला के द्वार ऊपर का मकान ।
गोमेद न. गोमूत्र के रंग का रत्न विशेष ।
गौरितिलक न. मंडल विशेष ।
ग्रन्थि स्त्री, गांठ ।
ग्रह पु. नवकी संख्या ।
ग्रास पु. जलचर प्राणी विशेष ।
ग्रासपट्टी स्त्री. ग्रास के मुखवाला दासा ।
ग्रीवा स्त्री. शिखर का स्कंध और आमलसार के नीचे
का भाग ।
ग्रीवापीठ न. कलश के नीचे का गला ।
घ
घट पु. कलश, आमलसार ।
घण्टा स्त्री. कलश, आमलसार ।
घण्टिका स्त्री. छोटी आमलसारिका, संवरणा के कलश ।
घृत न. घी ।
च
चण्ड पु. महादेव का गणदेव, यह शिवंलिग की जलाधारी
के नीचे स्थापित किया जाता है, जिसे स्नात्र-
जल उसके मुख मे जाकर बाहर गिरता है,
यह स्नात्रजल पीछे दोष कर्त्ता नहीं रहता ।
चण्डिका स्त्री. देवी विशेष ।
चतुरस्र वि. समचोरस ।
चतुर्दश सं. चौदह की संख्या ।
चतुष्किका स्त्री. चौकी मंडप ।
चत्वर न, चौक, चाररस्ता, यज्ञ स्थान ।
चन्द्र पु. द्वारशाला का देव, चंद्रमा ।
चन्द्रशाला स्त्री. खुली छत ।
चन्द्रावलोकन न. खुला भाग ।
चन्द्रिका स्त्री. आमलसार के ऊपर औंधे कमल की
आकृतिवाला भाग ।
चम्पका स्त्री. दशवी संवरणा.
चरकी स्त्री. वास्तुचक्र के ईशान कोण की देवी ।
चरभ न. सरलग्न ।
चापाकार न. धनुष के आकार वाला मंडल ।
चार पु. जिसमे पाव पाव भाग सोलह वार बढाया
जाता है, ऐसी संख्या ।
चित्रकूटा स्त्री. ठारहवी संवरणा ।
चित्रा स्त्री. चौदहवा नक्षत्र ।
चिन्तारमन् पु. आठवां व्यय ।