प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २०३
३८-श्रीशैलप्रासाद—
कर्णौ च तिलकं ज्ञेयं श्रीशैल ईश्वरप्रियः ।
इति श्रीशैलप्रासादः ॥३८॥
कमलकन्द प्रासाद के कोणे के ऊपर एक २ तिलक भी चढ़ाने से श्रीशैल नाम का
प्रासाद होता है, वह ईश्वर को प्रिय है।
शृंगसंख्या—पूर्ववत् २१ और तिलक ४ कोणे ।
३६-अरिनाशन प्रासाद—
भद्रे चैवोरुचत्वारि प्रासादस्त्वरिनाशनः ॥६२॥
इत्यरिनाशनप्रासादः ॥३६॥
श्रीशैलप्रासाद के भद्र के ऊपर एक २ उरुशृंग चढाने से अरिनाशन नामका प्रासाद
होता है ॥६२॥
शृंगसंख्या—कोणे २०, भद्रे ४, एक शिखर, कुल २५ शृंग और तिलक ४ कोणे ।
विभक्ति उन्नीसवीं ।
४०-श्रीमल्लिजिनवल्लभ-महेन्द्रप्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वादशपदभाजिते ।
कर्णो भागद्वय कार्यः प्रतिरथश्च सार्धकः ॥६३॥
सार्धभागकं भद्रार्धं चार्धं नन्दीद्वयं भवेत् ।
कर्णो क्रमद्वयं कार्यं प्रतिरथे तथैव च ॥६४॥
द्वादश उरुशृङ्गाणि स्थापयेच्च चतुर्दिशि ।
महेन्द्रनामः प्रासादो जिनेन्द्रमल्लिवल्लभः ॥६५॥
इति मल्लिजिनवल्लभो महेन्द्रप्रासाद. ॥४०॥
प्रासाद की समचोरस भूमिका बारह भाग करे । उनमे दो भाग का कोण, डेढ़ भागका
प्रतिरथ, डेढ़ भागका भद्रार्ध, कर्णानंदी और भद्रनन्दी आधे २ भाग की करे । प्रतिरथ और
कोणे के ऊपर केसेरी और सर्वतोभद्र, ये दो क्रम और भद्र के ऊपर बारह उरुशृग चढावे ।
ऐसा महेन्द्र नामका प्रासाद मल्लिजिनेन्द्र को वल्लभ है ॥६३ से ६५॥
शृंगसंख्या—कोणे ५६, प्ररथे ११२, भद्रे १२, एक शिखर, कुल १८१ शृंग ।