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सर्वकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६६
अनन्तजिन प्रासाद के प्ररथ के ऊपर एक २ तिलक चढाने से सुरेन्द्र नाम का प्रासाद
होता है, यह सर्व देवो के लिए प्रिय है ॥७३॥
शृंग संख्या—पूर्ववत् ४५३ और तिलक ८ प्ररथे ।
विभक्ति पन्द्रहवीं ।
२९—धर्मनाथजिनप्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चाष्टाविंशतिभाजिते ।
कर्णं रथं च भद्रार्धं युगभागं विधीयते ॥७४॥
निर्गमं तत्प्रमाणेण द्विभागा नन्दीकोशिका ।
केसरी सर्वतोभद्रं रथे कर्णै च दापयेत् ॥७५॥
तदूर्ध्वं तिलकं देयं सर्वशोभान्वितं कृतम् ।
नन्दिका कर्णिकायां च शृङ्गोर्ध्वं शृङ्गमुत्तमम् ॥७६॥
भद्रे चैवोरुचत्वारि चाष्टौ प्रत्यङ्गानि च ।
धर्मदो नाम विख्यातः पूरे धर्मविवर्धनः ॥७७॥
इति धर्मनाथजिनप्रासादः ॥२९॥
प्रासाद को समचोरस भूमि का अट्ठावीस भाग करे । उनमे चार भाग का कोण, चार
भाग का प्ररथ, चार भाग का भद्रार्ध, एक भाग की कोणी, और एक भाग की भद्रनंदी
बनावें । ये सब अंग समदल रक्खें । कोण और प्ररथ के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र ये
दो क्रम चढावे और उसके ऊपर शोभायमान एक एक तिलक चढावे । कोणी और नन्दी के
ऊपर दो दो शृंग चढावे । भद्र के ऊपर चार उरुशृंग और आठ प्रत्यंग चढावे । ऐसा धर्म
को देने वाला धर्मद नाम का प्रासाद नगर मे धर्म को बढाने वाला है ॥७४ से ७७॥
शृंग संख्या—कोणे ५६, प्ररथे ११२, कोणी पर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग,
८ एक शिखर, कुल २२५ शृंग और तिलक ४ कोणे और ८ प्ररथे कुल १२ ।
३०—धर्मवृक्षप्रासाद—
तद्रूपे तत्प्रमाणे च कर्त्तव्यः सर्वकामदः ।
रथोर्ध्वं च कृते शृङ्गे धर्मवृक्षोऽयं नामतः ॥७८॥
इति धर्मवृक्षप्रासादः ॥३०॥