प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
ऽष्टमोऽध्यायः १६५
पुपाथ वितथश्चैव गृहक्षतो यमस्तथा । '
गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृगः सप्त सुरा इति ॥१०५॥
अग्निकोण मे जानुके ऊपर अग्नि देव और दाहिने पैर की नलीके ऊपर पुषा आदि
सात देव—पुषा, वितथ, गृहक्षत, यम, गान्धर्व, भृगराज और मृग, ये सात देव
स्थित है ॥१०४-१०५॥
पादयोः पितरस्तस्मात् सप्त पादनलीस्थिताः ।
दौवारिकोऽथ सुग्रीवः पुष्पदन्तो जलाधिपः ॥१०६॥
'असुरशोषयक्ष्माश्च रोगो जानुनि संस्थितः ।
नागो मुख्यश्च भल्लाटः सोमो गिरिश्च बाहुगाः ॥१०७॥
दोनो पैरके ऊपर पितृदेव, बाये पैरकी नली पर दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदत, जलाधिप
(वरुण), असुर, शोष, और पापयक्ष्मा ये सात देव स्थित है। नाग, मुख्य, भल्लाट, कुबेर और
गिरि (शैल), ये पाच देव बाबी भुजा पर स्थित है ॥१०६-१०७॥
अदितिः स्कन्धदेशे च वामे कर्णे दिति. स्थितः ।
द्वात्रिंशद्वाह्यगा देवा नाभिष्पृष्ठे स्थितो विधिः ॥१०८॥
बाये स्कंध पर अदिति देव और बाये कान पर दितिदेव स्थित है। इस प्रकार बत्तीस
देव वास्तुपुरुष के बाह्य अंगों पर है। मध्य नाभि के पृष्ठ भाग मे ब्रह्मा स्थित है ॥१०८॥
अर्यमा दक्षिणे वामे स्तने तु पृथिवीधरः ।
विवस्वानऽथ , मित्रश्च दक्षवामोरुगावुभौ ॥१०६॥
दाहिने स्तन पर अर्यमा और बाये स्तन पर पृथ्वीधर देव स्थित है। दाहनी ऊरु पर
विवस्वान् और बायी ऊरु पर मित्रदेव स्थित है ॥१०६॥
आपस्तु गलके वास्तो-रापवत्सो हृदि स्थितः ।
२सावित्री सविता तद्वत् करं दक्षिणमाश्रितौ ॥११०॥
वास्तुपुरुष के गले पर आपदेव, हृदय के ऊपर आपवत्स देव स्थित है। दाहिने हाथ पर
सावित्री और सविता ये दो देविया स्थित है ॥११०॥
इन्द्र इन्द्रजयो मेढ़े रुद्रोऽसौ वामहस्तके ।
रुद्रदासोऽपि तत्रैव इति देवमयं वपुः ॥१११॥
१. 'शेष ।' २. 'सावित्र' ।
१६६ प्रासादमण्डने
मेढ्र (लिंग) स्थान पर इन्द्र और इन्द्रजय देव स्थित है। बायें हाथ पर रुद्र और
रुद्रदास देव स्थित है ! इस प्रकार कुल पैंतालीस देवमय वास्तुपुरुष का शरीर है ॥१११॥
वास्तुमंडल के कोने की आठ देवियां—
ऐशान्ये चरकी बाह्ये पीलीपीच्छा च पूर्वदिक् ।
विदारिकाग्निकोणे च जम्भा याम्यदिशाश्रिता ॥११२॥
नैर्ऋत्ये पूतना स्कन्दा पश्चिमे वायुकोणके ।
पापराक्षसिका सौम्येऽर्यमैवं सर्वतोऽर्चयेत् ॥११३॥
वास्तुमंडल के बाहर ईशानकोने में उत्तर दिशा में चरकी और पूर्व में पोलीपीच्छा,
अग्निकोने मे पूर्व में विदारिका और दक्षिण में जम्भा देवी, नैर्ऋत्यकोने मे दक्षिण मे पूतना
और पश्चिम मे स्कन्दा, वायुकोने में पश्चिम मे पापराक्षसिका और उत्तर में अर्यमा देवी का
न्यास करके पूजन करे ॥११२-१३॥
देवीः क्रूरान् यमादींश्च माषान्नैः सुरयामिषैः ।
अपरान् घृतपक्वान्नैः सर्वान् स्वर्णसुगन्धिभिः ॥११४॥
इति वास्तुपुरुषविन्यासः ।
देवियो को और यम आदि क्रूर देवो को माषान्न, सुरा और आमिष से और बाकी के
सब देवो को घृत, पक्वान, सुवर्ण और सुगंधित पदार्थों से पूजना चाहिये ॥११४॥
शास्त्रप्रशंसा—
एकेन शास्त्रेण गुणाधिकेन,
विना द्वितीयेन पदार्थसिद्धिः ।
तस्मात् प्रकारान्तरतो विलोक्य,
मणिर्गुणाढ्योऽपि सहायकाङ्क्षी ॥११५॥
इस ग्रन्थ के कर्त्ता श्रीमण्डनसूत्रधार का कहना है कि—शिल्पशास्त्र अनेक है। उनमें
यह एक ही शास्त्र अधिक गुणवाला होने पर भी दूसरे शिल्पशास्त्र देखे बिना पदार्थ की सिद्धि
नही होती, इसलिये प्रकारान्तर से दूसरे शिल्पग्रन्थ भी देखने चाहिये। जैसे—अकेला मणि
अधिक गुणवाला होने पर भी इतनी शोभा नही देता जितनी सुवर्णादि अन्य पदार्थों के साथ
मिलाने से देता है। इसी प्रकार शिल्प के अनेक शास्त्र देखने से शिल्पी शिल्पशास्त्र का विद्वान्
होता है ॥११५॥
ऽष्टमोऽध्यायः १६७
अन्तिममंगल—
श्रीविश्वकर्मगणनाथमहेशचण्डी-
श्रीविश्वरूपजगदीश्वरसुप्रसादात् ।
प्रासादमण्डनमिदं रुचिरं चकार,
श्रीमण्डनो गुणवतां भुवि सूत्रधारः ॥११६॥
इति श्रीसूत्रधारमण्डनविरचिते वास्तुशास्त्रे प्रासादमण्डने
अष्टमोऽध्यायः समाप्तः । सम्पूर्णोऽयं ग्रन्थः ।
श्री विश्वकर्मा, गणपति, महेश, चण्डीदेवी और विश्वस्वरूप श्री जगदीश्वर की कृपा से
जगत के विद्वानो मे सुप्रसिद्ध मंडन नाम का सूत्रधार है। उसने प्रासाद निर्माण विधि का यह
प्रासादमंडन नाम का शास्त्र आनंद पूर्वक बनाया ॥११६॥
इति श्री पंडित भगवानदास जैन ने इस प्रासादमंडन के आठवे
अध्याय को सुबोधिनी नामकी भाषाटीका समाप्त की।
❀ श्रीरस्तु ❀
परिशिष्ट नं.-१
केसरी आदि २५ प्रासाद ।
( अपराजितपृच्छा सूत्र १५६ )
विश्वकर्मोवाच—
सान्धारांश्च ततो वक्ष्ये प्रासादान् पर्वतोपमान् ।
शिखरैर्विविधाकारै-नैकाएडैश्च¹ विभूषितान् ॥१॥
पर्वत के जैसे शोभायमान, अनेक प्रकार के शिखरवाले और अनेक शृंगों से विभूषित,
ऐसे सान्धार जातिके प्रसादो को कहता हूं। ऐसा विश्वकर्मा कहता है ॥१॥
आद्यः पञ्चाएडको ज्ञेयः केसरी नाम नामतः ।
²तावदन्तं चतुर्वृद्धि-र्यावदेकोत्तरं शतम् ॥२॥
प्रथम केसरी नामका प्रासाद पांच शृंगो वाला है। पीछे प्रत्येक प्रासाद के ऊपर चार २
शृंग बढाने से पच्चीसवें अंतिम मेरु प्रासाद के ऊपर एक सौ एक शृंग होजाता हैं ॥२॥
पच्चीस प्रासादों का नाम—
केशरी सर्वतोभद्रो नन्दनो नन्दशालिकः ।
नन्दीशो मन्दरश्चैव श्रीवत्सश्चामृतोद्भवः ॥३॥
हिमवान् हेमकूटश्च कैलासः पृथिवीजयः ।
इन्द्रनीलो महानीलो भूधरो रत्नकूटकः ॥४॥
वैडूर्यः पद्मरागश्च वज्रको मुकुटोज्ज्वलः ।
ऐरावतो राजहंसो गरुडो वृषभस्तथा ॥५॥
मेरुः प्रासादराजः स्याद् देवानामालयो हि सः ।
संयोगेन च सान्धारान् कथयामि यथार्थतः ॥६॥
१. 'रएडकैर्नैकभूषितान्।' २. 'तावन्तश्चतुरो वृद्धिः।'
परिशिष्टे केसरीप्रासादः १६६
केसरी, सर्वतोभद्र, नन्दन, नन्दशालिक, नन्दीश, मंदर, श्रीवत्स, अमृतोद्भव, हिमवान्,
हेमकूट, कैलाश, पृथिवीजय, इन्द्रनील, महानील, भूधर, रत्नकूटक, वैडूर्य, पद्मराग, वज्रक,
मुकुटोज्ज्वल, ऐरावत, राजहंस, गरुड, वृषभ और मेरु ये पचीस प्रासाद सांधारजाति के हैं ।
उसका अनुक्रमसे यथार्थ वर्णन किया जाता है ॥३ से ६॥
'दशहस्तादधस्तान्न प्रासादो भ्रमसंयुक्तः ।
षट्त्रिंशन्तं निरन्धारा धाव्ये वेदादिहस्ततः ॥७॥
यदि प्रासाद का मान दस हाथ से न्यून न हो तो, वह प्रासाद भ्रम (परिक्रमा) वाला
बना सकते है। एवं चार हाथ से छत्तीस हाथ तक के मान का प्रासाद बिना भ्रमका भी बना
सकते है ॥७॥
पञ्चविंशतिः २सान्धाराः प्रयुक्ता वास्तुवेदिभिः ।
भ्रमहीनास्तु ये कार्याः शुद्धच्छन्देषु नागराः ॥८॥
वास्तुशास्त्र के विद्वानो ने ये सान्धार (परिक्रमा वाले) पचीस प्रासाद शुद्ध नागर जाति
के कहे है, वे भ्रम रहित भी बना सकते है ॥८॥
१-केसरीप्रासाद—
चतुरसीकृते क्षेत्रे अष्टाष्टकविभाजिते ।
भागभागं भ्रमभित्ति-द्विभागो देवालयः ॥६॥
सान्धार जाति के प्रासाद की समचोरस भूमि के आठ २ भाग करे, उनमें से एक भाग
की भ्रमणी, एक २ भाग की दो दीवार और दो भागका गभारा बनाना चाहिये ॥६॥
निरन्धारे पदा भित्ति-रर्धे गर्भं प्रकल्पयेत् ।
मध्यच्छन्दश्च वेदास्त्रो बाह्ये कुम्भायतं शृणु ॥१०॥
यदि प्रासाद निरंधार बनाना हो तो प्रासाद के मान के चौथे भागकी दीवार और आधे
मानका गभारा बनाना चाहिये । जैसे-आठ हाथ के मानका प्रासाद है, तो उसका चौथा भाग
दो २ हाथ की दीवार और चार हाथ का गभारा बनावे । मध्य में गभारा समचोरस रक्खे ।
अब गभारा
१७० प्रासादमण्डने
क्षेत्रार्धे च भवेद् भद्रं भद्रार्धं कर्णविस्तरः ।
कर्णस्यार्धप्रमाणेन कर्त्तव्यो भद्रनिर्गमः ॥१२१॥
प्रासाद की भूमिके नाप से आधा भद्रका विस्तार रक्खें। इससे
आधे मानका कोणा का विस्तार रक्खें। कोणे के आधे मान का
भद्रका निर्गम रक्खें ॥१२१॥
चतुष्कर्णेषु ख्यातानि श्रीवत्सशिखराणि च ।
रथिकोद्गमे च पञ्चैव केशरी गिरिजाप्रियः ॥१२२॥
इति केसरीप्रासादः ॥१॥
प्रासाद के चारों कोणे के ऊपर एक २ श्रीवत्स शृंग चढावें, तथा
भद्रके ऊपर रथिका और उद्गम बनावें। इस प्रकार का केसरी नामका
प्रासाद पार्वती देवी को प्रिय है ॥१२२॥
शृंग संख्या-चार कोणे ४ और एक शिखर एवं कुल ५ शृंग।
२-सर्वतोभद्रप्रासाद—
क्षेत्रे विभक्ते दशधा गर्भः षोडशकोष्ठकैः ।
भित्तिं भ्रमं च भित्तिं च भागभागं प्रकल्पयेत् ॥१२३॥
प्रासाद की समचोर भूमिका दस २ भाग करें। उनमें से मध्य
गभारा कुल सोलह भाग का रक्खें। बाकी एक भाग की दीवार, एक
भाग की भ्रमणी और एक भागकी दूसरी बाहर की दीवार रक्खें ॥१२३॥
द्विभागः कर्ण इत्युक्तो भद्रं षड्भागिकं तथा ।
निर्गमं चैकभागेन भागिका पार्श्वचोभयोः ॥१२४॥
दो २ भाग का कोणा और छभागका भद्र का विस्तार रक्खें। भद्र का निर्गम एक
भाग रक्खे और भद्र के दोनों तरफ एक २ भाग की एक २ कोणी बनावें ॥१२४॥
कर्णिका चार्धभागेन भागार्धं भद्रनिर्गमम् ।
भागत्रयं च विस्तारे मुखभद्रं विधीयते ॥१२५॥
भद्र के दोनों तरफ आधे २ भाग की एक २ कर्णिका भी बनाना—इस का और
कोणीया का निर्गम आधा भाग और भद्र का निर्गम आधा भाग, इस प्रकार कुल एक भाग
भद्र का निर्गम जानें। भद्रका विस्तार छ भाग रखना ऊपर लिखा है, उनमे से दो कोणी और
चित्र-संलग्न पाठ (चित्र शीर्षक एवं विवरण):
- ऊर्ध्व पाठ (चित्र के पार्श्व में): 〔उत्तार्द्धे, केसरी प्रासाद ११, समराङ्गण, पृ. ३६५, रेखा ५〕
- तलच्छन्द (Ground Plan) पाठ: केसरीप्रासादप्रस्तारः (अन्तर्गत: भित्ति, गर्भ)
परिशिष्टे केसरीप्रासादः १७१
दो कर्णिका का तीन भाग छोड़ करके बाकी तीन भाग रहे, उतना मुखभद्र का विस्तार
रखे ॥१५॥
भद्रे वै तूद्गमाः पञ्च कर्णेऽष्टशृङ्गकानि च ।
श्रीवत्सशिखरं कार्यं घटाकलशसंयुतम् ॥१६॥
इति सर्वतोभद्रप्रासादः ॥२॥
भद्रके ऊपर पांच २ उद्गम करे। कोणे के ऊपर दो २
एव कुल आठ शृंग चढावे आमलसार और कलश वाला
श्रीवत्स शिखर बनावे ॥१६॥
शृंगसंख्या—प्रत्येक कोण पर २-२ और एक शिखर
एवं कुल ९ शृंग ।
३-नन्दनप्रासाद—
श्रीवत्सं भद्रमारूढं रथिकोद्गमभूषिते ।
नन्दने नन्दति स्वामी दुरितं हरति ध्रुवम् ॥१७॥
इति नन्दनप्रासाद. ।.३॥
यह नन्दन प्रासाद का मान और स्वरूप सर्वतोभद्र
प्रासाद के अनुसार जाने । फर्क इतना कि—भद्र के गवाक्ष और
उद्गम के ऊपर एक २ उरुशृंग चढ़ावे । इसको बनानेवाला
स्वामी आनन्द मे रहता है और सब पापो का नाश
करता है ॥१७॥
शृंगसंख्या—चार कोणे ८, चार भद्रे ४ और एक
शिखर, एव कुल १३ शृंग ।
४-नन्दिशालप्रासाद—
तस्यैवं भद्रोर्ध्वे शृङ्गं भद्रं तस्यानुरूपतः ।
नन्दिशाली गुणैर्युक्तः स्वरूपो लक्षणान्वितः ॥१८॥
इति नन्दिशालप्रासादः ॥४॥
इस नन्दिशालप्रासाद का तलमान और स्वरूप नन्दन प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष
इतना कि—भद्र के ऊपर एक २ उरुशृंग अधिक चडावे तो यह नन्दिशाल प्रासाद सब गुणो से
युक्त अच्छे लक्षणवाला सुन्दर बनता है ॥१८॥
शृंगसंख्या-कोणे ८, भद्रे ८ और एक शिखर, एवं कुल १७ शृंग ।
१७२ प्रासादमण्डने
५-नन्दीशप्रासाद—
त्रिभागं च भवेद् भद्रं भद्रार्थं प्ररथस्तथा ।
कर्णे शृङ्गद्वयं भद्रे एकैकं प्ररथे तथा ॥१९॥
इति नन्दीशप्रासादः ॥५॥
यह नन्दीशप्रासाद का मान और स्वरूप सर्वतोभद्र प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष
यह है कि—छः भाग का भद्र है, उसके बदले तीन भाग का भद्र और डेढ़ २ भाग का प्रतिरथ
बनावें। कोणे के ऊपर दो २, भद्र के ऊपर एक २ और प्रतिरथ के ऊपर एक २ शृंग
चढ़ावे ॥१९॥
शृंगसंख्या—कोणे ८, प्ररथे ८, भद्रे ४ और एक शिखर, एवं कुल २१ शृंग ।
६-मंदरप्रासाद—
द्वादशांशस्तु विस्तारो मूलगर्भस्तदर्धतः ।
भागभागं तु कर्त्तव्या द्वे भित्ती चान्धकारिका ॥२०॥
कर्णप्ररथभद्रार्धं कारयेद् द्विद्विभागतः ।
प्ररथः समनिष्कासो भद्रं भागेन निर्गमम् ॥२१॥
कर्णे द्वे भद्रके द्वे च चैकं प्रतिरथे तथा ।
सघण्टा कलशा रेखा रथिकोद्गमभूषिताः ॥२२॥
इति मन्दरप्रासादः ॥६॥
प्रासाद की समचोरस भूमिका बारह भाग करें। उनमें से छः
भाग का गभारा बनावें, तथा एक २ भाग की दोनों दीवार और एक २
भाग की भ्रमणी (परिक्रमा) बनावें। गभारे के बाहर के भाग में
कोणा, प्ररथ और भद्रार्ध ये सब दो २ भाग का रक्खें । उसका निर्गम
समदल रक्खें और भद्रका निर्गम एक भाग रक्खें। कोणे के ऊपर
दो २ शृंग, भद्रके ऊपर दो २ उरशृंग और प्रतिरथ के ऊपर एक २
शृंग चढ़ावें । आमलसार, कलश, रेखा, गवाक्ष और उद्गम, ये सब
शोभायमान बनावें ॥२० से २२॥
शृंगसंख्या—कोणे ८, प्ररथे ८ भद्रे ८ और एक शिखर, एव
कुल २५ शृंग ।
परिशिष्टे केसरीप्रासादः १३६
७-श्रीवृक्षप्रासाद—
चतुर्दशांशविस्तारे गर्भगृहाष्टांशविस्तरः ।
भागभागं भ्रमो भित्ति-स्तारनिर्गमनेस्तु भागिकः ॥२३॥
कर्णे शृङ्गद्वयं कुर्या-च्छिखरं चाष्टभिर्भगम् ।
प्रत्यः कर्णमानेन तिलकं शृङ्गकेशरी ॥२४॥
नन्दिकायां च तिलकं भद्रे शृङ्गद्वयं भवेत् ।
श्रीवृक्षस्तु समाख्यातः कर्त्तव्यस्तु श्रियः पतेः ॥२५॥
इति श्रीवृक्षप्रासादः ॥७॥
प्रासाद को समचोरस भूमिहा चौदह भाग करें। उनमें से
आठ भागका गभारा, एक भागकी दीवार, एक भागकी भ्रमन्ती
और एक भागकी बाहर की दीवार, इस प्रकार भीतर १४ भाग
होता है। बाहर का मान नंदर प्रासाद के अनुसार होता है।
विशेष इतना कि—दो भाग का कोणा, २ भाग का प्रतिरथ, एक
भागकी नंदी, और दो भाग का भद्रारि रखो। कोने के ऊपर
दो शृंग, प्रतिरथ के ऊपर एक शृंग और एक तिलक बांधे।
शिखर का विस्तार आठ भाग का रखो। नंदीके ऊपर एक
तिलक रक्खे। भद्रके ऊपर तीन २ उरुशृंग बांधे। ऐसा
श्रीवृक्षप्रासाद का स्वरूप है, यह विष्णु के लिए बांधे
॥२३ से २५॥
शृंगसंख्या—कोणे ८, प्रतिरथे ८, भद्रे १२, एक शिखर,
एवं कुल २९ शृंग। तिलक संख्या-प्रतिरथे ८ और नंदीपर ८ एवं कुल १६ तिलक।
८-अमृतोद्भवप्रासाद—
कर्णे शृङ्गत्रयं कुर्यात् प्रत्यः पूर्ववत्स्थितः ।
अमृतोद्भवनामोऽसौ प्रासादः सुरपूजितः ॥२६॥
इति अमृतोद्भवप्रासादः ॥८॥
यह प्रासाद का तजमान और रचना श्रीवृक्षप्रासाद के अनुसार जानना। फर्क इतना
कि—कोण के ऊपर तीन शृङ्ग चढ़ावे, बाकी प्रतिरथ आदिक का रचना पूर्वोक्त प्रकार ही करा
जाने । ऐसा अमृतोद्भवप्रासाद देवों से पूजित है ॥२६॥
१७४ प्रासादमण्डने
शृंगसंख्या—कोणे १२, प्रतिरथे ८, भद्रे १२, एक शिखर, एवं कुल ३३ शृंग, तिलक
संख्या—प्रतिरथे ८ ओर नन्दी पर ८, कुल १६ तिलक ।
६-हिमवान् प्रासाद—
द्वे द्वे शृङ्गे प्रतिरथे त्वमृतोद्भवसंस्थितौ ।
हिमवान् द्वे उरुशृङ्गै पूज्यः सुरनरोरगैः ॥२७॥
इति हिमवान् प्रासादः ॥६॥
यह प्रासाद का तलमान और स्वरूप-अमृतोद्भव प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह
है कि—पठरे के ऊपर तिलक के बदले शृंग अर्थात् दो शृंग चढ़ावें और भद्रके ऊपर से एक
उरुशृंग कम करके दो उरुशृंग रक्खें। ऐसा हिमवान् नामका प्रासाद देव, मनुष्य और नाग-
कुमारों से पूजित है ॥२७॥
शृंगसंख्या—कोणे १२, प्रतिरथे १६, भद्रे ८, एक शिखर, एवं कुल ३७ शृंग और
तिलक ८ नंदी के ऊपर ।
१०-हेमकूट प्रासाद—
उरुशृङ्गतत्रयं भद्रे नन्दिका तिलकान्विता ।
हेमकूटस्तदा नाम प्रकर्त्तव्यस्त्रिमूर्त्तिके ॥२८॥
इति हेमकूटप्रासादः ॥१०॥
यह प्रासादका तलमान और स्वरूप हिमवान् प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह है
कि—भद्र के ऊपर तीसरा उरुशृंग और नंदी के ऊपर दूसरा तिलक चढ़ावें । यह हेमकूट
नामका प्रासाद ब्रह्मा, विष्णु और महेश, यह त्रिमूर्त्ति के लिये बनावें ॥२८॥
शृंगसंख्या—कोणे १२, प्रतिरथे १६, भद्रे १२, एक शिखर, एवं कुल ४१ शृंग और
१६ तिलक नन्दी के ऊपर ।
११-कैलास प्रासाद—
नन्दिकाग्रान्ततः शृङ्गं रेखाश्च तिलकोत्तमाः ।
कैलासश्च तदा नाम ईश्वरस्य सदा प्रियः ॥२६॥
इति कैलासप्रासादः ॥११॥
यह प्रासाद का मान और स्वरूप हेमकूट प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह हैं कि—
नन्दी के ऊपर दो तिलक है, उसके बदले एक शृंग और उसके ऊपर एक तिलक चढावें ।
परिशिष्टे केसरीप्रासादः १७५
तथा कोणो के ऊपर तीन शृंग हैं, उसके बदले दो शृंग और उसके ऊपर तिलक चढ़ाना
चाहिये । ऐसा कैलास नामका प्रासाद ईश्वर को हमेशा प्रिय है ॥२६॥
शृंगसंख्या—कोणे ८, पठरे १६, नंदी पर ८, भद्रे १२, एक शिखर, एवं कुल ४५ शृंग
और तिलक ८ कोने और ८ नन्दी के ऊपर ।
१२-पृथिवीजय प्रासाद—
रेखोर्ध्वे तिलकं त्यक्त्वा शृङ्गं तत्रैव कारयेत् ।
पृथ्वीजयस्तदा नाम कर्त्तव्यः सर्वदैवते ॥३०॥
इति पृथ्वीजयप्रासादः ॥१२॥
यह प्रासाद का तलमान और स्वरूप कैलासप्रासादकी तरह जाने । विशेष यह है कि—
कोणेके ऊपर का तिलक हटाकर के उसके बदले शृंग चढ़ावे । ऐसा पृथ्वीजय नामका प्रासाद
सब देवों के लिये बनावे ॥३०॥
शृंगसंख्या—कोणे १२, प्रतिरथे १६, नंदी के ऊपर ८, भद्रे १२, एक शिखर, एवं
कुल ४६ शृंग और तिलक ८ नंदी के ऊपर ।
१३-इन्द्रनीलप्रासाद—
षोडशांशकविस्तारे द्विभागः कर्णविस्तरः ।
नन्दिका चैकभागेन द्वयं'शः प्रतिरथस्तथा ॥३१॥
पुनर्नन्दी भवेद् भागं भद्रं वेदांशविस्तरम् ।
समस्तं समनिष्कासं भद्रे भागो विनिर्गमः ॥३२॥
प्रासाद की समचोरस भूमि का सोलह भाग करे । उनमे से दो भाग का कोणा, एक
भागकी नन्दी, दो भागका प्रतिरथ, एक भाग की दूसरी नन्दी और दो भागका भद्रार्ध बनावे ।
ये सब अंगोका निर्गम समदल और भद्रका निर्गम एक भाग रक्खे ॥३१-३२॥
चतुष्ट्यंशको गर्भो वेष्टितो भीत्तिभागतः ।
बाह्यभीत्तिर्भवेद् भागा द्विभागा च भ्रमन्तिका ॥३३॥
सोलह भाग मे गभारे का विस्तार आठ भाग ( समचोरस ६४ भाग ) करे गभारे की
दीवार एक भाग, भ्रमणो दो भाग और बाहर की दीवार एक भाग रक्खें ॥३३॥
१७६ प्रासादमण्डने
कर्णे शृङ्गद्वयं कार्यं शिखरं सूर्यविस्तरम् ।
नन्दिकायां तु तिलकं प्रत्यङ्गं च द्विभागिकम् ॥३४॥
शृङ्गद्वयं प्रतिरथे उरुशृङ्गं षडंशकम् ।
१शृङ्गद्वयं नन्दिकाया-मुरःशृङ्गं युगांशकम् ॥३५॥
द्विभागं भद्रशृङ्गं तु शृङ्गार्धे चैव निर्गमः ।
कर्णे प्रतिरथे चैव ह्युदकान्तरभूषितम् ॥३६॥
इन्द्रनीलस्तदा नाम इन्द्रादिसुरपूजितः ।
वल्लभः सर्वदेवानां शिवास्यापि विशेषतः ॥३७॥
इति इन्द्रनीलप्रसादः ॥१३॥
कोणों के ऊपर दो शृंग चढ़ावें। शिखर का विस्तार
बारह भाग रखें। नन्दी के ऊपर एक तिलक चढ़ावें और दो
भाग के विस्तार वाला प्रत्यंग चढ़ावे। प्रतिरथ के ऊपर दो शृंग
चढ़ावें। पहला उरुशृंग छ भाग विस्तार में रक्खे। नन्दी के ऊपर
एक शृंग चढ़ावें। दूसरा उरुशृंग विस्तार में चार भाग का
और तीसरा उरुशृंग विस्तार में दो भाग का रखें। इन
उरुशृंगों का निर्गम विस्तार से आधा रखें। कोणा और प्रतिरथ
उदकान्तर वाला बनावें। ऐसा इन्द्रनील प्रासाद इन्द्रादि देवों से
पूजित है, यह सब देवों को और विशेष कर शिवजी को प्रिय
है ॥३४ से ३७॥
शृंग संख्या—कोणो ८, प्रतिरथे १६, भद्र नन्दी के ऊपर ८, भद्रे १२, प्रत्यंग ८,
एक शिखर, कुल ५३ शृंग और तिलक ८ कर्णा नन्दी पर।
१४-महानील प्रसाद-
कर्णे नन्दी (कर्णनन्द्यां ?) तथा शृङ्गं रेखोर्ध्वे तिलकं तथा ।
महानीलस्तदा नाम कर्त्तव्यः सर्वदैवते ॥३८॥
इति महानीलप्रसादः ॥१४॥
१. 'शृंगद्वयं' अशुद्ध पाट मालुम होता है। उस स्थान पर 'शृङ्गमेकं' ऐसा पाठ चाहिये जिसे शृंगों की संख्या ठीक मिल जाय ।
परिशिष्टे केसरीप्रासाद. १७७
यह महानील प्रासाद का तलमान और स्वरूप इन्द्रनील प्रासाद के अनुसार जानें ।
विशेष यह है कि—कर्णनन्दी के ऊपर से तिलक हटा करके उसके बदले शृंग रक्खे । ऐसा
महानील प्रासाद सब देवों के लिये बनावे ॥३८॥
शृंग संख्या—कोणे ४, नंदी पर ८, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे १६, नन्दी पर ८ भद्रे १२ और
एक शिखर, कुल ५७ शृंग और तिलक ४ कोणे ।
१५—भूधरप्रासाद—
कार्यं शृङ्गं च तिलकं रेखामध्ये प्रशस्यते ।
भूधरस्य समाख्यातः प्रासादो देवालयः ॥३६॥
इति भूधरप्रासादः ॥१ ॥
यह प्रासाद का मान और स्वरूप महानील प्रासाद के
अनुसार जाने । विशेष यह कि—कोणे के ऊपर एक शृंग अधिक
चढ़ावे तो यह भूधर नाम का प्रासाद देवोका स्थानरूप
होता है ॥३६॥
शृंग संख्या—कोणे ८, बाकी पूर्ववत् जाने । तिलक ४
कोणे ।
१६—रत्नकूटप्रासाद—
भूधरस्य यथा प्रोक्तं द्विभागं वर्धयेत् पुनः ।
पूर्ववद्दलसंख्यायां भद्रपार्श्वे द्विनन्दिके ॥४०॥
द्विभागं बाह्यभित्तिश्च शेषं पूर्वप्रकल्पितम् ।
तलच्छन्दमिति ख्यात-मूर्ध्वमानमतः शृणु ॥४१॥
यह रत्नकूट प्रासाद का मान और स्वरूप भूधर प्रासाद
के अनुसार जाने । विशेष यह कि—तल मानमे दो भाग बढ़ावे
अर्थात् अठारह भाग करे । तथा भद्र के दोनो तरफ एक २
भाग की दूसरी नन्दी बनावें । और बाहर की दीवार दो भागकी
रक्खे । बाकी सब पहले के अनुसार जानें । अब ऊर्ध्वमान
सुनिये ॥४०-४१॥
[रेखाचित्र-पाठ / आलेख टिप्पणी]
(कोणे, कर्णपर प्रासाद २४, मध्यमे ४४, प्रत्यङ्गे ४५, शिखरे ७७)
मंदिर, कुण्डण
मध्यमप्रस्तरे रूपौ.
प्रा० २३
१७८ प्रासादमण्डने
कर्णे द्विशृङ्गं तिलकं शिखरं सूर्यविस्तरम् ।
तिलके द्वे नन्दिकायां प्रत्यङ्गं तु द्विभागिकम् ॥४२॥
शृङ्गत्रयं प्रतिरथे षड्भागा चोरुमञ्जरी ।
तिलके द्वे पुनर्नन्द्यां-मुरुशृङ्गं युगांशकम् ॥४३॥
नन्द्यां च शृङ्गतिलके त्रिभागा चोरुमञ्जरी ।
द्विभागं भद्रशृङ्गं च अर्धे चार्धे च निर्गमः ॥४४॥
कोणे के ऊपर दो शृंग और एक तिलक चढ़ावे । शिखर का विस्तार बारह भाग का
रक्खें । कर्णानन्दो के ऊपर दो तिलक और दो भाग का प्रत्यंग चढ़ावे । प्रतिरथ के ऊपर तीन
शृंग और नंदी के ऊपर दो तिलक चढ़ावें । भद्रनन्दी के ऊपर एक शृंग और एक तिलक
चढ़ावे । भद्र के ऊपर चार उरुशृंग चढ़ावें, उनमे पहला उरुशृंग छः भाग, दूसरा चार भाग,
तीसरा तीन भाग और चौथा दो भाग का रक्खे । ये उरुशृंगों का निर्गम विस्तार से आधा
रक्खे ॥४२ से ४४॥
शृंग संख्या—कोणे ८, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे २४, भद्र नन्दी पर ८, भद्रे १६, एक शिखर,
कुल ६५ शृंग और तिलक—कोणे ४, कोणो पर १६, प्ररथ नन्दी पर १६ और भद्र नन्दी पर ८,
कुल ४४ तिलक ।
रत्नकूटस्तदा नाम शिवलिङ्गेषु कामदः ।
प्रशस्तः सर्वदेवेषु राज्ञां तु जयकारणम् ॥४५॥
इति रत्नकूटप्रासादः ॥१६॥
ऊपर कहे हुए स्वरूप वाला रत्नकूट प्रासाद शिवलिंग के लिये बनावें तो सब इच्छित
फल को देने वाला है । सब देवो के लिये बनावे तो भी प्रशस्त है और राजाओं को विजय
कराने वाला है ॥४५॥
१७—वैडूर्यप्रासाद—
शृङ्गं तृतीयं रेखोर्ध्वे कर्त्तव्यं सर्वशोभनम् ।
वैडूर्यश्च तदा नाम कर्त्तव्यः सर्वदैवते ॥४६॥
इति वैडूर्यप्रासादः ॥१७॥
इस प्रासाद का तलमान और स्वरूप रत्नकूट प्रासाद के अनुसार है । विशेष यह है
कि—कोणे के ऊपर से तिलक निकाल करके उसके बदले एक तीसरा शृंग चढ़ावें । सब
परिशिष्टे केसरीप्रासादः १७६
शोभायमान बनावे । यह वैडूर्य नाम का प्रासाद सब देवो के लिये बनाना चाहिये ॥४६॥
शृंगसख्या—कोने १२, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे २४, भद्रनंदी पर ८, भद्रे १६ एक शिखर,
एवं कुल ६९ शृंग । तिलक संख्या—कर्णनंदी पर १६, प्रतिरथ नदी पर १६ और भद्रनन्दी
पर ८, एवं कुल ४० तिलक ।
१८-पद्मरागप्रासाद--
तथैव तिलकं नन्द्यां शृङ्गयुग्मं तु संस्थितम् ।
पद्मरागस्तदा नाम सर्वदेवसुखावहः ॥४७॥
इति पद्मरागप्रासादः ॥१८॥
इस प्रासाद का मान और स्वरूप वैडूर्यप्रासाद की तरह समझे । विशेष यह है कि-
कोणे के ऊपर से तीसरा शृंग हटा करके उसके बदले मे तिलक चढ़ावे और भद्रनंदी के
ऊपर जो एक तिलक और एक शृंग है, उसके बदले दो शृंग रक्खे । ऐसा पद्मराग नाम का
प्रासाद सब देवो के लिये सुख कारक है ॥४७॥
शृंगसख्या—कोणे ८, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे २४, भद्र नंदी पर १६, भद्रे १६, एक शिखर,
एवं कुल ७३ शृंग । तिलक संख्या—कोणे ४, कर्णनन्दी पर १६ प्रतिरथ नदी पर १६
एवं कुल ३६ तिलक ।
१९-वज्रकप्रासाद--
रेखोर्ध्वे च ततः शृंगं कर्त्तव्यं सर्वशोभनम् ।
वज्रकश्चेति नामासौ शक्रादिसुरवल्लभः ॥४८॥
इति वज्रकप्रासादः ॥१९॥
इस प्रासाद का मान और स्वरूप पद्मराग प्रासाद की तरह जानें । विशेष यह है कि-
कोणे के ऊपर से तिलक हटा करके उसके बदले में शृंग चढ़ावे । यह वज्रक प्रासाद इन्द्र आदि
देवो को प्रिय है ॥४८॥
शृंगसख्या—कोणे १२, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे २४, भद्रनंदी पर १६, भद्रे १६, एक शिखर,
कुल ७७ शृंग । तिलक सख्या—कर्णनंदी पर १६, प्रतिरथ नन्दी पर १६, कुल ३२ तिलक ।
२०-मुकुटोज्ज्वलप्रासाद--
भक्ते त्रिंशतिधा क्षेत्रे द्विभागः कर्णविस्तरः ।
सार्धभागं भवेन्नन्दी कर्णवत्प्ररथस्तथा ॥४६॥
१८० प्रासादमण्डने
पुनर्नन्दी सार्धभागा भागा वै भद्रनन्दिका ।
वेदांशो भद्रविस्तार एकभागस्तु निर्गमः ॥५०॥
द्विभागा बाह्यभित्तिश्च द्विभागा च भ्रमन्तिका ।
तत्समा मध्यभित्तिश्च गर्भोऽष्टांशैः प्रकल्पितः ॥५१॥
इस प्रासाद की समचोरस भूमिका बीस भाग करें। उनमें
से दो भाग का कोणा, डेढ़ भाग की नंदी, दो भाग का प्ररथ,
डेढ़ भाग की नदी, एक भाग की भद्रनन्दी और चार भाग का
भद्र का विस्तार रखें। भद्र का निर्गम एक भाग का रखें।
दो भाग बाहर की दीवार, दो भाग की भ्रमणी, दो भाग की
गभारे की दीवार और आठ भाग का गभारा रखें ॥४६ से ५१॥
कर्णो द्विशृङ्गं तिलकं रेखा द्विसप्तविस्तरा ।
नन्द्यां शृङ्गं च तिलकं प्रत्यङ्गं तदूर्ध्वतः ॥५२॥
शृङ्गत्रयं प्रतिकर्णो सप्तांशा चोरुमञ्जरी ।
नन्द्यां शृङ्गं च तिलक-मुरुशृङ्गं षडंशकम् ॥५३॥
भद्रनन्द्यां तथा शृङ्ग-मिषुभागोरुमञ्जरी ।
भद्रशृङ्गं द्विभागं स मुकुटोज्ज्वल उच्यते ॥५४॥
इति मुकुटोज्ज्वलप्रासादः ॥२०॥
रेखा का विस्तार चौदह भाग का रखे। कोण के ऊपर दो शृंग, और एक तिलक,
कर्णनंदी के ऊपर एक शृंग और एक तिलक, ऊपर प्रत्यंग, प्ररथ के ऊपर तीन शृंग, नंदीके
ऊपर एक शृंग और एक तिलक, भद्रनन्दी के ऊपर एक शृंग और भद्र के ऊपर चार शृंग
चढावे। पहला उरुशृंग सात भाग का, दूसरा उरुशृंग छः भाग का, तीसरा उरुशृंग पांच
भाग का और चौथा उरुशृंग दो भाग का रखे। ऐसा मुकुटोज्ज्वल प्रासाद है ॥५२ से ५४॥
शृंगसंख्या—कोणे ८, प्रत्यंग ८, कर्णनन्दी पर ८, प्ररथे २४, नंदी पर ८, भद्रनन्दी
पर ८, भद्रे १६, एक शिखर, कुल ८१ शृंग। तिलक संख्या-कोणे ४, कर्णनन्दी पर ८,
प्ररथनन्दी पर ८ कुल २० तिलक।
परिशिष्टे केसरीप्रासादः १८१
२१-ऐरावतप्रासाद —
रेखोर्ध्वे च ततः शृङ्गं कर्त्तव्यं सर्वकामदम् ।
ऐरावतस्तदा नाम शक्रादिसुरवल्लभः ॥५५॥
इत्यैरावतप्रासादः ॥२१॥
इसका तलमान और स्वरूप मुकुटोज्ज्वल प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष यह है कि—
कोणो के ऊपर का तिलक हटाकर के उस जगह शृग रक्खे । यह सब इच्छित फल देनेवाला
है । ऐसा ऐरावतप्रासाद इन्द्रादि देवों के लिये प्रिय है ॥५५॥
शृंग सख्या— कोणो १२, नंदी पर ८, प्रत्यंग ८, प्ररथे २४, नंदीपर ८, भद्रनन्दी पर ८,
भद्रे १६, एक शिखर, कुल ८५ शृंग । तिलक संख्या—कर्णानन्दी पर ८, प्रति नन्दी पर ८, कुल
१६ तिलक ।
२२-राजहंसप्रासाद—
तथैव तिलकं कुर्याद् भद्रकर्णौ तु शृङ्गकम् ।
राजहंसः समाख्यातः कर्त्तव्यो ब्रह्ममन्दिरे ॥५६॥
इति राजहंसप्रासादः ॥२२॥
इसका तलमान और स्वरूप ऐरावत प्रसाद के अनुसार जाने । विशेष यह है कि—
कोणो के ऊपर तीसरा शृंग के बदले मे एक तिलक चढ़ावें, अर्थात् दो शृंग और एक तिलक
चढ़ावे । तथा भद्रनंदी के ऊपर एक शृंग बढावे । ऐसा राजहंस प्रासाद का स्वरूप है, वह
ब्रह्मा के लिये बनावे ॥५३॥
शृंग सख्या—कोणो ८ प्रत्यंग ८, कर्ण नन्दी पर ८, प्ररथे २४, प्ररथ नंदी के ऊपर ८,
भद्रनन्दी के ऊपर १६, भद्रे १६ और एक शिखर, कुल ८६ शृंग। तिलक सख्या—कोणो ४,
कर्णनंदी पर ८. प्ररथनदी पर ८, एवं कुल २० तिलक ।
२३-पक्षिराज (गरुड) प्रासाद—
रेखोर्ध्वं च ततः शृङ्गं कर्त्तव्यं सर्वकामदम् ।
पक्षिराजस्तदा नाम कर्त्तव्यः स श्रियः पतेः ॥५७॥
इति पक्षिराजप्रासाद ॥२३॥
इस प्रासाद का मान और स्वरूप राजहंस प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष यह कि—
कोणो के ऊपर का तिलक हटा कर के उसके बदले शृग चढावे । ऐसा पक्षिराज प्रासाद विष्णु
के लिये बनाना चाहिये ।५७॥
शृंगसंख्या—कोणो १२, प्रत्यंग ८, कर्णनंदी पर ८, प्ररथे २४, प्ररथनन्दी पर ८,
भद्रनदी पर १६, भद्रे १६ और एक शिखर, एव कुल ९३ शृंग । तिलक संख्या कर्णनन्दी
पर ८ और प्ररथ नन्दी पर ८, एव कुल १६ तिलक ।
चोरुमञ्जरी ।
(Wait, look at "च्छृङ्गोर्ध्वं": च्छृ-ङ्गो-र्ध्वं. Yes, "कुर्या-च्छृङ्गोर्ध्वं चोरुमञ्जरी ।")
Line 17:
द्वे द्वे शृङ्गे उपरथे उरुशृङ्गं षडंशकम् ॥६२॥
Line 18:
भद्रनन्द्यां भवेच्छृङ्गं वेदांशा चोरुमञ्जरी ।
Line 19:
द्विभागं भद्रशृङ्गं च कर्त्तव्यं च मनोरमम् ॥६३॥
Line 20:
सप्तनवत्यण्डकयुक् कर्त्तव्यो लक्षणान्वितः ।
Line 21:
वृषभो नाम विख्यात ईश्वरस्य सदा प्रियः ॥६४॥
Line 22:
इति वृषभप्रासादः ॥२४॥
(It is right-aligned).
Line 23:
शिखर का विस्तार सोलह भाग का करे । कोणो के ऊपर दो शृंग और एक तिलक,
(Notice: "कोणो" without anusvara or with? It is "कोणो", no dot).
Line 24:
प्ररथ ऊपर दो शृंग, उसके ऊपर तीन तीन भाग का प्रत्यंग, रथ के ऊपर तीन शृंग, उपरथ
(Notice: "प्ररथ" - misprint in Hindi for प्रतिरथ).
Line
परिशिष्टे केसरीप्रासादः १८३
२५-मेरुप्रासाद—
कर्णे शृङ्गत्रयं चैव एकोत्तरशताण्डकः ।
मेरुश्चापि समाख्यातः कर्तव्यश्च त्रिमूर्त्तिके ॥६५॥
यह मेरु प्रासाद का मान और स्वरूप वृषभ प्रासाद के
अनुसार जाने । विशेष यह है कि—वृषभ प्रासाद के कोणो के
ऊपर का तिलक हटा कर के उसके बदले शृंग चढ़ावे । यह
एक सौ एक शृंग वाला मेरु प्रासाद ब्रह्मा, विष्णु और महेश के
लिये बनावे ॥६५॥
शृंग सख्या—कोणे १२, प्रत्यंग ८, प्रत्यथे १६, रथे २४,
उपरथे १६, भद्रनन्दी के ऊपर ८, भद्रे १६, और एक शिखर,
एव कुल १०१ शृंग ।
मेरुप्रासाद की प्रदक्षिणा का फल—
सर्वस्य हेममेरोश्च यत्पुण्यं त्रिप्रदक्षिणैः ।
कृते शैलेष्टकामिश्च तत्पुण्याल्लभतेऽधिकम् ॥६६॥
सम्पूर्ण सुवर्णमय मेरु की तीन प्रदक्षिणा करने से जो
पुण्य होता है, उस पुण्य से भी अधिक पुण्य पाषाण अथवा ईंट
के बने हुवे मेरु प्रासाद की प्रदक्षिणा करने से होता है ॥६६॥
हरो हिरण्यगर्भश्च हरिर्दिनकरस्तथा ।
एते देवाः स्थिता मेरौ नान्येषां स कदाचन ॥६७॥
इति श्रीसूत्रसन्तानगुणकीर्त्तिप्रकाशप्रद्योतकारे श्रीभुवनदेवाचार्यो-
क्तापराजितपृच्छायां केसर्यादिसान्धारप्रासादनिर्णयाधिकारो
नामैकोनषष्ट्युत्तरशततमं सूत्रम् ॥
महादेव, ब्रह्मा, विष्णु और सूर्य, इन देवो को मेरु प्रासाद मे प्रतिष्ठित किये जाते है ।
अन्य दूसरे देवो को कभी भी उसमे प्रतिष्ठित नही करना चाहिये ॥६७॥
इति पंडित भगवानदास जैन अनुवादित केसरी आदि
पचीस साधार प्रासाद निर्णयाधिकार समाप्त ।
परिशिष्ट नं. २
अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः ।
जय उवाच-
शृणु तात ! महादेव ! यन्मया परिपृच्छ्यते ।
प्रासादांश्च जिनेन्द्राणां कथयसि किं मां प्रभो ! ॥१॥
हे महादेव ! पिता मैने आपको जिनेन्द्र के प्रासादों का वर्णन करने का कहा था, उसको
हे भगवन् ! आप सविस्तार कहेगे ? ॥१॥
किं तलं किञ्च शिखरं किं द्विपञ्चाशदुत्तमाः ।
समोसरणं किं तात ! किं स्यादष्टापदं हि तत् ॥२॥
महीधरो मुनिवरो द्विधारिणी सुशोभिता ।
हे तात ! उत्तम बावन जिनालय किस प्रकार के है ? तथा उनके तथा शिखरों की रचना
कैसी है ? समवसरण, अष्टापद, महीधर, मुनिवर और शाभायमान द्विधारिणी' प्रासादों की
रचना कैसी है ? उसका आप वर्णन करे ॥२॥
श्रीविश्वकर्मोवाच-
शृणु वत्स ! महाप्राज्ञ यत्त्वया परिपृच्छ्यते ।
प्रासादांश्च जिनेन्द्राणां कथयाम्यहं तच्छृणु ॥३॥
श्री विश्वकर्मा अपने जयनाम के पुत्र को सम्बोधन करके कहते है कि-हे महा बुद्धिमान्
पुत्र ! तुमने जिनेन्द्रो के प्रासादो का वर्णन के लिये पूछा, उसको विस्तार पूर्वक कहता हूँ,
सुनो ॥३॥
प्रासादमध्ये मेरवो भद्रप्रासादनागराः ।
अन्तका द्राविडाश्चैव महीधरा लतिनास्तथा ॥४॥
उत्तम जाति के प्रासादो मे मेरुप्रसाद, नागर जाति के भद्रप्रासाद, अंतकप्रासाद, द्राविड़
प्रासाद, महीधर प्रासाद और लतिन जाति का प्रासाद, ये उत्तम जाति के प्रासाद हैं ॥४॥