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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 226

परिशिष्टे केसरीप्रासाद. १७७
यह महानील प्रासाद का तलमान और स्वरूप इन्द्रनील प्रासाद के अनुसार जानें ।
विशेष यह है कि—कर्णनन्दी के ऊपर से तिलक हटा करके उसके बदले शृंग रक्खे । ऐसा
महानील प्रासाद सब देवों के लिये बनावे ॥३८॥
शृंग संख्या—कोणे ४, नंदी पर ८, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे १६, नन्दी पर ८ भद्रे १२ और
एक शिखर, कुल ५७ शृंग और तिलक ४ कोणे ।
१५—भूधरप्रासाद—
कार्यं शृङ्गं च तिलकं रेखामध्ये प्रशस्यते ।
भूधरस्य समाख्यातः प्रासादो देवालयः ॥३६॥
इति भूधरप्रासादः ॥१ ॥
यह प्रासाद का मान और स्वरूप महानील प्रासाद के
अनुसार जाने । विशेष यह कि—कोणे के ऊपर एक शृंग अधिक
चढ़ावे तो यह भूधर नाम का प्रासाद देवोका स्थानरूप
होता है ॥३६॥
शृंग संख्या—कोणे ८, बाकी पूर्ववत् जाने । तिलक ४
कोणे ।
१६—रत्नकूटप्रासाद—
भूधरस्य यथा प्रोक्तं द्विभागं वर्धयेत् पुनः ।
पूर्ववद्दलसंख्यायां भद्रपार्श्वे द्विनन्दिके ॥४०॥
द्विभागं बाह्यभित्तिश्च शेषं पूर्वप्रकल्पितम् ।
तलच्छन्दमिति ख्यात-मूर्ध्वमानमतः शृणु ॥४१॥
यह रत्नकूट प्रासाद का मान और स्वरूप भूधर प्रासाद
के अनुसार जाने । विशेष यह कि—तल मानमे दो भाग बढ़ावे
अर्थात् अठारह भाग करे । तथा भद्र के दोनो तरफ एक २
भाग की दूसरी नन्दी बनावें । और बाहर की दीवार दो भागकी
रक्खे । बाकी सब पहले के अनुसार जानें । अब ऊर्ध्वमान
सुनिये ॥४०-४१॥


[रेखाचित्र-पाठ / आलेख टिप्पणी]

(कोणे, कर्णपर प्रासाद २४, मध्यमे ४४, प्रत्यङ्गे ४५, शिखरे ७७)
मंदिर, कुण्डण
मध्यमप्रस्तरे रूपौ.
प्रा० २३