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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

जेसलमेर जैन मंदिर के मडप की सवरणा

कीर्त्ति स्तंभ - चितौड़गढ

सप्तमोऽध्यायः १४१
तद्रूपा भद्रकूटाश्च श्रृङ्गकूटास्तदर्धतः ।
सिंहस्थाना कर्णघण्टी बृहद्घण्टी तदूर्ध्वतः ॥
संवरणागर्भमूले रथिका द्वयं‍शविस्तरा ।
भागैका चोदये कार्या भागा पक्षतवङ्गिका ॥
तदूर्ध्वे उद्गमो भाग-स्तवङ्गोर्ध्वे च कूटकः ।
सिंह वै उद्गमोर्ध्वे तु उरोघण्टा भागोपरि ॥
तदुपरि सिंहस्थानं भागेकं च विनिर्गतम् ।
तस्योपरि मूलघण्टा द्विभागा च भागोच्छ्रया ॥
अष्टसिंहेः पञ्चघण्टैः कूटैरेवं द्विरष्टभिः ।
चतुर्भिर्मूलकूटश्च पुष्पिका नाम नामतः ॥”
..... 'छज्जा के उद्गम के अर्धमान का कोने कोने के ऊपर घंटिका रक्खे । उसके जैसा भद्र
का कूट बनावे व इससे आधे भाग का शृंगकूट रक्खे । कर्णघंटी पर सिंह रक्खें । उसके ऊपर
बीच में बड़ी घंटो रक्खें । संवरणा के गर्भ के मूल मे दो भाग के विस्तार वालो रथिका बनावें
और यह उदय मे एक भाग की रक्खे । इसके दोनो तरफ तवंगा एक एक भाग की रक्खें और
रथिका के ऊपर एक भाग उदय वाला उद्गम बनावे । तवंगा के ऊपर कूट रक्खें । उद्गम और बडी
कर्णघंटी के ऊपर सिह रक्खे, उसका निर्गम एक भाग रक्खे । उसके ऊपर दो भाग के
विस्तारवाली और एक भाग का उदय वाली मूलघंटा रक्खे । आठसिंह (चार कर्ण और चार
भद्र के उद्गम ऊपर) पाच बडी घंटी, सोलह कूट और चार मूलकूट वाली प्रथम पुष्पिका
नाम की संवरणा होती है ।
दूसरो नन्दिनी नाम की सवरणा—
"तवङ्गकूटयोर्मध्ये तिलकं द्वयं‍शविस्तरम् ॥
भागोदयं विधातव्यं रूपसंघाटभूषितम् ॥
तवङ्गरथिकाश्चैव द्विभागोदयिन. स्मृताः ।
अष्टचत्वारिंशत्कूटा मूले स्युः पूर्ववत्तथा ॥
नवघण्टा समायुक्ता स्याद्वै द्वादशसिंहतः ।
नन्दिनी नामविख्याता कर्तव्या शान्तिमिच्छता ॥
कार्या तिलकवृद्धिश्च यावत्क्षेत्रं वेदास्रकम् ।
मण्डपवलनिष्कासे-र्भक्तिभागेस्तु कल्पना ॥

• १५२ प्रासादमण्डने
बृहद्हलैर्भिन्नोद्भिन्ना मण्डपक्रमभागतः ।
आसां युक्तिर्विधातव्या मेरूकूटान्तकल्पना ॥
तवंग और कूटके मध्य में दो भाग
के विस्तारवाला और एक भाग के उदय
वाला तलके भूषणरूप तिलक बनावें ।
तवंगा और रथिका ये दोनों दो भाग के
उदयवाले बनावें । अड़तालीस कूटा,
नवघण्टा और बारह सिंह वाली नन्दिनी
नाम की संवरणा शांति की इच्छा
रखने वाले बनावें। समचोरस क्षेत्र के
भागों में तिलककी वृद्धि करनी चाहिये ।
मंडप को विस्तार से आधा उदय में
रखें। भूमि के बारह भाग की कल्पना
करे। संवरणायें भिन्न और उद्भिन्न
[चित्र-शीर्षक: १३ वामी सैन्यधी की पुरानी संवारणी वल्लभी-शैली]
[पुरातत्त्व प्रो. सांकलि.]
होती हैं। मण्डप के अनुक्रम भाग से
पचीसवीं मेरुकूटा नाम की संवरणा
तक इस प्रकार युक्ति से अन्य संवरणायें
बनावें ।
इति श्री मंडनसूत्र धार विरचित
प्रासादमंडन के मंडप बलाणक संव-
रणा लक्षणवाला सातवां अध्याय की
पंडित भगवानदास जैन ने सुबोधिनी
नाम की भाषा टीका रची ॥७॥
★

अथ प्रासादमण्डनेऽष्टमः साधारणोऽध्यायः
अथ साधारणोऽध्यायः सर्वलक्षणसंयुतः ।
विश्वकर्मप्रसादेन विशेषेण प्रकथ्यते ॥१॥
श्री विश्वकर्मा के प्रसाद से सर्व लक्षणों वाला साधारण नाम का यह आठवां अध्याय
कुछ विशेषरूप से कहा जाता है ॥१॥
शिवलिंग का न्यूनाधिक मान—
'मानं न्यूनाधिकं वापि स्वयंभूबाणरत्नजे ।
घटितेषु विधातव्य-मर्चालिङ्गेषु शास्त्रतः ॥२॥
स्वयंभूलिंग, बाणलिंग और रत्नका लिंग, ये मान मे न्यूनाधिक हो तो दोष नही है ।
परन्तु घड़ा हुआ शिवलिंग और मूर्ति तो शास्त्र मे कहे हुए मानानुसार ही होना चाहिये ॥२॥
वास्तुदोष—
बहुलेपमल्पलेपं समसन्धिः शिरोगुरुः ।
सशव्यं पादहीनं तु तच्च वास्तु विनश्यति ॥३॥
अधिक लेपवाला, कम लेपवाला, सांध के ऊपर सांध वाला, उपरका हिस्सा मोटा और
नीचे पतला, शल्यवाला और कम नीव वाला, ऐसे वास्तु का शीघ्र ही नाश हो जाता है ॥३॥
निषेधवास्तुद्रव्य—
अन्यवास्तुच्युतं द्रव्य-मन्यवास्तुनि योजयेत् ।
प्रासादे न भवेत् पूजा गृहे तु न वसेद् गृही ॥४॥
किसी मकान आदि का गिरा हुआ ईंट, चूना, पाषाण और लकडी आदि वास्तु द्रव्य,
यदि मंदिर मे लगावें तो देव अपूजित रहें और घरमे लगावे तो मालिक का निवास न रहे,
अर्थात् मंदिर और गृह शून्य रहे ॥४॥
१ 'मान' के स्थान पर 'वृष' होना चाहिये । क्योकि अपराजित पृच्छा सूत्र० १०६ श्लो० ११ मे लिखा है
कि—'वृष न्यूनाधिकं वाणे रत्नजे च स्वयम्भुवि' अर्थात् बाण, रत्न और स्वयम्भूलिंग के मंदिर में नंदी
का मान न्यूनाधिक भी हो सकता है ।

१४४ प्रासादमण्डने
शिवालय उत्थापनदोष—
स्वस्थाने संस्थितं यस्य विप्रवास्तुशिवालयम् ।
अचाल्यं सर्वदेशेषु चालिते राष्ट्रविभ्रमः ॥५॥
अपने स्थान मे यथास्थित रहा हुआ और ब्राह्मणों से वास्तु पूजन किया हुआ, ऐसे
शिवालय को चलायमान नही किया जाता । क्योंकि अचल ( चलायमान न हो ), को यदि
चलायमान किया जाय तो राष्ट्रों मे परिवर्त्तन होता है ॥५॥
जीर्णोद्धार का पुण्य—
वापीकूपतडागानि प्रासादभवनानि च ।
जीर्णान्युद्धरते यस्तु पुण्यमष्टगुणं लभेत् ॥६॥
वावडी, कुआं, तालाब, प्रासाद ( मंदिर ) और भवन, ये जीर्ण हो गये हों तो उनका
उद्धार करना चाहिये । जीर्णोद्धार करने से आठ गुना फल होता है ॥६॥
जीर्णोद्धार का वास्तु स्वरूप—
तद्रूपं तत्प्रमाणं स्यात् पूर्वसूत्रं न चालयेत् ।
हीने तु जायते हानि-रधिके स्वजनक्षयः' ॥७॥
जीर्णोद्धार करते समय पहले का वास्तु जिस आकार और जिस मानका हो, उसी
आकार और उसी मानका रखना चाहिये । अर्थात् पहले के मानसूत्र मे परिवर्त्तन नही करना
चाहिये । प्रथम के मान से कम करे तो हानि होवे और अधिक करे तो स्वजन की
हानि होवे ॥७॥
वास्तु द्रव्याधिकं कुर्यान्मृत्काष्ठे शैलजं हि वा ।
शैलजे धातुजं वापि धातुजे रत्नजं तथा ॥८॥
जीर्णोद्धार करते समय प्रथम का वास्तु अल्पद्रव्य का हो तो वह अधिक द्रव्यका बनाना
चाहिये । जैसे—प्रथमका वास्तु मिट्टी का हो तो काष्ठ का, काष्ठ का हो तो पाषाण का, पाषाण
का हो तो धातु का और धातु का हो तो रत्न का बनाना श्रेयस्कर है ॥८॥
दिङ्‌मूढ दोष—
पूर्वोत्तरदिशामूढं मूढं पश्चिमदक्षिणे ।
तत्र मूढममूढं वा यत्र तीर्थं समाहितम् ॥६॥
१. 'तु धनक्षयः ।'

पूर्वोत्तर दिशा ( ईशान कोन ) अथवा पश्चिम दक्षिण दिशा ( नैर्ऋत्य कोन ) मे
प्रासाद टेढा हो तो दिङ्मूढ दोष नही माना जाता। जैसे तीर्थ स्थान में प्रासाद के मूढ और
अमूढ का दोष नहीं माना जाता ॥९॥
"पूर्वपश्चिमदिङ्मूढं वास्तु स्त्रीनाशकं स्मृतम् ।
दक्षिणोत्तरदिङ्मूढं सर्वनाशकरं भवेत् ॥" अप० सू० ५२
पूर्व पश्चिम दिशा का वास्तु अग्नि और वायु कोनमे दिङ्मूढ हो तो स्त्री का विनाश
कारक है। दक्षिणोत्तर दिशा का वास्तु भी अग्नि और वायुकोन मे दिङ्मूढ हो तो सर्व
विनाश कारक है।
दिङ्मूढ का परिहार—
सिद्धायतनतीर्थेषु नदीनां सङ्गमेषु च ।
स्वयम्भूबाणलिङ्गेषु तत्र दोषो न विद्यते ॥१०॥
सिद्धायतन अर्थात् सिद्ध पुरुषों का निर्वाण, अग्नि संस्कार, जल संस्कार अथवा भूमि-
संस्कार हुआ हो ऐसे पवित्र स्थानो मे, तथा च्यवन, जन्म, दीक्षा ज्ञान और मोक्ष संस्कार
हुआ हो, ऐसे तीर्थस्थानो मे, नदी के संगम स्थान मे, बनाया हुआ प्रासाद तथा स्वयंभू और
बाण लिंगो के प्रासाद, ये दिङ्मूढ हो तो दोष नही है ॥१०॥
अव्यक्त प्रासाद का चालन—
अव्यक्तं¹ मृण्मयं चाल्यं त्रिहस्तान्तं तु शैलजम् ।
दारुजं पुरुषार्द्धं हि अत ऊर्ध्वं न चालयेत् ॥११॥
यदि अव्यक्त जीर्ण प्रासाद मिट्टी का हो तो गिरा करके फिर बनावे, पाषाण का हो तो
तीन हाथ तक और लकडी का हो तो आधे पुरुष के मान तक ऊंचा रहा हो तो चलायमान
करे। इससे अधिक ऊंचाई मे रहा हो तो चलायमान न करे ॥११॥
महापुरुष स्थापित देव—
विषमस्थानमाश्रित्य भग्नं यत्स्थापितं पुरा ।
तत्र स्थाने स्थिता देवा भग्नाः पूजाफलप्रदाः ॥१२॥
प्राचीन महापुरुषोंने जो देव स्थापित किये हैं, वे विषमासन वाले हो, अथवा खंडित
हों तो भी पूजनीय है। क्यो कि उस स्थान पर देवो का निवास है, इसलिये वे देवमूर्तिया पूजन
का फल देनेवाली है ॥१२॥
१. 'व्यक्तं तु' ऐसा अपराजितपृच्छा सूत्र ११० मे पाठ है।
प्रा० १६

१४६ प्रासादमण्डने
यद्यथा स्थापितं वास्तु तत्तथैव हि कारयेत् ।
अव्यङ्गं चालितं वास्तु दारुणं कुरुते भयम् ॥१३॥
प्राचीन महापुरुषोंने जो वास्तु स्थापित किया है, उसका यदि जीर्णोद्धार किया जाय तो
जैसा पहले हो वैसा ही करना चाहिये । जीर्ण वास्तु यदि अंगहीन न हुआ हो तो ऐसे वास्तु को
चलायमान करने से बड़ा भयंकर भय उत्पन्न होता है ॥१३॥
अथ तच्चालयेत् प्राज्ञै–जीर्णं व्यङ्गं च दूषितम् ।
आचार्यशिल्पिभिः प्राज्ञैः शास्त्रदृष्ट्या समुद्धरेत् ॥१४॥
यदि प्राचीन वास्तु जीर्ण हो गया हो अथवा अंगहीन होकर दोषवाला हो गया हो तो
उसका विद्वान् आचार्य और शिल्पियों की सलाह लेकर शास्त्रानुसार उद्धार करना
चाहिये ॥१४॥
जीर्णवास्तु पातन विधि—
स्वर्णजं रौप्यजं वापि कुर्यान्नागमथो वृषम् ।
तस्य शृङ्गेण दन्तेन पतितं पातयेत् सुधीः ॥१५॥
इति जीर्णोद्धार विधिः ।
जीर्णोद्धार के आरंभ के समय सोना अथवा चांदी का हाथी अथवा वृषभ बनावें ।
उस हाथी के दांत से अथवा वृषभ के शृंग से जीर्णवास्तु को गिरावे । उसके बाद बुद्धिमान
शिल्पी सब गिरा देवें ॥१५॥
महादोष—
मण्डलं जालकं चैव कीलकं सुषिरं तथा ।
छिद्रं सन्धिश्च काराश्च महादोषा इति स्मृताः ॥१६॥
देवालय में चूना उतर जाने से मंडलाकार लकीरे दीखती हों, मकड़ी के जाले लगे हों,
कीले लगी हों, पोलाण हो गया हों, छिद्र पड़ गये हों, सांध दीख पड़ती हों और कारागृह बन
गया हो, तो ये महादोष माने गये है ॥१६॥
शिल्पिकृत महादोष—
“दिङ्मूढो नष्टछन्दश्च आयहीनः शिरोगुरुः ।
ज्ञेया दोषास्तु चत्वारः प्रासादाः कर्मदारुणाः ॥” अप० सू० ११०

ऽष्टमोऽध्यायः १४७
यदि प्रासाद दिङ्मूढ हो गया हो, नष्टछंद हो अर्थात् यथा स्थान प्रासाद के अंगोपांग न
हो, आय हीन हो और ऊपर का भाग भारी व नीचे का पतला हो तो उन्हे प्रासाद के चार
भयंकर महादोष शिल्पिंकृत माना हैं।
भिन्न और अभिन्न दोष— -
भिन्नदोषकरं यस्मात् प्रासादमठमन्दिरम् ।
मूषाभिर्जालकैद्वारै रश्मिवातैः प्रभेदितम् ॥१७॥
प्रासाद ( देवालय ), मठ (आश्रम) और मंदिर (गृह), इनका गर्भगृह यदि मूषा (लंबा
अलिंद) से, जालियो से अथवा दरवाजे से आते हुए सूर्य की किरणो से वेधित होता हो तो भिन्न
दोष माना जाता है ॥१७॥
अपराजितपृच्छा सूत्र ११० में कहा कि—
"मूषाभिर्जालकैद्वारै-गर्भो यत्न न भिद्यते ।
अभिन्नं कथ्यते तच्च प्रासादो वेश्म वा मठः ॥"
प्रासाद, गृह और मठ का गर्भगृह मूषा, जालि और द्वार से आते हुए सूर्य किरणों से

१४८ प्रासादमण्डने
व्यक्ताव्यक्त प्रसाद—
व्यक्ताव्यक्तं गृहं कुर्याद् भिन्नाभिन्नस्य मूर्त्तिकम् ।
यथा स्वामिशरीरं स्यात् प्रासादमपि तादृशम् ॥१६॥
इति भिन्नदोषाः ।
उपरोक्त भिन्न और अभिन्न दोषवाली देवमूर्तियों के लिये व्यक्त और अव्यक्त प्रासाद
बनावे । अर्थात् भिन्न दोष रहित देवों के लिये प्रकाश वाले और भिन्न दोषवाले देवों के
लिये अंधकारमय प्रासाद बनावें । जैसे स्वामी अपने शरीर के अनुकूल गृह बनाता है, वैसे देवों
के अनुकूल प्रासाद बनाना चाहिये ॥१६॥
अपराजित पृच्छा सूत्र ११० में कहा है कि—
“व्यक्ताव्यक्तं लयं कुर्यादभिन्नाभिन्नमूर्त्तयोः ।
मूर्त्तिलक्षणाजं स्वामो प्रासादं तस्य तादृशम् ॥”
भिन्न दोषो से रहित शिव आदि की देव मूर्तियों के लिये व्यक्त ( प्रकाशवाले ) प्रासाद
बनावें और भिन्न दोषवाली गौरी आदि की देव मूर्तियों के लिये अव्यक्त (अंधकारमय) प्रासाद
बनावे ।
महामर्मदोष—
'भिन्नं चतुर्विधं ज्ञेय-मष्टधा मिश्रकं मतम् ।
मिश्रकं पूजितं तत्र भिन्नं वै दोषकारकम् ॥२०॥
छन्दभेदो न कर्त्तव्यो जातिभेदोऽपि वा पुनः ।
उत्पद्यते महामर्म जातिभेदकृते सति ॥२१॥
भिन्नदोष चार प्रकार के और मिश्रदोष आठ प्रकार के है। उनमे मिश्रदोष पूजित
( शुभ ) है और भिन्नदोष दोषकारक है। छंदभेद-जैसे छंदो में गुरु लघु यथावस्थान न होने से
छंद दूषित होता है, वैसे प्रासाद की अंगविभक्ति नियमानुसार न होनेसे प्रासाद दूषित होता है।
जातिभेद-प्रासाद की अनेक जातियों मे से पीठ आदि एक जाति की और शिखर आदि दूसरी
जाति का बनाया जाय तो जातिभेद होता है। ऐसा जातिभेद करने से बड़ा मर्मदोष उत्पन्न
होता है ॥२०-२१॥
१. भिन्नदोष जानने के लिये देखो अपराजित पृच्छा सूत्र ११० और मिश्रदोष जानने के लिये देखो
अप० सूत्र ११४ श्लो० १ से ६ ।

ऽष्टमोऽध्यायः १४६
अन्यदोष फल—
द्वारहीने हनेच्चक्षु-र्नालीहीने धनक्षयः ।
अपदे स्थापिते स्तम्भे महारोगं विनिर्दिशेत् ॥२२॥
द्वार मान मे हीन हो तो नेत्र की हानि, नाली (जलमार्ग) हीन हो तो धन का क्षय और
स्तंभ अपदमे रखा जाय तो महारोग होता है ॥२२॥
स्तम्भन्यासोदये हीने कर्त्ता तत्र विनश्यति ।
प्रासादे पीठहीने तु नश्यन्ति गजवाजिनः ॥२३॥
स्तंभ का मान विस्तार में अथवा उदय मे हीन हो तो कर्त्ता का विनाश होता है।
प्रासाद की पीठ मानमे हीन हो तो हाथी घोडा आदि बाहनों की हानि होती है ॥२३॥
रथोपरथहीने तु प्रजापीडां विनिर्दिशेत् ।
कर्णहीने सुरागारे फलं क्वापि न लभ्यते ॥२४॥
प्रासाद के रथ और उपरथ आदि अंग मानमे हीन हो तो प्रजा को पीडा होती है।
यदि कोना मानमे हीन हो तो पूजन का फल कभी भी नही मिलता ॥२४॥
जङ्घाहीने हरेद् बन्धून् कर्त्तृकारापरादिकान् ।
शिखरे हीनमाने तु पुत्रपौत्रधनक्षयः ॥२५॥
प्रासाद की जंघा प्रमाण से हीन हो तो करने कराने वाले और दूसरे की हानि होती है।
जो शिखर प्रमाण से न्यून हो तो पुत्र, पौत्र और धनकी हानि होती है ॥२५॥
अतिदीर्घे कुलच्छेदो ह्रस्वे व्याधिर्विनिर्दिशेत् ।
तस्माच्छास्त्रोक्तमानेन सुखदं सर्वकामदम् ॥२६॥
शिखर यदि मान से अधिक लंबा हो तो कुल की हानि होती है और मान से छोटा
होवे तो रोग उत्पन्न होते है । इसलिये शास्त्र मे कहे हुए मानके अनुसार ही प्रासाद बनावे तो
यह सर्व इच्छित फलको देनेवाला होता है ॥२६॥
जगत्यां रोपयेच्छालां शालायां चैव मण्डपम् ।
मण्डपेन च प्रासादो ग्रस्तो वै दोषकारकः ॥२७॥
इति दोषा. ।
जगती मे शाला (चौकी मंडप) बनाना, उस शाला मे मंडप और मंडप मे प्रासाद ग्रस्त
हो तो दोषकारक है ॥२७॥

१५० प्रासादमण्डने
छाया भेद—
प्रासादोच्छ्रायविस्तारा-ज्जगती वामदक्षिणे ।
छायाभेदा न कर्त्तव्या यथा लिङ्गस्य पीठिका ॥२८॥
प्रासाद के उदय और विस्तार के अनुसार बायीं और दाहिनी और जगती शास्त्रमान के
अनुसार रखना चाहिये । ऐसा न करें तो छायादोष होता है, क्योंकि जैसे शिवलिंग की पीठिका
रूप जगती हैं, वैसे प्रासाद रूप लिंग की जगतीरूप पीठिका है ॥२८॥
देवपुर, राजमहल और नगर का मान—
जगत्यां त्रिचतुःपञ्च-गुणं देवपुरं त्रिधा ।
एकद्विवेदसाहस्रै-र्हस्तैः स्याद् राजमन्दिरम् ॥२६॥
कलाष्टवेदसाहस्रै-र्हस्तै राजपुरं समम् ।
दैर्घ्ये तुल्यं सपादांशं सार्थांशेनाधिकं शुभम् ॥३०॥
जगती मे तीन, चार अथवा पांच गुणा देवपुर का मान है। एक, दो अथवा चार हजार
हाथ का राजमहल का मान है और सोलह आठ अथवा चार हजार हाथ का राजपुर
( राजधानी वाला नगर ) का मान हैं। ये दरेक का तीन २ प्रकार का मान जानें । लंबाई मे
विस्तार के बराबर अथवा सवाया तथा डेढा मान का रखना शुभ है ॥२६-३०॥
राजनगर में देवस्थान—
द्वादश त्रिपुराणि स्यु-र्देवस्थानानि चत्वरे ।
षट्त्रिंशत् षड्भिर्वृद्ध्या यावदष्टोत्तरं शतम् ॥३१॥
पुरं प्रासादगृहैः स्यात् सौधैर्जालगवाक्षकैः ।
कीर्त्तिस्तम्भैर्जल्लारामै-र्गढैर्मंडैश्च¹ शोभितम् ॥३२॥
इति देवपुरराजपुराणि ।
राजनगर के चौरास्ते मे बारह त्रिपुर ( छत्तीस ) देवस्थान है। छत्तीस से छह २
बढ़ाते हुए एकसो आठ तक बढ़ावे, उतने देवस्थान है। यह नगर देव प्रासादों से, जाली और
गवाक्षवाले राजमहलो से और गृहों से कीर्त्तिस्तंभों से, कुआं, वावड़ी आदि जलाशयों से, किला
और मंडपों से शोभित होता है ॥३१-३२॥
१. 'गेंहै ।'

ऽष्टमोऽध्यायः १५१
आश्रम और मठ—
प्रासादस्योत्तरे याम्ये तथाग्नौ पश्चिमेऽपि वा ।
यतीनामाश्रमं कुर्यान्मठं तद्वित्रिभूमिकम् ॥३३॥
प्रासाद के उत्तर अथवा दक्षिण दिशा में, तथा अग्निकोन मे या पिछले भाग मे यतियों
का आश्रम तथा ऋषियो का मठ, दो या तीन मंजिल बनावे ॥३३॥
द्विशालमध्ये षड्दारुः पट्टशालाग्रे शोभिता ।
मत्तवारणमग्रे च तदूर्ध्वं पट्टभूमिका ॥३४॥
आश्रम के दोशाला के मध्य में षड्दारु (आमने सामने की दीवार मे दो दो स्तंभ और
उसके ऊपर एक २ एक २ पाट, ऐसा षड्दारु कहा जाता है) रक्खे । द्विशाला के आगे सुशोभित
पट्टशाला (बरामदा) बनावे और उसके आगे कटहरा बनावे । उसके ऊपर पट्टभूमिका
(चंद्रशाला-खुली छत) रक्खें ॥३४॥
स्थान विभाग—
कोष्ठागारं च वायव्ये वह्निकोणे महानसम् ।
पुष्पगेहं तथेशाने नैर्ऋत्ये पात्रमायुधम् ॥३५॥
सत्रागारं च पुरतो वारुण्यां च जलाश्रयम् ।
मठस्य¹ पुरतः कुर्याद् विद्याव्याख्यानमण्डपम् ॥३६॥
इति मठः ।
मठ के वायुकोने मे धान्य का कोठार, अग्निकोने मे रसोड़ा, ईशान कोने में पुष्पगृह
(पूजोपकरण), नैर्ऋत्य कोने में पात्र और आयुध, आगे के भाग में यज्ञशाला और पश्चिम
दिशामे जलस्थान बनावे । एवं मठ के आगे पाठशाला और व्याख्यान मंडप बनावे ॥३५-३६॥
प्रतिष्ठा मुहूर्त्त—
पूर्वोक्ता सप्तपुण्याह-प्रतिष्ठा सर्वसिद्धिदा ।
रवौ² सौम्यायने कुर्याद् देवानां स्थापनादिकम् ॥३७॥
प्रथम अध्ययन के श्लोक ३६ में जो सात पुण्य दिन कहे गये है । उनकी प्रतिष्ठा सर्वसिद्धि
को देनेवाली है। जब सूर्य उत्तरायन मे हो तब देवो की प्रतिष्ठा आदि शुभ कार्य करना
चाहिये ॥३६॥
१. 'मठस्योपरितः ।' २. 'रवेः' ।

१५२ प्रासादमण्डने
प्रतिष्ठा के नक्षत्र—
प्रतिष्ठा चोत्तरा मूल आर्द्रायां च पुनर्वसौ ।
पुष्ये हस्ते मृगे स्वातौ रोहिण्यां श्रुतिमैत्रभे ॥३८॥
तीन उत्तरा नक्षत्र, मूल, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, मृगशीर्ष, स्वाति, रोहिणी, श्रवण
और अनुराधा, ये नक्षत्र देव प्रतिष्ठा के कार्य मे शुभ हैं ॥३८॥
प्रतिष्ठा में वर्जनीय तिथि—
तिथिरिक्तां कुजं धिष्ण्यं क्रूरविद्धं विधुं तथा ।
दग्धातिथिं च गण्डान्तं चरभोपग्रहं त्यजेत् ॥३६॥
रिक्तातिथि, मंगलवार, क्रूरग्रह से वेधित अथवा युत नक्षत्र और चंद्रमा, दग्धातिथि,
नक्षत्र, मास, तिथि और लग्न आदिका गंडांतयोग, चर राशि और उपग्रह ये सब प्रतिष्ठा
कार्य मे वर्जनीय हैं ॥३६॥
सुदिने शुभनक्षत्रे लग्ने सौम्ययुतेक्षिते ।
अभिषेकः प्रतिष्ठा च प्रवेशादिकमिष्यते ॥४०॥
शुभदिनमे, शुभ

ऽष्टमोऽध्यायः १५३
सोलह स्तंभ वाला और तोरणों से शोभायमान बनावे । तथा मंडप के मध्य मे वेदिका और
पाच, आठ अथवा नव यज्ञ कुण्ड बनावे ॥४१ से ४३॥
यज्ञकुण्ड का मान—
हस्तमात्रं भवेत् कुण्डं मेखलायोनिसंयुतम् ।
आगमैर्वेदमन्त्रैश्च होमं कुर्याद् विधानतः ॥४४॥
तीन मेखला और, योनि से युक्त ऐसा एक हाथ के मानका यज्ञकुण्ड बनावे । उसमे
आगम और वेद के मंत्रो से विधिपूर्वक होम करे ॥४४॥
आहुति संख्या से कुण्डमान—
अयुते हस्तमात्र स्याद् लक्षार्द्धं तु द्विहस्तकम् ।
त्रिहस्तं लक्षहोमे स्याद् दशलक्षे चतुष्करम् ॥४५॥
त्रिशल्लक्षे पञ्चहस्तं कोट्यर्द्धं षट्करं मतम् ।
अशीतिलक्षेऽद्रिकरं कोटिहोमे कराष्टकम् ॥४६॥
ग्रहपूजाविधाने च कुण्डमेककरं भवेत् ।
मेखलास्त्रितयं वेद-रामयुग्माङ्गुलैः क्रमात् ॥४७॥*
दस हजार आहुति के लिये एक हाथ का, पचास हजार आहुति के लिये दो हाथ का, एक
लाख आहुति के लिये तीन हाथ का, दस लाख आहुति के लिये चार हाथ का, तीस लाख
आहुति के लिये पाच हाथ का, पचास लाख आहुति के लिये छह हाथ का, अस्सी लाख आहुति
के लिये सात हाथ का और एक करोड आहुति देना हो तो आठ हाथ का कुण्ड बनावे । ग्रहपूजा
आदि के विधान मे एक हाथ के मान का कुण्ड बनावे । कुण्ड की तीन मेखला क्रमश. चार,
तीन और दो अंगुल के मान को रखें ॥४५ से ४७॥
दिशानुसार कुण्डों की आकृति—
“प्राच्याञ्चतुष्कोणभगेन्दुखण्ड-त्रिकोणवृत्ताङ्गभुजाग्बुजानि ।
अष्टास्रिशक्रेश्वरयोस्तु मध्ये, वेदास्रि वा वृत्तमुशन्ति कुण्डम् ॥”३२॥
इति मंडपकुं डसिद्धौ
पूर्व दिशा मे समचोरस, अग्निकोण मे योन्याकार, दक्षिण दिशा मे अर्द्धचन्द्र, नैऋ-
त्यकोण मे त्रिकोण, पश्चिमदिशा में गोल, वायव्यकोण मे छह कोण, उत्तर में अष्टदल पद्माकार

  • विशेष जानने के लिये देखो अपराजितपृच्छा सूत्र १४१ ।
    प्रा० २०

१५४ प्रासादमण्डने
और ईशानकोणमे अष्टकोण, ये आठ पूर्वदिशासे ईशानकोण तक आठ दिक्पालों के कुण्ड है ।
तथा पूर्व और ईशान के मध्य भाग मे नवा प्राचार्य कुण्ड गोल अथवा समचोरस बनावें ।
'विशेष जानने के लिये देखे मंडपकुं'डसिद्धि आदि ग्रंथ ।'
मंडल—
एकद्वित्रिकरं कुर्याद् वेदिकोपरि मण्डलम् ।
ब्रह्मविष्णुरवीणां च सर्वतोभद्रमिष्यते ॥४८॥
वेदिकाके ऊपर एक, दो अथवा तीन हाथ के मानका मंडल बनावें । ब्रह्मा, विष्णु और
सूर्य की प्रतिष्ठा मे सर्वतोभद्र नामका मंडल बनावे ॥४८॥
भद्रं तु सर्वदेवानां नवनाभिस्तथा त्रयम् ।
लिङ्गोद्भवं शिवस्यापि लतालङ्गोद्भवं तथा ॥४६॥
सब देवों की प्रतिष्ठा में भद्र नाम का मंडल, तथा नवनाभी अथवा तीन नाभि वाला
लिंगोद्भव मंडल बनावे । शिव की प्रतिष्ठा में लिंगोद्भव तथा लतालिङ्गोद्भव नाम का मंडल
बनावे ॥४९॥
भद्रं च गौरीतलकं देवीनां पूजने हितम् ।
अर्धचन्द्रं तडागेषु चापाकारं तथैव च ॥५०॥
सब देवियों की पूजन प्रतिष्ठा मे भद्र और गौरीतिलक नाम का मंडल बनावें । तथा
तालाब की प्रतिष्ठा में अर्धचंद्र चापाकार मंडल बनावे ॥५०॥
टङ्काभं स्वस्तिकं चैव वापीकूपेषु पूजयेत् ।
पीठिकाजलपट्टेषु योन्याकारं तु कामदम् ॥५१॥
वावडी और कुओ की प्रतिष्ठा मे टंकाभ और स्वस्तिक मंडल का पूजन करे । पीठिका
और जलपट्ट की प्रतिष्ठा मे योनि के आकार का मंडल पूजने से सब कार्य सिद्ध होते है ॥५१॥
गजदन्तं महादुर्गे प्रशस्तं मण्डलं यजेत् ।
टङ्काभं चतुरस्रं च गजदन्तं महायतम् ॥५२॥
बड़े किले की प्रतिष्ठा मे गजदंत नामका मंडल पूजन करना प्रशस्त है । टंकाभ मंडल
का आकार चोरस है और गजदंत मंडल का आकार लंबा है ॥५२॥
विख्यातं सर्वतोभद्रं ज्ञेयमन्योऽन्यलोकतः ।
पूर्वादितोरणं प्लक्ष-यज्ञाश्वत्थटपिप्पलैः ॥५३॥

ऽष्टमोऽध्यायः १५५
सब मंडलो मे सर्वतोभद्र नामका मंडल प्रसिद्ध है, उसका तथा अन्य मंडलों का स्वरूप
अन्यशास्त्र ( अपराजितपृच्छा सूत्र १४८ ) से जानें । यज्ञमंडप मे पूर्वादि दिशाओं मे अनुक्रम से
पीपला, गूलर, बरगद और पीपल के पत्तो का तोरण बाधे ॥५३॥
ऋत्विजसंख्या—
द्वात्रिंशत् षोडशाष्टौ च ऋत्विजो वेदपारगान् ।
कुलीनानङ्गसम्पूर्णान् यज्ञार्थमभिमन्त्रयेत् ॥५४॥
यज्ञ करने वाले बत्तीस, सोलह अथवा आठ ऋत्विज आमंत्रित होना चाहिये । ये सब
वेदों के ज्ञाता हो, कुलवान् हों और अंगहीन न हों ॥५४॥
देवस्नान विधि—
मण्डपस्य त्रिभागेन चोत्तरे स्नानमण्डपम् ।
स्थण्डिलं वालुकं कृत्वा शय्यायां स्नापयेत् सुरम् ॥५५॥
पञ्चगव्यैः कषायैश्च वल्कलैः क्षीरवृक्षजैः ।
स्नापयेत् पञ्चकलशैः शतवारं जलेन च ॥५६॥
मंडप की चारों दिशा मे तीन २ भाग करें, अर्थात् मंडप का नव भाग करे। ( आठ
दिशा के आठ और एक मध्य वेदी का भाग जाने ) । इनमे उत्तर दिशा के भाग में स्नान मंडप
बनावे । उसमे रेतीका शुद्ध स्थंडिल ( भूमि ) बनाकर उसके ऊपर शय्या मे देव की स्थापना
करे । पीछे पंचगव्य से, कषाय वर्ग की औषधियो से और क्षीरवृक्षो की छालो के चूर्ण से स्नात्र-
जल तैयार करें, उससे पाच २ कलश एकसौ बार भर करके देवको स्नान करावे ॥५५-५६॥
वेदमन्त्रैश्च वादित्रै-र्गीतमङ्गलनिःस्वनै ।
वस्त्रेणाच्छादयेद् देवं वेद्यन्ते मण्डपे न्यसेत् ॥५७॥
स्नान क्रिया के समय वेदमंत्रो के उच्चारणो से, वाजीत्र की ध्वनियो से और मागलिक
गीतो से आकाश ध्वनिमान करे। स्नान के बाद देवको वस्त्रसे आच्छादित करके, पीछे
ईशानकोन की वेदी के ऊपर स्थापित करें ॥५७॥
देवशयन—
तल्पमारोपयेद् वेद्या-मुत्तराङ्गी न्यसेत् ततः ।
कलशं तु शिरोदेशे पादस्थाने कमण्डलुम् ॥५८॥

१५६ प्रासादमण्डने
ईशानकोन की वेदी के ऊपर देवका शय्यासन रक्खें। उनके चरण उत्तर दिशा में
रक्खे। सिर भाग के पास कलश और चरण के स्थान के पास कमंडलु रक्खें ॥५८॥
व्यजनं दक्षिणे देशे दर्पणं वामतः शुभम् ।
रत्नन्यासं ततः कुर्याद् दिक्पालादिकपूजनम् ॥५६॥
देवकी दाहिनी ओर पंखा और बायी ओर दर्पण रखना शुभ है। पीछे आठ दिशाओं
मे रत्न को स्थापित करके दिकपाल आदि की पूजा करें ॥५६॥
आग्नेयां गणेशं विद्या-दीशानेग्रहमण्डलम् ।
नैऋत्ये वास्तुपूजा च वायव्ये मातरः स्मृतः ॥६०॥
अग्निकोन में गणेश, ईशानकोन मे नवग्रह मंडल, नैऋत्य कोन में वास्तुपूजा और
वायव्यकोन मे मातृदेवता की स्थापना करे ॥६०॥
रत्नन्यास-
वज्रं वैडूर्यकं मुक्ता-मिन्द्रनीलं सुनीलकम् ।
पुष्परागं च गोमेदं 'प्रवालं पूर्वतः क्रमात् ॥६१॥
वज्र (हीरा), वैडूर्य, मोती, इन्द्रनील, सुनील, पुष्पराग, गोमेद और प्रवाल, ये
आठ रत्न पूर्वादि सृष्टिक्रम से रक्खे ॥६१॥
धातुन्यास-
सुवर्णं रजतं ताम्रं कांस्यं रीतिं च सीसकम् ।
वङ्गं लोहं च पूर्वाद्यौ सृष्ट्या धातूनिह न्यसेत् ॥६२॥
सोना, चांदी, ताबा, कांसी, पीतल, सीसा, कलई और लोह, ये आठ धातु पूर्वादि
सृष्टिक्रम से रक्खे ॥६२॥
श्रौषधिन्यास-
*वज्री वह्निः सहदेवी विष्णुकान्तेन्द्रवारुणी ।
शंखिनी ज्योतिष्मती चैवेश्वरी तान् क्रमान् न्यसेत् ॥६३॥
*अपराजितपृच्छा सूत्र १४६ श्लो० १५ मे 'वचा' पाठ है ।
१. 'चन्द्र' पूर्वादिषु यजेत्' इति पाठान्तरे ।

ऽष्टमोऽध्यायः १५७
वज्री ( वज्रदंती ), वह्नि ( चित्रक ), सहदेवी, विष्णुकान्ता, इन्द्रवारुणी, शंखाहुली,
ज्योतिष्मती ( मालकागनी ) और शिवलिंगी, ये आठ औषधियां पूर्वादि दिशाओं में सृष्टिक्रम से
रक्खे ॥६३॥
धान्यन्यास—
यवो व्रीहिस्तथा कङ्गु-जूर्णाहा च तिलैर्युताः ।
शाली मुद्गाः समाख्याता गोधूमाश्च क्रमेण तु ॥६४॥
जव, व्रीहि, कगु, जुआर, तिल, शाली, मूंग और गेहू, ये आठ धान्य पूर्वादि दिशाओ
मे सृष्टिक्रम से रक्खे ।
आचार्य और शिल्पियो का सन्मान—
यद्देवाभरणं पूजा वस्त्रालङ्कारभूषणम् ।
तत्सर्वं शिल्पिने दद्याद् आचार्याय तु याज्ञिकम् ॥६५॥
देवसंस्कार के लिये जो वस्त्र और अलंकार आदि आभूषण चढाया जाता है, वे सब
शिल्पिको देना चाहिये और आचार्य को यज्ञ संबन्धी सब वस्तु देनी चाहिये ॥६५॥
ततो महोत्सवं कुर्यान्नृत्यगीतैरनेकशः ।
नैवेद्यारात्रिकं पूजा-मङ्गन्यासादिकं तथा ॥६६॥
पीछे अनेक प्रकार के नृत्य और गीत पूर्वक महोत्सव करे, नैवेद्य चढावे, आरती करे
और अंगन्यास ( मुद्रा न्यास ) आदि करे ॥६६॥
क्षीरं क्षौद्रं घृतं खण्डं पक्वान्नानि बहून्यपि ।
षड्रसस्वादुभक्ष्याणि सन्मानं परिकल्पयेत् ॥६७॥
दूध, शहद, घी, खांड और अनेक प्रकार के पकवान, तथा षड्रस के स्वाद वाले भोजन
पदार्थ, ये सन्मान पूर्वक देव के आगे रखने चाहिये ॥६७॥
विप्राणां सम्प्रदायैश्च वेदमन्त्रैस्तथागमैः ।
सकलीकरणं जीवन्यासं कृत्वा प्रतिष्ठयेत् ॥६८॥
पीछे ब्राह्मण अपने सम्प्रदाय के अनुसार वेद ंत्रो से तथा आगम मंत्रो से सकलीकरण
करके देवमे जीवन्यास करें । पीछे प्रतिष्ठित करे ॥६८॥

१५८ प्रासादमण्डने
प्रासाददेव न्यास—
प्रासादे देवतान्यासं स्थावरेषु पृथक् पृथक् ।
खरशिलायां वाराहं पौल्यां नागकुलानि च ॥६६॥
प्रासाद के थरों और अंगोपांगो में अलग २ देवों का न्यास करके पूजन करें । खरशिला
में वाराह देव और भीट के थर मे नागदेव का न्यास करे ॥६६॥
प्रकुम्भे जलदेवांश्च पुष्पके किन्नुरांस्तथा ।
१नन्दिनं जाड्यकुम्भे च कर्णिकायां स्थापयेद्धरिम् ॥७०॥
कुम्भ के थर मे जलदेव, पुष्पकंठ के थर मे किन्नरदेव, जाड्यकुम्भ मे नंदीदेव, और
कर्णिका के थर मे हरिदेव का न्यास करें ॥७०॥
गणेशं गजपीठे स्या-दश्वपीठे तथाश्विनौ ।
नरपीठे नरांश्चैव च्क्ष्मां च खुरके यजेत् ॥७१॥
गजपीठ में गणेश, अश्वपीठ में दोनों अश्विनीकुमार, नरपीठ में नरदेव और खुरा के
थर मे पृथ्बीदेवी का न्यास करके पूजन करें ॥७१॥
भद्रे संध्यात्रयं २कुम्भे पार्वतीं कलशे स्थिताम् ।
कपोताल्यां च गान्धर्वान् मञ्चिकायां सरस्वतीम् ॥७२॥
भद्र के कुम्भ मे तीन सध्यादेवी, कलश के थर मे पार्वतीदेवी, केवाल के थर में गांधर्वदेव
और मांची के थर में सरस्वती देवी का न्यास करें ॥७२॥
जङ्घायां च दिशिपाला-निन्द्रमुद्गमे संस्थितम् ।
सावित्रीं भरणीदेशे शिरावट्यां च देविकाम् ॥७३॥
जंघा के थर मे दिक्पाल, उद्गम के थर मे इन्द्र, भरणी के थर में सावित्री और शिरावटी
के थर मे भाराधार देवी का न्यास करें ॥७३॥
विद्याधरान् कपोताल्या-मन्तराले सुरांस्तथा ।
पर्जन्यं कूटच्छाद्ये च ततो मध्ये प्रतिष्ठयेत् ॥७४॥
केवाल के थर मे विद्याधर, अंतराल के थर मे किन्नरादि सुर और छज्जा के थरमें पर्जन्य
( मेघ ) देव, इनका न्यास करे । अब भीतर के मध्य भाग में देवों का न्यास कहते है ॥७४॥
१. 'नन्दिनी' । २. 'सप्तारं कुम्भके' अप० सू० १५० श्लो० ८ ।