प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऽष्टमोऽध्यायः १५१
आश्रम और मठ—
प्रासादस्योत्तरे याम्ये तथाग्नौ पश्चिमेऽपि वा ।
यतीनामाश्रमं कुर्यान्मठं तद्वित्रिभूमिकम् ॥३३॥
प्रासाद के उत्तर अथवा दक्षिण दिशा में, तथा अग्निकोन मे या पिछले भाग मे यतियों
का आश्रम तथा ऋषियो का मठ, दो या तीन मंजिल बनावे ॥३३॥
द्विशालमध्ये षड्दारुः पट्टशालाग्रे शोभिता ।
मत्तवारणमग्रे च तदूर्ध्वं पट्टभूमिका ॥३४॥
आश्रम के दोशाला के मध्य में षड्दारु (आमने सामने की दीवार मे दो दो स्तंभ और
उसके ऊपर एक २ एक २ पाट, ऐसा षड्दारु कहा जाता है) रक्खे । द्विशाला के आगे सुशोभित
पट्टशाला (बरामदा) बनावे और उसके आगे कटहरा बनावे । उसके ऊपर पट्टभूमिका
(चंद्रशाला-खुली छत) रक्खें ॥३४॥
स्थान विभाग—
कोष्ठागारं च वायव्ये वह्निकोणे महानसम् ।
पुष्पगेहं तथेशाने नैर्ऋत्ये पात्रमायुधम् ॥३५॥
सत्रागारं च पुरतो वारुण्यां च जलाश्रयम् ।
मठस्य¹ पुरतः कुर्याद् विद्याव्याख्यानमण्डपम् ॥३६॥
इति मठः ।
मठ के वायुकोने मे धान्य का कोठार, अग्निकोने मे रसोड़ा, ईशान कोने में पुष्पगृह
(पूजोपकरण), नैर्ऋत्य कोने में पात्र और आयुध, आगे के भाग में यज्ञशाला और पश्चिम
दिशामे जलस्थान बनावे । एवं मठ के आगे पाठशाला और व्याख्यान मंडप बनावे ॥३५-३६॥
प्रतिष्ठा मुहूर्त्त—
पूर्वोक्ता सप्तपुण्याह-प्रतिष्ठा सर्वसिद्धिदा ।
रवौ² सौम्यायने कुर्याद् देवानां स्थापनादिकम् ॥३७॥
प्रथम अध्ययन के श्लोक ३६ में जो सात पुण्य दिन कहे गये है । उनकी प्रतिष्ठा सर्वसिद्धि
को देनेवाली है। जब सूर्य उत्तरायन मे हो तब देवो की प्रतिष्ठा आदि शुभ कार्य करना
चाहिये ॥३६॥
१. 'मठस्योपरितः ।' २. 'रवेः' ।