प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऽष्टमोऽध्यायः १४६
अन्यदोष फल—
द्वारहीने हनेच्चक्षु-र्नालीहीने धनक्षयः ।
अपदे स्थापिते स्तम्भे महारोगं विनिर्दिशेत् ॥२२॥
द्वार मान मे हीन हो तो नेत्र की हानि, नाली (जलमार्ग) हीन हो तो धन का क्षय और
स्तंभ अपदमे रखा जाय तो महारोग होता है ॥२२॥
स्तम्भन्यासोदये हीने कर्त्ता तत्र विनश्यति ।
प्रासादे पीठहीने तु नश्यन्ति गजवाजिनः ॥२३॥
स्तंभ का मान विस्तार में अथवा उदय मे हीन हो तो कर्त्ता का विनाश होता है।
प्रासाद की पीठ मानमे हीन हो तो हाथी घोडा आदि बाहनों की हानि होती है ॥२३॥
रथोपरथहीने तु प्रजापीडां विनिर्दिशेत् ।
कर्णहीने सुरागारे फलं क्वापि न लभ्यते ॥२४॥
प्रासाद के रथ और उपरथ आदि अंग मानमे हीन हो तो प्रजा को पीडा होती है।
यदि कोना मानमे हीन हो तो पूजन का फल कभी भी नही मिलता ॥२४॥
जङ्घाहीने हरेद् बन्धून् कर्त्तृकारापरादिकान् ।
शिखरे हीनमाने तु पुत्रपौत्रधनक्षयः ॥२५॥
प्रासाद की जंघा प्रमाण से हीन हो तो करने कराने वाले और दूसरे की हानि होती है।
जो शिखर प्रमाण से न्यून हो तो पुत्र, पौत्र और धनकी हानि होती है ॥२५॥
अतिदीर्घे कुलच्छेदो ह्रस्वे व्याधिर्विनिर्दिशेत् ।
तस्माच्छास्त्रोक्तमानेन सुखदं सर्वकामदम् ॥२६॥
शिखर यदि मान से अधिक लंबा हो तो कुल की हानि होती है और मान से छोटा
होवे तो रोग उत्पन्न होते है । इसलिये शास्त्र मे कहे हुए मानके अनुसार ही प्रासाद बनावे तो
यह सर्व इच्छित फलको देनेवाला होता है ॥२६॥
जगत्यां रोपयेच्छालां शालायां चैव मण्डपम् ।
मण्डपेन च प्रासादो ग्रस्तो वै दोषकारकः ॥२७॥
इति दोषा. ।
जगती मे शाला (चौकी मंडप) बनाना, उस शाला मे मंडप और मंडप मे प्रासाद ग्रस्त
हो तो दोषकारक है ॥२७॥