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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 278 में से

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पृष्ठ 197

१४८ प्रासादमण्डने
व्यक्ताव्यक्त प्रसाद—
व्यक्ताव्यक्तं गृहं कुर्याद् भिन्नाभिन्नस्य मूर्त्तिकम् ।
यथा स्वामिशरीरं स्यात् प्रासादमपि तादृशम् ॥१६॥
इति भिन्नदोषाः ।
उपरोक्त भिन्न और अभिन्न दोषवाली देवमूर्तियों के लिये व्यक्त और अव्यक्त प्रासाद
बनावे । अर्थात् भिन्न दोष रहित देवों के लिये प्रकाश वाले और भिन्न दोषवाले देवों के
लिये अंधकारमय प्रासाद बनावें । जैसे स्वामी अपने शरीर के अनुकूल गृह बनाता है, वैसे देवों
के अनुकूल प्रासाद बनाना चाहिये ॥१६॥
अपराजित पृच्छा सूत्र ११० में कहा है कि—
“व्यक्ताव्यक्तं लयं कुर्यादभिन्नाभिन्नमूर्त्तयोः ।
मूर्त्तिलक्षणाजं स्वामो प्रासादं तस्य तादृशम् ॥”
भिन्न दोषो से रहित शिव आदि की देव मूर्तियों के लिये व्यक्त ( प्रकाशवाले ) प्रासाद
बनावें और भिन्न दोषवाली गौरी आदि की देव मूर्तियों के लिये अव्यक्त (अंधकारमय) प्रासाद
बनावे ।
महामर्मदोष—
'भिन्नं चतुर्विधं ज्ञेय-मष्टधा मिश्रकं मतम् ।
मिश्रकं पूजितं तत्र भिन्नं वै दोषकारकम् ॥२०॥
छन्दभेदो न कर्त्तव्यो जातिभेदोऽपि वा पुनः ।
उत्पद्यते महामर्म जातिभेदकृते सति ॥२१॥
भिन्नदोष चार प्रकार के और मिश्रदोष आठ प्रकार के है। उनमे मिश्रदोष पूजित
( शुभ ) है और भिन्नदोष दोषकारक है। छंदभेद-जैसे छंदो में गुरु लघु यथावस्थान न होने से
छंद दूषित होता है, वैसे प्रासाद की अंगविभक्ति नियमानुसार न होनेसे प्रासाद दूषित होता है।
जातिभेद-प्रासाद की अनेक जातियों मे से पीठ आदि एक जाति की और शिखर आदि दूसरी
जाति का बनाया जाय तो जातिभेद होता है। ऐसा जातिभेद करने से बड़ा मर्मदोष उत्पन्न
होता है ॥२०-२१॥
१. भिन्नदोष जानने के लिये देखो अपराजित पृच्छा सूत्र ११० और मिश्रदोष जानने के लिये देखो
अप० सूत्र ११४ श्लो० १ से ६ ।