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सर्वकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 278 में से

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पृष्ठ 194

पूर्वोत्तर दिशा ( ईशान कोन ) अथवा पश्चिम दक्षिण दिशा ( नैर्ऋत्य कोन ) मे
प्रासाद टेढा हो तो दिङ्मूढ दोष नही माना जाता। जैसे तीर्थ स्थान में प्रासाद के मूढ और
अमूढ का दोष नहीं माना जाता ॥९॥
"पूर्वपश्चिमदिङ्मूढं वास्तु स्त्रीनाशकं स्मृतम् ।
दक्षिणोत्तरदिङ्मूढं सर्वनाशकरं भवेत् ॥" अप० सू० ५२
पूर्व पश्चिम दिशा का वास्तु अग्नि और वायु कोनमे दिङ्मूढ हो तो स्त्री का विनाश
कारक है। दक्षिणोत्तर दिशा का वास्तु भी अग्नि और वायुकोन मे दिङ्मूढ हो तो सर्व
विनाश कारक है।
दिङ्मूढ का परिहार—
सिद्धायतनतीर्थेषु नदीनां सङ्गमेषु च ।
स्वयम्भूबाणलिङ्गेषु तत्र दोषो न विद्यते ॥१०॥
सिद्धायतन अर्थात् सिद्ध पुरुषों का निर्वाण, अग्नि संस्कार, जल संस्कार अथवा भूमि-
संस्कार हुआ हो ऐसे पवित्र स्थानो मे, तथा च्यवन, जन्म, दीक्षा ज्ञान और मोक्ष संस्कार
हुआ हो, ऐसे तीर्थस्थानो मे, नदी के संगम स्थान मे, बनाया हुआ प्रासाद तथा स्वयंभू और
बाण लिंगो के प्रासाद, ये दिङ्मूढ हो तो दोष नही है ॥१०॥
अव्यक्त प्रासाद का चालन—
अव्यक्तं¹ मृण्मयं चाल्यं त्रिहस्तान्तं तु शैलजम् ।
दारुजं पुरुषार्द्धं हि अत ऊर्ध्वं न चालयेत् ॥११॥
यदि अव्यक्त जीर्ण प्रासाद मिट्टी का हो तो गिरा करके फिर बनावे, पाषाण का हो तो
तीन हाथ तक और लकडी का हो तो आधे पुरुष के मान तक ऊंचा रहा हो तो चलायमान
करे। इससे अधिक ऊंचाई मे रहा हो तो चलायमान न करे ॥११॥
महापुरुष स्थापित देव—
विषमस्थानमाश्रित्य भग्नं यत्स्थापितं पुरा ।
तत्र स्थाने स्थिता देवा भग्नाः पूजाफलप्रदाः ॥१२॥
प्राचीन महापुरुषोंने जो देव स्थापित किये हैं, वे विषमासन वाले हो, अथवा खंडित
हों तो भी पूजनीय है। क्यो कि उस स्थान पर देवो का निवास है, इसलिये वे देवमूर्तिया पूजन
का फल देनेवाली है ॥१२॥
१. 'व्यक्तं तु' ऐसा अपराजितपृच्छा सूत्र ११० मे पाठ है।
प्रा० १६