प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
प्रकरण २ ] विक्रमार्कराजाका प्रबन्ध [ ५
रहा । बादको पुण्यबलके सहायसे राजाने उसे पृथ्वी तलपर पटक दिया, और उसकी छातीपर पैर रखकर कहा
कि-' इष्ट देवताका स्मरण करो ! ' तब वह बोला कि-' मैं तुम्हारे अद्भुत साहससे संतुष्ट हूँ। तुम जो करनेको
कहो उस आदेशका पालन करनेवाला मैं अग्नि नामक बेताल तुम्हें सिद्ध हुआ । ' ऐसा होनेपर उसका राज्य
निष्कंटक हुआ । इसी तरह अपने पराक्रमसे दिगमण्डलको आक्रान्त करनेवाले उस राजाने छानवे प्रतिद्वन्दी
राजाओंके राज्यको अपने अधिकारमें किया ।
३. जंगली हाथी, तुम्हारे शत्रुओंके [ उजड पड़े हुए ] घरोंकी स्फटिक निर्मित दीवालपर दूरसे
अपनी परछाई देखकर, उसे प्रतिद्वंद्वी हाथी समझकर, क्रोधसे आघात करता है । [ उस आघातके
कारण ] फिर जब उसका दाँत टूट जाता है तो उसे ही हथिनी समझकर धीरे धीरे साह स १ के
साथ उसका स्पर्श करता है ।
इस२ प्रकार, कालिदासा दि महाकवियों द्वारा की हुई स्तुति ( प्रशंसा ) से अलंकृत होते हुए उसने
चिरकाल तक विशाल साम्राज्यका उपभोग किया ।
अब यहाँपर प्रसंगसे महाकवि कालिदासकी उत्पत्ति संक्षेपमें कहते हैं-
२) अवन्ती नामक नगरीमें राजा विक्रमादित्य की लड़की प्रियंगुमंजरी थी । वह अध्ययनके
लिये वररुचि नामक पंडितको समर्पण की गई । बुद्धिमती होनेके कारण सभी शास्त्रोंको उसने उस पंडितसे
कुछ ही दिनोंमें पढ़ लिया । वह पूर्ण यौवनावस्था प्राप्त कर चुकी थी, और नित्य अपने पिताकी सेवा करती
थी । किसी समय, वसन्त कालमें दोपहरको-जब कि सूर्य सिरपर आगया था, वह खिड़कीके सामने एक
सुखासन ( सोफा ) पर बैठी हुई थी; इसी समय उपाध्याय ( वररुचि ) रास्तेमें चलते हुए खिड़कीकी छायामें
कुछ विश्राम लेने खड़े रहे । कुमारीने उन्हें देखा और खूब पके हुए आमके फलोंको दिखाया । उसने समझा
कि ये ( उपाध्याय ) उन फलोंके लोलुप हैं, और बोली-' आपको ये फल ठंडे रुचेंगे या गरम ? ' उसकी
इस बातकी चातुरीको न समझते हुए उस ( उपाध्याय ) ने कहा कि-' गरम ही चाहते हैं ' इस प्रकार
कह कर, उस उपाध्यायने अपना वस्त्र फैलाया जिसमें उसने ऊपरसे वे फल नीचे फेंके । लेकिन फल पृथ्वीपर
गिर पड़े और उससे उनमें धूल लग गई । वररुचि हाथ में लेकर मुँहसे फूंक फूंक कर उस धूलको झाड़ने
लगा । राजकन्याने उपहासके साथ कहा-' क्या ये बहुत गरम हैं कि जिससे मुंहसे फूंक कर ठंडा कर रहे
हो ? ' उसकी इस बातसे चिढ़कर उस ब्राह्मणने कहा-' ऐ अपनेको चतुर समझनेवाली अभिमानिनि ! तूं गुरुके
साथ ऐसा मज़ाक कर रही है; जा तुझको पशुपाल पति मिलो ' । इस प्रकार उनका शाप सुनकर उसने कहा--
' आप तो त्रैविद्य हैं, लेकिन मैं तो, आपसे अधिक विद्यावान् होनेके कारण जो आदमी आपका भी गुरु होगा,
उसीसे विवाह करूंगी । ' उसने इस प्रकार प्रतिज्ञा की । इसके बाद विक्रमादित्य जब कन्याके लिये उचित
श्रेष्ठ वर पाने की चिन्तारूपी समुद्रमें डूब रहे थे, तो वह पंडित जिसे राजाने अभिलषित वर की खोज
करनेका आग्रहपूर्वक आदेश कर रखा था, एक बार एक जंगलमें घूमता हुआ पिपासासे व्याकुल हुआ । जब
१ मूलमें यहापर ' साहसाङ्कः ' ऐसा सविभक्तिक पाठ है इसलिये इसे हाथीका विशेषण मान कर यह अर्थ किया गया
है । प्रत्यन्तरोंमें ' साहसाङ्क ' ऐसा निर्विभक्तिक पाठ भी मिलता है जो अर्थदृष्टिसे संबोधनात्मक हो सकता है । उस अर्थमें यह ' हे
साहसाङ्क ! ' ऐसा विक्रमका विशेषण हो सकता है । विक्रम का उपनाम साह सा ङ्क था, इसके यथेष्ट प्रमाण मिलते हैं।
२ यह जो राजाकी स्तुतिका पद्य उद्धृत किया गया है वह महाकवि कालिदास का बनाया हुआ है, ऐसा
मेरुतुंगका मतव्य मालूम देता है ।
६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
चारों ओर कहीं जल नहीं मिला तो एक पशुपालको देखकर उससे जल मांगा । उसने जलके अभावमें दूध
पीनेको कहा और बोला कि—‘करचडी’ करो । उसके ऐसा कहने पर वररुचि बड़ी चिन्तामें पड़ गया, क्यों
कि उसने इसके पहले यह शब्द किसी भी कोष ग्रन्थमें नहीं पढ़ा सुना था । उस पशुपालने उसके मस्तक पर
हाथ रखकर और भैंसके नीचे बिठाकर, दोनों हथेलियों को जोड़कर 'करचडी' नामक मुद्रा बताकर, उसे पेट
भर कर दूध पिलाया । उस (उपाध्याय) ने अपने मस्तक पर हाथ रखनेके कारण और एक 'करचडी' इस
विशेष शब्दके बतानेके कारण, उसे गुरुके समान समझा और फिर उसको ही उस राजकुमारीका समुचित
पति निश्चित किया । भैंसोंसे हटाकर उसे अपने महलमें ले आया और ६ महिने तक उसके शरीरकी शुश्रूषा
करते हुए "ओं नम शिवाय" इस आशीर्वादको पढ़ाया । ६ महिने बाद जब पण्डितने समझ लिया कि ये
अक्षर उसे कण्ठस्थ हो गये हैं तो एक दिन शुभ मुहूर्तमें उसको अच्छी तरह श्रृंगार कराके उसे राजसभामें ले
गया । राजाको आशीर्वाद देते समय, बहुत बारका अभ्यस्त वह आशीर्वाद भी, सभाक्षोभके कारण “उ श र ट”
इस प्रकारके शब्दोंमें बोल गया । उसकी इस ऊटपटांग बातसे राजा विस्मित हुआ । वररुचिने उसकी
[मूर्खता छिपाने और] चतुरता बतानेके लिये राजाके सामने कहा-
४. उमाके साथ रुद्र जो, शङ्कर और शूलपाणि है ।
रक्षा करें तुम्हारी हे राजन्, टंकारके बलसे जो गर्वित है ॥
इस प्रसिद्ध श्लोकद्वारा [जिसके चारों चरणोंके प्रथमाक्षरोंसे 'उशर्ट' शब्द बनता है] वर
रुचिने उसके पाण्डित्यकी गंभीरताका विस्तारपूर्वक विवेचन किया । उसकी बातसे प्रसन्न होकर, राजाने
उस भैंस चरानेवालेसे अपनी पुत्रीका विवाह कर दिया । पर पण्डितके सिखानेसे वह सदा मौन ही रहा करता ।
राजकन्याने उसकी चतुरता जाननेके लिये, कोई नई लिखी हुई पुस्तकके संशोधनका उससे अनुरोध किया ।
उसने उस पुस्तकको हथेलीपर रखकर, नखनी लेकर, सारे अक्षरोंको बिंदु और मात्रासे रहित कर दिया । उसे
ऐसा करते देख राजपुत्रीने निर्णय किया कि यह तो मूर्ख है । तबसे सर्वत्र ही 'जा मा तृ शु द्धि' की कहावत
प्रचलित हुई। एक बार दीवाल परके चित्रमें भैंसोंका झुण्ड देखकर, आनंदित होकर, वह अपनी प्रतिष्ठा भूल गया
और उनके बुलानेकी विकृत बोली बोलने लगा । तब राजकुमारीने निश्चय किया कि यह निरा पशुपाल-भैंसोंका
चरवाहा है । फिर यह (चरवाहा) राजकन्याकी अवज्ञा देखकर विद्वत्ताके लिये कालिकाकी आराधना करने
लगा। अपनी पुत्रीके वैधव्यसे शंकित होकर राजाने² रातके समय गुप्त वेशमें दासीको भेजा । उसने यह कहकर
कि- 'मै तुझे तुष्टमान हुई हूँ' ज्यों ही उठाने लगी त्यों ही विप्लवकी आशंकासे, स्वय कालिका देवीने ही प्रत्यक्ष
होकर उसे अनुगृहीत किया । इस वृत्तान्तको सुनकर राजकुमारी प्रमुदित हुई और आकर बोली कि-'क्या
कुछ विशेष वाणी प्राप्त हुई है?'³ उसके ऐसा कहनेपर वह तभीसे कालिदास नामसे प्रसिद्ध हुआ और
उसने कुमार सम्भव प्रभृति ३ महाकाव्य और ६ प्रबंध बनाये ।
-इस प्रकार यह कालिदासकी उत्पत्तिक। प्रबंध है ॥ १ ॥
१ 'जामातृ शुद्धि' की कहावत हिंदीमें या गुजराती भाषामें प्रचलित हा ऐसा ज्ञात नहीं हुआ, लेकिन मराठी भाषामें
'जावांइ शोध' नामकी कहावत प्रचलित है । विक्रमकी और और कथाओंमें भी इसका उल्लेख मिलता है इससे ज्ञात होता है
पुराने समयमें यह कहावत गुजरात आदि देशोंमें भी प्रचलित होगी ।
२ पुत्रीका वैधव्य प्राप्त होनेकी शंका राजाको इसलिये हुई कि वह पशुपाल आमरणान्त उपवास करनेकी प्रतिज्ञा करके
देवीकी आराधना करने बैठा था । मेरुतुङ्गसूरिका यह ग्रन्थ बहुत ही संक्षिप्त शैलीमें लिखा हुआ है, इसलिये इसमें बहुतसी बातें
अध्याहृत रहती हैं । दूसरे निरूपणों में बातें खुलासेके साथ लिखी हुई मिलती हैं ।
प्रकरण ३-७ ] विक्रमार्कराजाका प्रबन्ध [ ७
३) एक बार, उस नगरका निवासी दा ता नामक सेठ, हाथमें भेंट लेकर आया और
सभामें बैठे हुए विक्रमादित्य को प्रणाम करके कहने लगा-‘महाराज, मैंने शुभ मुहूर्त्तमें प्रधान बढ़इयोंसे
एक धवलगृह (महल) बनवाया, और उसमें बड़े उत्सवके साथ प्रवेश किया। मैं जब रातको उसमें पलँग-
पर पड़ा हुआ, आधा-सोया, आधा-जागा वाली अवस्थामें था उस समय ‘गिरता हूँ’ इस प्रकारकी मैंने
आकस्मिक वाणी सुनी। मैं मारे डरके ‘मत गिरो’ यह कहता हुआ उसी समय वहाँसे भाग निकला। उस
मकानके बनवानेके संबंधमें ज्योतिषियों और कारीगरोंको समय समय पर जो धन दान किया गया है वह मेरे
ऊपर वृथा दण्ड ही हुआ! अब इस विषयमें महाराज जो उचित समझें करें!’ राजाने उस सेठकी बात भली
भाँति सुनकर, उस धवलगृहका मूल्य जो तीन लाख उसने बताया, वह उसे चुकाकर, उसको स्वायत्त कर
लिया। सायंकाल होनेपर, सर्वावसर¹ यानि राजसभामें बैठकर, तत्संबंधी सब कार्योंसे निवृत्त होकर, उस घरमें
सुखपूर्वक जा सोया। उसी ‘गिरता हूँ’ इस वाणीको सुनकर वह असम साहसी राजा बोला कि ‘जल्दी
गिरो!’ और उसके ऐसा कहते ही पास ही गिरे हुए सुवर्ण पुरुषको उसने प्राप्त किया।
—इस तरह यह सुवर्ण पुरुषकी सिद्धिका प्रबन्ध है॥२॥
४) एक दूसरे अवसरपर कोई अभागा पुरुष, अपने हाथसे बनाये हुए एक लोहेका दुबला पतला
दरिद्र नामक पुतला लेकर द्वारपर आया। जब द्वारपाल उसे राजाके पास ले गया तो उसने कहा कि-‘महाराज,
आप जैसे स्वामीसे शासित इस अवन्तीपुरीमें सभी चीजें जल्दी बिक जाती हैं और मिल जाती हैं, ऐसी
प्रसिद्धि जानकर मैंने चौरासी चौहटोंपर विक्रयके लिये इस दरिद्र-पुतलेको घुमाया, लेकिन किसीने इसे नहीं
खरीदा और उलटी मेरी भर्त्सना की गई। आपकी इस नगरीका यह कलंक यथार्थ रीतिसे आपको बताकर, क्या मैं
जैसे आया था वैसे ही चला जाऊं? यह आपसे पूछने आया हूँ।’ उसकी इस घटनाको पुरीका एक महान्
कलंक समझकर राजाने उसी समय उसे एक लाख दीनार देकर, लोहेके उस दरिद्र-पुतलेको खरीद लिया और
अपने खजानेमें रखवा दिया। ऐसा करनेपर उसी रातको, सुख पूर्वक सोये हुए राजाके निकट, पहले पहरमें
हाथियोंकी अधिष्ठात्री देवता, दूसरेमें घोड़ोंकी अधिष्ठात्री देवता और तीसरेमें लक्ष्मीने आविर्भूत होकर कहा कि—
‘महाराजने जब दरिद्र-पुतलेको खरीद लिया है तो, फिर हमारा यहाँ रहना उचित नहीं है’—यह कह, अनुज्ञा
लेकर वे चले जानेको पूछने आये, तो राजाने अपना साहस भग्न न हो इसलिये उनको जानेकी अनुमति दे दी।
चौथे पहरमें कोई दिव्य तेजःसम्पन्न उदार पुरुष प्रकट हुआ और बोला किँ—‘मैं सत्त्व (साहस) हूँ, जानेके लिये
आपकी अनुज्ञा चाहता हूँ’। उसके ऐसा पूछनेपर राजा हाथमें तलवार लेकर जब आत्मघात करनेको उद्यत
हुआ तो फिर उसने हाथ पकड़कर कहा कि-‘मैं तुष्टमान हुआ’ और राजाको उस कृत्यसे रोका। सत्त्वके
वहीं रहनेपर हाथी आदिकी तीनों अधिष्ठात्री देवतायें लौटकर राजासे बोलीं-‘जानेके संकेतको नष्ट करके सत्त्वने
हमें धोखा दिया है। इसलिये राजाको छोड़कर हम लोगोंका जाना अब उचित नहीं है। इस प्रकार वे
भी बिना किसी यत्नके ही स्थिर होकर रह गईं।
[१] तभीतक धन है, तभीतक गुण है, और तभीतक समुज्ज्वल कीर्ति है, जबतक हे सत्त्व
(साहस)! तुम चित्तरूपी नगरमें खेल रहे हो।
१ सर्वावसर उस जगहका नाम है जहां राजा अपने मुख्य सिंहासन पर बैठकर सब कोई प्रजाजन और राजकीय
पुरुषोंकी मुलाकात लेता देता है और राज्यके सब कार्योंका विचार करता है। दीवान-ए-आम या दरबार-ए-आम यह उर्दू शब्द इसका
प्रायः समानार्थक हो सकता है।
८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
[ २ ] राज्य भी जाय, स्त्रियां भी जाय और इस लोकसे यश भी चला जाय; किन्तु हे सत्त्व ! हम
तुम्हारे जानेकी अनुमति आजीवन नहीं दे सकते ।
—इस प्रकार यह विक्रमादित्यके सत्त्वका प्रबंध है ॥ ३ ॥
५) एक दूसरे अवसरपर, कोई विदेशी सामुद्रिक-शास्त्रज्ञ द्वारपालके द्वारा सभामें बैठे हुए विक्रमादि-
त्य के पास ले जाया गया । प्रवेश करते ही राजाके लक्षणोंको देखकर वह सिर पीटने लगा । राजाने विषादका
कारण पूछा, तो बोला—'महाराज, सभी अपलक्षणोंके निधान होनेपर भी तुम्हें छानवे देशोंकी साम्राज्य
लक्ष्मीको भोगते हुए देखकर, सामुद्रिक शास्त्रके ऊपर मेरा विराग हो गया है। मैं तुम्हारे अन्दर ऐसी कोई
काबरी (चितकबरी) आंत नहीं देख रहा हूं जिसके प्रभावसे तुम भी कोई राज्यकर्ता बनो । उसके इस वाक्यके
सुनते ही विक्रमादित्य तलवार खींचकर जब अपने पेटमें मारने लगा तो उस (सामुद्रिकज्ञ) ने पूछा कि
'यह क्या ?' इस पर विक्रमने कहा—'पेट फाड़कर तुम्हें उसी प्रकारकी (काबरी) आंत दिखाता हूं।
तब उसने कहा कि—'मैंने पहले नहीं समझा था कि, तुम्हारा यह सत्त्वरूपी महालक्षण बत्तीस लक्षणोंसे भी
बढ़कर है। इसपर राजाने उसे पारितोषिक देकर बिदा किया ।
—इस प्रकार यह सत्त्वपरीक्षाका प्रबंध है ॥ ४ ॥
६) इसके बाद एक अवसरपर, विक्रम ने सुना कि दूसरेके शरीरमें प्रवेश करनेवाली विद्यासे तिर-
स्कृत होकर अन्य सारी कलायें निष्फल-सी हैं। यह सुनकर उस विद्याकी प्राप्तिके लिये श्रीपर्वत पर भैरवा-
नन्द योगीके पास जाकर उसने चिरकाल तक उस (योगी) की सेवा करनी शुरू की । योगीके पूर्वसेवक
किसी ब्राह्मणने [ राजासे यह कहा कि—तुम ] मुझे छोड़कर (अकेले) गुरुसे पर-काय-प्रवेश विद्या न लेना ।
राजाने उसका अनुरोध मान लिया । जब गुरु विद्या देनेको उद्यत हुए तो उनसे कहा कि—'पहले इस
ब्राह्मणको विद्या दीजिये, बादको मुझे' । 'राजन् ! यह (ब्राह्मण) विद्याके सर्वथा अयोग्य है' ऐसा गुरुके
कहनेपर भी बार बार विक्रम अनुरोध करता रहा । तब गुरुने यह उपदेश देकर कि—'पीछे तुम पछताओगे'
उस ब्राह्मणको भी विद्या दी । बादमें लौटकर दोनों उज्जयिनी पहुंचे । वहां पद्माके मर जानेसे राजपुरुषोंको
उदास देखकर और स्वयं परकाय-प्रवेश विद्याका अनुभव करनेके निमित्त, राजाने उस हाथीके शरीरमें अपनी
आत्माका प्रवेश कराया । [ इस प्रसंगका वर्णन करनेवाला यह एक पद्य है-- ]
५. ब्राह्मणको अंगरक्षक बनाकर राजा (परकाय-प्रवेश) विद्याके द्वारा अपने हाथीके शरीरमें प्रविष्ट
हुआ । [ बादमें ] ब्राह्मण राजाके शरीरमें पैठ गया । तब राजा क्रीड़ा-शुक (महलके पींजरेमेंका
तोता) हुआ । बादमें (शुकरूपी) राजाने छिपकली के शरीरमें प्रवेश किया तो रानीने उसकी मृत्यु
समझी । (इस पर) ब्राह्मणने (जो राजाके शरीरमें प्रविष्ट हुआ बैठा था) शुकको जिलाया और
विक्रम ने फिर अपना शरीर पाया ॥ ५ ॥ इस तरह विक्रम को परकाय प्रवेश विद्या सिद्ध हुई ।
—इस प्रकार यह विद्यासिद्धिका प्रबंध है ॥ ५ ॥
७) फिर एक दूसरे अवसरपर, विक्रमादित्य राजपाटिका १ (बहिर्भ्रमण) में जा रहा था तब
मार्गमें सिद्धसेन सूरिको आते देखा । उस नगरका (जैन) संघ उनके पीछे पीछे आरहा था और बंदी जन
१ 'राजपाटिका' यह प्राकृत 'रायवडिया' और देशी 'रहवाडी' शब्दका संस्कृत रूपान्तर है। पुराने समयमें राजा
आदि राजनायक पुरुष प्रायः मध्यान्होत्तर तीसरे पहरके अंतमें या चतुर्थ प्रहरमें, राजमहलसे अनुचर आदिके खास परिवारके साथ
निकल कर, प्रधान राजमार्गसे होते हुए नगर या गावके बाहर जो राजकीय उद्यानादि स्थान होते थे उनमें जाते थे और वहापर
घंटे-दो घंटे ठहर कर, सन्ध्याकाल होते समय वापस निवासस्थान पर आते थे । राजाओंका यह इस प्रकार टहलने या हवाखानेके
लिये जो महल बाहर जाना होता था उसको राजपाटिका कहते थे ।
प्रकरण ८-११ ] विक्रमार्कराजाका प्रबन्ध [.९
'सर्वज्ञपुत्र' कह कर उनकी स्तुति कर रहे थे। 'सर्वज्ञपुत्र' इस विरुदसे कुपित होकर विक्रमादित्य ने
उनकी सर्वज्ञताकी परीक्षाके लिये मन-ही-मन प्रणाम किया। सिद्धसेन ने भी पूर्वगत श्रुतज्ञानके द्वारा राजाका
मनोगत भाव समझकर, दाहिना हाथ उठाकर धर्मलाभ का आशीर्वाद दिया। राजाने जब आशीर्वाद देनेका
कारण पूछा, तो महर्षिने कहा कि - तुम्हारे मानस नमस्कारके लिये यह आशीर्वाद दिया गया है। इस पर
उनके ज्ञानसे चकित होकर राजाने उनके पारितोषिक निमित्त एक करोड़ सुवर्ण वितरण किया।
८) एक बार, एक दूसरे अवसरपर, राजाने कोषाध्यक्षसे अपने दिलाए हुए सुवर्णका वृत्तान्त पूछा,
तो वह बोला कि - धर्मकी बहीमें मैंने श्लोक बनाकर सुवर्णका वृत्तान्त लिखा है; जो इस प्रकार है -
६. दूर-ही-से हाथ उठाकर 'धर्मलाभ हो' इस प्रकार कहनेवाले सिद्धसेन सूरिको राजाने एक कोटि
[ सुवर्ण ] दिया।
इसके बाद श्री सिद्धसेन सूरिको सभामें बुलाकर राजाने जब कहा कि-उस सुवर्णको ग्रहण कीजिये।
तो उन्होंने कहा कि - खाये हुए को खिलाना वृथा है। उसी सुवर्णसे ऋणग्रस्ता पृथ्वीको ऋणमुक्त कीजिये।
इस प्रकारका उपदेश मिलनेपर, सूरिके सन्तोषसे सन्तुष्ट होकर राजाने उस बातको स्वीकार किया।
९) उसी रातको राजा वीरचर्या¹ निमित्त नगरमें घूम रहा था, उस समय एक तेलीको बारबार
इस (श्लोकार्थ) को पढ़ते सुना-
७. 'हमारा संदेश नारद ! कृष्णको कहना।'
राजा सबेरा होनेतक रुका रहा पर उत्तरार्ध न सुन सका। उदास होकर राजमहलमें आकर सो गया।
सवेरे सामयिक कृत्य करके राजाने उस तेलीको बुलाकर उत्तरार्ध पूछा। उसने कहा-
'जगत् दारिद्रयसे दुःखित है [ इस लिये ] बलिके बन्धनको छोड़ो ॥ ७॥'
यह सुनकर सिद्धसेन सूरिके उपदेशको फिरसे कहा हुआ समझकर पृथ्वीको ऋणमुक्त करना शुरू किया।
[ उज्जयिनी में राजा विक्रमादित्य भट्टमात्र के साथ गुप्त वेश धारण करके महाकालके मंदिरमें
नाटक देखने गया। कुछ समयके बाद नागरिकके लड़के द्वारा कराये जानेवाले नाटकमें सूत्रधारके मुखसे उसका
वर्णन सुनकर राजाने भी उस नागरिकका धन ले लेनेके लिये मन-ही-मन लोभ किया। बादको कुछ समय
बीतनेपर वह प्यासा होकर मुख्य वेश्याके घर परसे भटके पाससे पानी मंगवाया। वहा बुढ़िया वेश्या प्रधान
पुरुषोंसे कह कर उसके लिये ईखका रस लेनेके लिये उपवनमें गई। काटनेवालोंसे ईख कटवाकर उसका रस
निकलवाया पर उससे घड़िया बिलकुल नहीं भरी तो मनमें दुखी होकर ऊपरका शकोरा भर कर ही बहुत देरसे
आई। राजाके रस पी लेनेपर भट्टमात्रने उसकी देरी और उदासीका कारण पूछा। वह बोली-और और
दिन तो एक ही ईखसे घड़ा और शकोरा दोनों भर जाते थे लेकिन आज तो घड़ा भी नहीं भरा। इसका कारण
समझमें नहीं आता। भट्टमात्रने फिर पूछा कि-तुम लोग तो बड़ी पक्की बुद्धिवाली होती हो इसलिये इसका
कारण जानकर और विचारकरके बताओ। फिर वेश्या बोली कि-पृथ्वीके मालिक (राजा) का मन प्रजाके
प्रति विरुद्ध होगया है, इसलिये पृथ्वीका रस भी क्षीण होगया है। यह कारण उसने निवेदन किया तो
राजा भी उसके बुद्धिकौशलसे चकित हुआ। वह फिर अपने घरकी शय्यापर सोया हुआ इस प्रकार विचार
करने लगा कि-प्रजा-पीड़न किये बिना, केवल विरुद्ध चिन्ता मात्रसे ही पृथ्वीके रसकी इस प्रकार हानि हुई ! तो*
१ वीरचर्या-उस जमानेके राजा अपनी प्रजाके सुख दुःखोंकी बातें स्वय जानने-सुननेके लिये कभी कभी रातके
समय, एकाकी गुप्तवेशमें महलोंसे बाहर निकल जाते थे और दो चार घंटे इधर उधर घूम फिर कर नगर चर्चाका प्रत्यक्ष अनुभव
करते थे। इसका नाम वीरचर्या है।
३-४
१० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
मैं अब प्रजाको पीड़ा नहीं पहुँचाऊंगा । ऐसा निश्चय करके राजा दूसरी रातको प्यासका बहाना करके परीक्षाके
लिये फिर उसके घर गया । वह शीघ्र ही ईखका रस ले आई और राजाको दिया जिसे पीकर वह [ अपने
महलमें आया और ] शय्यापर सो गया । भट्टमात्रके पूंछनेपर वेश्याने भी [ उसी तरह ] निवेदन किया
( बताया ) कि - [ आज ] राजाका मन प्रजापर प्रसन्न है । राजाने भी रातवाली अपनी बात बताकर, परके
चित्तको इस प्रकार पहचान लेनेके कारण, सन्तुष्ट होकर उस वृद्ध वेश्याको [ पारितोषिकके ढंगपर ] हार
दिया । - इस प्रकार यह राजाके मनके अनुसार होनेवाले पृथ्वीरसका प्रबंध है । ]
१०) इसके बाद एक बार श्री सिद्धसेन सूरिने, यह पूछे जानेपर कि-' मुझ ( विक्रम ) के समान क्या
कोई [ और भी ] जैन राजा होगा ? ' कहा-
८. एक हजार एक सौ निन्यानवे वर्ष पूर्ण होनेपर तुझ विक्रमादित्य के समान एक कुमार [पाल]
नामक राजा होगा ।
११) इसके बाद, एक दूसरे अवसरपर, जब राजा जगत्को ऋणमुक्त कर रहा था, अपने औदार्य
गुणका अहंकार करते हुए उसने सोचा कि-' प्रातःकाल एक कीर्ति-स्तम्भ बनवाऊँगा । [ उसी दिन ] रातको
वीरचर्या निमित्त चतुष्पथमें घूम रहा था कि दो साढ़ लड़ते हुए सामने आये । उनसे डर कर राजा किसी
दारिद्र्यग्रस्त ब्राह्मणकी पुरानी गोशालाके एक खंभेपर चढ़ गया । वे दोनों सांढ़ भी सींगसे बारंबार उसी खंभेपर
प्रहार करने लगे । इसी बीच उस ब्राह्मणने अकस्मात् जग कर, आकाशमें शुक्र और वृहस्पतिसे अवरुद्ध चन्द्र-
मण्डलको देखकर, गृहिणीको उठाया और चन्द्रमण्डलसे सूचित होनेवाले राजाका प्राणभय जान कर कहा कि-
उसकी शान्तिके लिये हवनीय द्रव्यसे हवन करूंगा । राजा कान लगा कर यह बात सुन रहा था । गृहिणीने
उससे कहा-' इस राजाने सारी पृथ्वीको तो ऋणमुक्त किया है, लेकिन मेरी सात कन्याओंके विवाहार्थ तो कुछ
द्रव्य नहीं दिया । तो फिर शान्तिकर्म करके उसे व्यसन ( संकट ) से मुक्त करनेमें क्या लाभ है ? ' इस प्रकार
उसकी बात सुन कर वह सर्वथा गर्वसे रहित हुआ और उस संकटसे छूटकर और उस कीर्तिस्तम्भकी बातको
भूलकर चिरकाल तक राज्य करता रहा ।
- इस प्रकार यह विक्रमादित्यकी निर्गर्वताका प्रबन्ध है ॥ ६ ॥
[ इसके बाद एक दूसरी रातको एक धोबिनसे राजाने पूछा कि-' वस्त्रोंमें बालू क्यों लगी रहती है और
वे गन्दे क्यों हैं ! ' उसने कहा-
[ ३ ] हे महाराज, यह जो दक्षिण समुद्ररूपी दक्षिण नायककी वधू, रेवाकी प्रतिस्पर्द्धिनी, गोदावरी
नामक प्रसिद्ध नदी, जिसका तट गोविन्दके प्रिय गोकुलोंसे आकुल है, उसका जल, वर्षाकाल बीत
जानेपर भी आपकी सेनाके हाथियोंके दाँतरूपी मूसलसे प्रक्षोभित धूलिके कारण, स्वच्छ नहीं हुआ ।
[ ४ ] उस राजाओंके राजाने धोबिनकी यह बात सुन कर भ्रूक्षेप मात्रमें अपने शरीरके आभूषणोंके
साथ एक लाख [ का दान ] दे दिया ।
[ ५ ] राजा विक्रमादित्यने चोर, मागध ( भाट ), ब्राह्मण और धोबिनसे कविता सुन कर [ रातके ]
चारों पहर दान दिया । ]
-' इस प्रकार यहापर विक्रमके संबंधके [ और भी ] विविध प्रबंध, परंपरा द्वारा जानलेने चाहिए ।
१ इस पंक्तिके लेखसे मेरुतुंगसूरि यह सूचित करना चाहते हैं कि विक्रमके विषयके जैसे ये प्रबन्ध हमने यहा
लिखे हैं, वैसे और भी अनेक प्रबन्ध हैं, जिनका ज्ञान अन्यान्य ग्रन्थों प्रबन्धों द्वारा प्राप्त करना चाहिए । हमने तो यहा पर कुछ
दिग्दर्शन करानेके लिये ही ये थोड़ेसे प्रबन्ध लिख दिये हैं ।
प्रकरण १२ ] विक्रमाकॅराजाका प्रबन्ध [ ११
१२) एक वार, आयुके अन्तमें विक्रमादित्य का शरीर कुछ कमजोर हुआ तो एक वैद्यने उपदेश
दिया कि, कौवेका मास खानेसे रोगकी शान्ति होगी । जब राजा उसे पकाने लगा तो इससे वैद्यने राजाका
प्रकृति-व्यत्यय देखकर कहा—इस समय धर्मौषध ही बलवान है । क्यों कि प्रकृतिकी विकृति होनेसे उत्पात होता
है। जीवनके लोभसे लोकोत्तर सत्त्व-प्रकृतिका त्याग करके काकमास खाकर आप किसी तरह भी न जियेंगे । वैद्यके
ऐसा कहनेपर उसको 'परमार्थबान्धव' कह कर राजाने उसकी प्रशंसा की और पारितोषिक देनेके लिये कहा ।
फिर और हाथी, घोड़ा, कोश इत्यादि सर्वस्व याचकोंको देकर, राजपुरुषों और नागरिकोंसे विदा लेकर, धवल
गृहके किसी निर्जन प्रान्तमें तात्कालोचित दान और देव पूजन करके कुशासनपर बैठ गया और सोच ही रहा
था कि ब्रह्मद्वारसे प्राणोंको निकाल दूं, अकस्मात् आविर्भूत अप्सराओंके समूहको देखा । राजाने हाथ जोड़कर
प्रणाम करके उनसे पूछा कि-‘तुम लोग कौन है ?’ इस पर अप्सराओंने कहा कि—विस्तारके साथ कुछ
कहनेका यह अवसर नहीं है, हम तो विदा लेनेके लिये ही यहा आई हैं । इस प्रकार कहकर जाती हुई
अप्सराओंसे राजाने फिर कहा—‘नवीन ब्रह्माने आप लोगोंको एक अद्वितीय रूप दे कर बनाया है । फिर भी
जानना चाहता हू कि, यह अद्वितीय रूप नासिकाहीन क्यों है ?’ इस पर वे ताली बजाकर हँसती हुई
बोलीं—‘अपने ही अपराधको हमारे ऊपर डाल रहे हो ?’ ऐसा कह कर वे चुप हो गई । तब राजाने
कहा—आप लोग तो स्वर्ग लोकमें रहती हैं। आपके ऊपर मेरे अपराधकी सम्भावना कैसे हो सकती है ?
इस तरह राजाका वचन समाप्त होनेपर उनमें की मुख्य सुमुखीने कहा—‘ हे राजन्, पूर्वतन पुण्यके प्रभावसे
नव निधियोंने तुम्हारे महलमें अवतार ग्रहण किया था, हम लोग उन्हींकी अधिष्ठात्री देवतायें हैं । आपने
जन्मसे महादान देते हुए भी एक ही निधिमेंसे इतना ही मात्र दिया है कि जिससे आप नासाग्र देख नहीं
सकते ।’ इस प्रकारका उनका कथन सुनकर हाथसे सिर ठोकते हुए राजाने कहा कि—‘यदि मैं जानता कि
नव निधिया अवतीर्ण हुई हैं तो उन्हें नौ ही पुरुषोंको दे देता । दैवने अज्ञान भावसे मुझे वञ्चित किया ।’
उसके ऐसा कहते समय उन्होंने यह कह कर आश्वासित किया, किं—कलियुगमें तो आप ही एकमात्र उदार हैं।
और वह परलोक प्राप्त हुआ । उसी दिनसे उस विक्रमादित्य का संवत्सर प्रवृत्त हुआ जो आज भी जगत्में
वर्तमान है ।
॥ श्रीविक्रमादित्यके दान विषयक ये विविध प्रबंध पूरे हुए ॥
१२] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
२. सातवाहन राजाका प्रबन्ध ।
१३) दान और विद्वत्ताके विषयमें श्री सातवाहन की कथा परम्परागत यथाश्रुतिके अनुसार जानना
चाहिये।१ उसके पूर्व जन्मकी कथा इस प्रकार है—प्रतिष्ठानपुरमें सातवाहन राजा जब राजपाटिका
(बहिर्भ्रमण) करने जा रहा था तो नगरके निकट नदीमें एक मछलीको हँसते देखा, जिसे लहरोंने पानीके
किनारे फेंक दिया था। इस अस्वाभाविक बातको देखकर राजाको भय हुआ। उसने सभी पंडितोंसे इस
सन्देहको पूछते हुए एक ज्ञानसागर नामक जैन मुनिसे भी पूछा। अपने अतिशय ज्ञानके बलसे उसने
राजाके पूर्वजन्मको जानकर इस प्रकार उपदेश दिया कि—'पिछले जन्ममें तुम इसी नगरमें रहते थे। तुम्हारे
कुल-वंशमें कोई नहीं था। और तुम्हारी जीवनवृत्ति एकमात्र लकड़ीका बोझ ढोना था। तुम नित्य ही भोजनके
अवसर पर इसी नदीके निकटवर्ती शिलातलपर बैठकर पानीसे सत्तू सानकर खाया करते थे। किसी दिन,
'एक महीनेके उपवासकी पारणाके लिये' नगरमें जाते हुए एक जैन मुनिको बुलाकर वह सत्तूका पिंड उनको
दानकर दिया। उस पात्रदानके माहात्म्यसे तुम सातवाहन नामक राजा हुए और वह मुनि देवता हुआ।
वही देवता अपने अधिष्ठान वश होकर, उस काष्ठभारवाही जीवको तुझे इस राजाके रूपमें पहचानकर, प्रमादके
कारण हँस पड़ा।' इस कथागत वस्तुका संग्रह सूचक यह [पुरातन] काव्य है—
९. मछलीके मुँहके हँसनेपर जो सातवाहन राजा भयभीत होगया था उससे मुनिने कहा कि
जिसने सत्तूसे मुनिको पूर्व जन्ममें जो पारणा कराया था वही आप हैं और दैवात् मछलीने आपको
पहचान लिया इसलिये वह हँस रही।
वह सातवाहन उस पूर्व जन्मके वृत्तान्तको जातिस्मृतिसे प्रत्यक्ष करके उस दिनसे दानधर्मकी
आराधना करता हुआ सब महाकवियों और विद्वानोंका संग्रह करता रहा। उसने चार करोड़ सुवर्णसे चार
गाथाओंको खरीदा और सात सौ गाथाओंवाला 'सातवाहन' नामक संग्रह गाथा कोश शास्त्र निर्माण कराया।
इस प्रकार वह नाना सद्गुणोंका निधि बनकर चिरकाल तक राज्य करता रहा'। वे चारों गाथायें ये हैं। जैसे--
[प्रबन्धचिन्तामणिकी मूल पाठकी जो आवृत्ति हमने तैयार की है उसमें यहा पर (देखो पृष्ठ ११) १०
प्राकृत गाथायें दी हुई हैं। इन गाथाओंके क्रम आदिके विषयमें पुरानी प्रतियोंमें बहुत कुछ गडबड मालूम देती है। कोई
प्रतिमें तो ये गाथायें सर्वथा नहीं दी गई हैं और 'गाथाचतुष्टयमेतद्' (अर्थात्-ये चार गाथायें इस प्रकार हैं) इस वाक्यके
बदले 'तद्गाथाचतुष्टय बहुश्रुतेभ्यो ज्ञेयं' (अर्थात्-ये चार गाथायें बहुश्रुत विद्वानों द्वारा जाननी चाहिए) ऐसा वाक्य है; और
कुछ प्रतियोंमें पहली ५ गाथायें लिखी हुई मिलती हैं, कुछमें दूसरी ५ गाथायें, कुछमें दसों गाथायें मिलती हैं। हमने मूलमें,
समग्रकी दृष्टिसे इन दसों गाथाओंका पाठ दे दिया है। इनमें पहला गाथा-पंचक है वह शृंगार विषयक वस्तुका वर्णनवाला है;
दूसरा गाथा-पंचक अन्योक्तिद्वारा सत्पुरुषोंके परोपकार भावका वर्णन करता है। इन गाथाओंका अर्थ इस प्रकार है-]
१० 'हार,' 'वेणीदंड,' 'खद्योतपङ्क्ति' और 'ताल' इन ४ वस्तुओंका वर्णन करनेवाली ४
गाथायें सालाहन राजाने दसकोटि [सुवर्ण] दे कर ग्रहण कीं ॥ १ ॥
१ विक्रमकी तरह सातवाहन राजाकी भी बहुतसी कथायें परंपरासे चली आती हैं। विक्रमचरित के समान सात
वाहनचरित भी बना हुआ है। संस्कृतके कथासरित्सागर नामक प्रसिद्ध ग्रंथमें सातवाहन की बहुतसी कथायें गूंथी हुई हैं। वे
सब कथायें मेरुतुंगसूरिके समयमें बहुत प्रचलित थीं और लोक-प्रसिद्ध थीं इसलिये उन्होंने उन कथाओंको इस ग्रंथमें संकलित
नहीं किया। विक्रम के बाद सातवाहन प्रसिद्ध ऐतिहासिक दानशील राजा हो गया और उसने भी विद्वानोंको खूब धन दान
किया, इसलिये सिर्फ उसका नाम निर्देश करनेके निमित्त ही यह इतना-सा वृत्तांत उसके विषयमें मेरुतुंगसूरिने लिख दिया है।
इसकी विशेष चर्चा अगले ऐतिहासिक विवेचनवाले भागमें की जायगी।
प्रकरण १३ ] सातवाहन राजका प्रबन्ध [ १३
[ हारका वर्णन करनेवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-]
११. खूब पुष्ट और ऊंचे उठे हुए स्तनोंवाली स्त्रीके वक्षस्थलपर रहा हुआ [ मोतियोंका ] हार स्थिर
होकर रहनेकी ठीक जगह न मिलनेसे छातीपर उद्विग्न अथवा उन्मुख होकर इधर उधर फिरता
रहता है—जैसे यमुना नदीके प्रवाहमें पानीके फेनके बुद्बुदे इधर उधर फिरते रहते हैं।
[ 'वेणीदण्ड 'का वर्णन करनेवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-]
१२. हे सुन्दरि, तेरा यह कृष्णकांति वेणीदण्ड नितम्ब-बिम्बपर जो शोभ रहा है यह मानों ऐसा
लगता है कि सुरतस्थानरूप महानिधिकी रक्षा करनेवाला कोई भुजंग है।
[ 'खट्ठोद्गालि'के वर्णनवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-]
१३. सुरत-संभोगके समय जो संतोषदायक सुंदर सुखानुभव हुआ, उसका विरह होनेसे, हे प्रिय
सखि ! यह खाट चूं चूं ऐसा शब्द कर रही है।
[ 'ताल' का वर्णन करनेवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-]
१४. हे शुक ! तूं इसे चांचके लगाने-ही-से गिर जानेवाला पका हुआ. आम्रफल मत समझ । यह तो
जरठ हो जानेसे बेस्वादवाला और उभडा हुआ तालफल है।
[ दूसरा गाथा-पंचक है उसमें 'कदली वृक्ष', 'विन्ध्य गिरी', 'स्नेहधार' और 'चन्दन वृक्ष' इन ४ वस्तुओंका
अन्योक्तिमय वर्णन है। इसकी आखिरी १० वीं गाथामें कहा गया है कि सालीवाहन राजाने ये गाथायें ९
कोटि (प्रत्यत्तरमें ४ कोडि) देकर ग्रहण कीं। इनका अर्थ क्रमशः इस प्रकार है-]
१५. जो पुरुष, केलके झाडके 'समान, दूसरोंको फल देते हुए अपना विनाशका भी विचार नहीं
करते, उनके सामने मरना भी वाछनीय है ।
१६. जिस तरह विन्ध्याचल पर्वत सदा सरस (हरे भरे) वृक्षोंको धारण करता है वैसे ही शुष्क-
( निकम्मे ) वृक्षोंको भी धारण करता है । उसी तरह बडे पुरुष अपने उत्संगवर्ती-समीपवर्ती निर्गु-
णोंका भी त्याग नहीं करते ।
१७. वे मुज्झार¹ जिन्होंने तृषित होकर प्रथम ही प्रथम जो स्नेहधार (जलधारा) का जैसे तैसे
करके पान किया है वे फिर आजन्म अन्य पानकी इच्छा नहीं करते ।
१८. शुष्क हो जानेपर भी जिस चन्दनके वृक्षका, सब जनोंको आनन्द देनेवाला ऐसा सुरभि गन्ध है
यह जब सरस भाववाला (हरा फूला ) होगा तब तो फिर कैसा ही होगा ।
१ यह 'मुज्झार' क्या वस्तु है इसका अर्थ हमें स्पष्ट नहीं हुआ । यह शब्द भी शुद्ध है या नहीं इसकी हमें शंका है।
कोश वगैरह ग्रंथोंमें यह शब्द हमें नहीं मिला।
१४ ] प्रबंधचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश'
३. शीलव्रतके विषयमें भूयराजका प्रबंध ।
१४) यह प्रबंध इस प्रकार है-कान्यकुब्ज देशमें, जो छत्तीस लाख गाँवोंका प्रगणा है, 'कल्याण
कटक' नामक राजधानीमें भूयराज नामक राजा राज्य कर रहा था। किसी दिन प्रभात कालमें जब कि
वह राजपाटिका करनेके लिये जा रहा था, उस समय खिड़की पर बैठी हुई किसी मृग-नयनीको देखता हुआ
उसका अपहरण करनेके लिये अपने पानीयके अधिकारी पुरुषको आदेश किया। उसने उसे राज-भवनमें लाकर
किसी संकेत स्थलपर रखकर राजाको निवेदन किया। वहाँ आकर राजाने उसका हाथ पकडकर खींचना चाहा
तो इसपर वह राजासे बोली-' स्वामिन्, आप तो सर्व देवताके अवतार हैं; अफसोस कि आपका इस नीच नारीमें
क्यों अभिलाष है?' उसके इस वाक्यसे राजाकी कामाग्नि कुछ शान्त हुई, और वह बोला कि-'तुम कौन हो?'
उसके यह कहनेपर कि 'मैं आपकी दासी हूं'-राजाने कहा कि 'यह बात क्या ठीक कह रही हो?' तो उसने
बताया कि 'आपका दास जो पानीयका अधिकारी है, मैं उसकी स्त्री, और आपकी दासानुदासी हूं?' उसकी
बातसे राजा चकित हुआ और उसकी कामपीडा सर्वथा विलीन हो गयी। उसको अपनी पुत्री मानकर उसे
बिदा किया। उस (स्त्री) के शरीरमें हमारे हाथ लगे हैं, यह सोचकर उनके निग्रह (नष्ट करने) की इच्छासे
रातको यह भ्रान्ति जन्माकर कि खिड़कीके रास्ते कोई प्रवेश कर रहा है, अपने ही पहरेदारोंसे अपने दोनों ही
हाथ कटवा डाले। सबेरे पहरेदारोंको मंत्रीलोग दण्ड देने लगे तो उन्हें रोककर मालवमण्डलमें महाकाल
देवके प्रासाद (मन्दिर) में जाकर उनकी आराधना करता रहा। देवताके आदेशसे जब दोनों भुजायें लग
गईं तो अपने अन्तःपुरके साथ सारा मालवदेश उसी देवको समर्पण कर दिया और परमार [जातिके]
राजपूतोंको उसकी रक्षाके अधिकारी नियुक्त करके स्वयं तापसी दीक्षा ग्रहण की।
—इस प्रकार शीलव्रत विषयक यह भूयराजका प्रबन्ध है ॥ ९ ॥
प्रकरण १४-२० ] वनराज-आदिका प्रबन्ध [ १५
४. वनराजादि प्रबन्ध ।
१५) उसी कान्यकुब्ज देशके [ अधिकारमें ] गुर्जर धरित्री (गुजरात) भी एक प्रांतरूप है । उस
गुजरात के वढ्ढीयार नामक देशके पञ्चाशर ग्राममें चापोत्कट वंशमें जन्म लेनेवाले एक बालकको उसकी
माता झोलीमें रखकर और उसे ' वण ' नामक वृक्षमें लटकाकर लकड़ी चुन रही थी । कार्यवश वहा आये
हुये श्री शीलगुणसूरि नामक जैनाचार्यने यह देखकर कि, अपराह्नमें (दोपहरके बाद) भी उस वृक्षकी छाया
नहीं झुक रही है, सोचा कि इस झोलीवाले बालकके पुण्यका ही यह प्रभाव है; और इस आशासे कि [भविष्यमें]
यह जैन धर्मका प्रभावक पुरुष होगा, उसकी माताकी वृत्तिका उचित प्रबन्ध करवाकर उस बालकको
उससे अपने अधीन ले लिया । वीरमती गणिनी नामक एक आर्या बालकका पालन करने लगी । गुरुने
उसका नाम वनराज रखा । जब वह आठ वर्षका हुआ तो गुरुने देवपूजाके द्रव्योंको नष्ट करनेवाले
चूहोंसे उस द्रव्यकी रक्षा करनेके काममें उसे नियुक्त किया । यह तो उन्हें बाणोंसे मारने लगा ।
गुरुके निषेध करने पर उसने कहा कि- ' ये चूहे तो चौथे उपाय यानि दण्डसे ही साध्य हैं । ' उसके जातक
( जन्मकुण्डली ) में राजयोग देखकर और यह निर्णय करके कि यह महा नृपति होनेवाला है, गुरुने उसे फिर
उसकी माताको सौंप दिया । यह माताके साथ किसी पल्ली ( गाँव ) में रहने लगा । यहा उसका मामा रहता
था जो डकैती करता था, उसका वह आदरपात्र बन गया और उसके साथ गाँवों और नगरोंमें, अपने
पौरुषका आतंक बतलाता हुआ, चारों और लूट-पाट करने लगा ।
१६) एकबार काकर नामके गाँवमें किसी व्यवहारीके घरमें सेंध मारा और धन चुराते समय
उसका हाथ दहीके भाण्डमें पड़ गया । तब यह सोचकर कि मैंने इस घरमें खाया है, सब कुछ वहीं छोड़कर
निकल गया । दूसरे दिन उस व्यवहारीकी बहन श्रीदेवीने, रातको गुप्तरूपसे, उसे भाईके समान स्नेह बतला-
कर अपने यहाँ बुलाया और पूछा-' मेरे घरमें प्रवेश करके तुमने सब सार ग्रहण करके भी इस तरह क्यों
छोड़ दिया ? ' उसने कहा-
२०. कोप करनेका निमित्त मिलने पर भी उस मनुष्यके प्रति कैसे पापविचार किया जाय जिसके घरमें
उत्पलदल ( कमलपत्र ) के समान सुकुमार हाथको गीला* बनाया हो ।
उस स्त्रीने भी उसकी बात सुनकर और उसके चरित्रसे चमत्कृत होकर भोजन और वस्त्र आदिसे
उसका उपकार किया । वनराजने उसके बदलेमें प्रतिज्ञा की कि-मेरे पट्टाभिषेकके समय तुम्ही वहन होकर
टीका देना ।
१७) इसके बाद, एक दूसरे अवसरपर जब वह डकैती करने जा रहा था उस समय [ उसके साथी ]
चोरोंने किसी एक जंगलमें जाम्बा नामक बनियेको जा घेरा । ये चोर जो तीन थे उनको देखकर बनियेने
अपने पासके पांच बाणोंमेंसे दोको तोड़ डाले । चोरोंके पूछनेपर बोला कि-तुम तो तीन ही जन हो, इसलिये
उससे अधिक दो बाण व्यर्थ है । ऐसा कहकर उसने उनके बताए हुए एक चलते लक्ष्यको अपने बाणसे
बाँध दिखाया । उसके इस लक्ष्यभेदसे सन्तुष्ट होकर, वे उसे अपने साथ ले गये । उसकी ऐसी युद्ध-विद्यासे
चकित होकर श्री वनराजने यह आदेश देकर विदा किया कि-मेरे पट्टाभिषेकके समय तुम महामन्त्री होगे ।
- हाथ गीला बनानेका तात्पर्य भोजन करनेसे है ।
१६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
१८) बादमें कान्यकुब्ज देशसे एक पञ्चकुल (कर वसूल करनेवाला) गुजरात देशका कर उगाहने
आया। यह गुजरात देश उस कान्यकुब्ज देशके राजाने अपनी 'महणका' नामक कन्याको दहेजमें
दे दिया था। इस पञ्चकुलने उस वनराज नामक पुरुषको अपना सेलभृत् (शस्त्राधिकारी) बनाया।
छ महीने तक देशसे कर वसूल कर २४ लाख पारूथक द्रम्म (चाँदीके सिक्के ?) और ४ हज़ार अच्छी नस्लके
तेजबान् घोड़े लेकर जब वह पञ्चकुल अपने देशको चला तो वनराजने सौराष्ट्र नामक घाटपर उसे मार
डाला और फिर उस राजाके भयसे साल भर तक किसी बनमें जाकर छिपा रहा।
१९) इसके बाद, अपने राज्याभिषेकके लिये राजधानीरूप नगर बसानेकी इच्छासे एक अच्छी भूमि
खोजने लगा। पीपळुला सरोवरके किनारे, अणहिल्ल नामका भारूवाड़ साखड़ का लड़का जो सुखपूर्वक
बैठा था, उसने पूछा कि-'तुम यहापर क्या देख रहे हो?' उसके प्रधानोंके यह कहनेपर कि नगर बसानेके
योग्य अच्छी भूमि देखी जा रही है। वह बोला कि-'यदि उस नगरको मेरे नामपर बताओ तो मैं वैसी
भूमि बताऊँ।' यह कहकर वह जालि वृक्षके पास गया और वहां जितनी भूमिमें खरगोशके द्वारा कुत्ता
त्रास्रित होता रहता था उतनी भूमिको उसने बताया। उसी भूमिमें वनराजने अणहिल्लपुर इस
नामसे नया नगर बसाया।
[यहाँपर, एक P नामक प्रतिमें अणहिल्लपुरकी प्रशंसा बतलानेवाले निम्नलिखित पद्य लिखे हुए मिलते हैं-]
[६] जो (नगर) हारका अनुकरण करनेवाले प्राकार (खाई) से प्रकाशित हो रहा है, वह ऐसा
लग रहा है मानों सत्ययुग वृत्ताकार होकर कटिसे उसकी रक्षा कर रहा है।
[७] जिस नगरमें रातके आरंभमें चन्द्रशाला (ऊपरी तल) में खेलती हुई स्त्रियोंके मुखकी शोभासे
आकाश ऐसा जान पडता है कि उसमें सैकड़ों चन्द्रमा उदय हुए हैं।
[८-९] जिस नगरीके विजयी गुणके सामने लंका को शंका हो गई, चम्पा कापने लगी, विदिशा
कृश हो गई, काशी की सम्पत्ति नष्ट हो गई, मिथिलाका आदर शिथिल हो गया, त्रिपुरीकी
शोभा विपरीत हो गई, मथुरा की आकृति मन्थर (सुस्त, फीकी) पड़ गई और धारा भी
निराधार हो गई।
[१०] जिस नगरके स्त्रीजन और कौरवेश्वरके सैन्यमें हम कोई अन्तर नहीं देखते क्यो कि दोनों ही
'गांगेय-कर्ण' (स्त्री-पक्षमें सोना है कानमें जिनके; और सेना-पक्षमें भीष्म और कर्ण है जिनमे) हैं।
[११] जिसके आगे प्रौढ़ शोभावाली अलकापुरीको पुलक नहीं होता (आनंदित नहीं होती),
लंका अति शंकाकुला हो उठती है, उज्जयिनी की भी कभी जीत नहीं होती, चम्पा अति
कांपती रहती है, कान्तिपुरी कान्तिविभूषिता नहीं होती, अयोध्या अतियोध्या हो जाती है,
ऐसा यह अद्भुत पत्तन (अणहिलपुर) नगर है जिसमें लक्ष्मी सदा नाच करती रहती है।
इस नगरकी जय हो।
२०) श्रीविक्रमादित्य के संवत् ८०२ आठ सौ दोमें-प्रसंतरमें, संवत् ८०२ के वैशाख सुदी दूज,
सोमवारको-उस जालि वृक्षके नीचे बड़ा भारी राजप्रासाद बनाकर राज्याभिषेक लग्नके समय श्रीवनराजने
काकर ग्रामकी रहनेवाली उस प्रतिज्ञात बहन श्रीदेवी को बुलाकर उसके हाथसे तिलक करवाया। उस समय
उसकी आयु पचास वर्षकी थी। वह जांबा नामक वणिक् महामंत्री बनाया गया। पञ्चासर ग्रामसे श्री शी
लगुणसूरिको भक्तिके साथ ले आकर धवल गृहमें अपने सिंहासनपर बैठाया और कृतज्ञोंमें श्रेष्ठ होनेके
कारण सप्ताङ्ग राज्य उन्हें समर्पण किया। उन निःस्पृह सूरिने उसका बार बार निषेध किया। किन्तु उसने
प्रकरण २१-२३] वनराज-आदिका प्रबन्ध [१७
उनके प्रत्युपकारकी बुद्धिसे उन्हींकी आज्ञासे श्री पार्श्वनाथकी प्रतिमासे अलंकृत पञ्चासर नामक चैत्य बनवाया
और उसमें देवकी आराधना करती हुई अपनी निजकी मूर्ति भी स्थापित की । धवल गृहमें कण्टेश्वरी देवीका
भी मन्दिर बनवाया ।
२१. वनराज के समयसे ही गुर्जरोंका यह राज्य जैन मंत्रों द्वारा स्थापित हुआ है इसलिये इसका
द्वेषी कभी भी आनंद प्राप्त नहीं कर सकता ।
२१) संवत् ८०२ से लेकर ५९ वर्ष २ मास २१ दिन तक श्री वनराज ने राज्य किया। श्री वनराज
की पूरी आयु १०९ वर्ष २ मास २१ दिन की थी ।
संवत् ८६२ की आषाढ़ सुदी तृतीयाको अश्विनी नक्षत्र और सिंह लग्नके बीतते समय श्री वनराज के
पुत्र श्री योगराजका राज्याभिषेक हुआ ।
[ B. P. प्रतिमें “संवत् ८०२ से लेकर ६० वर्ष तक श्री वनराजने राज्य किया । संवत् ८६२ वर्षमें
श्री योगराजका राज्यभिषेक हुआ ( P. प्रतिमें श्री योगराजने राज्य अलंकृत किया ),” इतना ही पाठ है ।]
२२) उस राजा ( योगराज ) के तीन लड़के हुए । किसी समय क्षेमराज नामक कुमारने राजाको
इस प्रकार सूचित किया कि एक अन्य देशीय राजाके प्रवहण ( जहाज ) बवंडरमें पड़कर तितर बितर हो
गये हैं । वे अन्यान्य बंदरगाहोंसे हटकर श्री सोमेश्वर पत्तन में आ लगे हैं । उनमें १० हजार तेजस्वी
घोड़े और १८ सौ (!) हाथी, तथा एक करोड किंमतवाली और और चीजे हैं । यह सब संपत्ति हमारे
देशसे होकर अपने देशको जायगी । यदि महाराजकी आज्ञा हो तो उसे ले आया जाय । उसके ऐसी विज्ञप्ती
करने पर राजाने वैसा करनेका निषेध किया ।
उसके बाद जब वह सब स्वदेशकी अन्तिम सीमाके प्रान्तमें पहुँचा, तो वृद्धावस्थाके कारण राजाकी
निष्फलताका विचार कर, तीनों कुमार अपनी सेना सजाकर उसपर टूट पडे, और अज्ञात चौर वृत्तिसे, उसके
पाससे सब कुछ छीनकर अपने पिताके पास ले आये । भीतर-ही-भीतर कुपित किन्तु ऊपरसे मौन धारण किये
हुए राजाने उनसे कुछ नहीं कहा । वह सब कुछ राजाको भेंटकर जब पूछा गया कि-क्षेमराज कुमारने यह
अच्छा किया या बुरा ? तो राजा बोला-यदि कहूं कि अच्छा किया तो दूसरेके धन लूटनेका पाप लगता है और यदि
कहू कि अच्छा नहीं किया तो तुम लोगोंके मनमें बुरा लगता है । इसमे यही सिद्ध होता है कि मौन ही रहना
अच्छा है । फिर और भी सुनो ! तुम्हारे प्रथम प्रश्नके उत्तरमें, दूसरेके धनके हरण करनेका जो मैंने निषेध किया
था उसका कारण यह है कि-और और देशोंमें राजगण, अन्यान्य राजाओंकी जब प्रशंसा करते हैं, तब गूर्जर
देश में चोरोंका राज्य है ऐसा कहकर वे नित्य उपहास किया करते हैं । जब हमारे स्थान पुरुष ( प्रतिनिधि )
इन बातोंके समाचार हमें देते हैं तो हमें सुनकर दुःख होता है और हमारे पूर्वजोंने कुछ इस तरहकी
बातें की थीं, इसकी हमें ग्लानि होती है । पूर्वजोंका यह कलङ्क यदि लोगोंके हृदयमे भूल जाय तो, अन्य सब
राजाओंकी पंक्तिमें हम भी राज शब्दका सम्मान पावें । किंचित् धन लोभसे लुब्ध होकर तुम लोगोंने पूर्वजोंके
इस कलंकको माज-मूनकर फिरसे ताजा बना दिया । इसके बाद राजाने शस्त्रागारसे अपना धनुष्य मँगाकर
यह आज्ञा दी कि तुम लोगोंमेंसे जो बलवान् हों वह इस धनुष्यको चढ़ाये । यथाक्रम सभी उठे पर जब
कोई न चढ़ा सका तो राजाने खेटकी भांति उसे चटा दिया; और कहा-
२२. राजाकी आज्ञाका भंग करना, नौकरोंका वेतन काट लेना और स्त्रियोंको अलग शय्या देना-
बिना शस्त्र ही से हत्या करना कहलाता है ।
५-६
द्वितीय प्रकाश: मुञ्ज एवं धारानरेश राजा भोज प्रबन्ध
१८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
इस प्रकार नीतिशास्त्रके उपदेशानुसार, मेरी आज्ञा भंग करके बिना शस्त्रके वध करनेवाले तुम पुत्रोंको
मैं क्या दंड दूं? इसके बाद राजाने आयुके १२० वें वर्षमें प्रायोपवेशन ( अन्न जलका त्याग ) कर चितामें
प्रवेश किया । इस राजाने भट्टारिका श्री योगेश्वरी का मन्दिर बनाया ।
२३) इस [ योगराज नामक ] राजाने ३५ वर्ष राज्य किया ।
सं० ८९७ से लेकर २५ वर्ष श्री क्षेमराजने राज्य किया ।
सं० ९२२ से लेकर २९ वर्ष तक श्री भूयड़ने राज्य किया। इसने श्री पत्तन नगरमें भूयडेश्वर का
मन्दिर बनवाया ।
सं० ९५१ से लेकर २५ वर्ष तक श्री वैर सिंहने राज्य किया ।
सं० ९७६ से लेकर १५ वर्ष तक श्री रत्नादित्यने राज्य किया ।
सं० ९९१ से लेकर ७ वर्ष तक श्री सामन्तसिंहने राज्य किया ।
इस प्रकार चापोत्कट वंशमें सात राजा हुए । विक्रमादित्य संवत् ९९८ वर्ष तक [ इस वंशका
राज्य रहा । ]
[ A प्रति और उसके साथ प्रायः मिलती हुई D प्रतिमें यह राजावली निम्नलिखित रूपसे मिलती है । ]
सं० *८... (?) श्रावण सुदी ४ से १० वर्ष १ मास १ दिन श्री योगराजने राज्य किया ।
स० ८....श्रावण सुदी ५ उत्तराषाढ़ा नक्षत्र और धनुष लग्नमें रत्नादित्य का राज्याभिषेक हुआ ।
सं० ८....कार्तिक सुदी ९ से लेकर ३ वर्ष ३ मास ४ दिनतक इस राजाने राज्य किया ।
सं० ८....कार्तिक सुदी ९ रविवारको मघा नक्षत्र और वृषलग्नमें श्रीवैर सिंह राज्यपर बैठा ।
सं० ८....ज्येष्ठ सुदी १० शुक्रवारसे लेकर ११ वर्ष ७ मास २ दिनतक इस राजाने राज्य किया ।
सं० ८....ज्येष्ठ सुदी १३ को हस्त नक्षत्र और सिंह लग्नमें श्री क्षेमराजदेव का राज्याभिषेक हुआ ।
सं० ९३....भादों सुदी १५ रविवारको, इस राजाको राज्य करते, ३८ वर्ष ३ महीना १० दिन
व्यतीत हुए थे ।
सं० ९३५ वर्षमें आश्विन सुदी १ सोमवारको रोहिणी नक्षत्र और कुम्भ लग्नमें श्रीचामुण्डराज
देव का पट्टाभिषेक हुआ ।
सं० ९....माघ वदी ३ सोमवारसे लेकर १३ वर्ष ४ मास १७ दिनतक इस राजाने राज्य किया ।
स० ९३८ (?) माघ वदी ४ मंगलवारको स्वाती नक्षत्र और सिंह लग्नमें श्री आगडदेव राज्यपर
बैठा । इसने कर्करापुरीमें आगडेश्वर और कण्टकेश्वरी के मंदिर बनवाये ।
सं० ९६५ पौष सुदी ९ बुधवारसे लेकर २६ वर्ष १ मास २० दिनतक इसने राज्य किया ।
सं० ९....पौष सुदी १० गुरुवारको आर्द्रा नक्षत्र और कुम्भ लग्नमें भूयगडदेव राज्यपर बैठा । इस
राजाने भूयगडेश्वर का मंदिर और श्रीपत्तन में प्रकार बनवाया ।
सं० ९....वर्षसे आषाढ़ सुदी १५ से लेकर २७ वर्ष ६ महिने ५ दिनतक इसने राज्य किया ।
इस प्रकार चापोत्कट वंशमें ८ पुरुष हुए । १९० वर्ष, २ मास, सात दिनतक इस वंशके राजाओंने
राज्य किया । ]
- जिन प्रतियोंमें यह पाठ मिलता है उनमें इन संवत् सूचक अंकोंके विषयमें बड़ी गड़बड़ी है। कहीं कोई अंक
लिखा हुआ मिलता है और कहीं कोई । प्रतियोंमें जो वर्ष मास आदि दिये गये हैं उनका इन अंकोंके साथ कोई मेल नहीं
मिलता। इसलिये हमने इन अंकोंके स्थान शून्य ही रखे हैं। आगेके भागमें जो ऐतिहासिक विवेचन किया गया है उससे इन
अंकोंकी निरर्थकता मालूम हो जायगी ।
प्रकरण २४-२५ ] मूलराजका प्रबन्ध [ १९
चौलुक्यवंशका प्रारंभ ।
२३. हाथी ( मातङ्ग होनेके कारण ) सेवाके योग्य नहीं रहे, पहाड़ोंके पर गिर गये, कच्छप जड़
प्रीतिवाला है, शेषनागको दो जीभें हैं, इसलिये पृथ्वीको कौन धारण करने योग्य है-इस तरह
चिन्ता करनेवाले विधाताकी सायंकालीन संध्याके चुल्लुकसे कोई तलवारधारी वह सुभट उत्पन्न हुआ१
[ जिससे चौलुक्यवंशका प्रारंभ हुआ । ]
[ यह पद्य श्लेषात्मक है और उस अर्थ ही में इसका कवित्व है। एक समय ब्रह्मदेव सन्ध्या-कृत्य कर रहे थे उस
समय पृथ्वीकी दशाका उन्हें विचार आया । पृथ्वीको धारण करने योग्य कौन कौन पदार्थ है इसका विचार करते हुए उनके
मनमें दिग्गजोंका खयाल आया-लेकिन वे असेव्य मालूम दिये क्यों कि वे मातंग कहलाते हैं। (संस्कृत भाषामें मातंग शब्दके
दो अर्थ है-१ हाथी, और २ चांडाल ) । फिर उन्हें कुलाचल पर्वतोंका खयाल आया, लेकिन वे पक्ष विहीन मालूम दिये ।
( पुराणोंमें पर्वतोंके पक्ष यानि पर इन्द्रने काट डाले ऐसी कथा प्रचलित है।) संस्कृतमें पक्ष शब्दका अर्थ पांख भी होता
है। फिर ब्रह्माका खयाल कूर्म यानि कच्छपकी ओर गया, लेकिन वह जड़प्रीतिवाला मालूम दिया। जो जड़के साथ प्रीति रखता
हो वह पृथ्वीको धारण करने जैसा महान् कार्य करने योग्य कैसे हो सकता है? (संस्कृतमें जड़ यानि मूर्ख और जल=पानी ऐसे
दो अर्थ इसके होते हैं। कच्छपकी प्रीति जल यानि पानीके साथ होती ही है। इसके बाद ब्रह्माका ध्यान फणिपति=शेषनागकी
तरफ गया-लेकिन वह उन्हें दो-जीभा मालूम दिया। सर्पके दो जीभें होती ही हैं। (संस्कृतमें द्विजिह्व=दो-जीभका अर्थ चुगलखोर
ऐसा निन्दात्मक भी होता है।) इसलिये जो दो-जीभा हो वह पृथ्वीका भार उठाने लायक नहीं हो सकता। इस प्रकार ब्रह्मा
इनकी अयोग्यताका खयाल कर चिन्तामग्न हो रहे थे और चुल्लूमें पानी भरकर सन्ध्याञ्जलि देनेका विचार कर रहे थे, उतनेमें उस
चुल्लुकमेंसे, हाथमें तलवार धारण किये हुए एक सुभट बाहर निकला और ब्रह्मदेवने उसे ही पृथ्वीका भार वहन करनेमें समर्थ और
योग्य समझ कर उसे पृथ्वीका शासक नियत किया। उसकी जो संतान हुई वह चौलुक्य वंशके नामसे प्रसिद्ध हुई।]
५. मूलराजका प्रबंध ।
२४) पूर्वोक्त श्री भूयराजके वंशज मुंजाल देवके तीन पुत्र हुए जिनका नाम राज, बीज
और दण्डक था । ये तीनों भाई तीर्थयात्राके लिये निकले । श्री सोमेश्वरको नमस्कार करके वहांसे लौटते
हुए अणहिल्लपुरमें आए । वहां पर ये सामन्तसिंह राजाकी घुड़दौड़ देख रहे थे । राजाने बिना ही
कारण घोड़ेको कोड़ा मारा जिसे देखकर, राज नामरू क्षत्रियने, जो कार्पटिक (कार्पटिये) का वेश धारण
किये हुए था, पीड़ित होकर अपना सिर हिलाते हुए, आह ! आह ! ऐसा शब्द कहा । राजाके उसका कारण
पूछने पर उसने कहा कि, घोड़ेकी यह अयुत्तम विशेष चाल जो न्यून करने योग्य है, उसको न समझकर
आपने जो कोड़ा मारा वह मुझे जैसे अपने ही मर्मपर लगा अनुभूत हुआ । उसकी इस बातसे चकित
होकर राजाने वह घोड़ा उसीको चढ़नेके लिये दिया । घोड़ा और घुड़सवार दोनोंका सदृश योग देखकर
उसने पद पद पर उनका न्यूंछन किया, और उसके इस आचरणसे किसी महत् कुलवाला उसे समझकर,
अपनी लीलादेवी नामक बहिनका उसके साथ ब्याह कर दिया । कुछ समय बाद जब यह गर्भवती हुई तो
अकालमें ही उसकी मृत्यु हो गई । मन्त्रियोंने, गर्भस्थ सन्तानका मरण न हो जाय इस विचारसे उसका पेट
चीरकर सन्तानका उद्धार किया । मूल नक्षत्रमें जन्म होनेके कारण उसका नाम मूलराज रखा गया । उदय-
कालीन सूर्यकी भाँति जन्मसे ही तेजोमय होनेके कारण वह सबका आदरपात्र हो गया । अपने पराक्रमसे वह
मामाके राज्यको बढ़ाता रहा । सामंतसिंह मदमत्त होकर उसको कभी राज्यासनपर बिठा देता था और फिर
१ यह पद्य चौलुक्य वंशकी आद्य उत्पत्तिका सूचक है। किसी कोई शिलालेखमेंस यह लिया गया मालूम देता है।
ब्रह्माके चुल्लुकमेंसे इस वंशका मूल पुरुष पैदा हुआ और इसी लिये इस वंशका नाम चौलुक्य हुआ, यह पीछेके भाट लोगोंकी
कल्पना है और इसका कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं है यह अगले भागसे स्पष्ट हो जायगा।
२० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
होशमें आकर उठा देता था। तभीसे चापोत्कटों का दान उपहासके रूपमें मशहूर हुआ¹। वह इस प्रकार बार
बार चिढ़ाया जानेपर एक दिन उसने अपने नौकरोंको तैयार किया और जब मामाने बेहोशीमें राज्यासनपर
बिठाया तो उसे मारकर सचमुच ही वह राजा बन गया।
२५) सं० ९९२ के आषाढ़ सुदी १५ वृहस्पति वारको, अश्विनी नक्षत्र और सिंह लग्नमें, जन्मसे
इक्कीसवें वर्षमें मूलराज का राज्याभिषेक हुआ।
[ B P आदर्शमें 'सं० ९९८ में श्री मूलराज का राज्याभिषेक हुआ' ऐसा पाठ मिलता है।]
२४. ²शास्त्रमें तो सुना जाता है कि मूलार्क (मूल नक्षत्रका सूर्य) सब प्रकारका कल्याण करता है।
लेकिन आश्चर्य है कि वर्तमानमें तो मूलराज ही ने ऐसा योग कर दिया है।
[ १२ ] *उस विभुने स्वप्नमें आकर कहा कि चापोत्कट वंशके राजा हैहय भूपतिके वंशमें यशो-
ज्ज्वला कन्या है। अगर तुमको वह दान की जाय तो निःशंक भावसे उसके साथ विवाह कर
लेना क्यों कि वह मृगाक्षी अपने उदरमें सार्वभौम (चक्रवर्ती) राजाको धारण करेगी।
[ १३ ] श्री गुर्जर मण्डलमें उसकी कुक्षिसे श्री राजिराज का पुत्र राजा श्री मूलराज पैदा
हुआ। अपने अद्भुत महाप्रभावसे, जब वह दिग्विजयके लिये उद्यम करता था तो उस समय
केवल पृथ्वी ही नहीं काँप उठती थी परंतु उसके साथ उसके स्वामी राजाओंके दिल भी
काँप उठते थे।
[ श्रीसौराष्ट्र मण्डलमें श्री सा....सिंहके साथ युद्ध हुआ यह प्रबंध प्रसिद्ध है x । ]
[ १४ ] जिसने अपने शत्रुओंको जीत लिया ऐसे उस राजाको गूर्जरेश्वरोंकी राजश्री, उसके
गुणोंसे आवर्जित होकर बाणारिपु (विष्णु) को लक्ष्मीकी तरह, स्वयं वरनेको आई।
[ १५ ] उस महा इच्छावाले राजाने कच्छके राजा लक्षको, शत्रुको बुरी तरह घायल करनेवाले
अपने बाणोंका लक्ष्य बनाया।
[ १६ ] उस असामान्य पराक्रमीने लाटेश्वर के दुर्वारणीय सेनानायक बाण (र?)पको मारकर
हाथियोंको ग्रहण किया था।
१ गुजरातमें, उस जमानेमें शायद यह एक लोकोक्ति प्रचलित थी कि—'यह तो चाउड़ोंका दान है'। किया
हुआ दान मिलेगा या नहीं और मिलनेपर भी वह स्थिर रूपसे रहेगा या नहीं—ऐसा जिस दान पर विश्वास नहीं किया जाता उसे
लोग चाउड़ोंका दान कहकर उसका उपहास किया करते थे।
२ मूलराज शब्द पर यह श्लेष है। इसका दूसरा अर्थ मूलराज यानि मूलचन्द्र यह निकाला गया। राज शब्द
चन्द्रमाका भी वाचक है। ज्योतिष शास्त्रके विधानानुसार सूर्य जब मूल नक्षत्रमें आता है तब वह मूलार्क योग कहलाता है।
यह योग अनेक तरहके शुभ कल्याणोंका करनेवाला माना जाता है। लेकिन यह राजा तो मूलार्क नहीं है मूलराज (=मूलचन्द्र)
है, तो भी इसने अपने उदयकालमें वैसे ही अनेक कल्याणकारक योग कर बतलाए हैं, इसलिये यह खास आश्चर्यकी बात है।
- १२ और १३ अंक वाले ये दोनों पद्य किसी पुरानी प्रशस्तिमेंसे उद्धृत किये गये मालूम देते हैं। पहले पद्यमें यह
बतलाया गया है कि-शायद शम्भु या अन्य किसी देवने मूलराजके पिता राजिराजका स्वप्नमें आकर यह कहा कि-चापोत्कट
वंशका राजा, जो हैहय वंशका है, उसकी गुणवती कन्यासे विवाह करनेके लिये तुझसे कहा जाय तो उसे निःशंक होकर
ब्याह लेना। क्यों कि उसकी कोखमें ऐसा गर्भ उत्पन्न होगा जो सार्वभौम राजा बनेगा। यह पद्य ऐतिहासिक दृष्टिसे महत्त्वका है।
इसमें चापोत्कट वंशको हैहयवंश कहा है। चावड़ाओंके मूल वंशका विचार करनेके लिये यह एक नया उल्लेख है। विशेष
विचारके लिये अगला विवेचनात्मक भाग देखना चाहिए।
x यह पंक्ति, मूल प्रतिमें अपूर्ण ही प्राप्त हुई है। इसका स्पष्ट कथन क्या है सो ज्ञात नहीं होता। सौराष्ट्रके किसी
राजाके साथ मूलराजके युद्ध होनेका इसमे उल्लेख किया गया मालूम देता है। यह पंक्ति दूसरी दूसरी प्रतियोंमें नहीं मिलती।
प्रकरण २५-२७ ] मूलराजका प्रबन्ध [ २१
[ १७ ] जिसने दानसे दारिद्र्यको नष्ट किया, शौर्यसे दुर्जनोंका दमन किया और कीर्तिसे रामचंद्रको
भी म्लानकर दिया ऐसे उस राजाने चिरकाल तक राज्यका उपभोग किया।
इत्यादि स्तुतियों द्वारा पंडित लोगोंसे प्रशंसित होता हुआ यह इस प्रकार साम्राज्य कर रहा था, तब किसी
अवसरपर सपादलक्ष देशका राजा, मूलराज पर चढ़ाई करनेके लिये गूर्जर देशकी सीमापर आया। दूसरी
ओर, उसी समय तिल्लग देश के राजाका बारप नामक सेनापति भी चढ़ आया। इन दोनोंमेंसे किसी एकके
साथ जब युद्ध शुरू होगा, तब दूसरी ओरसे दूसरा शत्रु आक्रमण कर बैठेगा; ऐसी परिस्थितिमें क्या करना
चाहिए इसका विचार मूलराज अपने मंत्रियोंके साथ करने लगा, तो उन्होंने कहा कि कुछ समय कन्या दुर्ग में
बैठकर व्यतीत कर देना अच्छा है; और जब नवरात्र आनेपर सपादलक्षका राजा अपनी कुलदेवीकी आरा-
धनाके लिये चला जाय, तब अवसर पाकर बारप नामक सेनापतिको जीत लिया जाय। और इसके बाद
वापस आनेवाले सपादलक्ष के राजाका भी पराजय किया जाय। उनके इस प्रकारके विचार सुनकर राजा
बोला कि ऐसा करनेपर क्या लोगोंमें मेरे भाग निकलनेकी निंदा न होगी? इसपर वे मंत्री बोले-
२५. [ परस्परके द्वन्द्व युद्धमें ] भेडा जो पीछे हटता है वह प्रहार करनेके लिये है, और सिंह भी
आक्रमण करते समय क्रोधसे संकुचित होता है। हृदयमें वैरभावको भर रखनेवाले और गूढ यंत्र
चलानेवाले बुद्धिमान लोग किसी अवगणनाकी परवा न करके [ सब कुछ ] सह लेते हैं।
इस प्रकार उनकी बात सुनकर मूलराजने कन्यादुर्ग में जाकर आश्रय लिया। इधर सपादलक्ष के
राजाने गूर्जर देशमें ही सारा वर्षाकाल बिताया और जब नवरात्रके दिन आए तो उस रणभूमिमें ही शाकम्भरी
नगरकी स्थापना कर गोत्रदेवी भी वहीं मँगा ली और वहीं नवरात्रकी पूजाका समारम्भ किया। मूलराज ने यह
हाल सुनकर मंत्रियोंके बतलाए हुए उपायको निरर्थक समझा। उसको तत्काल एक मति सूझ आई। राजकीय
भेंट-सौगात भेजनेके बहाने उसने अपने सत्र आसपासके सामन्तोंको गुप्त गुप्त बुलावा भेजा और फिर जासुसी काम
करनेवाले अधिकारियोंके पाससे सभी राजपूतों और सैनिकोंको, वंश और चरित्रसे, पहचान कर उन्हें यथोचित
दान आदिसे सम्मानित किया और समयका संकेत बताकर उन सबको सपादलक्ष देशके राजाके शिबिरके
आसपास तैनात कर दिया। निश्चित दिनपर स्वयं, अपनी प्रधान साँढनीपर बैठकर उसके पालकके साथ बहुत
सी भूमि पार करके, प्रातः काल जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सके उस तरह, सपादलक्ष नृपतिकी
छावनीमें जा पहुँचा। साढनी परसे उतरकर हाथमें तलवार लेकर मूलराजने अकेले ही वहाँ पहुँचकर
द्वारपालसे कहा-इस समय राजा किस काममें होते हैं?। जाकर अपने स्वामीको कहो कि मूलराज राजद्वारमें
प्रवेश कर रहा है। यह कहता हुआ [द्वारपालने कुछ आनाकानी की तो ] अपने भुजदण्डके बलसे उसे
द्वारपरसे हटा दिया। फिर जब यह 'यह श्री मूलराज द्वारमें प्रवेश कर रहे हैं' इस प्रकार पुकार ही रहा
था कि उतनेमें तो यह, उस राजाके तंबूके भीतर प्रवेश करके, राजाके पलंग पर ही स्वयं जा बैठा। यह
देखकर क्षणभर तो यह राजा भयभीत होकर मौन ही रहा। फिर कुछ भय दूर करके उसने पूछा
कि- 'क्या आप ही श्री मूलराज हैं?'। मूलराजके मुँहसे 'हाँ' यह शब्द सुन कर जितनेमें
यह कुछ समयोचित बोलना चाहता था, उतनेमें तो पूर्व संकेतित चार हजार सैनिकोंने उस राजाके
बडे डेरे (तम्बू) को चारों ओरसे घेर लिया। इसके बाद मूलराजने उस राजासे इस प्रकार कहा-इस
भूमण्डलमें, ऐसा कोई युद्धवीर राजा, जो मेरे सामने लड़ाईमें टिक सके, है या नहीं-इसका में सोच किया
करता था और कोई वैसा वीर निकल आवे इसके लिये में सैकड़ों मन्नते मनाता था। भाग्ययोगसे आप
२२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
उपस्थित हुए हैं । किन्तु भोजनके समय मक्खी पड़ जानेके समान, इस तैलङ्ग देश के तैलप नामक राजाके
सेनापतिको, जो मुझे जीतनेके लिये आया है, जब तक शिक्षा न दे लूं तब तक आप पीछेसे हमला इत्यादि न
करके रुक जाइये, यही अनुरोध करने मैं आपके पास आया हूं । मूलराज ने जब ऐसा कहा तो उस राजाने
इस प्रकार कहा- राजा होकर भी अपने प्राणोंकी परवा न करके, सामान्य सैनिककी भाँति अकेले ही इस
प्रकार शत्रुगृहमें प्रवेश करके चले आये इसलिये [ मैं तुम्हारे साहससे मुग्ध हूँ और ] जब तक जीऊंगा तब
तक तुम्हारे साथ हमारी सन्धि बनी रहेगी। उस राजाके ऐसा कहने पर 'ऐसा मत कहो, ऐसा मत कहो' इस
प्रकार निवारण करता हुआ, उसके द्वारा भोजनार्थ निमंत्रित होनेपर, अवज्ञापूर्वक अस्वीकार करके, वह हाथमें
तलवार लेकर उठ चला और उसी साढनीपर सवार होकर, अपनी उस सेनासे परिवृत होकर उस बारप
सेनापतिकी सेनापर टूट पड़ा। उसे मारकर उसके दस हज़ार घोड़े और १८ सौ हाथी छीन कर, जितनेमें
पड़ाव डालनेकी तैयारी कर रहा था, उतनेमें तो अपने गुप्तचरोंसे यह सब हाल सुनकर वह सपादलक्ष का
राजा वहाँसे भाग निकला ।
२६) उस राजाने पत्तन में श्रीमुलराज वस हिका [ नामक जैन मन्दिर ] और श्रीमुञ्जालदेव
स्वामी (शिव) का प्रासाद बनवाया । वह प्रति सोमवारको शिवकी भक्ति करनेके निमित्त सोमेश्वर
पत्तन (सोमनाथ पाटन) की यात्राको जाता था। उसकी इस प्रकारकी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर सोमनाथ
उपदेश देकर मण्डली नगरी में आये। उस राजाने वहाँ 'मूलेश्वर' नामका मन्दिर बनवाया। नमस्कार
करनेकी इच्छासे हर्षित होकर वहाँपर नित्य आनेवाले उस राजाकी, उस प्रकारकी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर,
सोमनाथने यह कहा कि- मैं समुद्रके साथ तुम्हारे नगरमें अवतीर्ण हूँगा। यह कहकर सोमेश्वर अणहिल्ल-
पुर में अवतीर्ण हुए। आये हुए समुद्रकी सूचना मिले इसलिये नगरके सभी जलाशयोंका पानी खारा होगया।
उस राजाने वहाँपर त्रिपुरुष प्रासाद नामक शिवका मन्दिर बनवाया ।
२७) इसके बाद, वह उस प्रासादके प्रबंधक होने योग्य किसी उचित तपस्वीकी खोज करते हुए
उसने एक कान्थडी नामक तपस्वीका नाम सुना, जो सरस्वती नदीके किनारे, एकान्तर दिनोंको उपवास
किया करता था और पारणाके दिन अनिर्दिष्ट भिक्षाके पाँच ग्रासका आहार किया करता था। जब राजा
उसकी वन्दना करने गया, तो उस समय उसे तीन दिनका ज्वर था । उसने अपने ज्वरको कंथा में संक्रा
मित कर दिया। राजाने उसे देखकर पूछा कि- यह कंथा (गुदड़ी) काँप क्यों रही है ? । राजाके साथ
बात करनेमें असमर्थ होनेके कारण मैंने ज्वरको उसमें संक्रामित किया है- ऐसा कहनेपर, राजा बोला-यदि
इतनी शक्ति है तो फिर ज्वरको सर्वथा दूर क्यों नहीं कर देते ? । राजाके यों कहनेपर उसने-
२६. पूर्वजन्मके सञ्चित हमारे जो कोई भी रोग हों वे अब उपस्थित हों। मैं उनसे अनृण होकर
शिवके उस परम पदको प्राप्त होना चाहता हूँ।
शिवपुराणके इस वचनको कह कर बताया कि-'कर्म भोगे बिना क्षय नहीं होते' यह जानते हुए
मैं इसे कैसे दूर कर सकूँ ? । राजाने फिर त्रिपुरुष धर्म स्थानक के प्रबंधक होनेके लिये उससे प्रार्थना की।
२७. अधिकार मिलनेसे तीन महीनों में, और मठका महन्त बननेसे तीन दिनोंमें [ नरक प्राप्त होता
है ]; और अगर शीघ्र ही नरकप्राप्तिकी इच्छा हो तो एक दिन पुरोहित बन जाओ ।
इस स्मृति-वाक्यके तत्त्वको जानते हुए, तपरूपी नौकासे संसार सागरको पार करके मैं फिर इस गोष्प-
दमें कैसे डूबना चाहूं। इस वाक्यसे निषिद्ध होकर राजाने [ और कोई उपाय न सोच कर ] ताम्र-शासनको
मण्डफ (परोठे) में वेष्टित करके भिक्षाके लिये आये हुए उस तपस्वीके पर्णपुटमें छोड़ दिया। यह उसे न
जानता हुआ लेकर वहाँसे लौट गया। यद्यपि सरस्वती नदीने पहले तो उसे मार्ग दे दिया था, पर इस वार बढ़
जानेसे जब उसे मार्ग नहीं मिला, तो वह जन्मकालसे लेकर अपने दोषोंका विचार करने लगा। तात्कालिक
भिक्षा संबंधी दोषको जाननेके लिये जब उसे देखता है, तो उसमें उस राजाका दिया हुआ ताम्र-शासन
मालूम दिया। इससे तपस्वीको क्रुद्ध जानकर, राजा वहाँ आया और उसकी सान्त्वनाके लिये यह जब अनुनय
विनय करने लगा, तो उसने यह कह कर कि-मैंने स्वयं जो दाहिने हाथसे दान ग्रहण किया है यह अन्यथा
कैसे होगा; अपने शिष्य वयजल्लदेवको राजाको सौंपा। उस वयजल्लदेवने कहा कि-शरीरमें उबटनके
लिये हमको प्रतिदिन आठ पल उत्तम जातिका चंदन, चार पल कस्तूरी, एक पल कपूर तथा बत्तीस वाररा-
नाएँ, और जागीरके साथ श्वेत छत्र प्रदान करो, तो मैं प्रपञ्चरूपा पद स्वीकार करूँगा। राजाने सब देनेका
स्वीकार कर, त्रिपुरुष धर्मस्थान में उसे 'तपस्वियोंका राजा' के पदपर अभिषिक्त किया। वह 'कंकूखोल'
इस नामसे प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकारके भोगोंको भोगते हुए भी वह अकुटिल भावसे ब्रह्मचर्य व्रतमें निरत रहा।
एक बार रातको मूलराज की रानी उसकी परीक्षा लेने लगी तो उसे पानका बीड़ा मार कर कुट्टिनी बना दिया
और फिर अनुनीत होकर उसे अपने उबटनके लेपसे और स्नानके मैले जलसे स्नान करवा, कर नीरोग किया।
यहांपर लाखाकी उत्पत्ति और विपत्तिका प्रबंध भी दिया जाता है-
२८) प्राचीन कालमें, किसी परमार वंशमें, राजा कीर्तिराज देवकी कामलता नामकी लड़की थी।
वह बाल्यकालमें, सखियोंके साथ, किसी महलके आंगनमें खेल रही थी। सखियोंने कहा कि अपना अपना वर
वरण करो। घोर अन्धकारमें उस कामलताकी आँखोंका मार्ग बंद हो जानेसे, उसने फूहड़ नामक
पशुपालका, जो उस महलके एक खंभेकी ओटमें खड़ा हुआ था और जिसे यह कुछ भी वृत्तान्त मालूम नहीं था,
वरण कर लिया। इसके अनन्तर, कुछ वर्षोंके बाद, जब किसी अच्छे वरोंकी खोज उसके लिये की जाने
लगी, तो पतिव्रता-व्रतके निर्वाहके विचारसे, उसने अपने माता पितासे अनुज्ञा लेकर उसी (पशुपाल) से विवाह
किया। उन दोनोंका पुत्र लाखाक हुआ। वह कच्छ देश का राजा बना। यशोराज को उसने [अपने
पराक्रमसे] खुश किया था और उसकी बड़ी कृपासे वह सबसे अजेय हो गया था। उसने ग्यारह वार मूल-
राजकी सेनाको त्रासित किया था। एक बार, जब कि वह लाखा, कपिलकोट के किलेमें रहा हुआ था
उसी समय, राजा (मूलराज) ने स्वयं जाकर उसे घेर लिया। वह लक्ष (लाखाक) अपने माहेच नामक
एक परम साहसी सुभटके आनेकी प्रतीक्षा करने लगा-जिसको कि उसने कहीं थाह पाइनेके लिये भेजा था।
यह बात जानकर मूलराज ने उसके आगमनके मार्ग घेर लिये। कार्य समाप्त करके आते हुए उस भृत्यसे
राजपुरुषोंने कहा 'हथियार रख दो 1'। अपने स्वामीके कार्यकी सिद्धिके लिये उसने वैसा ही करके युद्धके लिये
प्रस्तुत लाखाक के पास आकर प्रणाम किया। इसके बाद सग्रामके अवसरपर-
२८. 'उगे हुए सूर्यने जो प्रताप नहीं बताया तो हे लाखा ! वह दिन निकृष्ट कहा जाता है। गिनती
करनेसे तो आठ कि दस दिन मिल सकते हैं ।
१ इस वचनका भावार्थ यह मालूम देता है कि सूर्यका उदय होनेपर भी यदि जिस दिन उसका तेज नहीं दिखाई
देता-अर्थात् कुहासा छाया रहता है तो लोक उस दिनको निकृष्ट=दुर्दिन मानते हैं। वीर पुरुष या तेजस्वी पुरुष उत्पन्न होकर भी
यदि अपना कोई तेज नहीं बतलावें तो उसका उत्पन्न होना निरर्थक ही समझा जाता है।
२ इस दूसरे वचनका भावार्थ यह ज्ञात होता है कि-वीर पुरुषको समय प्राप्त होनेपर शीघ्र ही अपना पराक्रम बतलानेके
लिये उद्यत हो जाना चाहिए। दिनोंकी गिनती करते रहनेसे तो कुछ लाभ नहीं होता।
२४ ] 'प्रबन्धचिन्तामणि' [ प्रथम प्रकाश
, इत्यादि प्रकारके बहुतसे बोध-वाक्य उस भृत्यके सुनकर और उसकी उत्कट धीरता देखकर
लक्षका साहस खूब बढ़ा और उसने मूलराजके साथ बराबर तीन दिन तक द्वन्द्व-युद्ध किया ।
मूलराजने उसकी अजेयता देखकर चौथे दिन सोमेश्वरका स्मरण किया । रुद्रकी कला जब उसके
अन्दर अवतीर्ण हुई, तो [उसके प्रभावसे ] उसने लाखाको मार डाला । बादमें लाखाकी देह जब पृथ्वीपर
गिरी हुई पड़ी थी तब हवाके संचारसे उसकी हिलती हुई दाढ़ीको मूलराजने पैरसे छुआ । इसपर
लक्ष की माताने कुपित होकर यह शाप दिया कि तुम्हारा वंश द्यूति (कुष्ठ) रोगसे मरा करेगा ।
२९. मूलराजने अपने प्रतापाग्निमें लक्ष को होम करके उसकी स्त्रियोंके आँसुओंकी धाराको
उन्मुक्त किया ।*
३०. सहसा डूबे जालमें आये हुए लक्ष रूपी कच्छप (कछुआ और कच्छका राजा) को मारकर
जिसने संग्रामरूपी सागरमें अपनी धीवरताका परिचय दिया +।
, ३१. हे मूलराज ! दानरूपी लता बलि के समयमें पृथ्वीमें पैदा हुई, दधीचिके समय उसकी
जड़ जमी, राम के होनेपर उसमें अंकुर उगे, कर्णके समय उसमें डाल और टहनिया निकलीं,
नागार्जुन के समय कलियाँ प्रकट हुई, विक्रमादित्य के समय फूली और तुम्हारे समयमें आमूल
फलवती हुई ।
३२. तुम्हारे शत्रुओंके [सूने] महल, जो वर्षाकालमें, बादलोंके पानीसे स्नान करते हैं, उनके ऊपर जो तृण
उग आये हैं उसके बहाने मानों ये कुश लिये हुए हैं, नालोंके पानीसे मानों श्राद्धकी अञ्जलि दे रहे
हैं, और दीवालके ढोंकोंके गिरनेके मिससे पिण्डदान करते हैं; इस प्रकार अपने स्वामीके प्रेतके
लिये ये प्रतिदिन श्राद्ध कर रहे हैं ।
—इस प्रकार लाखा फूलोतकी उत्पत्ति और विपत्तिका यह प्रबंध है ॥ ११॥
२९) इस प्रकार उस राजाने पचपन वर्ष तक निष्कण्टक राज्य किया । एक बार सायंकालकी आरतीके
अनन्तर राजाने एक दासको इनाममें पानका बीड़ा दिया । उसने हाथमें लेकर देखा तो उसमें कृमि दिखाई दिये ।
राजाके आग्रह पूर्वक पूछनेपर उसने यह बात कही । इससे राजाको वैराग्य आया और उसने संन्यास ग्रहण
किया और दाहिने पैरके अंगूठेमें अग्नि प्रज्वलित कर, आठ दिनतक गज दान इत्यादि महादान देता रहा ।
३२. एकमात्र विनय भावके वशी भूत होकर उसने पैरमें लगी हुई उधूमकेश अग्निको सहन किया ।
अन्य प्रतापीयोंकी तो बात ही क्या है, उसने सूर्यके मण्डलको भी भेद दिया ।
इस प्रकारकी स्तुतियोंसे स्तुत होते हुए उसने स्वर्गारोहण किया ।
सं० ९९८ से लेकर ५५ वर्ष श्री मूलराजने राज्य किया ।
॥ श्रीमुलराज प्रबंध समाप्त ॥
* यह श्लोक श्लेषार्थवाला है—लक्ष होम के दो अर्थ होते हैं—लक्ष=लाखा राजाका होम, और लक्ष=एक लाख बार
होम । आकाशमें बादलोंकी वृष्टिका किसी कारणसे जब रुकाव हो जाता है तो उसके प्रतिकारके लिये एक लाख आहुतियों वाला
होम करनेका वैदिक शास्त्रोंमें विधान है। इधर, लाखाकी रानिया, जो कभी रुदन नहीं करती थीं, उनके आंसूरूपी वृष्टिका
प्रवाह चालू करनेके लिये, मूलराजने अपने प्रतापरूपी अग्निमें लाखाको होम दिया—भस्म कर दिया ।
- इस श्लोकमें 'कच्छपलक्ष' और 'धीवरता' शब्द पर श्लेष है । मूलराजने कच्छप=कच्छपति लक्षराजको मारकर
अपनी धीवरता=श्रेष्ठ बुद्धिमत्ताका परिचय दिया। दूसरा अर्थ कच्छपलक्ष यानि एक लाख कछुए, और उस अर्थमें धीवरका
अर्थ मच्छीमार ऐसा किया गया है ।