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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 181 में से

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पृष्ठ 44

प्रकरण २५-२७ ] मूलराजका प्रबन्ध [ २१
[ १७ ] जिसने दानसे दारिद्र्यको नष्ट किया, शौर्यसे दुर्जनोंका दमन किया और कीर्तिसे रामचंद्रको
भी म्लानकर दिया ऐसे उस राजाने चिरकाल तक राज्यका उपभोग किया।
इत्यादि स्तुतियों द्वारा पंडित लोगोंसे प्रशंसित होता हुआ यह इस प्रकार साम्राज्य कर रहा था, तब किसी
अवसरपर सपादलक्ष देशका राजा, मूलराज पर चढ़ाई करनेके लिये गूर्जर देशकी सीमापर आया। दूसरी
ओर, उसी समय तिल्लग देश के राजाका बारप नामक सेनापति भी चढ़ आया। इन दोनोंमेंसे किसी एकके
साथ जब युद्ध शुरू होगा, तब दूसरी ओरसे दूसरा शत्रु आक्रमण कर बैठेगा; ऐसी परिस्थितिमें क्या करना
चाहिए इसका विचार मूलराज अपने मंत्रियोंके साथ करने लगा, तो उन्होंने कहा कि कुछ समय कन्या दुर्ग में
बैठकर व्यतीत कर देना अच्छा है; और जब नवरात्र आनेपर सपादलक्षका राजा अपनी कुलदेवीकी आरा-
धनाके लिये चला जाय, तब अवसर पाकर बारप नामक सेनापतिको जीत लिया जाय। और इसके बाद
वापस आनेवाले सपादलक्ष के राजाका भी पराजय किया जाय। उनके इस प्रकारके विचार सुनकर राजा
बोला कि ऐसा करनेपर क्या लोगोंमें मेरे भाग निकलनेकी निंदा न होगी? इसपर वे मंत्री बोले-
२५. [ परस्परके द्वन्द्व युद्धमें ] भेडा जो पीछे हटता है वह प्रहार करनेके लिये है, और सिंह भी
आक्रमण करते समय क्रोधसे संकुचित होता है। हृदयमें वैरभावको भर रखनेवाले और गूढ यंत्र
चलानेवाले बुद्धिमान लोग किसी अवगणनाकी परवा न करके [ सब कुछ ] सह लेते हैं।
इस प्रकार उनकी बात सुनकर मूलराजने कन्यादुर्ग में जाकर आश्रय लिया। इधर सपादलक्ष के
राजाने गूर्जर देशमें ही सारा वर्षाकाल बिताया और जब नवरात्रके दिन आए तो उस रणभूमिमें ही शाकम्भरी
नगरकी स्थापना कर गोत्रदेवी भी वहीं मँगा ली और वहीं नवरात्रकी पूजाका समारम्भ किया। मूलराज ने यह
हाल सुनकर मंत्रियोंके बतलाए हुए उपायको निरर्थक समझा। उसको तत्काल एक मति सूझ आई। राजकीय
भेंट-सौगात भेजनेके बहाने उसने अपने सत्र आसपासके सामन्तोंको गुप्त गुप्त बुलावा भेजा और फिर जासुसी काम
करनेवाले अधिकारियोंके पाससे सभी राजपूतों और सैनिकोंको, वंश और चरित्रसे, पहचान कर उन्हें यथोचित
दान आदिसे सम्मानित किया और समयका संकेत बताकर उन सबको सपादलक्ष देशके राजाके शिबिरके
आसपास तैनात कर दिया। निश्चित दिनपर स्वयं, अपनी प्रधान साँढनीपर बैठकर उसके पालकके साथ बहुत
सी भूमि पार करके, प्रातः काल जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सके उस तरह, सपादलक्ष नृपतिकी
छावनीमें जा पहुँचा। साढनी परसे उतरकर हाथमें तलवार लेकर मूलराजने अकेले ही वहाँ पहुँचकर
द्वारपालसे कहा-इस समय राजा किस काममें होते हैं?। जाकर अपने स्वामीको कहो कि मूलराज राजद्वारमें
प्रवेश कर रहा है। यह कहता हुआ [द्वारपालने कुछ आनाकानी की तो ] अपने भुजदण्डके बलसे उसे
द्वारपरसे हटा दिया। फिर जब यह 'यह श्री मूलराज द्वारमें प्रवेश कर रहे हैं' इस प्रकार पुकार ही रहा
था कि उतनेमें तो यह, उस राजाके तंबूके भीतर प्रवेश करके, राजाके पलंग पर ही स्वयं जा बैठा। यह
देखकर क्षणभर तो यह राजा भयभीत होकर मौन ही रहा। फिर कुछ भय दूर करके उसने पूछा
कि- 'क्या आप ही श्री मूलराज हैं?'। मूलराजके मुँहसे 'हाँ' यह शब्द सुन कर जितनेमें
यह कुछ समयोचित बोलना चाहता था, उतनेमें तो पूर्व संकेतित चार हजार सैनिकोंने उस राजाके
बडे डेरे (तम्बू) को चारों ओरसे घेर लिया। इसके बाद मूलराजने उस राजासे इस प्रकार कहा-इस
भूमण्डलमें, ऐसा कोई युद्धवीर राजा, जो मेरे सामने लड़ाईमें टिक सके, है या नहीं-इसका में सोच किया
करता था और कोई वैसा वीर निकल आवे इसके लिये में सैकड़ों मन्नते मनाता था। भाग्ययोगसे आप