प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण ८-११ ] विक्रमार्कराजाका प्रबन्ध [.९
'सर्वज्ञपुत्र' कह कर उनकी स्तुति कर रहे थे। 'सर्वज्ञपुत्र' इस विरुदसे कुपित होकर विक्रमादित्य ने
उनकी सर्वज्ञताकी परीक्षाके लिये मन-ही-मन प्रणाम किया। सिद्धसेन ने भी पूर्वगत श्रुतज्ञानके द्वारा राजाका
मनोगत भाव समझकर, दाहिना हाथ उठाकर धर्मलाभ का आशीर्वाद दिया। राजाने जब आशीर्वाद देनेका
कारण पूछा, तो महर्षिने कहा कि - तुम्हारे मानस नमस्कारके लिये यह आशीर्वाद दिया गया है। इस पर
उनके ज्ञानसे चकित होकर राजाने उनके पारितोषिक निमित्त एक करोड़ सुवर्ण वितरण किया।
८) एक बार, एक दूसरे अवसरपर, राजाने कोषाध्यक्षसे अपने दिलाए हुए सुवर्णका वृत्तान्त पूछा,
तो वह बोला कि - धर्मकी बहीमें मैंने श्लोक बनाकर सुवर्णका वृत्तान्त लिखा है; जो इस प्रकार है -
६. दूर-ही-से हाथ उठाकर 'धर्मलाभ हो' इस प्रकार कहनेवाले सिद्धसेन सूरिको राजाने एक कोटि
[ सुवर्ण ] दिया।
इसके बाद श्री सिद्धसेन सूरिको सभामें बुलाकर राजाने जब कहा कि-उस सुवर्णको ग्रहण कीजिये।
तो उन्होंने कहा कि - खाये हुए को खिलाना वृथा है। उसी सुवर्णसे ऋणग्रस्ता पृथ्वीको ऋणमुक्त कीजिये।
इस प्रकारका उपदेश मिलनेपर, सूरिके सन्तोषसे सन्तुष्ट होकर राजाने उस बातको स्वीकार किया।
९) उसी रातको राजा वीरचर्या¹ निमित्त नगरमें घूम रहा था, उस समय एक तेलीको बारबार
इस (श्लोकार्थ) को पढ़ते सुना-
७. 'हमारा संदेश नारद ! कृष्णको कहना।'
राजा सबेरा होनेतक रुका रहा पर उत्तरार्ध न सुन सका। उदास होकर राजमहलमें आकर सो गया।
सवेरे सामयिक कृत्य करके राजाने उस तेलीको बुलाकर उत्तरार्ध पूछा। उसने कहा-
'जगत् दारिद्रयसे दुःखित है [ इस लिये ] बलिके बन्धनको छोड़ो ॥ ७॥'
यह सुनकर सिद्धसेन सूरिके उपदेशको फिरसे कहा हुआ समझकर पृथ्वीको ऋणमुक्त करना शुरू किया।
[ उज्जयिनी में राजा विक्रमादित्य भट्टमात्र के साथ गुप्त वेश धारण करके महाकालके मंदिरमें
नाटक देखने गया। कुछ समयके बाद नागरिकके लड़के द्वारा कराये जानेवाले नाटकमें सूत्रधारके मुखसे उसका
वर्णन सुनकर राजाने भी उस नागरिकका धन ले लेनेके लिये मन-ही-मन लोभ किया। बादको कुछ समय
बीतनेपर वह प्यासा होकर मुख्य वेश्याके घर परसे भटके पाससे पानी मंगवाया। वहा बुढ़िया वेश्या प्रधान
पुरुषोंसे कह कर उसके लिये ईखका रस लेनेके लिये उपवनमें गई। काटनेवालोंसे ईख कटवाकर उसका रस
निकलवाया पर उससे घड़िया बिलकुल नहीं भरी तो मनमें दुखी होकर ऊपरका शकोरा भर कर ही बहुत देरसे
आई। राजाके रस पी लेनेपर भट्टमात्रने उसकी देरी और उदासीका कारण पूछा। वह बोली-और और
दिन तो एक ही ईखसे घड़ा और शकोरा दोनों भर जाते थे लेकिन आज तो घड़ा भी नहीं भरा। इसका कारण
समझमें नहीं आता। भट्टमात्रने फिर पूछा कि-तुम लोग तो बड़ी पक्की बुद्धिवाली होती हो इसलिये इसका
कारण जानकर और विचारकरके बताओ। फिर वेश्या बोली कि-पृथ्वीके मालिक (राजा) का मन प्रजाके
प्रति विरुद्ध होगया है, इसलिये पृथ्वीका रस भी क्षीण होगया है। यह कारण उसने निवेदन किया तो
राजा भी उसके बुद्धिकौशलसे चकित हुआ। वह फिर अपने घरकी शय्यापर सोया हुआ इस प्रकार विचार
करने लगा कि-प्रजा-पीड़न किये बिना, केवल विरुद्ध चिन्ता मात्रसे ही पृथ्वीके रसकी इस प्रकार हानि हुई ! तो*
१ वीरचर्या-उस जमानेके राजा अपनी प्रजाके सुख दुःखोंकी बातें स्वय जानने-सुननेके लिये कभी कभी रातके
समय, एकाकी गुप्तवेशमें महलोंसे बाहर निकल जाते थे और दो चार घंटे इधर उधर घूम फिर कर नगर चर्चाका प्रत्यक्ष अनुभव
करते थे। इसका नाम वीरचर्या है।
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