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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 181 में से

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पृष्ठ 29

६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश

चारों ओर कहीं जल नहीं मिला तो एक पशुपालको देखकर उससे जल मांगा । उसने जलके अभावमें दूध
पीनेको कहा और बोला कि—‘करचडी’ करो । उसके ऐसा कहने पर वररुचि बड़ी चिन्तामें पड़ गया, क्यों
कि उसने इसके पहले यह शब्द किसी भी कोष ग्रन्थमें नहीं पढ़ा सुना था । उस पशुपालने उसके मस्तक पर
हाथ रखकर और भैंसके नीचे बिठाकर, दोनों हथेलियों को जोड़कर 'करचडी' नामक मुद्रा बताकर, उसे पेट
भर कर दूध पिलाया । उस (उपाध्याय) ने अपने मस्तक पर हाथ रखनेके कारण और एक 'करचडी' इस
विशेष शब्दके बतानेके कारण, उसे गुरुके समान समझा और फिर उसको ही उस राजकुमारीका समुचित
पति निश्चित किया । भैंसोंसे हटाकर उसे अपने महलमें ले आया और ६ महिने तक उसके शरीरकी शुश्रूषा
करते हुए "ओं नम शिवाय" इस आशीर्वादको पढ़ाया । ६ महिने बाद जब पण्डितने समझ लिया कि ये
अक्षर उसे कण्ठस्थ हो गये हैं तो एक दिन शुभ मुहूर्तमें उसको अच्छी तरह श्रृंगार कराके उसे राजसभामें ले
गया । राजाको आशीर्वाद देते समय, बहुत बारका अभ्यस्त वह आशीर्वाद भी, सभाक्षोभके कारण “उ श र ट”
इस प्रकारके शब्दोंमें बोल गया । उसकी इस ऊटपटांग बातसे राजा विस्मित हुआ । वररुचिने उसकी
[मूर्खता छिपाने और] चतुरता बतानेके लिये राजाके सामने कहा-
४. उमाके साथ रुद्र जो, शङ्कर और शूलपाणि है ।
रक्षा करें तुम्हारी हे राजन्, टंकारके बलसे जो गर्वित है ॥
इस प्रसिद्ध श्लोकद्वारा [जिसके चारों चरणोंके प्रथमाक्षरोंसे 'उशर्ट' शब्द बनता है] वर
रुचिने उसके पाण्डित्यकी गंभीरताका विस्तारपूर्वक विवेचन किया । उसकी बातसे प्रसन्न होकर, राजाने
उस भैंस चरानेवालेसे अपनी पुत्रीका विवाह कर दिया । पर पण्डितके सिखानेसे वह सदा मौन ही रहा करता ।
राजकन्याने उसकी चतुरता जाननेके लिये, कोई नई लिखी हुई पुस्तकके संशोधनका उससे अनुरोध किया ।
उसने उस पुस्तकको हथेलीपर रखकर, नखनी लेकर, सारे अक्षरोंको बिंदु और मात्रासे रहित कर दिया । उसे
ऐसा करते देख राजपुत्रीने निर्णय किया कि यह तो मूर्ख है । तबसे सर्वत्र ही 'जा मा तृ शु द्धि' की कहावत
प्रचलित हुई। एक बार दीवाल परके चित्रमें भैंसोंका झुण्ड देखकर, आनंदित होकर, वह अपनी प्रतिष्ठा भूल गया
और उनके बुलानेकी विकृत बोली बोलने लगा । तब राजकुमारीने निश्चय किया कि यह निरा पशुपाल-भैंसोंका
चरवाहा है । फिर यह (चरवाहा) राजकन्याकी अवज्ञा देखकर विद्वत्ताके लिये कालिकाकी आराधना करने
लगा। अपनी पुत्रीके वैधव्यसे शंकित होकर राजाने² रातके समय गुप्त वेशमें दासीको भेजा । उसने यह कहकर
कि- 'मै तुझे तुष्टमान हुई हूँ' ज्यों ही उठाने लगी त्यों ही विप्लवकी आशंकासे, स्वय कालिका देवीने ही प्रत्यक्ष
होकर उसे अनुगृहीत किया । इस वृत्तान्तको सुनकर राजकुमारी प्रमुदित हुई और आकर बोली कि-'क्या
कुछ विशेष वाणी प्राप्त हुई है?'³ उसके ऐसा कहनेपर वह तभीसे कालिदास नामसे प्रसिद्ध हुआ और
उसने कुमार सम्भव प्रभृति ३ महाकाव्य और ६ प्रबंध बनाये ।
-इस प्रकार यह कालिदासकी उत्पत्तिक। प्रबंध है ॥ १ ॥


१ 'जामातृ शुद्धि' की कहावत हिंदीमें या गुजराती भाषामें प्रचलित हा ऐसा ज्ञात नहीं हुआ, लेकिन मराठी भाषामें
'जावांइ शोध' नामकी कहावत प्रचलित है । विक्रमकी और और कथाओंमें भी इसका उल्लेख मिलता है इससे ज्ञात होता है
पुराने समयमें यह कहावत गुजरात आदि देशोंमें भी प्रचलित होगी ।
२ पुत्रीका वैधव्य प्राप्त होनेकी शंका राजाको इसलिये हुई कि वह पशुपाल आमरणान्त उपवास करनेकी प्रतिज्ञा करके
देवीकी आराधना करने बैठा था । मेरुतुङ्गसूरिका यह ग्रन्थ बहुत ही संक्षिप्त शैलीमें लिखा हुआ है, इसलिये इसमें बहुतसी बातें
अध्याहृत रहती हैं । दूसरे निरूपणों में बातें खुलासेके साथ लिखी हुई मिलती हैं ।