प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
प्रास्ताविक वक्तव्य [ छ
हिन्दी भाषान्तरके प्रकट होनेके बाद, ( जो अब शीघ्र ही प्रेसमें जानेवाला है ) प्रकट होगा - अर्थात् हमारी
सङ्कल्पित योजनाके अनुसार, वह इस प्रबन्धचिन्तामणिका ५ वाँ भाग होगा ।
*
६. प्रबन्धचिन्तामणि वर्णित ऐतिहासिक तथ्योंके विषयमें कुछ स्वाभिप्राय ज्ञापन ।
इस ग्रन्थके पढ़नेवाले पाठकोंको यह बात लक्ष्यमें रखनी चाहिये कि - यद्यपि ग्रन्थ प्रधानतया ऐतिहासिक
प्रबन्धोंका सङ्ग्रहात्मक है, तथापि इसके सब-के-सब प्रबन्ध ऐतिहासिक नहीं हैं । खास करके अन्तिम प्रकाशमें
जो पुण्यसार, कर्मसार, वासना, कृपाणिका इत्यादि शीर्षक ५-७ प्रबन्ध हैं वे पौराणिक ढंगके कथात्मक रूप
हैं । उनमें ऐतिहासिकता खोज निकालना निरर्थक है । बाकीके अन्य बहुतसे - प्राय सब ही - ऐतिहासिक माने
जा सकते हैं, पर इनमेंसे भी कुछ प्रबन्धोंमें वर्णित व्यक्तियोंके विषयमें, अभी तक इतिहासविदोंमें थोड़ा बहुत मतभेद
अवश्य है। दृष्टान्तके तौरपर, प्रथम प्रकाशमें प्रारम्भ-ही-में दिये गये विक्रमार्क राजाके व्यक्तित्वके विषयमें विद्वानोंमें
अभी तक कोई एक निर्णयात्मक विचार स्थिर नहीं हो पाया । वह राजा कौन था और कब हो गया इसके
विषयमें अभी तक अनेक तर्क-वितर्क किये जा रहे हैं । नामके अतिरिक्त प्रबन्ध कथित और सब बातें तो एक
कहानीकी अपेक्षा अन्य कोई अधिक महत्त्व नहीं रखतीं ।
यही बात सातवाहनवाले प्रबन्धके विषयमें कही जा सकती है । सातवाहन राजाका नाम यद्यपि
शिलालेखों वगैरहमें उपलब्ध होता है, पर इस नामके कई राजा हो जानेसे और प्रबन्धमें वर्णित घटनाका
कोई ऐतिहासिकत्व प्रतीत न होनेसे उसके विषयमें भी नामके अतिरिक्त प्रबन्धकथित समूचा वर्णन कल्पनात्मक
ही मानना चाहिये ।
सातवाहनके बाद भूपराजका जो प्रबन्ध है, उसके अस्तित्वके विषयका अभीतक अन्य कोई ऐतिहासिक
प्रमाण उपलब्ध नहीं हुआ है, पर उसके ऐतिहासिक पुरुष होनेका सम्भव माना जा सकता है ।
इस तरह इन कुछ दो चार नामोंकी व्यक्तियोंको छोड़ कर, बाकी जितने भी नाम इस ग्रन्थमें आये हुए है
वे सब प्राय ऐतिहासिक पुरुष हैं । हाँ उनमेंसे कुछ कुछ व्यक्तियोंका सम्बन्ध, परस्पर एक दूसरेके साथ, इस
तरह जोड़ दिया गया है जो भ्रमात्मक है । उदाहरणके तौरपर, भोज-भीमके वर्णनवाले दूसरे प्रकाशमें, धाराके
परमार राजा भोजदेवके साथ खास करके महाकवि बाण, मयूर, मानतुङ्ग और माघ आदिका जो परस्पर सम्बन्ध
और समकालीनत्व वर्णन किया गया है वह सर्वथा भ्रान्त और निराधार है । ग्रन्थकारके पूर्ववर्ती और प्रसिद्ध
विद्वान् प्रभाचन्द्र सूरिने, अपने प्रभावकचरितमें, इन व्यक्तियोंका वर्णन और ही राजाओंके समयमें दिया है और वह
कुछ प्रमाणभूत भी सिद्ध होता है। तब फिर न मालूम मेरुतुङ्ग सूरिने किस आधार पर, ऐसा भ्रान्तिपूर्ण यह वर्णन
अपने इस महत्त्वके ग्रन्थमें ग्रथित कर डाला है, सो समझमें नहीं आता । भोजप्रबन्धकी ये बहुतसी बातें
कल्पनाप्रसूत और लोककथायें जैसी प्रतीत होतीं हैं । ग्रन्थकारने ये बातें किसी पुरातन प्रबन्ध आदिके आधार
पर लिखीं हैं या किसीके मुखसे सुन कर लिखीं हैं इसके जाननेका कोई साधन अभीतक ज्ञात नहीं हुआ ।
सिद्धराज और कुमारपालके समयके जितने वर्णन इसमें ग्रथित हैं वे प्राय सब-के-सब ऐतिहासिक और
आधारभूत हैं । उनके घटनाक्रममें कुछ आगे-पीछे पनका सम्भव हो सकता है पर उनमेंका कोई वर्णन सर्वथा
निर्मूल हो ऐसा नहीं माना जा सकता ।
मेरुतुङ्ग सूरिके इस ग्रन्थमें, ऐतिहासिक दृष्टिसे, जो सबसे अधिक विशेष महत्त्वका उल्लेख पाया गया है
७ ] प्रबन्धचिन्तामणि
वह है अणहिलपुरके राजाओंके समयका कालक्रम-ज्ञापक निश्चित निर्देश । अणहिलपुरके राज्यसिंहासन पर, कौन
राजा कब गद्दीपर बैठा और उसने कितने वर्ष राज्य किया इसका जो उल्लेख इस ग्रन्थमें किया गया है वैसा उल्लेख,
पूर्वके अन्य किसी ग्रन्थमें नहीं मिलता । यद्यपि इस उल्लेखमें चावडा (चापोत्कट) वंशके जो संवत्सर निर्दिष्ट किये
गये हैं उनकी तिथियोंके निर्णायक और समर्थक अन्य कोई वैसे प्रमाण अभीतक उपलब्ध नहीं हो पाये, तथापि
उनके बाधक भी वैसे कोई प्रमाण अभीतक उपस्थित नहीं हुए । और चौलुक्य वंशके राजाओंके राज्यकालकी
जो संवत्सरयावलि इसमें दी गई है वह तो शिलालेख आदि अन्यान्य अनेक प्रमाणोंसे प्रायः सर्वथा निर्भ्रान्त सिद्ध
हो चुकी है । इसलिये इसमें दी गई यह राजसंवत्सरावलि बडे ही महत्त्वकी और एक अद्वितीय ऐतिह्य वस्तु
सावित हुई है ।
७. प्रबन्धचिन्तामणिकी रचना कब और क्यों की गई ।
मेरुतुङ्ग सूरिने यह ग्रन्थ कब और कहां बनाया इसका उल्लेख उन्होंने ग्रन्थके अन्तमें स्पष्ट कर ही दिया
है । इस उल्लेखसे ज्ञात होता है, कि वि० सं० १३६१ में, काठियावाडके वर्तमान वढवान शहरमें उन्होंने इस
ग्रन्थको पूर्ण किया । यह वह समय है, जब गुजरातके स्वाधीनता और स्वराज्यका सर्वनाश हुआ और विधर्मी
यवनराज्य और पारवश्यका प्रादुर्भाव हुआ। मेरुतुङ्गके सामने ही अणहिलपुरका वह चौलुक्य वंश नामशेष हुआ,
जिसके स्थापक पुरुषसे ले कर अन्तिम पुरुषके समय तककी गुजरातके राजकीय, सामाजिक और धार्मिक जीवनकी
कुछ विशिष्ट स्मृतियां लिपिबद्ध करनेका उन्होंने इस ग्रन्थमें मौलिक प्रयत्न किया है । मेरुतुङ्ग सूरिके विचारसे,
गुजरातमें – अणहिलपुर पाटनमें – वीरप्रकृति राजा वीरधवल और उसके विचक्षण मंत्री वस्तुपाल-तेजपालके बाद
और कोई वैसा स्मरणीय पुरुष पैदा नहीं हुआ जिसका नामनिर्देश वे अपने इस ग्रन्थमें करते । यद्यपि वीरधवलके
बाद उसके वंशजोंने प्रायः ५०-५५ वर्षतक अणहिलपुरमें राज्यसिंहासनका उपभोग किया, पर उनका शासन
प्रायः निष्प्राण और निस्तेजसा ही रहा । मेरुतुङ्ग सूरिको उस शासनकालमें कोई महत्त्व नहीं मालूम दिया और
इसलिये उन्होंने उस समयकी किसी भी घटनाका उल्लेख अपने ग्रन्थमें नहीं आने दिया । उनके अभिप्रायमें,
वीरधवल और वस्तुपाल-तेजपालके साथ गुजरातके ज्योतिर्मय जीवनकी समाप्ति हो गई। चाहे मेरुतुङ्ग सूरिको,
इतिहासके आत्माका दिव्य दर्शन हुआ हो या न हुआ हो, पर इसमें कोई शक नहीं कि उनका यह ग्रन्थलेखन, सचमुच,
इतिहासदर्शनकी एक अस्पष्ट पर सूक्ष्म कलाके आभासका उत्तम सूचन करता है। जब हम गुजरातके भूतकालीन
राष्ट्रीय जीवन पर एक गहरी दृष्टि डालते हैं, तब हमें यह बहुत स्पष्टताके साथ दिखाई देता है, कि यथार्थ ही,
गुजरातके भाग्याकाशमें वीरधवल और वस्तुपाल-तेजपालके बाद, अब तक, वैसा कोई ज्योतिर्धर तेजस्वी तारक
उदित नहीं हुआ। और जब तक गुजरातमें पुन वैसा पूर्ण स्वराज्य स्थापित नहीं हो पाता तब तक हम इस
अन्तर्दाहक अनुभूतिका मिटा नहीं सकते ।
*
मेरुतुङ्ग सूरिने इस ग्रन्थकी रचना किस लिये की-यह भी उन्होंने ग्रन्थके प्रारम्भमें और अन्तमें,
संक्षिप्त रूपमे सूचित किया है । वे कहते हैं कि-"बारवार सुनी जानेके कारण पुरानी कथायें बुद्धिमानोंके
मनको वैसा प्रसन्न नहीं कर पातीं । इसलिये मैं निकटवर्ती सत्पुरुषोंके वृत्तान्तोंसे [ सङ्कलित ऐसे ] इस प्रबन्ध-
चिन्तामणि ग्रन्थकी रचना कर रहा हूं।" (-देखो पृ० २, पत्र ६ का अनुवाद) । इस कथनके भावको स्पष्ट
करनेके लिये, इसके नीचे एक टिप्पणी दे कर हमने उसमें कहा है कि-" पुराने जमानेमें व्याख्यानकार और
कथाकार प्राय. सदा उन्ही कथा-वार्ताओंको सुनाया करते थे जो महाभारत और रामायण आदि पुराण ग्रन्थोंमें
"? It has "वातकी"!
Let's check L27: "वचा रखनेका है" -> "वचा रखनेका"!
Look at L28: "वड़ी प्रतिष्ठा थी" -> "वड़ी"!
Look at L30: "वतलानेके लिये" -> "वतलानेके"!
Look at L31: "वड़ी सख्त कुश्ती" -> "वड़ी"!
Yes! The text literally uses 'व' everywhere:
"वात", "वतलानेकी", "वचा", "वड़ी", "सव"!
Wait, look at L17:
"वतलानेकी दृष्टिसे, बहुत कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण कथन किया है; और उसके साथ अन्य धर्मकी - खास करके"
Wait, does it say "वतलानेकी" or "बतलानेकी"? It has 'व'!
Wait, let's look at "बहुत" in L17:
Wait, is "बहुत" with 'व'? "वहुत"!
Look at L14: "भी वहुत आधारभूत" -> YES! It is "वहुत"!
Look at L8: "वहुश्रुत" (L6)!
Look at L6:
"ग्रन्थके अन्तमें वे, इस रचनाके करनेमें एक दूसरा भी कारण वतलाते हुए लिखते हैं कि—"वहुश्रुत और"
"गुणवान् ऐसे वृद्धजनोंकी प्राप्ति प्रायः दुर्लभ हो रही है..."
Yes! It is "वहुश्रुत" in L6!
[घ] प्रबन्धचिन्तामणि
वाली किसी उक्तिने न आने देनेकी सावचेतीका रखना, उसका कर्त्तव्य है । ब्राह्मण और शेव ग्रन्थकारोंने भी
वैसा ही किया है; मुसलमान और ईसाई इतिहास-लेखकोंने भी वैसा ही किया है — और अब भी सब वैसा ही
करते रहते हैं । इसलिये इसमें जैनधर्मके महत्त्वके प्रतिपादनका होना कोई खास दूषण नहीं है । रही बात अति-
शयोक्तिकी — सो विशुद्ध इतिहासकी दृष्टिसे किसी भी प्रकारकी अतिशयोक्ति अवश्य ही आलोचनीय है और
उसकी प्रामाणिकता विचारणीय है । पर जैसा कि हमने पहले ही सूचित कर दिया है, यह ग्रन्थ कोई विशुद्ध
इतिहास ग्रन्थ नहीं है । यह तो कुछ पुरातन प्रकीर्ण पोथियोंमें यत्र तत्र लिखित और कुछ कुछ वृद्ध जनोंके
मुखसे यथा-तथा सुन ऐसी इतिहासविषयक कथा-वार्ताओंका एकत्र संकलनवाला एक संग्रह मात्र है । अतः
इसमेंकी कुछ उक्तियाँ अथवा घटनाएँ, विशुद्ध इतिहासकी दृष्टिसे, यदि भ्रान्तिपूर्ण, अतिशयोक्तिपूर्ण अथवा
निर्मूलप्राय भी सिद्ध हों तो उसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है । और खुद ग्रन्थकारको भी इस विषयमें कुछ
आशंका हुई है, कि उनके इस संकलनमें, विद्वानोंको कुछ बातें संदिग्ध या भिन्नभाववाली मालूम दें । इसलिये
उन्होंने ग्रन्थान्तमें यह बात भी इस तरह कह दी है कि—" यद्यपि विद्वानों द्वारा अपनी बुद्धि [ संकलना ] से
कहे गये प्रबन्ध [ कुछ कुछ ] भिन्न भिन्न भावोंवाले अवश्य होते हैं, तथापि इस ग्रन्थकी रचना सुसंप्रदाय
( योग्य परंपरा ) के आधार पर की गई है; इसलिये चतुर जनोंको [ इसके विषयमें ] वैसी चर्चा न करनी
चाहिए ।" इस कथनको स्पष्ट करनेके इरादेसे इसके नीचे जो टिप्पणी हमने दी है उसमें लिखा है कि —
" मेरुतुङ्ग सूरिने इस ग्रन्थकी संकलना करनेमें कुछ तो पुराने प्रबन्ध-ग्रन्थोंकी सहायता ली और कुछ परंपरासे
चली आती हुई मौखिक बातोंका आधार लिया । इस प्रकार परंपरासे सुनी हुई बातोंका परस्पर मिलान करनेमें
विद्वानोंको अवश्य ही उनमें कुछ-न-कुछ भिन्न भाव मालूम पडता रहता है । मेरुतुङ्ग सूरिको भी अपनी इस
रचनामें कहीं कहीं ऐसा भिन्न भाव मालूम हुआ है । इस भिन्न भावके निराकरण करनेका या खुलासा करनेका
उनके पास न तो कोई साधन था और न कोई उनको उसकी वैसी आवश्यकता थी । उन्होंने सिर्फ इतना ही
कहना पर्याप्त समझा कि हमने जो बातें इस ग्रन्थमें संकलित कीं हैं वे एक सुसंप्रदाय द्वारा प्राप्त की हुई हैं ।
इसलिये इनके तथ्यातथ्यके बारेमें चतुर मनुष्योंको चर्चा करनेसे कोई लाभ नहीं । प्रबन्धचिन्तामणिकी कुछ बातें
ऐतिहासिक दृष्टिसे सर्वथा भ्रान्त भी मालूम होतीं हैं लेकिन मेरुतुङ्ग सूरि उनके लिये निष्पक्ष और निराग्रह हैं।"
यद्यपि यह बात ठीक है कि मेरुतुङ्ग सूरिका मुख्य लक्ष्य जैन धर्मके महत्त्वकी ओर रहा है; तथापि
उन्होंने अन्य धर्मोकी निन्दा करनेकी दृष्टिसे या अन्य धार्मिक जनोंकी हीनता बतानेकी भावनासे इसमें कुछ
भी नहीं लिखा है । बल्कि प्रसङ्गोपात्त अन्य-धर्म-विषयक कुछ महत्त्वकी बातें भी उन्होंने उसी आदरकी दृष्टिसे
लिखी हैं, जैसी अपने धर्मकी लिखीं हैं । उदाहरणके तौरपर, मूलराजके प्रत्र-धर्मे जो शिवपूजाका प्रभाव और
श्वेताचार्य कण्ठडी नामक तपस्वीके तपकी महिमाका वर्णन किया गया है, वह सर्वथा वैसा ही आदरयुक्त पंक्तियोंमें
लिखा गया है, जैसा जिनपूजा या किसी जैन आचार्यके वारेमें लिखा गया हो । इसी तरह सिद्धराजकी माता
मयणल्लाकी शिवभक्तिके विषयमें जो उल्लेख किया गया है वह भी वैसा ही निष्पक्ष भावसे भरा हुआ है । अगर
मेरुतुङ्ग सूरिको शिवधर्मकी महत्ताके बारेमें अनादर होता तो ये इन उल्लेखोंको इसमें स्थान ही क्यों देते ।
मुख्यतया जैन श्रोताओं ( श्रावकों ) के सम्मुख, व्याख्यान सभामें, जैन साधुओं-यतियोंके बाचने
निमित्त, इस ग्रन्थकी रचना की गई है, इसलिये इसमें जैन व्यक्तियोंका और उनके कार्यकलापोंका ही अधिक
वर्णन होना स्वाभाविक है । पर, उसके साथ ही मेरुतुङ्ग सूरिको, गुजरातके सर्व सामान्य प्रजाकीय और राष्ट्रीय
जीवनकी उन्नायक इतर व्यक्तियों और उनकी कार्य स्मृतियोंके तरफ भी अनुराग है; और इसलिये उन्होंने
अपने इस संग्रहमें, उन इतर व्यक्तियोंकी जीवन-स्मृतियोंके भी, यथाश्रुत और यथाज्ञात वृत्तान्तोंको, जहाँ-जहाँ प्रथित
प्रास्ताविक वक्तव्य [ ८
कर लेनेमें कोई सकोच नहीं किया । भोज-भीमप्रबन्धकी बहुतसी स्मृतियाँ इसी दृष्टिसे संगृहीत की गई हैं।
सिद्धराजके प्रबन्धमेंकी भी बहुतसी बातें इसी आशयसे लिखी गई हैं।
*
९. मेरुतुङ्ग सूरिकी इतिहास-प्रियता ।
मालूम देता है कि मेरुतुङ्ग सूरिको ऐतिहासिक बातोंमें कुछ अधिक रस था और ऐतिहासिक तथ्यपर पक्षपात
था । इसलिये उन्होंने सिद्धराज और कुमारपालके जीवन विषयकी वैसी भी कुछ तथ्यभूत बातें उल्लिखित कर दी हैं
जिससे उन व्यक्तियोंके, कुछ चरित्र दुर्बलता और स्वभाव-कृपणता आदि दोषोंकी भी, हमको झांकी हो जाती
है । हेमचन्द्र सूरि आदि विद्वानोंने अपनी रचनाओंमें ऐसे दोषोंका बिल्कुल भी आभास नहीं आने दिया है ।
*
इस विषयमें, मेरुतुङ्ग सूरिने सबसे अधिक महत्त्वकी जो सत्य ऐतिहासिक बात लिख डाली है वह है
मंत्रीश्वर वस्तुपाल-तेजपालकी माता कुमारदेवीके पुनर्लग्नकी । तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक नीतिकी भाव-
नाकी दृष्टिसे कुमारदेवीका वह पुनर्लग्न अवश्य निन्दनीय और हीन कार्य समझा जाता था । वैसे कार्यको समाज
बड़ी हलकी दृष्टिसे देखता था और उस कार्यके करनेवाली व्यक्तिको बड़े कठोर भावसे समाजसे बहिष्कृत और
तिरस्कृत किये करता था । यह तो उस एक-अद्वितीय भाग्यवती कुमारदेवीका लोकोत्तर पुण्यकर्म ही था, जिसके
प्रभावसे उसकी कुक्षीमें ऐसे प्रभावशाली पुत्ररत्न पैदा हुए जिनकी समता रखनेवाले पुरुष, सारे संसारके इतिहासमें
भी गिने गिने ही दिखाई देंगे । इन पुत्र-पुङ्गवोंके प्रतापके कारण कुमारदेवी तत्कालीन समाजमें बड़ी भारी प्रतिष्ठाकी
पुण्यभूमि बन सकी और सारे देशके जनोंसे बड़ी श्रद्धाके साथ पूजी और प्रशंसी गई । बड़े-से-बड़े धर्माचार्योंने,
बड़े-से-बड़े कवियोंने, बड़े-से-बड़े राष्ट्रपुरुषोंने उसकी प्रतिमाकी पूजा की और उसके नामकी स्तुतियाँ गाईं ।
पर उसके जीवनका वह महत् प्रेमकार्य, जिसके वश होकर उसने, अणहिलपुरके एक बड़े खानदानके प्राग्वाट
कुटुम्बके पराक्रमी युवक ठाकुर आसराजके साथ पुनर्लग्न किया था, उसकी स्मृतिका किंचित् आभास भी उन
समकालीन कवियों और ग्रन्थकारोंने अपनी कृतियोंमें न आने दिया । क्यों कि यह कार्य समाज और धर्मको
नापसन्द था । उसकी स्मृतिको जीवित रखना अप्रिय था। श्रद्धेय और पूजनीय माता कुमारदेवीके पुण्य जीवनकी
उस मानी गई कृष्णकथाका सूचन करना उन कवियोंके लिये बड़ा पातक कार्य था । महामात्य वस्तुपाल-तेजपाल
जैसे जगत्श्रेष्ठ, पुण्यप्रभावक और धर्मोद्धार नरशिरोमणि विधवा-विवाहसे प्रसूत पुत्ररत्न थे, इस विचारको
स्मृतिमें लाना भी उन ग्रन्थकारोंके लिये, शायद बड़ा दु खद और दुर्निवारक कर्तव्य था । इसलिये उन्होंने अपनी
कृतियोंमें इसकी कहीं भी स्मृति नहीं होने दी। उन्हींका अनुगमन करनेवाले, वस्तुपाल-तेजपालके अन्यान्य पिछले
प्रसिद्ध चरित्रकारोंने भी उस बातका कहीं सूचन नहीं होने दिया । परंतु मेरुतुङ्गने अपने ग्रन्थमें इस बातका बहुत
ही संक्षेपमें पर बड़े स्पष्ट रूपसे उल्लेख कर दिया । ऐसा ही एक दूसरा स्पष्ट उल्लेख उन्होंने राणा वीरधवलकी
माताके विषयमें भी किया है, जो भी इसी तरहका एक सामाजिक अपराधका ज्ञापक हो कर भी ऐतिहासिक
तथ्य था । इन उल्लेखोंसे मेरुतुङ्ग सूरिकी सच्ची इतिहास प्रियताका हमको अच्छा आभास हो जाता है ।
बाकी उस समयके ग्रन्थकारोंके विषयमें, इससे अधिक विशुद्ध इतिहास-दृष्टिकी अपेक्षाकी कल्पना करना
और उनमें धार्मिक या सांप्रदायिक भावनाके पोषक विचारोंका दोषारोप कर, उनके अवाञ्छित कथनोंकी भी उपेक्षा-
की दृष्टिसे देखना, एक प्रकारकी निजकी ऐतिहासिक दृष्टिकी विपर्यासताका बोध कराना है ।
*
ढ ] प्रबन्धचिन्तामणि
१०. ग्रन्थकारके जीवनके विषयमें ।
ग्रन्थकार मेरुतुङ्ग सूरिके जीवन आदिके विषयमें कोई विशेष वस्तु ज्ञात नहीं होती । ये नागेन्द्र गच्छके
आचार्य थे और इनके गुरुका नाम चन्द्रप्रभ सूरि था । धर्मदेव नामक विद्वान् — जो शायद इनके वृद्ध गुरुभ्राता
या अन्य कोई गच्छवासी स्थविर साधु-पुरुष थे — उनके पाससे इन्होंने, इस ग्रन्थकी रचनामें बहुत कुछ ऐतिह्य
सामग्री प्राप्त की थी । गुणचन्द्र नामक इनका प्रधान शिष्य था जिसने इस ग्रन्थकी पहली संपूर्ण प्रतिलिपि लिख
कर तैयार की थी ।
इनकी एक और ग्रन्थकृति उपलब्ध होती है जिसका नाम महापुरुषचरित है । इस ग्रन्थमें, ऋषभदेव,
शान्तिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महावीर — इस प्रकार पाँच तीर्थंकरोंका संक्षिप्त चरित वर्णन है । इसके
अतिरिक्त और कोई इनकी कृति हमें अभीतक ज्ञात नहीं हुई ।
*
अन्तमें हम आशा करते हैं कि हिन्दी-भाषा-भाषी जिज्ञासु जन, इस ग्रन्थके वाचन-मननसे अपने प्राचीन
इतिहास विषयक ज्ञानमें उचित वृद्धि करेंगे; और खुद ग्रन्थकारने, ग्रन्थान्तमें जो नम्र निवेदन किया है उसकी
तरफ लक्ष्य रखनेकी सूचना कर, उसी कथनको उद्धृत करते हुए, हम अपना यह प्रास्ताविक वक्तव्य समाप्त
करते हैं ।
यथाश्रुतं सङ्कलितः प्रबन्धैर्ग्रन्थो मया मन्दधियापि यत्नात् ।
मात्सर्यमुत्सार्य सुधीभिरेष पक्षोद्धुरैरुन्नतिमेव नेयः ॥
मार्गशीर्षपूर्णिमा, वि० सं० १९९७ ⎫
भारतीय विद्या भवन ⎬ — जिनविजय
आम्रगिरि ( अन्धेरी ), बम्बई. ⎭
श्रीमेरुतुङ्गाचार्यविरचित
प्रबन्धचिन्तामणि
॥ ॐ नमः सर्वज्ञाय ॥
श्रीनाभिभूर्जिनः पातु परमेष्ठी भवान्तकृत् । श्रीभारत्योश्चतुर्द्वारमुचितं यच्चतुर्मुखी ॥ १ ॥
नृणामुपलतुल्यानां यस्य द्रावकरः करः । ध्यायामि तं कलावन्तं गुरुं चन्द्रप्रभं प्रभुम् ॥ २ ॥
गुम्फान् विधूय विविधान् सुखेवाधाय धीमताम् । श्रीमेरुतुङ्गस्तद्ग्रथवन्धाद् ग्रन्थं तनोत्यमुम् ॥३॥
रत्नाकरात् सद्गुरुसम्प्रदायात् प्रबन्धचिन्तामणिमुद्दिधीर्षोः ।
श्रीधर्मदेवः शतधोदितेतियुक्तैश्च साहाय्यमिव व्यधत्त ॥ ४ ॥
श्रीगुणचन्द्रगणेशः प्रबन्धचिन्तामणिं नवं ग्रन्थम् ।
भारतमिवाभिरामं प्रथमदर्शोऽत्र दर्शितवान् ॥ ५ ॥
भृशं श्रुतत्वान्न कथाः पुराणाः प्रीणन्ति चेतांसि तथा बुधानाम् ।
वृत्तैस्तदासन्नसतां प्रबन्धचिन्तामणिग्रन्थमहं तनोमि ॥ ६ ॥
बुधैः प्रबन्धाः स्वधियोच्यमाना भवन्त्यवश्यं यदि भिन्नभावाः ।
ग्रन्थे तथाप्यत्र सुसम्प्रदायाद् दृष्टे न चर्चा चतुरैर्विधेया ॥७॥
॥ ॐ सर्वज्ञको नमस्कार हो ॥
जिनकी चतुर्मुखी ( चार मुख ) लक्ष्मी और सरस्वतीका उचित द्वार है, और जो भवका अन्त
करनेवाले हैं ऐसे श्रीनाभिभू, परमेष्ठी जिन ( ऋषभनाथ ) रक्षा करे¹ ॥ १ ॥
उस कलावान् प्रभु चन्द्रप्रभ नामक गुरुका मैं ध्यान करता हूं जिनका कर (= हाथ, किरण )
पत्थरके समान मनुष्योंको भी द्रवित करनेवाला है² ॥ २ ॥
१ इस श्लोकमें ग्रन्थकारने ब्रह्मा और जिनदेव ऋषभनायककी एक साथ स्तुति की है । ब्रह्माके चार मुख होनेसे वे
चतुर्मुख के नामसे प्रसिद्ध हैं । जैन शास्त्रोंमें वर्णन है कि भगवान् ऋषभदेव जब धर्मोपदेश देते थे तब वे भी श्रोताओंको चार
मुखवाले दिखाई देते थे । इस लिये जिन भगवान्को भी चतुर्मुखका विशेषण दिया जाता है । ब्रह्मा भी परमेष्ठी पदसे प्रसिद्ध
हैं और जिन भगवान् भी परमेष्ठी कहलाते हैं । ब्रह्मा विष्णुके नाभिकमलसे पैदा हुए ऐसी पुराणोंमें प्रसिद्धि है इस लिये वे
नाभिभू कहे जाते हैं और जिनदेव ऋषभनायकके पिताका नाम नाभिराज था इस लिये ये भी नाभिभू कहे जाते हैं ।
२ इस श्लोकमें ग्रन्थकारने अपने गुरुको नमस्कार किया है जिनका नाम चन्द्रप्रभ था । चन्द्रप्रभ शब्दका श्लेषार्थ करते
हुए गुरुकी तुलना चन्द्रमाके साथ की है । चन्द्रमा अपनी १६ कलाओंके कारण कलान्त कहलाता है, ग्रन्थकारके गुरु भी अनेक
विद्या-कलाओंसे अलङ्कृत होनेके कारण कलावन्त थे । चन्द्रमाके कर याने किरण चन्द्रकान्त मणिको-जो एक प्रकारका पत्थर
ही है-द्रवित ( जलबिन्दु युक्त ) करते हैं; वैसे ही चन्द्रप्रभ गुरुके कर याने हाथ यदि पत्थरतुल्य मनुष्यके मस्तिष्क ऊपर भी पड़ते
हैं तो उसको भी ये द्रवित ( आर्द्र,-कोमलचित्त ) बनाते हैं ।
२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
विविध प्रकारके ग्रन्थों और प्रबन्धोंको छोड़ कर बुद्धिमानोंको सुखसे जिनका बोध हो सके इसलिये
गद्यरचना द्वारा ही मैं मेरुतुंग इस ग्रन्थकी रचना करना चाहता हूँ³ ॥ ३ ॥
रत्नाकर (समुद्र) समान सद्गुरु सम्प्रदायसे, जब मेरी इस प्रबन्धरूप चिन्तामणि (रत्न) के उद्धार
करनेकी इच्छा हुई तो धीधर्मदेव ने सैकड़ो वार इतिहासकी बातें कह कहकर मानों मेरी सहायता की⁴ ॥४॥
जिस प्रकार महाभारत ग्रन्थका प्रथम आदर्श (पहली नकल) गणेश (गजाननने) तैयार किया,
उसी प्रकार इस प्रबन्धचिन्तामणि नामक नये ग्रन्थका प्रथम आदर्श गुणचन्द्र नामक गणेश (गच्छपति) ने
सुन्दर रीतिसे तैयार किया⁵ ॥ ५ ॥
बारंवार सुनी जानेके कारण पुरानी कथायें बुद्धिमानोंके मनको वैसा प्रसन्न नहीं कर पातीं । इस
लिये मैं निकटवर्ती सत्पुरुषोंके वृत्तान्तोंसे [ संकलित ऐसे ] इस प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थकी रचना कर
रहा हूँ⁶ ॥ ६ ॥
यद्यपि विद्वानों द्वारा अपनी बुद्धि [ संकलना ] से कहे गये प्रबन्ध [कुछ कुछ] भिन्न भिन्न भावों
वाले अवश्य होते हैं; तथापि इस ग्रंथकी रचना सुसम्प्रदाय (योग्य परंपरा) के आधारपर की गई है; इसलिये
चतुर जनोंको [इसके विषयमें] वैसी चर्चा न करनी चाहिये⁷ ॥ ७ ॥
३ मेरुतुंग सूरिने इस ग्रंथकी रचना की उसके पूर्व, कुछ गद्य और कुछ पद्यमें, कुछ प्राकृत और कुछ संस्कृतमें,
कुछ पुरातन अपभ्रंश और कुछ अर्वाचीन देश्य भाषामें, इस प्रकारके कई छोटे बडे प्रबन्धात्मक ग्रन्थ बिद्यमान थे। उन
ग्रन्थोंमेंसे अपनी मनोवृत्तिके अनुसार जितने एक विषय चुनकर मेरुतुंगने सरल सस्कृत गद्य रचना द्वारा इस ग्रन्थका संकलन किया ।
४ ग्रन्थकार मेरुतुंगसूरिके धर्मदेव नामक कोई वृद्ध गुरुभ्राता अथवा गुरुजन थे जिन्होंने समय समय पर
इतिहासकी सैकड़ों पुरानी बातें सुना सुनाकर इस ग्रन्थकी रचना सामग्रीमें यथेष्ट सहायता दी । इस लिये ग्रन्थकारने अपने गुरुके
बाद उनका भी सम्मानपूर्वक इस श्लोक द्वारा स्मरण और उपकृत भाव प्रदर्शित किया है।
५ जैन ग्रन्थोंमें यति मुनियोंके समुदायको गण नामसे भी उल्लिखित किया जाता है। गणका नायक जो यति-
आचार्य होता है उसे गणेश-गणपति-गणनायक-आदि शब्दोंसे सम्बोधित किया जाता है। प्रबन्धचिन्तामणिका प्रथम आदर्श
तैयार करनेवाले गुण चन्द्र नामक गणी थे जो शायद मेरुतुंगसूरिके प्रधान शिष्य हों और उनके बाद उनके पट्टपर गणनायक बने
हों। गणेश शब्दसे, ग्रन्थकारने पुराण प्रसिद्ध देव गणपति ( गजानन विनायक ) जिन्होंने वेद व्यास कथित महाभारतकी
प्रथम नकल की, उनके साथ यहां पर श्लेषार्थ कर अर्थ घटना बताई है ।
६ पुराने जमानेमें व्याख्यानकार और कथाकार प्राय सदा उन्हीं कथा-वार्ताओंको सुनाया करते थे जो महाभारत और
रामायण आदि पुराण ग्रन्थोंमें प्रसिद्ध हैं। एकही एकही कथा बारवार सुनकर विज्ञ मनुष्योंके मनको विशेष आनन्द नहीं आता
यह सर्वानुभव सिद्ध बात है। मेरुतुंगसूरिने इस बातका विचार कर, कथाकारोंको, लोगोंका मनोरंजन करनेके लिए कुछ नई
सामग्री प्राप्त हो इस उद्देश्यसे, कितने एक इतिहास प्रसिद्ध और निकट समयवर्ती श्रेष्ठ पुरुषोंके ऐतिहासिक वृत्तान्तोंसे अलंकृत
ऐसे इस प्रबन्धचिन्तामणि नामक ग्रन्थकी रचना की। ग्रन्थकारका यह कथन खास ध्यान देने योग्य है ।
७ मेरुतुंगसूरिने इस ग्रन्थकी संकलना करनेमें कुछ तो पुराने प्रबन्ध-ग्रन्थोंकी सहायता ली और कुछ परंपरासे चली
आती हुई मौखिक बातोंका आधार लिया। इस प्रकार परंपरासे सुनी हुई बातोंका परस्पर मिलान करनेमें विद्वानोंको अवश्य ही उनमें
कुछ न कुछ भिन्नभाव मालूम पड़ता रहता है। मेरुतुंगसूरिको भी अपनी इस रचनामें और दूसरी अन्यकृत रचनामें कहीं कहीं ऐसा
विभिन्नभाव मालूम हुआ है। इस विभिन्नभावका निराकरण करनेका या खुलासा करनेका उनके पास न तो कोई साधन था और
न कोई उनको उसकी आवश्यकता थी। उन्होंने सिर्फ इतना ही कहना पर्याप्त समझा कि- इमने जो बातें इस ग्रन्थमें संकलित
की हैं वे एक सुसम्प्रदाय द्वारा प्राप्त की हुई हैं। इस लिये इनके तथ्यातथ्यके बारेमें चतुर मनुष्योंको चर्चा करनेसे कोई लाभ नहीं।
प्रबन्धचिन्तामणिकी कुछ बातें ऐतिहासिक दृष्टिसे सर्वथा भ्रान्त भी मालूम होती हैं लेकिन मेरुतुंगसूरि उनके लिये निष्पक्ष और
निराग्रह हैं-यह बात इस श्लोकगत कथनसे सूचित होती है ।
Here is the complete, line-by-line transcription of the Hindi and Sanskrit text from the image:
प्रकरण १ ] विक्रमार्कराजाका प्रबन्ध [ ३
१. विक्रमार्क राजाका प्रबन्ध ।
१. इस पृथ्वीतल पर विक्रमादित्य [ कालक्रमसे ] अन्तिम राजा होते हुए भी, अपने शौर्य
औदार्य आदि गुणोंसे वह प्रथम और अद्वितीय राजा हुआ$^१$ । श्रोताओंके कानोंमें अमृतकासा
आसिंचन करनेवाला उस राजाका इतिवृत्त बहुत कुछ विस्तृत है । हम यहां पर, ग्रंथकी आदिमें
उसीका संक्षेपमें कुछ वर्णन करते हैं * ।
२) वह इस प्रकार है—अवन्ति देशके$^२$ सुप्रतिष्ठान$^३$ नामक नगरमें असम साहसका एक मात्र
निधि; दिव्य लक्षणों ( चिह्नों ) से लक्षित; सत्कर्म, पराक्रम इत्यादि गुणोंसे भरपूर ऐसा एक विक्रम नामक
राजपूत ( राजपुत्र ) था । आजन्म दरिद्रतासे तंग होता हुआ भी वह अति नीति-परायण था; सैंकड़ों
उपाय करके भी जब धन नहीं प्राप्त कर सका तो एक बार भट्ट मात्र नामक मित्र के साथ रोहण पर्वतको
चला । उसके निकटवर्ती प्रवर नामक नगरमें [ एक ] कुम्हारके घर विश्राम करके प्रातःकाल उस कुम्हारसे
भट्टमात्रने कुदाल मांगा । उसने कहा-इस जगह खानके भीतर जाकर प्रातःकाल पुण्यात्मरु नामका श्रवण
करके, ललाटको हथेलीसे स्पर्श कर 'हा देव !' ऐसा कहकर चोट मारनेसे, दुर्भागी मनुष्यको भी अपनी
प्राप्तिके अनुसार रत्न मिलते हैं । उस भट्टमात्रने कुम्हारसे इस वृत्तान्तको भली भाँति सुन लिया पर
विक्रमसे इस प्रकारकी दीनता करानेमें वह असमर्थ था । उन साधनोंको साथ लेकर विक्रम जब उस
स्थानमें कुदालका प्रहार करनेको उद्यत हुआ तो उस उसम उसने [ अकस्मात् ] विक्रमसे इस प्रकार कहा
कि—' अवन्ती से आए हुए किसी वैदेशिकसे घरका कुशल समाचार पूछने पर उसने आपकी माताका मरण
बताया है !' इस तरह वज्र-सूची ( हीरा छेदनेकी सुई—हीराकणी ) के समान वचनको सुनकर विक्रमने
हथेलीसे माथा ठोंककर 'हा देव !' ऐसा कहा और कुदालको हाथसे फेंक दिया । उस कुदालके अग्रभागसे
फटी हुई जमीनमेंसे सवा लाख मूल्यका चमकता हुआ रत्न ( हीरा ) प्रादुर्भूत हुआ । भट्टमात्र उसे लेकर
१ मध्यकालीन प्रबन्धकारोंकी यह मान्यता थी कि विक्रमादित्यके बाद उसके जैसा पराक्रमी, शूर, वीर, उदार चेता
और कोई राजा नहीं हुआ । उसके पहलेके युगमें यद्यपि पुराणप्रसिद्ध अनेक राजा हुए जो इन गुणोंसे यथेष्ट अलंकृत थे, तथापि
ये भी विक्रमके जैसे संपूर्ण आदर्श नृपति नहीं थे । इसलिये इन गुणोंकी दृष्टिसे विक्रम उन राजाओंमें भी सर्व प्रथम स्थान प्राप्त
करता है और इसीलिये इस पद्ममें, ग्रंथकारने उसको कालक्रमसे अन्तिम होनेपर भी गुणक्रममें वह सर्व प्रथम था, ऐसा कहा है ।
प्रबन्धचिन्तामणिका ईंग्रेजी भाषामें जो अनुवाद टॉनी नामक इंग्रेज विद्वानने किया है, उसमें उसने अन्य इस शब्दका अर्थ
अन्त्यज-हीन जातीय ( of Lowest rank ) ऐसा किया है, लेकिन यह भ्रमात्मक है । विक्रम हीन जातीय था ऐसा कहीं
भी कोई उल्लेख नहीं मिलता । प्रबन्धोंमें विक्रमका कहीं तो राजपूत जातिके परमारवंश में उत्पन्न होना लिखा है और कहीं
हूण वंश में; ये दोनों ही प्रसिद्ध राजवंश हैं । इस विषयकी विशेष चर्चा हम अगले भागमें करेंगे ।
- इस प्रबन्धचिन्तामणिकी रचनाके पूर्व, विक्रमविषयक कई चरित्र और प्रबन्ध बने हुए विद्यमान थे । ये चरित्र प्रबन्ध
बहुत कुछ विस्तृत और विविध वर्णनवाले थे । उनमेंसे कुछ थोड़ेसे वर्णन, संक्षेप करके, मेरुतुंगसूरिने यशस्कर ग्रथित किये हैं ।
विक्रम विषयक इस विविध साहित्यका विशेष परिचय हम यथास्थान अगले ग्रन्थमें लिखेंगे ।
२ वर्तमान मालवेका प्राचीन नाम अवन्ती था ।
३ मालवा याने अवन्तीमें सुप्रतिष्ठान नामक कोई नगरका उल्लेख कहीं नहीं मिलता । अवन्तीकी राजधानी प्राचीन
काल ही से उज्जयिनी प्रख्यात है और विक्रमकी राजधानी यही उज्जयिनी थी । इसलिये संभव है कि ग्रंथकारने इसी उज्जयिनी
को सुप्रतिष्ठान-जिसका प्रतिष्ठान=स्थानम् खूब दृढ है-इस विशेषणसे उल्लिखित किया हो । उज्जयिनीके विशाला आदि
और भी उपनाम थे, इसलिये यह भी संभव है कि यह सुप्रतिष्ठान भी उसका एक उपनाम हो । दाक्षिण अर्थात् महाराष्ट्रकी
पुरानी राजधानी प्रतिष्ठान नगरी थी-जो वर्तमानमें निजाम राज्यमें गोदावरी के काँठेपर पैठण नामक कस्बेसे प्रसिद्ध है-
उसकी प्रतिस्पर्धा में भी शायद उज्जयिनीको सुप्रतिष्ठान नाम प्रदान किया गया हो ।
४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
विक्रमके साथ लौट आया । फिर उसके शोकरूपी शंकुकी शंकाको दूर करनेके लिये, भट्टमात्रने खानका
वृत्तान्त बताते हुए, तत्काल ही उसकी माताका कुशल समाचार कहा । विक्रमने इसे भट्टमात्रकी सहज
लोलुपता समझकर उसके हाथसे रत्न छीन लिया, और फिर खानके पास पहुँचा और बोला—
२०. गरीबोंके दरिद्रतारूप घानको भरनेवाले इस रोहणगिरिको धिक्कार है जो [ इस प्रकार ]
अर्थिजनों [ याचकों ] से ‘हा देन !’ ऐसा कहलाकर फिर रत्न देता है ।
यह कह कर उसने सब लोगोंके सामने उस रत्नको वहीं फेंक दिया । फिर देशान्तर भ्रमण करता
हुआ अवन्ती की सीमामें पहुँचा । वहा पर, नगारेकी मनोरम ध्वनि सुनकर और उसके कारणका वृत्तान्त
जानकर उसका स्पर्श किया¹ । फिर उस भट्टमात्रके साथ वह राजमन्दिरमें आया । [ ज्योतिषीसे ] बिना पूछे
हुए उसी मुहूर्त्तमें दिनभरके लिये मंत्रियोंने उसे राज-पदपर अभिषिक्त किया । उसने अपनी दूरदर्शितासे समझ
लिया कि इस राज्यपर कोई प्रबल राक्षस या देवता क्रुद्ध होकर प्रतिदिन एक एक राजाका संहार करता है
और राजाके अभावमें देशका विनाश करता है । इसलिये भक्ति या शक्तिसे उसका अनुनय करना उचित है ।
यह सोच, नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य आदि बनवाकर, सायंकाल चन्द्रशाला ( राजमहलका उपरी हिस्सा ) में सब
कुछ सजा कर रखा । रातकी आरती हो जानेके बाद, अगरक्षकोंसे भारशृङ्खलामें लटकते हुए पलँगपर अपने
पट्ट-दुकूल आदिसे आच्छादित तकियाको रखवाकर, स्वयं प्रदीपच्छायामें—अर्थात् ऐसी जगहपर जहाँ प्रदीपका
प्रकाश नहीं पड़ता था,—जाकर बैठ गया । हाथोंमें तलवार धारण किये हुए, और धैर्यमें जिसने तीनों लोकको
जीत लिया वैसा वह चारों ओर [ तीक्ष्ण दृष्टिसे ] देखता रहा । एकाएक घोर अर्द्धरात्रिको खिड़कीके रास्ते
पहले धुआँ उठा, फिर ज्वाला निकली और बादको साक्षात् प्रेतकी प्रतिमूर्तिके समान एक विकराल बेतालको
उसने आते देखा । भूखसे उस बेतालका पेट फक हो रहा था, [ इसलिये पहले ] उसने खूब इच्छापूर्वक उन
भोज्य द्रव्योंको खाया, फिर गध द्रव्योंको शरीरमें लगाया और पान खाकर सन्तुष्ट होकर फिर वहीं पलँगपर वह
बैठ गया और विक्रमादित्य से बोला—‘ अरे मनुष्य ! मेरा नाम अग्निबेताल है, देवराज ( इन्द्र ) के प्रतीहार
रूपसे मैं प्रसिद्ध हूं । मैं प्रतिदिन एक एक राजाको मारता हू । पर [ आज ] तुम्हारी इस भक्तिसे संतुष्ट होकर
मैंने तुम्हें अभयदानपूर्वक यह राज्य दे दिया है । पर इतना भक्ष्य-भोज्य मुझे सदैव देना । इस प्रकार दोनोंमें
तय होनेके बाद, कुछ काल बीतनेपर, विक्रमराजाने [उससे] अपनी आयु पूछी । तब वह यह कहकर चला
गया कि—‘ मैं तो नहीं जानता पर स्वामी ( इन्द्र ) से जानकर तुम्हें बताऊँगा । ’ फिर दूसरी रातको वह
आया और विक्रम से बोला कि—‘ इन्द्रने तुम्हारी आयु सौ सालकी बताई है । ’ राजाने अपने मित्रधर्मका अधिक
आरोप करके इस प्रकार अनुरोध किया कि—‘इन्द्रसे मेरी आयु सौ वर्षसे एक वर्ष अधिक या कम करा दो !’
उसने यह अंगीकार किया और फिर दूसरे दिन आकर यह बात कही—‘ महेन्द्रके किये भी [ तुम्हारी आयु ]
निन्यानवे या एक सौ एक वर्ष नहीं होगी।’ इस निर्णयके जान लेनेपर, राजा दूसरे दिन उसके लिये भक्ष्य-भोज्य
न बनवाकरके, लड़ाईके लिये सजित होकर रातमें तैयार रहा । वह वेताल भी यथारीति आकर उन भक्ष्य-
भोज्योंको न पाकर क्रुद्ध हुआ और उसने राजा ऊपर आक्रमण किया । बड़ी देरतक उन दोनोंमें युद्ध होता
१ प्राचीन कालमें यह प्रथा थी कि राज्यकी ओरसे किसी साहस या दुष्कर कार्यके करने-करवानेकी घोषणा जब कराई
जाती थी, तब एक विशिष्ट राजपुरुष, कुछ अन्य राजकर्मचारियों-सैनिकों आदिको साथ लेकर, नगरके प्रधान प्रधान राजमार्गोंसे
ढोल या नगारा बजवाता हुआ घूमता फिरता और मुख्य मुख्य स्थानोंपर खड़ा होकर जो कार्य करना करवाना हो उसकी
उद्घोषणा करता । जिस मनुष्यको वह कार्य करना अभीष्ट होता वह उस घोषणाके बाद उस ढोल या नगारेको अपना हाथ
लगाता, जिससे वे राजकर्मचारी यह समझ लेते कि इस मनुष्यको यह कार्य करना सम्मत है । फिर उस मनुष्यको वे सम्मानके
साथ प्रधान या राजाके पास ले जाते ।
प्रकरण २ ] विक्रमार्कराजाका प्रबन्ध [ ५
रहा । बादको पुण्यबलके सहायसे राजाने उसे पृथ्वी तलपर पटक दिया, और उसकी छातीपर पैर रखकर कहा
कि-' इष्ट देवताका स्मरण करो ! ' तब वह बोला कि-' मैं तुम्हारे अद्भुत साहससे संतुष्ट हूँ। तुम जो करनेको
कहो उस आदेशका पालन करनेवाला मैं अग्नि नामक बेताल तुम्हें सिद्ध हुआ । ' ऐसा होनेपर उसका राज्य
निष्कंटक हुआ । इसी तरह अपने पराक्रमसे दिगमण्डलको आक्रान्त करनेवाले उस राजाने छानवे प्रतिद्वन्दी
राजाओंके राज्यको अपने अधिकारमें किया ।
३. जंगली हाथी, तुम्हारे शत्रुओंके [ उजड पड़े हुए ] घरोंकी स्फटिक निर्मित दीवालपर दूरसे
अपनी परछाई देखकर, उसे प्रतिद्वंद्वी हाथी समझकर, क्रोधसे आघात करता है । [ उस आघातके
कारण ] फिर जब उसका दाँत टूट जाता है तो उसे ही हथिनी समझकर धीरे धीरे साह स १ के
साथ उसका स्पर्श करता है ।
इस२ प्रकार, कालिदासा दि महाकवियों द्वारा की हुई स्तुति ( प्रशंसा ) से अलंकृत होते हुए उसने
चिरकाल तक विशाल साम्राज्यका उपभोग किया ।
अब यहाँपर प्रसंगसे महाकवि कालिदासकी उत्पत्ति संक्षेपमें कहते हैं-
२) अवन्ती नामक नगरीमें राजा विक्रमादित्य की लड़की प्रियंगुमंजरी थी । वह अध्ययनके
लिये वररुचि नामक पंडितको समर्पण की गई । बुद्धिमती होनेके कारण सभी शास्त्रोंको उसने उस पंडितसे
कुछ ही दिनोंमें पढ़ लिया । वह पूर्ण यौवनावस्था प्राप्त कर चुकी थी, और नित्य अपने पिताकी सेवा करती
थी । किसी समय, वसन्त कालमें दोपहरको-जब कि सूर्य सिरपर आगया था, वह खिड़कीके सामने एक
सुखासन ( सोफा ) पर बैठी हुई थी; इसी समय उपाध्याय ( वररुचि ) रास्तेमें चलते हुए खिड़कीकी छायामें
कुछ विश्राम लेने खड़े रहे । कुमारीने उन्हें देखा और खूब पके हुए आमके फलोंको दिखाया । उसने समझा
कि ये ( उपाध्याय ) उन फलोंके लोलुप हैं, और बोली-' आपको ये फल ठंडे रुचेंगे या गरम ? ' उसकी
इस बातकी चातुरीको न समझते हुए उस ( उपाध्याय ) ने कहा कि-' गरम ही चाहते हैं ' इस प्रकार
कह कर, उस उपाध्यायने अपना वस्त्र फैलाया जिसमें उसने ऊपरसे वे फल नीचे फेंके । लेकिन फल पृथ्वीपर
गिर पड़े और उससे उनमें धूल लग गई । वररुचि हाथ में लेकर मुँहसे फूंक फूंक कर उस धूलको झाड़ने
लगा । राजकन्याने उपहासके साथ कहा-' क्या ये बहुत गरम हैं कि जिससे मुंहसे फूंक कर ठंडा कर रहे
हो ? ' उसकी इस बातसे चिढ़कर उस ब्राह्मणने कहा-' ऐ अपनेको चतुर समझनेवाली अभिमानिनि ! तूं गुरुके
साथ ऐसा मज़ाक कर रही है; जा तुझको पशुपाल पति मिलो ' । इस प्रकार उनका शाप सुनकर उसने कहा--
' आप तो त्रैविद्य हैं, लेकिन मैं तो, आपसे अधिक विद्यावान् होनेके कारण जो आदमी आपका भी गुरु होगा,
उसीसे विवाह करूंगी । ' उसने इस प्रकार प्रतिज्ञा की । इसके बाद विक्रमादित्य जब कन्याके लिये उचित
श्रेष्ठ वर पाने की चिन्तारूपी समुद्रमें डूब रहे थे, तो वह पंडित जिसे राजाने अभिलषित वर की खोज
करनेका आग्रहपूर्वक आदेश कर रखा था, एक बार एक जंगलमें घूमता हुआ पिपासासे व्याकुल हुआ । जब
१ मूलमें यहापर ' साहसाङ्कः ' ऐसा सविभक्तिक पाठ है इसलिये इसे हाथीका विशेषण मान कर यह अर्थ किया गया
है । प्रत्यन्तरोंमें ' साहसाङ्क ' ऐसा निर्विभक्तिक पाठ भी मिलता है जो अर्थदृष्टिसे संबोधनात्मक हो सकता है । उस अर्थमें यह ' हे
साहसाङ्क ! ' ऐसा विक्रमका विशेषण हो सकता है । विक्रम का उपनाम साह सा ङ्क था, इसके यथेष्ट प्रमाण मिलते हैं।
२ यह जो राजाकी स्तुतिका पद्य उद्धृत किया गया है वह महाकवि कालिदास का बनाया हुआ है, ऐसा
मेरुतुंगका मतव्य मालूम देता है ।
६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
चारों ओर कहीं जल नहीं मिला तो एक पशुपालको देखकर उससे जल मांगा । उसने जलके अभावमें दूध
पीनेको कहा और बोला कि—‘करचडी’ करो । उसके ऐसा कहने पर वररुचि बड़ी चिन्तामें पड़ गया, क्यों
कि उसने इसके पहले यह शब्द किसी भी कोष ग्रन्थमें नहीं पढ़ा सुना था । उस पशुपालने उसके मस्तक पर
हाथ रखकर और भैंसके नीचे बिठाकर, दोनों हथेलियों को जोड़कर 'करचडी' नामक मुद्रा बताकर, उसे पेट
भर कर दूध पिलाया । उस (उपाध्याय) ने अपने मस्तक पर हाथ रखनेके कारण और एक 'करचडी' इस
विशेष शब्दके बतानेके कारण, उसे गुरुके समान समझा और फिर उसको ही उस राजकुमारीका समुचित
पति निश्चित किया । भैंसोंसे हटाकर उसे अपने महलमें ले आया और ६ महिने तक उसके शरीरकी शुश्रूषा
करते हुए "ओं नम शिवाय" इस आशीर्वादको पढ़ाया । ६ महिने बाद जब पण्डितने समझ लिया कि ये
अक्षर उसे कण्ठस्थ हो गये हैं तो एक दिन शुभ मुहूर्तमें उसको अच्छी तरह श्रृंगार कराके उसे राजसभामें ले
गया । राजाको आशीर्वाद देते समय, बहुत बारका अभ्यस्त वह आशीर्वाद भी, सभाक्षोभके कारण “उ श र ट”
इस प्रकारके शब्दोंमें बोल गया । उसकी इस ऊटपटांग बातसे राजा विस्मित हुआ । वररुचिने उसकी
[मूर्खता छिपाने और] चतुरता बतानेके लिये राजाके सामने कहा-
४. उमाके साथ रुद्र जो, शङ्कर और शूलपाणि है ।
रक्षा करें तुम्हारी हे राजन्, टंकारके बलसे जो गर्वित है ॥
इस प्रसिद्ध श्लोकद्वारा [जिसके चारों चरणोंके प्रथमाक्षरोंसे 'उशर्ट' शब्द बनता है] वर
रुचिने उसके पाण्डित्यकी गंभीरताका विस्तारपूर्वक विवेचन किया । उसकी बातसे प्रसन्न होकर, राजाने
उस भैंस चरानेवालेसे अपनी पुत्रीका विवाह कर दिया । पर पण्डितके सिखानेसे वह सदा मौन ही रहा करता ।
राजकन्याने उसकी चतुरता जाननेके लिये, कोई नई लिखी हुई पुस्तकके संशोधनका उससे अनुरोध किया ।
उसने उस पुस्तकको हथेलीपर रखकर, नखनी लेकर, सारे अक्षरोंको बिंदु और मात्रासे रहित कर दिया । उसे
ऐसा करते देख राजपुत्रीने निर्णय किया कि यह तो मूर्ख है । तबसे सर्वत्र ही 'जा मा तृ शु द्धि' की कहावत
प्रचलित हुई। एक बार दीवाल परके चित्रमें भैंसोंका झुण्ड देखकर, आनंदित होकर, वह अपनी प्रतिष्ठा भूल गया
और उनके बुलानेकी विकृत बोली बोलने लगा । तब राजकुमारीने निश्चय किया कि यह निरा पशुपाल-भैंसोंका
चरवाहा है । फिर यह (चरवाहा) राजकन्याकी अवज्ञा देखकर विद्वत्ताके लिये कालिकाकी आराधना करने
लगा। अपनी पुत्रीके वैधव्यसे शंकित होकर राजाने² रातके समय गुप्त वेशमें दासीको भेजा । उसने यह कहकर
कि- 'मै तुझे तुष्टमान हुई हूँ' ज्यों ही उठाने लगी त्यों ही विप्लवकी आशंकासे, स्वय कालिका देवीने ही प्रत्यक्ष
होकर उसे अनुगृहीत किया । इस वृत्तान्तको सुनकर राजकुमारी प्रमुदित हुई और आकर बोली कि-'क्या
कुछ विशेष वाणी प्राप्त हुई है?'³ उसके ऐसा कहनेपर वह तभीसे कालिदास नामसे प्रसिद्ध हुआ और
उसने कुमार सम्भव प्रभृति ३ महाकाव्य और ६ प्रबंध बनाये ।
-इस प्रकार यह कालिदासकी उत्पत्तिक। प्रबंध है ॥ १ ॥
१ 'जामातृ शुद्धि' की कहावत हिंदीमें या गुजराती भाषामें प्रचलित हा ऐसा ज्ञात नहीं हुआ, लेकिन मराठी भाषामें
'जावांइ शोध' नामकी कहावत प्रचलित है । विक्रमकी और और कथाओंमें भी इसका उल्लेख मिलता है इससे ज्ञात होता है
पुराने समयमें यह कहावत गुजरात आदि देशोंमें भी प्रचलित होगी ।
२ पुत्रीका वैधव्य प्राप्त होनेकी शंका राजाको इसलिये हुई कि वह पशुपाल आमरणान्त उपवास करनेकी प्रतिज्ञा करके
देवीकी आराधना करने बैठा था । मेरुतुङ्गसूरिका यह ग्रन्थ बहुत ही संक्षिप्त शैलीमें लिखा हुआ है, इसलिये इसमें बहुतसी बातें
अध्याहृत रहती हैं । दूसरे निरूपणों में बातें खुलासेके साथ लिखी हुई मिलती हैं ।
प्रकरण ३-७ ] विक्रमार्कराजाका प्रबन्ध [ ७
३) एक बार, उस नगरका निवासी दा ता नामक सेठ, हाथमें भेंट लेकर आया और
सभामें बैठे हुए विक्रमादित्य को प्रणाम करके कहने लगा-‘महाराज, मैंने शुभ मुहूर्त्तमें प्रधान बढ़इयोंसे
एक धवलगृह (महल) बनवाया, और उसमें बड़े उत्सवके साथ प्रवेश किया। मैं जब रातको उसमें पलँग-
पर पड़ा हुआ, आधा-सोया, आधा-जागा वाली अवस्थामें था उस समय ‘गिरता हूँ’ इस प्रकारकी मैंने
आकस्मिक वाणी सुनी। मैं मारे डरके ‘मत गिरो’ यह कहता हुआ उसी समय वहाँसे भाग निकला। उस
मकानके बनवानेके संबंधमें ज्योतिषियों और कारीगरोंको समय समय पर जो धन दान किया गया है वह मेरे
ऊपर वृथा दण्ड ही हुआ! अब इस विषयमें महाराज जो उचित समझें करें!’ राजाने उस सेठकी बात भली
भाँति सुनकर, उस धवलगृहका मूल्य जो तीन लाख उसने बताया, वह उसे चुकाकर, उसको स्वायत्त कर
लिया। सायंकाल होनेपर, सर्वावसर¹ यानि राजसभामें बैठकर, तत्संबंधी सब कार्योंसे निवृत्त होकर, उस घरमें
सुखपूर्वक जा सोया। उसी ‘गिरता हूँ’ इस वाणीको सुनकर वह असम साहसी राजा बोला कि ‘जल्दी
गिरो!’ और उसके ऐसा कहते ही पास ही गिरे हुए सुवर्ण पुरुषको उसने प्राप्त किया।
—इस तरह यह सुवर्ण पुरुषकी सिद्धिका प्रबन्ध है॥२॥
४) एक दूसरे अवसरपर कोई अभागा पुरुष, अपने हाथसे बनाये हुए एक लोहेका दुबला पतला
दरिद्र नामक पुतला लेकर द्वारपर आया। जब द्वारपाल उसे राजाके पास ले गया तो उसने कहा कि-‘महाराज,
आप जैसे स्वामीसे शासित इस अवन्तीपुरीमें सभी चीजें जल्दी बिक जाती हैं और मिल जाती हैं, ऐसी
प्रसिद्धि जानकर मैंने चौरासी चौहटोंपर विक्रयके लिये इस दरिद्र-पुतलेको घुमाया, लेकिन किसीने इसे नहीं
खरीदा और उलटी मेरी भर्त्सना की गई। आपकी इस नगरीका यह कलंक यथार्थ रीतिसे आपको बताकर, क्या मैं
जैसे आया था वैसे ही चला जाऊं? यह आपसे पूछने आया हूँ।’ उसकी इस घटनाको पुरीका एक महान्
कलंक समझकर राजाने उसी समय उसे एक लाख दीनार देकर, लोहेके उस दरिद्र-पुतलेको खरीद लिया और
अपने खजानेमें रखवा दिया। ऐसा करनेपर उसी रातको, सुख पूर्वक सोये हुए राजाके निकट, पहले पहरमें
हाथियोंकी अधिष्ठात्री देवता, दूसरेमें घोड़ोंकी अधिष्ठात्री देवता और तीसरेमें लक्ष्मीने आविर्भूत होकर कहा कि—
‘महाराजने जब दरिद्र-पुतलेको खरीद लिया है तो, फिर हमारा यहाँ रहना उचित नहीं है’—यह कह, अनुज्ञा
लेकर वे चले जानेको पूछने आये, तो राजाने अपना साहस भग्न न हो इसलिये उनको जानेकी अनुमति दे दी।
चौथे पहरमें कोई दिव्य तेजःसम्पन्न उदार पुरुष प्रकट हुआ और बोला किँ—‘मैं सत्त्व (साहस) हूँ, जानेके लिये
आपकी अनुज्ञा चाहता हूँ’। उसके ऐसा पूछनेपर राजा हाथमें तलवार लेकर जब आत्मघात करनेको उद्यत
हुआ तो फिर उसने हाथ पकड़कर कहा कि-‘मैं तुष्टमान हुआ’ और राजाको उस कृत्यसे रोका। सत्त्वके
वहीं रहनेपर हाथी आदिकी तीनों अधिष्ठात्री देवतायें लौटकर राजासे बोलीं-‘जानेके संकेतको नष्ट करके सत्त्वने
हमें धोखा दिया है। इसलिये राजाको छोड़कर हम लोगोंका जाना अब उचित नहीं है। इस प्रकार वे
भी बिना किसी यत्नके ही स्थिर होकर रह गईं।
[१] तभीतक धन है, तभीतक गुण है, और तभीतक समुज्ज्वल कीर्ति है, जबतक हे सत्त्व
(साहस)! तुम चित्तरूपी नगरमें खेल रहे हो।
१ सर्वावसर उस जगहका नाम है जहां राजा अपने मुख्य सिंहासन पर बैठकर सब कोई प्रजाजन और राजकीय
पुरुषोंकी मुलाकात लेता देता है और राज्यके सब कार्योंका विचार करता है। दीवान-ए-आम या दरबार-ए-आम यह उर्दू शब्द इसका
प्रायः समानार्थक हो सकता है।
८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
[ २ ] राज्य भी जाय, स्त्रियां भी जाय और इस लोकसे यश भी चला जाय; किन्तु हे सत्त्व ! हम
तुम्हारे जानेकी अनुमति आजीवन नहीं दे सकते ।
—इस प्रकार यह विक्रमादित्यके सत्त्वका प्रबंध है ॥ ३ ॥
५) एक दूसरे अवसरपर, कोई विदेशी सामुद्रिक-शास्त्रज्ञ द्वारपालके द्वारा सभामें बैठे हुए विक्रमादि-
त्य के पास ले जाया गया । प्रवेश करते ही राजाके लक्षणोंको देखकर वह सिर पीटने लगा । राजाने विषादका
कारण पूछा, तो बोला—'महाराज, सभी अपलक्षणोंके निधान होनेपर भी तुम्हें छानवे देशोंकी साम्राज्य
लक्ष्मीको भोगते हुए देखकर, सामुद्रिक शास्त्रके ऊपर मेरा विराग हो गया है। मैं तुम्हारे अन्दर ऐसी कोई
काबरी (चितकबरी) आंत नहीं देख रहा हूं जिसके प्रभावसे तुम भी कोई राज्यकर्ता बनो । उसके इस वाक्यके
सुनते ही विक्रमादित्य तलवार खींचकर जब अपने पेटमें मारने लगा तो उस (सामुद्रिकज्ञ) ने पूछा कि
'यह क्या ?' इस पर विक्रमने कहा—'पेट फाड़कर तुम्हें उसी प्रकारकी (काबरी) आंत दिखाता हूं।
तब उसने कहा कि—'मैंने पहले नहीं समझा था कि, तुम्हारा यह सत्त्वरूपी महालक्षण बत्तीस लक्षणोंसे भी
बढ़कर है। इसपर राजाने उसे पारितोषिक देकर बिदा किया ।
—इस प्रकार यह सत्त्वपरीक्षाका प्रबंध है ॥ ४ ॥
६) इसके बाद एक अवसरपर, विक्रम ने सुना कि दूसरेके शरीरमें प्रवेश करनेवाली विद्यासे तिर-
स्कृत होकर अन्य सारी कलायें निष्फल-सी हैं। यह सुनकर उस विद्याकी प्राप्तिके लिये श्रीपर्वत पर भैरवा-
नन्द योगीके पास जाकर उसने चिरकाल तक उस (योगी) की सेवा करनी शुरू की । योगीके पूर्वसेवक
किसी ब्राह्मणने [ राजासे यह कहा कि—तुम ] मुझे छोड़कर (अकेले) गुरुसे पर-काय-प्रवेश विद्या न लेना ।
राजाने उसका अनुरोध मान लिया । जब गुरु विद्या देनेको उद्यत हुए तो उनसे कहा कि—'पहले इस
ब्राह्मणको विद्या दीजिये, बादको मुझे' । 'राजन् ! यह (ब्राह्मण) विद्याके सर्वथा अयोग्य है' ऐसा गुरुके
कहनेपर भी बार बार विक्रम अनुरोध करता रहा । तब गुरुने यह उपदेश देकर कि—'पीछे तुम पछताओगे'
उस ब्राह्मणको भी विद्या दी । बादमें लौटकर दोनों उज्जयिनी पहुंचे । वहां पद्माके मर जानेसे राजपुरुषोंको
उदास देखकर और स्वयं परकाय-प्रवेश विद्याका अनुभव करनेके निमित्त, राजाने उस हाथीके शरीरमें अपनी
आत्माका प्रवेश कराया । [ इस प्रसंगका वर्णन करनेवाला यह एक पद्य है-- ]
५. ब्राह्मणको अंगरक्षक बनाकर राजा (परकाय-प्रवेश) विद्याके द्वारा अपने हाथीके शरीरमें प्रविष्ट
हुआ । [ बादमें ] ब्राह्मण राजाके शरीरमें पैठ गया । तब राजा क्रीड़ा-शुक (महलके पींजरेमेंका
तोता) हुआ । बादमें (शुकरूपी) राजाने छिपकली के शरीरमें प्रवेश किया तो रानीने उसकी मृत्यु
समझी । (इस पर) ब्राह्मणने (जो राजाके शरीरमें प्रविष्ट हुआ बैठा था) शुकको जिलाया और
विक्रम ने फिर अपना शरीर पाया ॥ ५ ॥ इस तरह विक्रम को परकाय प्रवेश विद्या सिद्ध हुई ।
—इस प्रकार यह विद्यासिद्धिका प्रबंध है ॥ ५ ॥
७) फिर एक दूसरे अवसरपर, विक्रमादित्य राजपाटिका १ (बहिर्भ्रमण) में जा रहा था तब
मार्गमें सिद्धसेन सूरिको आते देखा । उस नगरका (जैन) संघ उनके पीछे पीछे आरहा था और बंदी जन
१ 'राजपाटिका' यह प्राकृत 'रायवडिया' और देशी 'रहवाडी' शब्दका संस्कृत रूपान्तर है। पुराने समयमें राजा
आदि राजनायक पुरुष प्रायः मध्यान्होत्तर तीसरे पहरके अंतमें या चतुर्थ प्रहरमें, राजमहलसे अनुचर आदिके खास परिवारके साथ
निकल कर, प्रधान राजमार्गसे होते हुए नगर या गावके बाहर जो राजकीय उद्यानादि स्थान होते थे उनमें जाते थे और वहापर
घंटे-दो घंटे ठहर कर, सन्ध्याकाल होते समय वापस निवासस्थान पर आते थे । राजाओंका यह इस प्रकार टहलने या हवाखानेके
लिये जो महल बाहर जाना होता था उसको राजपाटिका कहते थे ।
प्रकरण ८-११ ] विक्रमार्कराजाका प्रबन्ध [.९
'सर्वज्ञपुत्र' कह कर उनकी स्तुति कर रहे थे। 'सर्वज्ञपुत्र' इस विरुदसे कुपित होकर विक्रमादित्य ने
उनकी सर्वज्ञताकी परीक्षाके लिये मन-ही-मन प्रणाम किया। सिद्धसेन ने भी पूर्वगत श्रुतज्ञानके द्वारा राजाका
मनोगत भाव समझकर, दाहिना हाथ उठाकर धर्मलाभ का आशीर्वाद दिया। राजाने जब आशीर्वाद देनेका
कारण पूछा, तो महर्षिने कहा कि - तुम्हारे मानस नमस्कारके लिये यह आशीर्वाद दिया गया है। इस पर
उनके ज्ञानसे चकित होकर राजाने उनके पारितोषिक निमित्त एक करोड़ सुवर्ण वितरण किया।
८) एक बार, एक दूसरे अवसरपर, राजाने कोषाध्यक्षसे अपने दिलाए हुए सुवर्णका वृत्तान्त पूछा,
तो वह बोला कि - धर्मकी बहीमें मैंने श्लोक बनाकर सुवर्णका वृत्तान्त लिखा है; जो इस प्रकार है -
६. दूर-ही-से हाथ उठाकर 'धर्मलाभ हो' इस प्रकार कहनेवाले सिद्धसेन सूरिको राजाने एक कोटि
[ सुवर्ण ] दिया।
इसके बाद श्री सिद्धसेन सूरिको सभामें बुलाकर राजाने जब कहा कि-उस सुवर्णको ग्रहण कीजिये।
तो उन्होंने कहा कि - खाये हुए को खिलाना वृथा है। उसी सुवर्णसे ऋणग्रस्ता पृथ्वीको ऋणमुक्त कीजिये।
इस प्रकारका उपदेश मिलनेपर, सूरिके सन्तोषसे सन्तुष्ट होकर राजाने उस बातको स्वीकार किया।
९) उसी रातको राजा वीरचर्या¹ निमित्त नगरमें घूम रहा था, उस समय एक तेलीको बारबार
इस (श्लोकार्थ) को पढ़ते सुना-
७. 'हमारा संदेश नारद ! कृष्णको कहना।'
राजा सबेरा होनेतक रुका रहा पर उत्तरार्ध न सुन सका। उदास होकर राजमहलमें आकर सो गया।
सवेरे सामयिक कृत्य करके राजाने उस तेलीको बुलाकर उत्तरार्ध पूछा। उसने कहा-
'जगत् दारिद्रयसे दुःखित है [ इस लिये ] बलिके बन्धनको छोड़ो ॥ ७॥'
यह सुनकर सिद्धसेन सूरिके उपदेशको फिरसे कहा हुआ समझकर पृथ्वीको ऋणमुक्त करना शुरू किया।
[ उज्जयिनी में राजा विक्रमादित्य भट्टमात्र के साथ गुप्त वेश धारण करके महाकालके मंदिरमें
नाटक देखने गया। कुछ समयके बाद नागरिकके लड़के द्वारा कराये जानेवाले नाटकमें सूत्रधारके मुखसे उसका
वर्णन सुनकर राजाने भी उस नागरिकका धन ले लेनेके लिये मन-ही-मन लोभ किया। बादको कुछ समय
बीतनेपर वह प्यासा होकर मुख्य वेश्याके घर परसे भटके पाससे पानी मंगवाया। वहा बुढ़िया वेश्या प्रधान
पुरुषोंसे कह कर उसके लिये ईखका रस लेनेके लिये उपवनमें गई। काटनेवालोंसे ईख कटवाकर उसका रस
निकलवाया पर उससे घड़िया बिलकुल नहीं भरी तो मनमें दुखी होकर ऊपरका शकोरा भर कर ही बहुत देरसे
आई। राजाके रस पी लेनेपर भट्टमात्रने उसकी देरी और उदासीका कारण पूछा। वह बोली-और और
दिन तो एक ही ईखसे घड़ा और शकोरा दोनों भर जाते थे लेकिन आज तो घड़ा भी नहीं भरा। इसका कारण
समझमें नहीं आता। भट्टमात्रने फिर पूछा कि-तुम लोग तो बड़ी पक्की बुद्धिवाली होती हो इसलिये इसका
कारण जानकर और विचारकरके बताओ। फिर वेश्या बोली कि-पृथ्वीके मालिक (राजा) का मन प्रजाके
प्रति विरुद्ध होगया है, इसलिये पृथ्वीका रस भी क्षीण होगया है। यह कारण उसने निवेदन किया तो
राजा भी उसके बुद्धिकौशलसे चकित हुआ। वह फिर अपने घरकी शय्यापर सोया हुआ इस प्रकार विचार
करने लगा कि-प्रजा-पीड़न किये बिना, केवल विरुद्ध चिन्ता मात्रसे ही पृथ्वीके रसकी इस प्रकार हानि हुई ! तो*
१ वीरचर्या-उस जमानेके राजा अपनी प्रजाके सुख दुःखोंकी बातें स्वय जानने-सुननेके लिये कभी कभी रातके
समय, एकाकी गुप्तवेशमें महलोंसे बाहर निकल जाते थे और दो चार घंटे इधर उधर घूम फिर कर नगर चर्चाका प्रत्यक्ष अनुभव
करते थे। इसका नाम वीरचर्या है।
३-४
१० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
मैं अब प्रजाको पीड़ा नहीं पहुँचाऊंगा । ऐसा निश्चय करके राजा दूसरी रातको प्यासका बहाना करके परीक्षाके
लिये फिर उसके घर गया । वह शीघ्र ही ईखका रस ले आई और राजाको दिया जिसे पीकर वह [ अपने
महलमें आया और ] शय्यापर सो गया । भट्टमात्रके पूंछनेपर वेश्याने भी [ उसी तरह ] निवेदन किया
( बताया ) कि - [ आज ] राजाका मन प्रजापर प्रसन्न है । राजाने भी रातवाली अपनी बात बताकर, परके
चित्तको इस प्रकार पहचान लेनेके कारण, सन्तुष्ट होकर उस वृद्ध वेश्याको [ पारितोषिकके ढंगपर ] हार
दिया । - इस प्रकार यह राजाके मनके अनुसार होनेवाले पृथ्वीरसका प्रबंध है । ]
१०) इसके बाद एक बार श्री सिद्धसेन सूरिने, यह पूछे जानेपर कि-' मुझ ( विक्रम ) के समान क्या
कोई [ और भी ] जैन राजा होगा ? ' कहा-
८. एक हजार एक सौ निन्यानवे वर्ष पूर्ण होनेपर तुझ विक्रमादित्य के समान एक कुमार [पाल]
नामक राजा होगा ।
११) इसके बाद, एक दूसरे अवसरपर, जब राजा जगत्को ऋणमुक्त कर रहा था, अपने औदार्य
गुणका अहंकार करते हुए उसने सोचा कि-' प्रातःकाल एक कीर्ति-स्तम्भ बनवाऊँगा । [ उसी दिन ] रातको
वीरचर्या निमित्त चतुष्पथमें घूम रहा था कि दो साढ़ लड़ते हुए सामने आये । उनसे डर कर राजा किसी
दारिद्र्यग्रस्त ब्राह्मणकी पुरानी गोशालाके एक खंभेपर चढ़ गया । वे दोनों सांढ़ भी सींगसे बारंबार उसी खंभेपर
प्रहार करने लगे । इसी बीच उस ब्राह्मणने अकस्मात् जग कर, आकाशमें शुक्र और वृहस्पतिसे अवरुद्ध चन्द्र-
मण्डलको देखकर, गृहिणीको उठाया और चन्द्रमण्डलसे सूचित होनेवाले राजाका प्राणभय जान कर कहा कि-
उसकी शान्तिके लिये हवनीय द्रव्यसे हवन करूंगा । राजा कान लगा कर यह बात सुन रहा था । गृहिणीने
उससे कहा-' इस राजाने सारी पृथ्वीको तो ऋणमुक्त किया है, लेकिन मेरी सात कन्याओंके विवाहार्थ तो कुछ
द्रव्य नहीं दिया । तो फिर शान्तिकर्म करके उसे व्यसन ( संकट ) से मुक्त करनेमें क्या लाभ है ? ' इस प्रकार
उसकी बात सुन कर वह सर्वथा गर्वसे रहित हुआ और उस संकटसे छूटकर और उस कीर्तिस्तम्भकी बातको
भूलकर चिरकाल तक राज्य करता रहा ।
- इस प्रकार यह विक्रमादित्यकी निर्गर्वताका प्रबन्ध है ॥ ६ ॥
[ इसके बाद एक दूसरी रातको एक धोबिनसे राजाने पूछा कि-' वस्त्रोंमें बालू क्यों लगी रहती है और
वे गन्दे क्यों हैं ! ' उसने कहा-
[ ३ ] हे महाराज, यह जो दक्षिण समुद्ररूपी दक्षिण नायककी वधू, रेवाकी प्रतिस्पर्द्धिनी, गोदावरी
नामक प्रसिद्ध नदी, जिसका तट गोविन्दके प्रिय गोकुलोंसे आकुल है, उसका जल, वर्षाकाल बीत
जानेपर भी आपकी सेनाके हाथियोंके दाँतरूपी मूसलसे प्रक्षोभित धूलिके कारण, स्वच्छ नहीं हुआ ।
[ ४ ] उस राजाओंके राजाने धोबिनकी यह बात सुन कर भ्रूक्षेप मात्रमें अपने शरीरके आभूषणोंके
साथ एक लाख [ का दान ] दे दिया ।
[ ५ ] राजा विक्रमादित्यने चोर, मागध ( भाट ), ब्राह्मण और धोबिनसे कविता सुन कर [ रातके ]
चारों पहर दान दिया । ]
-' इस प्रकार यहापर विक्रमके संबंधके [ और भी ] विविध प्रबंध, परंपरा द्वारा जानलेने चाहिए ।
१ इस पंक्तिके लेखसे मेरुतुंगसूरि यह सूचित करना चाहते हैं कि विक्रमके विषयके जैसे ये प्रबन्ध हमने यहा
लिखे हैं, वैसे और भी अनेक प्रबन्ध हैं, जिनका ज्ञान अन्यान्य ग्रन्थों प्रबन्धों द्वारा प्राप्त करना चाहिए । हमने तो यहा पर कुछ
दिग्दर्शन करानेके लिये ही ये थोड़ेसे प्रबन्ध लिख दिये हैं ।
प्रकरण १२ ] विक्रमाकॅराजाका प्रबन्ध [ ११
१२) एक वार, आयुके अन्तमें विक्रमादित्य का शरीर कुछ कमजोर हुआ तो एक वैद्यने उपदेश
दिया कि, कौवेका मास खानेसे रोगकी शान्ति होगी । जब राजा उसे पकाने लगा तो इससे वैद्यने राजाका
प्रकृति-व्यत्यय देखकर कहा—इस समय धर्मौषध ही बलवान है । क्यों कि प्रकृतिकी विकृति होनेसे उत्पात होता
है। जीवनके लोभसे लोकोत्तर सत्त्व-प्रकृतिका त्याग करके काकमास खाकर आप किसी तरह भी न जियेंगे । वैद्यके
ऐसा कहनेपर उसको 'परमार्थबान्धव' कह कर राजाने उसकी प्रशंसा की और पारितोषिक देनेके लिये कहा ।
फिर और हाथी, घोड़ा, कोश इत्यादि सर्वस्व याचकोंको देकर, राजपुरुषों और नागरिकोंसे विदा लेकर, धवल
गृहके किसी निर्जन प्रान्तमें तात्कालोचित दान और देव पूजन करके कुशासनपर बैठ गया और सोच ही रहा
था कि ब्रह्मद्वारसे प्राणोंको निकाल दूं, अकस्मात् आविर्भूत अप्सराओंके समूहको देखा । राजाने हाथ जोड़कर
प्रणाम करके उनसे पूछा कि-‘तुम लोग कौन है ?’ इस पर अप्सराओंने कहा कि—विस्तारके साथ कुछ
कहनेका यह अवसर नहीं है, हम तो विदा लेनेके लिये ही यहा आई हैं । इस प्रकार कहकर जाती हुई
अप्सराओंसे राजाने फिर कहा—‘नवीन ब्रह्माने आप लोगोंको एक अद्वितीय रूप दे कर बनाया है । फिर भी
जानना चाहता हू कि, यह अद्वितीय रूप नासिकाहीन क्यों है ?’ इस पर वे ताली बजाकर हँसती हुई
बोलीं—‘अपने ही अपराधको हमारे ऊपर डाल रहे हो ?’ ऐसा कह कर वे चुप हो गई । तब राजाने
कहा—आप लोग तो स्वर्ग लोकमें रहती हैं। आपके ऊपर मेरे अपराधकी सम्भावना कैसे हो सकती है ?
इस तरह राजाका वचन समाप्त होनेपर उनमें की मुख्य सुमुखीने कहा—‘ हे राजन्, पूर्वतन पुण्यके प्रभावसे
नव निधियोंने तुम्हारे महलमें अवतार ग्रहण किया था, हम लोग उन्हींकी अधिष्ठात्री देवतायें हैं । आपने
जन्मसे महादान देते हुए भी एक ही निधिमेंसे इतना ही मात्र दिया है कि जिससे आप नासाग्र देख नहीं
सकते ।’ इस प्रकारका उनका कथन सुनकर हाथसे सिर ठोकते हुए राजाने कहा कि—‘यदि मैं जानता कि
नव निधिया अवतीर्ण हुई हैं तो उन्हें नौ ही पुरुषोंको दे देता । दैवने अज्ञान भावसे मुझे वञ्चित किया ।’
उसके ऐसा कहते समय उन्होंने यह कह कर आश्वासित किया, किं—कलियुगमें तो आप ही एकमात्र उदार हैं।
और वह परलोक प्राप्त हुआ । उसी दिनसे उस विक्रमादित्य का संवत्सर प्रवृत्त हुआ जो आज भी जगत्में
वर्तमान है ।
॥ श्रीविक्रमादित्यके दान विषयक ये विविध प्रबंध पूरे हुए ॥
१२] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
२. सातवाहन राजाका प्रबन्ध ।
१३) दान और विद्वत्ताके विषयमें श्री सातवाहन की कथा परम्परागत यथाश्रुतिके अनुसार जानना
चाहिये।१ उसके पूर्व जन्मकी कथा इस प्रकार है—प्रतिष्ठानपुरमें सातवाहन राजा जब राजपाटिका
(बहिर्भ्रमण) करने जा रहा था तो नगरके निकट नदीमें एक मछलीको हँसते देखा, जिसे लहरोंने पानीके
किनारे फेंक दिया था। इस अस्वाभाविक बातको देखकर राजाको भय हुआ। उसने सभी पंडितोंसे इस
सन्देहको पूछते हुए एक ज्ञानसागर नामक जैन मुनिसे भी पूछा। अपने अतिशय ज्ञानके बलसे उसने
राजाके पूर्वजन्मको जानकर इस प्रकार उपदेश दिया कि—'पिछले जन्ममें तुम इसी नगरमें रहते थे। तुम्हारे
कुल-वंशमें कोई नहीं था। और तुम्हारी जीवनवृत्ति एकमात्र लकड़ीका बोझ ढोना था। तुम नित्य ही भोजनके
अवसर पर इसी नदीके निकटवर्ती शिलातलपर बैठकर पानीसे सत्तू सानकर खाया करते थे। किसी दिन,
'एक महीनेके उपवासकी पारणाके लिये' नगरमें जाते हुए एक जैन मुनिको बुलाकर वह सत्तूका पिंड उनको
दानकर दिया। उस पात्रदानके माहात्म्यसे तुम सातवाहन नामक राजा हुए और वह मुनि देवता हुआ।
वही देवता अपने अधिष्ठान वश होकर, उस काष्ठभारवाही जीवको तुझे इस राजाके रूपमें पहचानकर, प्रमादके
कारण हँस पड़ा।' इस कथागत वस्तुका संग्रह सूचक यह [पुरातन] काव्य है—
९. मछलीके मुँहके हँसनेपर जो सातवाहन राजा भयभीत होगया था उससे मुनिने कहा कि
जिसने सत्तूसे मुनिको पूर्व जन्ममें जो पारणा कराया था वही आप हैं और दैवात् मछलीने आपको
पहचान लिया इसलिये वह हँस रही।
वह सातवाहन उस पूर्व जन्मके वृत्तान्तको जातिस्मृतिसे प्रत्यक्ष करके उस दिनसे दानधर्मकी
आराधना करता हुआ सब महाकवियों और विद्वानोंका संग्रह करता रहा। उसने चार करोड़ सुवर्णसे चार
गाथाओंको खरीदा और सात सौ गाथाओंवाला 'सातवाहन' नामक संग्रह गाथा कोश शास्त्र निर्माण कराया।
इस प्रकार वह नाना सद्गुणोंका निधि बनकर चिरकाल तक राज्य करता रहा'। वे चारों गाथायें ये हैं। जैसे--
[प्रबन्धचिन्तामणिकी मूल पाठकी जो आवृत्ति हमने तैयार की है उसमें यहा पर (देखो पृष्ठ ११) १०
प्राकृत गाथायें दी हुई हैं। इन गाथाओंके क्रम आदिके विषयमें पुरानी प्रतियोंमें बहुत कुछ गडबड मालूम देती है। कोई
प्रतिमें तो ये गाथायें सर्वथा नहीं दी गई हैं और 'गाथाचतुष्टयमेतद्' (अर्थात्-ये चार गाथायें इस प्रकार हैं) इस वाक्यके
बदले 'तद्गाथाचतुष्टय बहुश्रुतेभ्यो ज्ञेयं' (अर्थात्-ये चार गाथायें बहुश्रुत विद्वानों द्वारा जाननी चाहिए) ऐसा वाक्य है; और
कुछ प्रतियोंमें पहली ५ गाथायें लिखी हुई मिलती हैं, कुछमें दूसरी ५ गाथायें, कुछमें दसों गाथायें मिलती हैं। हमने मूलमें,
समग्रकी दृष्टिसे इन दसों गाथाओंका पाठ दे दिया है। इनमें पहला गाथा-पंचक है वह शृंगार विषयक वस्तुका वर्णनवाला है;
दूसरा गाथा-पंचक अन्योक्तिद्वारा सत्पुरुषोंके परोपकार भावका वर्णन करता है। इन गाथाओंका अर्थ इस प्रकार है-]
१० 'हार,' 'वेणीदंड,' 'खद्योतपङ्क्ति' और 'ताल' इन ४ वस्तुओंका वर्णन करनेवाली ४
गाथायें सालाहन राजाने दसकोटि [सुवर्ण] दे कर ग्रहण कीं ॥ १ ॥
१ विक्रमकी तरह सातवाहन राजाकी भी बहुतसी कथायें परंपरासे चली आती हैं। विक्रमचरित के समान सात
वाहनचरित भी बना हुआ है। संस्कृतके कथासरित्सागर नामक प्रसिद्ध ग्रंथमें सातवाहन की बहुतसी कथायें गूंथी हुई हैं। वे
सब कथायें मेरुतुंगसूरिके समयमें बहुत प्रचलित थीं और लोक-प्रसिद्ध थीं इसलिये उन्होंने उन कथाओंको इस ग्रंथमें संकलित
नहीं किया। विक्रम के बाद सातवाहन प्रसिद्ध ऐतिहासिक दानशील राजा हो गया और उसने भी विद्वानोंको खूब धन दान
किया, इसलिये सिर्फ उसका नाम निर्देश करनेके निमित्त ही यह इतना-सा वृत्तांत उसके विषयमें मेरुतुंगसूरिने लिख दिया है।
इसकी विशेष चर्चा अगले ऐतिहासिक विवेचनवाले भागमें की जायगी।
प्रकरण १३ ] सातवाहन राजका प्रबन्ध [ १३
[ हारका वर्णन करनेवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-]
११. खूब पुष्ट और ऊंचे उठे हुए स्तनोंवाली स्त्रीके वक्षस्थलपर रहा हुआ [ मोतियोंका ] हार स्थिर
होकर रहनेकी ठीक जगह न मिलनेसे छातीपर उद्विग्न अथवा उन्मुख होकर इधर उधर फिरता
रहता है—जैसे यमुना नदीके प्रवाहमें पानीके फेनके बुद्बुदे इधर उधर फिरते रहते हैं।
[ 'वेणीदण्ड 'का वर्णन करनेवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-]
१२. हे सुन्दरि, तेरा यह कृष्णकांति वेणीदण्ड नितम्ब-बिम्बपर जो शोभ रहा है यह मानों ऐसा
लगता है कि सुरतस्थानरूप महानिधिकी रक्षा करनेवाला कोई भुजंग है।
[ 'खट्ठोद्गालि'के वर्णनवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-]
१३. सुरत-संभोगके समय जो संतोषदायक सुंदर सुखानुभव हुआ, उसका विरह होनेसे, हे प्रिय
सखि ! यह खाट चूं चूं ऐसा शब्द कर रही है।
[ 'ताल' का वर्णन करनेवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-]
१४. हे शुक ! तूं इसे चांचके लगाने-ही-से गिर जानेवाला पका हुआ. आम्रफल मत समझ । यह तो
जरठ हो जानेसे बेस्वादवाला और उभडा हुआ तालफल है।
[ दूसरा गाथा-पंचक है उसमें 'कदली वृक्ष', 'विन्ध्य गिरी', 'स्नेहधार' और 'चन्दन वृक्ष' इन ४ वस्तुओंका
अन्योक्तिमय वर्णन है। इसकी आखिरी १० वीं गाथामें कहा गया है कि सालीवाहन राजाने ये गाथायें ९
कोटि (प्रत्यत्तरमें ४ कोडि) देकर ग्रहण कीं। इनका अर्थ क्रमशः इस प्रकार है-]
१५. जो पुरुष, केलके झाडके 'समान, दूसरोंको फल देते हुए अपना विनाशका भी विचार नहीं
करते, उनके सामने मरना भी वाछनीय है ।
१६. जिस तरह विन्ध्याचल पर्वत सदा सरस (हरे भरे) वृक्षोंको धारण करता है वैसे ही शुष्क-
( निकम्मे ) वृक्षोंको भी धारण करता है । उसी तरह बडे पुरुष अपने उत्संगवर्ती-समीपवर्ती निर्गु-
णोंका भी त्याग नहीं करते ।
१७. वे मुज्झार¹ जिन्होंने तृषित होकर प्रथम ही प्रथम जो स्नेहधार (जलधारा) का जैसे तैसे
करके पान किया है वे फिर आजन्म अन्य पानकी इच्छा नहीं करते ।
१८. शुष्क हो जानेपर भी जिस चन्दनके वृक्षका, सब जनोंको आनन्द देनेवाला ऐसा सुरभि गन्ध है
यह जब सरस भाववाला (हरा फूला ) होगा तब तो फिर कैसा ही होगा ।
१ यह 'मुज्झार' क्या वस्तु है इसका अर्थ हमें स्पष्ट नहीं हुआ । यह शब्द भी शुद्ध है या नहीं इसकी हमें शंका है।
कोश वगैरह ग्रंथोंमें यह शब्द हमें नहीं मिला।
१४ ] प्रबंधचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश'
३. शीलव्रतके विषयमें भूयराजका प्रबंध ।
१४) यह प्रबंध इस प्रकार है-कान्यकुब्ज देशमें, जो छत्तीस लाख गाँवोंका प्रगणा है, 'कल्याण
कटक' नामक राजधानीमें भूयराज नामक राजा राज्य कर रहा था। किसी दिन प्रभात कालमें जब कि
वह राजपाटिका करनेके लिये जा रहा था, उस समय खिड़की पर बैठी हुई किसी मृग-नयनीको देखता हुआ
उसका अपहरण करनेके लिये अपने पानीयके अधिकारी पुरुषको आदेश किया। उसने उसे राज-भवनमें लाकर
किसी संकेत स्थलपर रखकर राजाको निवेदन किया। वहाँ आकर राजाने उसका हाथ पकडकर खींचना चाहा
तो इसपर वह राजासे बोली-' स्वामिन्, आप तो सर्व देवताके अवतार हैं; अफसोस कि आपका इस नीच नारीमें
क्यों अभिलाष है?' उसके इस वाक्यसे राजाकी कामाग्नि कुछ शान्त हुई, और वह बोला कि-'तुम कौन हो?'
उसके यह कहनेपर कि 'मैं आपकी दासी हूं'-राजाने कहा कि 'यह बात क्या ठीक कह रही हो?' तो उसने
बताया कि 'आपका दास जो पानीयका अधिकारी है, मैं उसकी स्त्री, और आपकी दासानुदासी हूं?' उसकी
बातसे राजा चकित हुआ और उसकी कामपीडा सर्वथा विलीन हो गयी। उसको अपनी पुत्री मानकर उसे
बिदा किया। उस (स्त्री) के शरीरमें हमारे हाथ लगे हैं, यह सोचकर उनके निग्रह (नष्ट करने) की इच्छासे
रातको यह भ्रान्ति जन्माकर कि खिड़कीके रास्ते कोई प्रवेश कर रहा है, अपने ही पहरेदारोंसे अपने दोनों ही
हाथ कटवा डाले। सबेरे पहरेदारोंको मंत्रीलोग दण्ड देने लगे तो उन्हें रोककर मालवमण्डलमें महाकाल
देवके प्रासाद (मन्दिर) में जाकर उनकी आराधना करता रहा। देवताके आदेशसे जब दोनों भुजायें लग
गईं तो अपने अन्तःपुरके साथ सारा मालवदेश उसी देवको समर्पण कर दिया और परमार [जातिके]
राजपूतोंको उसकी रक्षाके अधिकारी नियुक्त करके स्वयं तापसी दीक्षा ग्रहण की।
—इस प्रकार शीलव्रत विषयक यह भूयराजका प्रबन्ध है ॥ ९ ॥