सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 181 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 24

श्रीमेरुतुङ्गाचार्यविरचित
प्रबन्धचिन्तामणि
॥ ॐ नमः सर्वज्ञाय ॥
श्रीनाभिभूर्जिनः पातु परमेष्ठी भवान्तकृत् । श्रीभारत्योश्चतुर्द्वारमुचितं यच्चतुर्मुखी ॥ १ ॥
नृणामुपलतुल्यानां यस्य द्रावकरः करः । ध्यायामि तं कलावन्तं गुरुं चन्द्रप्रभं प्रभुम् ॥ २ ॥
गुम्फान् विधूय विविधान् सुखेवाधाय धीमताम् । श्रीमेरुतुङ्गस्तद्ग्रथवन्धाद् ग्रन्थं तनोत्यमुम् ॥३॥
रत्नाकरात् सद्गुरुसम्प्रदायात् प्रबन्धचिन्तामणिमुद्दिधीर्षोः ।
श्रीधर्मदेवः शतधोदितेतियुक्तैश्च साहाय्यमिव व्यधत्त ॥ ४ ॥
श्रीगुणचन्द्रगणेशः प्रबन्धचिन्तामणिं नवं ग्रन्थम् ।
भारतमिवाभिरामं प्रथमदर्शोऽत्र दर्शितवान् ॥ ५ ॥
भृशं श्रुतत्वान्न कथाः पुराणाः प्रीणन्ति चेतांसि तथा बुधानाम् ।
वृत्तैस्तदासन्नसतां प्रबन्धचिन्तामणिग्रन्थमहं तनोमि ॥ ६ ॥
बुधैः प्रबन्धाः स्वधियोच्यमाना भवन्त्यवश्यं यदि भिन्नभावाः ।
ग्रन्थे तथाप्यत्र सुसम्प्रदायाद् दृष्टे न चर्चा चतुरैर्विधेया ॥७॥
॥ ॐ सर्वज्ञको नमस्कार हो ॥
जिनकी चतुर्मुखी ( चार मुख ) लक्ष्मी और सरस्वतीका उचित द्वार है, और जो भवका अन्त
करनेवाले हैं ऐसे श्रीनाभिभू, परमेष्ठी जिन ( ऋषभनाथ ) रक्षा करे¹ ॥ १ ॥
उस कलावान् प्रभु चन्द्रप्रभ नामक गुरुका मैं ध्यान करता हूं जिनका कर (= हाथ, किरण )
पत्थरके समान मनुष्योंको भी द्रवित करनेवाला है² ॥ २ ॥
१ इस श्लोकमें ग्रन्थकारने ब्रह्मा और जिनदेव ऋषभनायककी एक साथ स्तुति की है । ब्रह्माके चार मुख होनेसे वे
चतुर्मुख के नामसे प्रसिद्ध हैं । जैन शास्त्रोंमें वर्णन है कि भगवान् ऋषभदेव जब धर्मोपदेश देते थे तब वे भी श्रोताओंको चार
मुखवाले दिखाई देते थे । इस लिये जिन भगवान्‌को भी चतुर्मुखका विशेषण दिया जाता है । ब्रह्मा भी परमेष्ठी पदसे प्रसिद्ध
हैं और जिन भगवान् भी परमेष्ठी कहलाते हैं । ब्रह्मा विष्णुके नाभिकमलसे पैदा हुए ऐसी पुराणोंमें प्रसिद्धि है इस लिये वे
नाभिभू कहे जाते हैं और जिनदेव ऋषभनायकके पिताका नाम नाभिराज था इस लिये ये भी नाभिभू कहे जाते हैं ।
२ इस श्लोकमें ग्रन्थकारने अपने गुरुको नमस्कार किया है जिनका नाम चन्द्रप्रभ था । चन्द्रप्रभ शब्दका श्लेषार्थ करते
हुए गुरुकी तुलना चन्द्रमाके साथ की है । चन्द्रमा अपनी १६ कलाओंके कारण कलान्त कहलाता है, ग्रन्थकारके गुरु भी अनेक
विद्या-कलाओंसे अलङ्कृत होनेके कारण कलावन्त थे । चन्द्रमाके कर याने किरण चन्द्रकान्त मणिको-जो एक प्रकारका पत्थर
ही है-द्रवित ( जलबिन्दु युक्त ) करते हैं; वैसे ही चन्द्रप्रभ गुरुके कर याने हाथ यदि पत्थरतुल्य मनुष्यके मस्तिष्क ऊपर भी पड़ते
हैं तो उसको भी ये द्रवित ( आर्द्र,-कोमलचित्त ) बनाते हैं ।