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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

"? It has "वातकी"!
Let's check L27: "वचा रखनेका है" -> "वचा रखनेका"!
Look at L28: "वड़ी प्रतिष्ठा थी" -> "वड़ी"!
Look at L30: "वतलानेके लिये" -> "वतलानेके"!
Look at L31: "वड़ी सख्त कुश्ती" -> "वड़ी"!
Yes! The text literally uses 'व' everywhere:
"वात", "वतलानेकी", "वचा", "वड़ी", "सव"!
Wait, look at L17:
"वतलानेकी दृष्टिसे, बहुत कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण कथन किया है; और उसके साथ अन्य धर्मकी - खास करके"
Wait, does it say "वतलानेकी" or "बतलानेकी"? It has 'व'!
Wait, let's look at "बहुत" in L17:
Wait, is "बहुत" with 'व'? "वहुत"!
Look at L14: "भी वहुत आधारभूत" -> YES! It is "वहुत"!
Look at L8: "वहुश्रुत" (L6)!
Look at L6:
"ग्रन्थके अन्तमें वे, इस रचनाके करनेमें एक दूसरा भी कारण वतलाते हुए लिखते हैं कि—"वहुश्रुत और"
"गुणवान् ऐसे वृद्धजनोंकी प्राप्ति प्रायः दुर्लभ हो रही है..."
Yes! It is "वहुश्रुत" in L6!