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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

६२४ फलदीपिका
स्वात्मजान्त्यमृतिबन्धुधर्मगे
विध्यते न विबुधैर्यदि ग्रहैः ॥४॥
चन्द्रमा के शुभ गोचर स्थान १, ३, ६, ७, १०, ११,
वेध स्थान ५, ९, १२, २, ४, ८
विक्रमायरिपुगः कुजः शुभः
स्यात्तदान्त्यसुतधर्मगैः खगैः ।
चेन्न विद्ध इनसूनुरप्यसौ
किन्तु धर्मघृणिना न विध्यते ॥५॥
मंगल के शुभ गोचर स्थान ३, ६, ११
वेध स्थान १२, ९, ५
ऊपर जो श्लोक ३ से—और आगे के श्लोकों में जो शुभ गोचर
स्थान लिखे गये हैं—वहाँ तीसरे का बारहवाँ, छठे का नवाँ, ग्यारहवें
का पाँचवाँ. इस प्रकार समझना चाहिये । यदि गोचर में मंगल तृतीय
में है तो जन्म राशि से द्वादश कोई ग्रह होगा तभी वेध समझना ।
गोचर में मंगल तृतीय में हो और जन्म राशि से ९वें या ५वें कोई
ग्रह हो तो तृतीय मंगल का कोई वेध नहीं होगा । यदि गोचर में छठे
मंगल हो और नवें कोई अन्य ग्रह गोचर से हो (गोचर विचार के समय
जन्म कुंडली में नहीं) तो वेध होगा । गोचर से एकादश मंगल हो
और गोचर से ५वें (जन्म राशि से ५वें) कोई ग्रह हो तो मंगल का
वेध होने के कारण शुभ फल नहीं होगा ।
जो मंगल के शुभ गोचर स्थान हैं वही शनि के हैं :
शनि के शुभ गोचर स्थान ३, ६, ११
वेध स्थान १२, ९, ५

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६२५
अन्तर केवल यह है कि सूर्य, चन्द्र, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि,
राहु, केतु, यह सब मंगल का वेध करते हैं किन्तु सूर्य शनि का पिता
होने के कारण, शनि का वेध नहीं करता। केवल चन्द्र, मंगल, बुध,
बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, शनि का वेध करते हैं।
स्वाम्बुशत्रुमृतिकायगः शुभो
ज्ञस्तदा न खलु विध्यते सदा ।
स्वात्मजत्रितप आद्यनैधन
प्राप्तिगैर्विबुधभिर्यदि ग्रहैः ॥६॥
बुध के शुभ गोचर स्थान २, ४, ६, ८, १०, ११
वेध स्थान ५, ३, ९, १, ८, १२
स्वायधर्मतनयास्तसंस्थितो नाकनायकपुरोहितः शुभः।
रिःफरन्ध्रखजलत्रिगैर्यदा विध्यते गगनचारिभिर्न हि ॥७॥
बृहस्पति के शुभ गोचर स्थान २, ५, ७, ९, ११
वेध स्थान १२, ४, ३, १०, ८
आसुताष्टमतपोव्ययायगो विद्ध आस्फुजिदशोभनः स्मृतः।
नैधनास्ततनुकर्मधर्मधीलाभवैरिसहजस्थखेचरैः ॥८॥
शुक्र के शुभ गोचर स्थान १, २, ३, ४, ५, ८, ९, ११, १२
वेध स्थान ८, ७, १, १०, ९, ५, ११, ३, ६
जन्मन्यायासदाता क्षपयति विभवान् क्रोधरोगाध्वदाता
वित्तभ्रंशं द्वितीये दिशति न सुखदो वञ्चनामाग्रहं च ।

६२६ फलदीपिका
स्थानप्राप्तिं तृतीये धननिचयमुदाकल्यकृच्छ्रारिहन्ता
रोगान् दत्ते चतुर्थे जनयति च मुहुः स्रग्धराभोगविघ्नम् ॥६॥
वित्तक्षोभं सुतस्थो वितरति बहुशो रोगमोहादिदाता
षष्ठेऽर्को हन्ति रोगान् क्षपयति च रिपूञ्छोकमोहान्प्रमार्ष्टि ।
अध्वानं सप्तमस्थो जठरगुदभयं दैन्यभावं च तस्मै
रुक्त्रासावष्टमस्थः कलयति कलहं राजभीतिं च तापम् ॥१०॥
अब सूर्य, जन्म राशि से गिनने पर—गोचर वश प्रत्येक स्थान में
क्या-क्या फल उत्पन्न करता है, यह बताते हैं । उदाहरण के लिये जन्म
कुंडली में वृष राशि में चन्द्रमा है तो सूर्य जब वृष राशि में होगा
तो प्रथम स्थान में हुआ; मिथुन में जब सूर्य हुआ तो द्वितीय सूर्य
हुआ, इस प्रकार प्रथम, द्वितीय आदि गिनना चाहिये । सूर्य भिन्न-
भिन्न स्थानों में क्या फल करता है यह बताते हैं :—(१) परिश्रम
कराता है, धन खर्च होता है जातक क्रोध

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६२७
अनुभव हो। (८) रोग, भय उत्पन्न करे, मन में ताप (चिन्ता) कलह
(लड़ाई, झगड़ा, विवाद), राजा या सरकार, अधिकारी वर्ग से भय,
उनकी नाराज़गी का अन्देशा हो। (९) आपत्ति, दीनता, अपने प्रिय
लोगों से विरह, जो उद्योग किये जावें उनमें असफलता। (१०) जिस
कार्य की सिद्धि के लिये काम कर रहे हों उसमें सफलता—कोई बड़ा
कार्य उठाया गया हो तो वह पूरा हो। (११) स्थान प्राप्ति, सम्मान
वृद्धि, द्रव्य लाभ, रोग से छुटकारा, आर्थिक शारीरिक स्वास्थ्य।
(१२) क्लेश, धन की बर्बादी, ज्वर आदि रोग, दोस्त दुश्मनी
करें ॥ ११ ॥
आपद्धैन्यं तपसि विरहं चित्तचेष्टानिरोधं
प्राप्नोत्युग्रां दशमगृहगे कर्मसिद्धिं दिनेशे ।
स्थानं मानं विभवमपि चैकादशे रोगनाशं
क्लेशं वित्तक्षयमपि सुहृद्वैरमन्त्ये ज्वरं च ॥११॥
यह क्रम से बारहौं स्थानों में गोचरवश सूर्य का फल कहा गया है।
प्रति वर्ष प्रायः निम्नलिखित तारीखों को सूर्य एक राशि से
दूसरी राशि में प्रवेश करता है और प्रत्येक राशि में करीब एक महीना
रहता है :
सूर्य की राशि प्रवेश की अंग्रेज़ी तारीखें
मेष प्रवेश १३ या १४ अप्रैल
वृष " १४ या १५ मई
मिथुन " १५ जून
कर्क " १६ या १७ जुलाई
सिंह " १६ या १७ अगस्त

६२८ फलदीपिका
कन्या प्रवेश १७ सितम्बर
तुला " १७ अक्तूबर
वृश्चिक " १५-१६ नवम्बर
धनु " १६ दिसम्बर
मकर " १३ या १४ जनवरी
कुंभ " १२ फरवरी
मीन " १४ मार्च
ऊपर जो तारीखें बताई गई हैं वह स्थूल (मोटा-मोटी) सूर्य
संक्रान्ति (सूर्य जब एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण करता है—
जाता है) की अंग्रेज़ी तारीखें हैं। कभी फरवरी के २८ दिन हो जाते
हैं कभी २९ । इस कारण एकाध दिन का अन्तर पड़ जाता है—
इससे अधिक नहीं ।
अब प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन की पिछली घटनाओं को विचार
में लाकर यह देख सकता है कि उसके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएँ
किस महीने (यहाँ महीना सूर्य प्रवेश राशि का गिनना चाहिये १५ ता०
से १५ ता० तक, पहली तारीख से ३० या ३१ तारीख तक नहीं)
में अधिक होती हैं । यह प्रत्यक्ष है कि जीवन के सब वर्ष एक से
नहीं जाते—और सब महीने प्रति वर्ष एक से नहीं जाते क्योंकि सूर्य
गोचर ही तो सब कुछ नहीं है— अन्य ग्रहों का भी गोचर होता
है—महादशा, अन्तर्दशा भी अच्छी या ख़राब बदलती रहती है ।
सूर्य संक्रान्तिवश सूर्य गोचर विचार
सूर्य गोचर विचार के सिलसिले में हम एक नई बात पाठकों के
सामने रखते हैं । यह मन्त्रेश्वर ने नहीं लिखी है । अन्य स्थानों से
ली गई हैं।
(१) जिस दिन—जिस समय सूर्य संक्रान्ति हो अर्थात् सूर्य एक

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६२९
राशि से दूसरी राशि में जावे शुद्ध पंचांग में यह देखिये कि जितने
घंटे, मिनट पर (जितने बजे) या जितने घड़ी पल भर सूर्य पिछली
राशि छोड़ कर आगे की राशि में प्रवेश कर रहे हैं—उस समय
चन्द्रमा, किस नक्षत्र में है। जिस नक्षत्र में चन्द्रमा उस समय हो
उस नक्षत्र से पहले वाला नक्षत्र एक कागज़ पर नोट कर लीजिये।
उदाहरण के लिये जब सूर्य की संक्रान्ति हो रही है उस समय ज्येष्ठा
नक्षत्र है तो ज्येष्ठा से पहला अनुराधा आप कागज़ पर नोट करें।
यदि मान लीजिये सूर्य संक्रान्ति के समय चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र में है तो
पुष्य से पहला 'पुनर्वसु' नक्षत्र कागज़ पर नोट कीजिये।
अब इस कागज़ पर नोट किये हुए नक्षत्र से गणना प्रारम्भ
कीजिये और जन्म नक्षत्र तक—(जिस नक्षत्र में—जिस व्यक्ति का
आप विचार कर रहे हैं—उसका जन्म के समय चन्द्रमा था)
गिनिये।
उदाहरण के लिये किसी व्यक्ति के जन्म के समय भरणी नक्षत्र
था (अर्थात् उसके जन्म के समय चन्द्रमा भरणी नक्षत्र में था)
और आपको यह विचार करना है कि इस मास में (सूर्य जिस
राशि में एक मास रहेगा) सूर्य गोचर से कैसा फल करेगा तो उस
सूर्य संक्रान्ति के समय चन्द्रमा मान लीजिये ज्येष्ठा में था तो आपने
ज्येष्ठा से पहला नक्षत्र अनुराधा कागज़ पर नोट किया है तो अनुराधा
से भरणी (जन्म नक्षत्र) तक गिनिये। अनुराधा १, ज्येष्ठा २, मूल,
३, पूर्वाषाढ़ ४, उत्तराषाढ़ ५, श्रवण ६, धनिष्ठा ७, शतभिषा ८,
पूर्वाभाद्र ९, उत्तराभाद्र १०, रेवती ११, अश्विनी १२, भरणी १३,
इस प्रकार १३ संख्या आई। इस संख्या के अनुसार उस मास में
(१५ ता० से १५ तक) निम्नलिखित फल होगा।
(क) यदि संख्या १, २, ३ इनमें से कोई हो तो—यात्रा, सफ़र
या रास्ता चलना पड़े।

६३० फलदीपिका।
(ख) यदि संख्या ४, ५, ६, ७, ८, ९, इनमें से कोई हो तो
भोग ।
(ग) यदि संख्या १०, ११, १२ इनमें से कोई हो तो 'व्यथा'
अर्थात् कष्ट ।
(घ) यदि संख्या १३, १४, १५, १६, १७, १८ इनमें से कोई हो
तो नवीन वस्त्र की प्राप्ति ।
(ङ) यदि संख्या १९, २०, २१ इनमें से कोई हो तो "हानि" ।
(च) यदि संख्या २२, २३, २४, २५, २६, २७ इनमें से कोई
हो तो विपुल धन की प्राप्ति ।
क्रमेण भाग्योदयमर्थहानिं जयं भयं शोकमरोगतां च ।
सुखान्यनिष्टं गदमिष्टसिद्धिं मोदं व्ययं च प्रददाति चन्द्रः ॥१२॥
चन्द्र
जन्मकालीन चन्द्र राशि से जब गोचर से चन्द्रमा विविध
राशियों में आता है तो क्रमशः निम्नलिखित फल होते हैं :—
(१) भाग्योदय (२) धनहानि (३) जय (४) भय (५) शोक
(६) अरोगता (७) सुख (८) अनिष्ट फल (९) रोग (१०) इष्ट-
सिद्धि—कार्य में सफलता (११) प्रसन्नता (१२) व्यय ।
जन्मकालीन चन्द्र राशि में हो तो भाग्योदय । द्वितीय में हो
तो धनहानि, तृतीय में जय, जन्मकालीन चन्द्र राशि से चौथी
राशि में गोचर से चन्द्र आये तब भय—इसी प्रकार सर्वत्र समझना
चाहिये ॥ १२ ॥
अन्तः शोकं स्वजनविरहं रक्तपित्तोष्णरोगं
लग्ने वित्ते भयमपि गिरां दोषमर्थक्षयं च ।

छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६३१
धैर्ये भौमो जनयति जयं स्वर्णाभूषांप्रमोदं
स्थानभ्रंशं रुजमुदरजां बन्धुदुःखं चतुर्थे ॥१३॥
ज्वरमनुचितचिन्तां पुत्रहेतुव्यथां वा
कलयति कलहं स्वैः पञ्चमे भूमिपुत्रः ।
रिपुकलहनिवृत्तिं रोगशान्तिं च षष्ठे
विजयमथ धनाप्तिं सर्वकार्यानुकूल्यम् ॥१४॥
कलत्रकलहाक्षिरुग्जठररोगकृत्सप्तमे
ज्वरक्षतजरूक्षितो विगतवित्तमानोऽष्टमे ।
कुजे नवमसंस्थिते परिभवोऽर्थनाशादिभि-
र्विलम्बितगतिर्भवत्यबलदेहधातुक्षयैः ॥१५॥
दुश्चेष्टा वा कर्मविघ्नः श्रमः खे
द्रव्यारोग्यक्षेत्रवृद्धिश्च लाभे ।
भौमः खेटो गोचरे द्वादशस्थो
द्रव्यच्छेदस्ताप उष्णमयाद्यैः ॥१६॥
मंगल
अब मंगल का गोचर फल बताते हैं। जन्मकालीन चन्द्र राशि
से गिनने पर जिस राशि में गोचर से मंगल हो उसके अनुसार
निम्नलिखित फल होते हैं।
(१) अन्तःशोक—मन का भीतर ही भीतर किसी कारण से
शोकाकुल या चिन्तायुक्त होना. अपने कुटुम्बियों से वियोग, रक्त सम्बन्धी
रोग या पित्त जनित पीड़ा, ज्वर या अन्य उष्णता पैदा करने वाले
रोग ।

६३२ फलदीपिका
(२) भय, धनहानि वाक् पारुष्य (कठोर वाणी, झगड़ा)।
(३) जय, सफलता, धन प्राप्ति, आनन्द।
(४) स्थान भ्रंशता (जगह या नौकरी छूट जाय), रोग, पेट
की बीमारी, तथा बन्धुओं के कारण दुःख।
(५) ज्वर, बिना कारण चिन्ता, सन्तति कष्ट, उद्वेग, अपने
लोगों से कलह।
(६) शत्रुओं से कलह की निवृत्ति (उन पर विजय हो जाये या
उनसे समझौता हो जाये) रोग शान्ति, विजय, धन प्राप्ति तथा सब
कामों में अनुकूलता (सफलता)।
(७) अपनी स्त्री से कलह, नेत्र रोग, उदर रोग।
(८) ज्वर, चोट या घाव से पीड़ा, धन नाश, मान नाश।
(९) दीनता या पराजय, अर्थनाश, शरीर में निर्बलता, विलम्ब
से चलना आदि अशक्तता के लक्षण, धातु क्षय, आदि।
(१०) कार्य में असफलता या विघ्न, परिश्रम, दुश्चेष्टा (ऐसा
कार्य जो नहीं करना चाहिये अथवा जो कार्य किया जाय उससे हानि)
(११) द्रव्य लाभ, आरोग्य, जमीन जायदाद में लाभ आदि
शुभ फल।
(१२) धन नाश उष्णता या ताप से विविध रोग, चिन्ता,
उद्वेग आदि॥ १३-१६॥
वित्तक्षयं श्रियमरातिभयं धनाप्तिं
भार्यातनूजकलहं विजयं विरोधम् ।
पुत्रार्थलाभमथ विघ्नमशेषसौख्यं
पुष्टिं पराभवभयं प्रकरोति चान्द्रिः ॥१७॥
जन्मकालीन चन्द्र राशि से बुध के गोचर वश बारह राशियों के
भ्रमण का फल क्रमशः निम्नलिखित है।

छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६३३
(१) धन हानि (२) धन लाभ (३) शत्रुओं से भय (४)
धन प्राप्ति (५) अपने स्त्री पुत्रों से कलह (६) विजय (७)
विरोध, झगड़ा (८) पुत्र से खुशी, धन लाभ (९) विघ्न (१०)
सब प्रकार से सुख (११) धनवृद्धि लाभ (१२) पराजय-
दीनता ॥१७॥
जीवे जन्मनि देशनिर्गमनमप्यर्थच्युतिं शत्रुतां
प्राप्नोति द्रविणं कुटुम्बसुखमप्यर्थे स्ववाचां फलम् ।
दुश्चिक्ये स्थितिनाशमिष्टवियुतिं कार्यान्तरायं रुजं
दुःखैर्बन्धुजनोद्भवैश्च हिबुके दैन्यं चतुष्पाद्भयम् ॥१८॥
पुत्रोत्पत्तिमुपैति सज्जनयुतिं राजानुकूल्यं सुते
षष्ठे मन्त्रिणि पीडयन्ति रिपवः स्वज्ञातयो व्याधयः ।
यात्रां शोभनहेतवे वनितया सौख्यं सुताप्तिं स्मरे
मार्गक्लेशमरिष्टमष्टमगते नष्टं धनैः कष्टताम् ॥१९॥
भाग्ये जीवे सर्वसौभाग्यसिद्धिः
कर्मण्यर्थस्थानपुत्रादिपीडा ।
लाभे पुत्रस्थानमानादिलाभो
रिःफे दुःखं साध्वसं द्रव्यहेतोः ॥२०॥
बृहस्पति
गोचर वश बृहस्पति के बारह राशियों के भ्रमण का फल निम्न-
लिखित है । जन्मकालीन चन्द्र राशि में जब बृहस्पति हो तो प्रथम

६३४ फलदीपिका

राशि और उसके बाद की राशियों को द्वितीय, तृतीय इस प्रकार
गणना करनी चाहिए । (१) देश या अपने स्थान से बाहर जाना, धन का
अत्यन्त व्यय या नाश, शत्रुता आदि अनिष्ट फल । (२) धन प्राप्ति,
कुटुम्ब सुख, अपनी वाणी का इष्टफल, उसकी बात को लोग ध्यान से
सुनें या अपनी वाणी द्वारा धन प्राप्त हो । (३) स्थिति नाश—
जगह छूटे या स्थान छूटे या आर्थिक या सामाजिक स्थिति में
अंतर आये, अपने इष्ट जनों से वियोग, कार्य में विघ्न, रोग आदि
दुष्ट फल (४) बन्धुओं से दुःख दीनता, चौपायों से भय ।
(५) पुत्र की उत्पत्ति, सन्तान सुख, सज्जनों से समागम, राजा की
कृपा आदि शुभ फल । (६) अपने दायादों (चचेरे भाई आदि) तथा
शत्रुओं से पीड़ा, रोग आदि अशुभ फल । (७) किसी शुभ कार्य
से यात्रा, अपनी स्त्री से सुख, पुत्र प्राप्ति आदि शुभ फल । (८) मार्ग
क्लेश—व्यर्थ यात्रा से परिश्रम, अशुभ फल, धन नाश, विविध प्रकार
के कष्ट । (९) सर्वसौभाग्य, सिद्धि—भाग्योदय, कार्य में सफलता
आदि शुभ फल । (१०) धन कष्ट, स्थान कष्ट (नौकरी या
ओहदे में कमी या सम्मान में कोई बट्टा । संतान पीड़ा आदि
अशुभ फल । (११) पुत्र लाभ, स्थान लाभ (नयी जगह या ओहदा
मिले या अपनी जगह में ही इज्जत बढ़े), सम्मान वृद्धि आदि शुभ
फल । (१२) द्रव्य सम्बन्धी दुःख, भय, चिन्ता उद्वेग आदि अशुभ
फल ॥ १८-२० ॥
अखिलविषयभोगं वित्तसिद्धिं विभूतिं
सुखसुहृदभिवृद्धिं पुत्रलब्धिं विपत्तिम् ।
दिशति युवतिपीडां सम्पदं वा सुखाप्तिं
कलहमभयमर्थप्राप्तिमिन्द्रारिमन्त्री ॥ २१ ॥
शुक्र
शुक्र का गोचर फल निम्नलिखित है ।
(१) सब प्रकार का भोग । (२) धनागम । (३) धन वृद्धि—

सुन्दर उपकरण आदि का लाभ । (४) सुख, मित्रों में वृद्धि । (५)
पुत्र प्राप्ति, सन्तान सुख(६) विपत्ति, कष्ट । (७) स्त्री के कारण
पीड़ा । (८) सम्पत्ति । (९) सुख प्राप्ति । (१०) कलह ।(११)
भय । (१२) अर्थप्राप्ति आदि शुभ फल ।
यह सब स्थानों के फल जन्मकालीन चन्द्र राशि से गिनना
चाहिए। उदाहरण के लिए किसी की जन्म कुण्डली में कर्क राशि में
चन्द्रमा है और जिस समय शुभाशुभ विचार किया जा रहा हो गोचर
से शुक्र कुम्भ राशि में हो तो कर्क राशि से कुम्भ अष्टम होने के
कारण उपर्युक्त अष्टम स्थान का फल शुक्र करेगा ॥ २१ ॥
रोगाशौचक्रियाप्तिं धनसुतविहतिं स्थानभृत्यार्थलाभं
स्त्रीबन्ध्वर्थप्रणाशं द्रविणसुतमतिप्रच्युतिं सर्वसौख्यम् ।
स्त्रीरोगाध्वावभोतिं स्वसुतपशुसुहृद्वित्तनाशमयातिं
जन्मादेरष्टमान्तं दिशति पदवशेनार्कसूनुः क्रमेण ॥ २२ ॥
दारिघ्रं धर्मविघ्नं पितृसमविलयं नित्यदुःखं शुभस्थे
दुर्व्यापारप्रवृत्तिं कलयति दशमे मानभङ्गं रुजं वा ।
सौख्यान्येकादशस्थो बहुविधविभवप्राप्तिमुत्कृष्टकीर्तिं
विश्रान्तिं व्यर्थकार्याद्द्विसुहृतिमरभिः स्त्रीसुतव्याधिमन्त्ये ॥२३॥
शनि
जब जन्मकालीन चन्द्र राशि में ही गोचर से शनि भ्रमण कर
रहे हों तो रोग, किसी की मृत्यु के कारण आशौच आदि अशुभ फल
होता है । जन्म राशि से द्वितीय में शनि हो तो संतान कष्ट, धन
नाश आदि अशुभ फल होते हैं। गोचर से तृतीय शनि हो तो स्थान

६३६ फलदीपिका
लाभ (नयी जगह या नौकरी की प्राप्ति) या रोज़गार, अपनी हुकूमत,
बहुत से नौकरों का होना, धन लाभ आदि शुभ फल होते हैं। चौथे
शनि अशुभ फलकारक है—धन नाश, स्त्री नाश (या स्त्री से कलह)
बन्धुओं से या उनके कारण कष्ट आदि। जन्म राशि से पंचम शनि हो
तो धन की कमी हो या घाटा लगे। सन्तान कष्ट; बुद्धिनाश (मन
में शांति न रहे, नाना प्रकार की चिन्ताओं तथा उद्वेगों से अशांति
रहे)। जन्म राशि से गोचर वश शनि छठे हो तो शुभ फल देता है।
सब प्रकार का सुख, शत्रुओं पर विजय आदि—शुभ फल होते हैं।
सप्तम शनि पीड़ाकारक होता है—स्त्री कष्ट (स्त्री को रोग या
उससे कलह) अनेक प्रकार का भय, व्यर्थ की कष्टप्रद यात्राएँ आदि।
जन्मकालीन चन्द्र राशि से गोचरवश शनि अष्टम आवे तो भी पूर्ण
अशुभ फल देता है। संतान नाश या कष्ट, पशु, मित्र, धन, आदि के
कारण घोर पीड़ा। मित्र नष्ट हो जायें, पशु मर जायें, धन की
विशेष हानि हो। मनुष्य को स्वास्थ सम्बन्धी भी चिन्ता उपस्थित
होती है। किसी पीड़ाकारक रोग के कारण विशेष शरीर कष्ट हो।
जब गोचर से नवें शनि हो तो दरिद्रता कारक होता है। धर्म कार्य
में विघ्न उपस्थित होते हैं। पिता के समान किसी श्रेष्ठ व्यक्ति की
(गुरु, चाचा, मामा आदि की मृत्यु होती है और कुछ न कुछ दुःख का
कारण बना रहता है। जन्म राशि से दशम शनि हो तो सम्मान भंग
(इज़्ज़त में बट्टा लगे) कोई विशेष पीड़ा कारक रोग हो और किसी
ऐसे व्यापार (कार्य) में प्रवृत्ति हो जिसमें असफलता हो और घाटा
लगे या ऐसा दुष्ट कर्म बन आवे जिसके कारण अप्रतिष्ठा हो। एकादश
स्थान में (जन्म कालीन चन्द्र राशि से एकादश राशि में) जब शनि
भ्रमण करे तो शुभ फलकारक होता है। सब प्रकार के सुख, बहुत
प्रकार के वैभव, उत्कृष्ट कीर्ति आदि शुभ फल होते हैं। जब बारहवें
शनि हो तो वृथा कार्यों में लगे रहने के कारण व्यर्थ का परिश्रम

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६३७
होता है अर्थात् उद्योग सिद्धि या सफलता न मिलने के कारण केवल
कष्ट प्राप्ति होती है । शत्रुओं द्वारा धन नाश, स्त्री और पुत्रों को रोग
पीड़ा होती है ॥२२, २३॥
देहक्षयं वित्तविनाशसौख्ये
दुःखार्थनाशौ सुखनाशमृत्यून् ।
हानिं च लाभं सुभगं व्ययं च
कुर्यात्तमो जन्मगृहात्क्रमेण ॥ २४ ॥
राहु
जन्मकालीन चन्द्र राशि से बारह राशियों में राहु का फल निम्न-
लिखित है ।
(१) बीमारी, शारीरक शक्ति का क्षय । (२) धन नाश ।
(३) सुख । (४) दुःख । (५)धन नाश ।(६) सुख । (७) नाश ।
(८) मृत्यु तुल्य कष्ट । (९) हानि । (१०) लाभ । (११)
सौभाग्य । (१२) व्यय । ॥२४॥
क्षितितनयपतङ्गौ राशिपूर्वत्रिभागे
सुरपतिगुरुशुक्रौ राशिमध्यत्रिभागे ।
तुहिनकिरणमन्दौ राशिपाश्चात्यभागे
शशितनयभुजङ्गौ पाकदो सार्वकालम् ॥२५॥
ग्रहों के विशेष प्रभाव का काल
सूर्य और मंगल गोचर वश जब किसी राशि में प्रवेश करते हैं
तब प्रवेश करते ही अपना प्रभाव दिखाते हैं । एक राशि में ३०
अंश होते हैं—राशि के प्रथम तृतीयांश में इनका विशेष ज़ोर रहता
है । बृहस्पति और शुक्र राशि के मध्य भाग में अर्थात् दस अंश

६३८ फलदीपिका
से बीस अंश तक विशेष प्रभाव या फल उत्पन्न करते हैं। चन्द्रमा
और शनि राशि के अन्तिम तृतीयांश अर्थात् २० अंश से ३० अंश तक
विशेष फल दिखाते हैं। बुध और राहु सारी राशि में अर्थात् एक अंश
से तीस अंश तक सर्वत्र एक सा फल दिखाते हैं ॥२५॥
टिप्पणी—मुहूर्त्त चिंतामणि तथा अन्य कई ग्रंथों में शंका
उठाई है कि वेध कारक ग्रह की गणना जन्मकालीन चन्द्र राशि से
करना या गोचर द्वारा जिस ग्रह का विचार किया जा रहा है उससे
करना। विपरीत-वेध का भी विचार किया है। किंतु इस छोटी सी
पुस्तक में नारद कश्यप आदि ऋषि प्रणीत विभिन्न आदेशों
का परस्पर सामंजस्य करना संभव नहीं है। जो शास्त्रार्थ की
जटिलता में विशेष अभिरुचि रखते हों वे संस्कृत की सम्बन्धित पुस्तकों
का अवलोकन कर सकते हैं।

छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६३९

अथ मतान्तरेण रव्यादिग्रहाणां जन्मभाद्गोचरफलवेधयोर्ज्ञानाय चक्रम् ।

श्रीसूर्यःचन्द्रःभौमःबुधःबृहस्पतिःशुक्रःशनिःराहुःकेतुः
१स्थाननाशः<br>पन्थापुष्टिः<br>अन्नलाभःभयम्पी-<br>डाचबंधनं<br>भयम्अरिष्टादि<br>भयसुख<br>शत्रुनाशसर्वनाश<br>पीडामयहानि<br>कष्टहानि<br>रोगभय
२हानिः<br>भयम्धनलाभः<br>सुखम्धननाशः<br>नेत्रातिःधनलाभःधनादि-<br>लाभसुखम्<br>अर्थलाभःशोकः<br>धनहानिःनैस्वं<br>व्ययञ्चवैरं<br>वित्तनाशः
३सुखं<br>श्रियाप्तिःद्रव्याप्तिः<br>सुखम्सुखं<br>श्रीप्राप्तिःशत्रुतौ<br>भयम्भय<br>रोगाप्तिसुखम्<br>अर्थलाभःसुखार्थलाभःनैरुज्यं<br>च नृप्रप्तिःसुखलाभ<br>वृद्धि
४रोगभयं<br>माननाशःरोगदाना-<br>र्थनाशःकष्टं<br>शत्रुभीतिःधन सुखा-<br>दिप्राप्तिःधनहानि<br>व्ययम्धनागमःपीडाभयं<br>शत्रुवृद्धिःवैरं<br>शोकश्चैवभीति<br>पीड़ा
५दैन्यं<br>अर्थनाशःसुखं<br>कार्यनाशःदृग्भयं<br>धननाशःरुक्-<br>शोकश्चलाभः<br>सुखं चलाभः<br>पुत्रलाभःधनपुत्रयो-<br>र्नाशःहानिः<br>शोकश्चशोक<br>अर्थनाश
६रिपुनाशः<br>सुखंवित्तलाभःसुखार्थ-<br>लाभःअलाभः<br>स्थितिःरोगः<br>शोकश्चशत्रुवृद्धिः<br>पीडा चसुखं<br>वित्तलाभःसुखं लक्ष्मी<br>प्राप्तिःसुखम्<br>वित्तद्
७गमनं<br>धनहानिःद्रव्यप्राप्ति<br>सुखम्कार्यम्<br>धननाशःपीडामय<br>विग्रहःसम्मानं<br>सुखं चशोकः<br>अतिभयम्दोषः<br>पीडामयम्हानिः<br>कलहःदुर्गति<br>पीड़ाच

६४० फलदीपिका

श्रीसूर्यःचन्द्रःभौमःबुधःबृहस्पतिःशुक्रःशनिःराहुःकेतुः
८रोगाप्तिः भयम्क्लेशभयं मृत्युःभयं पाप बुद्धिःधनावाप्ति हानिःमृत्युभय पीड़ा चविपत्तिः धनक्षयःपीड़ाभयम् शत्रुवृद्धिःरुग्भयं सुखं चपीड़ाभयं हानिश्च
९कान्तिक्षयः पापबुद्धिःमानं नृपभयम्रुग्भयम्रुग्भयं धननाशःसुखं सम्मानम्सुखं लाभःपापः धननाशःपापकर्म रतिःपापं दैन्यञ्च
१०सौख्यं कर्मसिद्धिःशुभं सुखम्सुखं शोकश्चसुखं सुभोगःअति-दैन्यम्धर्मनाशः असुखम्वैमनस्यम्वैरं सुखम्भयं शोकश्च
११वित्ताप्तिः सुखम्विविधार्थ लाभःलाभः सुखाप्तिःशुभम-र्थागमःसौख्यं धनप्राप्तिःदुःखं धनागमःसुखवित्त-लाभःसुखं वित्तप्राप्तिसुयशो-ऽर्थलाभः
१२द्रव्यनाशः पीड़ाभयंरोगो धननाशःरोगश्शो-कश्चशोकः धननाशःदेहपीडा भयधनागमःक्लेश अनर्थश्चहानिः पीड़ा चपीड़ा वैरञ्च
शु.३।११ ६।१०।७।६।१०। १।३।११।३।६। ११२।४। ६।८। १०।११५।२।९ ।७।१११।२।३ ४।५।८ ९।१२।११६।११ ।३।३।११ ६३।६ ११
वे.९।५। १२।४। शनिवर्जितः२।१२।४ ५।९।८ बुधवर्जितः१२।९ ।५।५।३।९। ४।८।१२ चंद्रवर्जितः४।१२ १०।३ ८।८।७।१ १०।१२।५ ११।६।३९।५। १२ रविवर्जितः१२।५ ९ ।१२।९ ।५।

छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६४१
गोचरफलचक्रम्

सूर्यचन्द्रःभौमःबुधःगुरुःशुक्रःश.रा.के.ग्रहाः
३।६। १०।११॥१।२।३।५।६। ७।९।१०।११३।६ १०।११२।६ १०।११२।५।७ १२।१११।२।३ १२।११३।६।१० ।११।उत्तम
१।२।५ ७।९+ +१।२।५ ७।९१।३।५ ७।९१।३।६ ११।१०॥५।६। ७।१०१।२।५ ।७।९।अरिष्टकारक
४।८।१२४।८।१२४।८।१२४।८।१२४।८।१२४।८।१२४।८।१२विशेष अनिष्ट
प्रायः गोचर वश जो फल ऊपर दिये गये हैं वही वराहमिहिर आदि अन्य आचार्यों ने दिये हैं।
इस कारण पिष्टपेषण नहीं किया जाता है। विद्वानों ने गोचर-विचार का एक चक्र प्रस्तुत किया है, वह
साथ में दिया गया है। इस प्रसंग में ही मंत्रेश्वर ने नक्षत्र-गोचर का भी विचार किया है और कब ग्रह
गोचर द्वारा फल कम करते हैं—कब अधिक इसका विचार भी किया है। वह आगे दिया जाता है :

६४२ फलदीपिका
नक्षत्र गोचर
सात रेखायें आडी खींचिये और सात रेखायें इन आड़ी रेखाओं
को काटती हुई खड़ी खींचिए । अब पूर्वोत्तर दिशा से प्रारम्भ कर
जैसा चित्र में दिखाया गया है, क्रमशः कृत्तिका आदि अट्ठाइस
(अभिजित् सहित) नक्षत्रों के नाम लिखिए।
उत्तर
धनिष्ठा शतभिषा पू०भा उ०भा० रेवती अश्विनी भा मी
श्रवण कृत्तिका
अभिजित् रोहिणी
उ०षा मृगशीर
पू०षा० आर्द्र :
मूल पुनर्वसु
ज्येष्ठा पुष्य
अनुराधा आश्लेषा
विशाखा स्वाती चित्रा हस्त उ०फा पू०फा मघा
दक्षिण

छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६४३
रेखाः सप्तसमालिखेदुपरीगास्तिर्यक्तथैव क्रमा-
द्दीशादग्निभमादितोऽपि गणयेदादित्यभस्यावधि ।
वेधा जन्मदिने मृतिर्भयमथाधानाख्यनक्षत्रे
कर्मण्यर्थविनाशनं खलु रविर्दद्यात्सपापो मृतिम् ॥२६॥
सूर्य जिस नक्षत्र में गोचर से हो उसका यदि जन्मकालीन चन्द्र
नक्षत्र से वेध होता हो तो प्राण भय होता है । यदि आधान नक्षत्र
(जन्म नक्षत्र से उन्नीसवाँ नक्षत्र) का वेध होता हो तो भय और
चिंता होगी । यदि कर्म नक्षत्र (जन्म नक्षत्र से दसवां नक्षत्र) का वेध
होता हो तो धन नाश होगा । यदि सूर्य के साथ-साथ कोई क्रूर ग्रह
भी हो तो विशेष अनिष्ट परिणाम होता है ।
एवं विद्धे खचरैः क्रूरैरन्यैर्मरणम् ।
सौम्यैर्विद्धे न मृतिर्विद्यादेवं सकलम् ॥२७॥
ऊपर जो तीन नक्षत्र बताये गये हैं,उनका यदि अन्य क्रूर ग्रहों से
वेध हो रहा हो तो मृत्यु होती है । यदि शुभ ग्रहों से भी वेध हो
तो मृत्यु नहीं होती, इसी प्रकार जैसे सूर्य का नक्षत्र गोचर ऊपर
बताया गया है, अन्य ग्रहों के नक्षत्र गोचर का भी विचार करना
चाहिए ॥२७॥
आधानकर्मर्क्षविपन्निजर्क्षे
वैनाशिके प्रत्यरभे वधाख्ये ।
पापग्रहो मृत्युभयं विदध्या
द्वेधेतथा कार्यहरः शुभाख्ये ॥२८॥
जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से (क) उन्नीसवाँ नक्षत्र आधान नक्षत्र
कहलाता है, (ख) दसवाँ नक्षत्र कर्म नक्षत्र । (ग) तीसरा नक्षत्र