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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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सुन्दर उपकरण आदि का लाभ । (४) सुख, मित्रों में वृद्धि । (५)
पुत्र प्राप्ति, सन्तान सुख(६) विपत्ति, कष्ट । (७) स्त्री के कारण
पीड़ा । (८) सम्पत्ति । (९) सुख प्राप्ति । (१०) कलह ।(११)
भय । (१२) अर्थप्राप्ति आदि शुभ फल ।
यह सब स्थानों के फल जन्मकालीन चन्द्र राशि से गिनना
चाहिए। उदाहरण के लिए किसी की जन्म कुण्डली में कर्क राशि में
चन्द्रमा है और जिस समय शुभाशुभ विचार किया जा रहा हो गोचर
से शुक्र कुम्भ राशि में हो तो कर्क राशि से कुम्भ अष्टम होने के
कारण उपर्युक्त अष्टम स्थान का फल शुक्र करेगा ॥ २१ ॥
रोगाशौचक्रियाप्तिं धनसुतविहतिं स्थानभृत्यार्थलाभं
स्त्रीबन्ध्वर्थप्रणाशं द्रविणसुतमतिप्रच्युतिं सर्वसौख्यम् ।
स्त्रीरोगाध्वावभोतिं स्वसुतपशुसुहृद्वित्तनाशमयातिं
जन्मादेरष्टमान्तं दिशति पदवशेनार्कसूनुः क्रमेण ॥ २२ ॥
दारिघ्रं धर्मविघ्नं पितृसमविलयं नित्यदुःखं शुभस्थे
दुर्व्यापारप्रवृत्तिं कलयति दशमे मानभङ्गं रुजं वा ।
सौख्यान्येकादशस्थो बहुविधविभवप्राप्तिमुत्कृष्टकीर्तिं
विश्रान्तिं व्यर्थकार्याद्द्विसुहृतिमरभिः स्त्रीसुतव्याधिमन्त्ये ॥२३॥
शनि
जब जन्मकालीन चन्द्र राशि में ही गोचर से शनि भ्रमण कर
रहे हों तो रोग, किसी की मृत्यु के कारण आशौच आदि अशुभ फल
होता है । जन्म राशि से द्वितीय में शनि हो तो संतान कष्ट, धन
नाश आदि अशुभ फल होते हैं। गोचर से तृतीय शनि हो तो स्थान