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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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६२६ फलदीपिका
स्थानप्राप्तिं तृतीये धननिचयमुदाकल्यकृच्छ्रारिहन्ता
रोगान् दत्ते चतुर्थे जनयति च मुहुः स्रग्धराभोगविघ्नम् ॥६॥
वित्तक्षोभं सुतस्थो वितरति बहुशो रोगमोहादिदाता
षष्ठेऽर्को हन्ति रोगान् क्षपयति च रिपूञ्छोकमोहान्प्रमार्ष्टि ।
अध्वानं सप्तमस्थो जठरगुदभयं दैन्यभावं च तस्मै
रुक्त्रासावष्टमस्थः कलयति कलहं राजभीतिं च तापम् ॥१०॥
अब सूर्य, जन्म राशि से गिनने पर—गोचर वश प्रत्येक स्थान में
क्या-क्या फल उत्पन्न करता है, यह बताते हैं । उदाहरण के लिये जन्म
कुंडली में वृष राशि में चन्द्रमा है तो सूर्य जब वृष राशि में होगा
तो प्रथम स्थान में हुआ; मिथुन में जब सूर्य हुआ तो द्वितीय सूर्य
हुआ, इस प्रकार प्रथम, द्वितीय आदि गिनना चाहिये । सूर्य भिन्न-
भिन्न स्थानों में क्या फल करता है यह बताते हैं :—(१) परिश्रम
कराता है, धन खर्च होता है जातक क्रोध