सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 625, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 625

६२४ फलदीपिका
स्वात्मजान्त्यमृतिबन्धुधर्मगे
विध्यते न विबुधैर्यदि ग्रहैः ॥४॥
चन्द्रमा के शुभ गोचर स्थान १, ३, ६, ७, १०, ११,
वेध स्थान ५, ९, १२, २, ४, ८
विक्रमायरिपुगः कुजः शुभः
स्यात्तदान्त्यसुतधर्मगैः खगैः ।
चेन्न विद्ध इनसूनुरप्यसौ
किन्तु धर्मघृणिना न विध्यते ॥५॥
मंगल के शुभ गोचर स्थान ३, ६, ११
वेध स्थान १२, ९, ५
ऊपर जो श्लोक ३ से—और आगे के श्लोकों में जो शुभ गोचर
स्थान लिखे गये हैं—वहाँ तीसरे का बारहवाँ, छठे का नवाँ, ग्यारहवें
का पाँचवाँ. इस प्रकार समझना चाहिये । यदि गोचर में मंगल तृतीय
में है तो जन्म राशि से द्वादश कोई ग्रह होगा तभी वेध समझना ।
गोचर में मंगल तृतीय में हो और जन्म राशि से ९वें या ५वें कोई
ग्रह हो तो तृतीय मंगल का कोई वेध नहीं होगा । यदि गोचर में छठे
मंगल हो और नवें कोई अन्य ग्रह गोचर से हो (गोचर विचार के समय
जन्म कुंडली में नहीं) तो वेध होगा । गोचर से एकादश मंगल हो
और गोचर से ५वें (जन्म राशि से ५वें) कोई ग्रह हो तो मंगल का
वेध होने के कारण शुभ फल नहीं होगा ।
जो मंगल के शुभ गोचर स्थान हैं वही शनि के हैं :
शनि के शुभ गोचर स्थान ३, ६, ११
वेध स्थान १२, ९, ५