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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ५७
पराशर होरा में इन सात भागों को क्रमशः (१) क्षार (२) क्षीर,
(३) दधि, (४) आज्य, (५) इक्षुरस, (६) मद्य, (७) शुद्ध जल
कहा गया है।
नवांश चक्र

भागमे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.अंश
प्रथम भाग११०७४११०७४११०७४३-२०
द्वितीय ,,२११८५२११८५२११८५६-४०
तृतीय ,,३१२९६३१२९६३१२९६१०-०
चतुर्थ ,,४११०७४११०७४११०७१३-२०
पंचम ,,५२११८५२११८५२११८१६-४०
षष्ठ ,,६३१२९६३१२९६३१२९२०-०
सप्तम ,,७४११०७४११०७४११०२३-२०
अष्टम ,,८५२११८५२११८५२११२६-४०
नवम ,,९६३१२९६३१२९६३१२३०-०
दशमांश चक्र
मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कु.मी.अंश
:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---
११०३१२५२७४९६११८३
२११४१६३८५१०७१२९६
३१२५२७४९६११८११०९
४१६३८५१०७१२९२१११२
५२७४९६११८११०३१२१५
६३८५१०७१२९२१०४११८
७४९६११८११०३१२५२२१
८५१०७१२९२११४१६३२४
९६११८११०३१२५२७४२७
१०७१२९२११४१६३८५३०

५८ फलदीपिका
द्वादशांश चक्र
राशि
| मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | अ. क. |
| प्रथम भाग | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | २-३० तक |
| द्वितीय भाग | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | ५-० " |
| तृतीय भाग | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ७-३० " |
| चतुर्थ भाग | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | १०-० " |
| पंचम भाग | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | १२-३० " |
| षष्ठ भाग | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | १५-० " |
| सप्तम भाग | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | १७-३० " |
| अष्टम भाग | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | २०-० " |
| नवम भाग | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | २२-३० " |
| दशम भाग | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | २५-० " |
| एकादशभाग | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | २७-३० " |
| द्वादश भाग | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | ३०-० " |
षोडशांश चक्र
राशि
| भाग | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | अं.क. वि. |
| प्रथम भाग | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १-५२-३० |
| द्वितीय भाग | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | ३-४५- ० |
| तृतीय भाग | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ५-३७-३० |
| चतुर्थ भाग | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ७-३०- ० |
| पंचम भाग | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ९-२२-३० |
| षष्ठ भाग | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ११-१५- ० |
| सप्तम भाग | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | १३- ७-३० |
| अष्टम भाग | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | १५- ०- ० |
| नवम भाग | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | १६-५२-३० |
| दशम भाग | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १८-४५- ० |
| एकादशभाग | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | २०-३७-३० |
| द्वादश भाग | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | २२-३०- ० |
| त्रयोदशभाग | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | २४-२२-३० |
| चतुर्दश भाग | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २६-१५- ० |
| पंचदश भाग | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | २८- ७-३० |
| षोडश भाग | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ३०- ०- ० |

तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ५९
मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ इन छः विषम राशियों में सोलह
भागों के स्वामी (१) ब्रह्मा, (२) विष्णु, (३) हर, (४) सूर्य, (५)
ब्रह्मा, (६) विष्णु, (७) हर, (८) सूर्य, (९) ब्रह्मा, (१०) विष्णु,
(११) हर, (१२) सूर्य, (१३) ब्रह्मा, (१४) विष्णु, (१५) हर,
(१६) सूर्य होते हैं।
वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन इन छः सम राशियों में १६
भागों के स्वामी (१) सूर्य, (२) हर, (३) विष्णु, (४) ब्रह्मा, (५)
सूर्य, (६) हर, (७) विष्णु, (८) ब्रह्मा, (९) सूर्य, (१०) हर,
(११) विष्णु, (१२) ब्रह्मा, (१३) सूर्य, (१४) हर, (१५) विष्णु,
(१६) ब्रह्मा होते हैं।
त्रिंशांश का अर्थ है तीस भाग, किन्तु प्रचलित प्रथा यह है कि एक
राशि के पांच हिस्से करते हैं। विषम राशियों में (मे० मि०,सिं०, तु०,ध०,
कुं०) में प्रथम भाग ५ अंश तक, दूसरा १० अंश तक तीसरा १८ अंश तक,
चौथा २५ अंश तक, पांचवां ३० अंश तक होता है। सम (वृ०, क०, क०,
वृ०, म०, मी०) राशियों में प्रथम विभाग ५ अंश तक, दूसरा १२ अंश
तक, तीसरा २० अंश तक, चौथा २५ अंश तक, पांचवां ३० अंश तक
होता है। त्रिंशांश चक्र नीचे दिया जाता है। जिससे यह स्पष्ट होगा
कि किस राशि में कितने अंश तक त्रिंशांश वर्ग कौन-सा होगा।
त्रिंशांश
विषम (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ) राशियों में प्रथम भाग
५ अंश तक, दूसरा भाग १० अंश तक, तीसरा १८ अंश तक चौथा २५
अंश तक, पांचवां ३० अंश तक होता है।
सम (वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन) राशियों में प्रथम भाग
५ अंश तक, दूसरा भाग १२ अंश तक, तीसरा २० अंश तक, चौथा २५
अंश तक, पांचवां ३० अंश तक होता है।

० फलदीपिका
त्रिंशांश कुण्डली चक्र

भागमे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.मं.कुं.मी.
प्रथम भाग१२१२१२१२१२१२
द्वितीय ,,११६११६११६११६११६११६
तृतीय भाग९१२९१२९१२९१२९१२९१२
चतुर्थ ,,३१०३१०३१०३१०३१०३१०
पंचम ,,७८७८७८७८७८७८

षष्ट्यंश
प्रत्येक राशि में तीस अंश होते हैं, प्रत्येक अंश को यदि दो में विभाजित
किया जाय तो आधे-आधे अंश के—६० भाग—प्रत्येक राशि के किये जा
सकते हैं। मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, और कुम्भ राशियों में १, २, ८,
९, १०, ११, १२, १५, १६, ३०, ३१, ३२, ३३, ३४, ३५, ३९, ४०,
४२, ४३, ४४, ४८, ५१, ५२, और ५९ वें भाग क्रूर हैं। शेष भाग सौम्य
हैं। वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियों में ३, ४, ५, ६,
७, १३, १४, १७, १८, १९, २०, २१, २२, २३, २४, २५, २६, २७, २८,
२९, ३६, ३७, ३८, ४१, ४५, ४६, ४७, ४९, ५०, ५३, ५४, ५५, ५६,
५७ और ६० वें भाग क्रूर हैं बाकी सौम्य हैं।
यह दस वर्ग हुए। किसी भी ग्रह की शुभता या क्रूरता का विचार
करना हो तो यह देखिये कि वह अपने उच्च अथवा स्वयं की या मित्र आदि
की राशि होरा द्रेष्काण आदि में है या शत्रु अधिशत्रु के घर और वर्गों
में पड़ा है। परन्तु सब वर्गों का सम्मान महत्त्व नहीं है। यदि राशि को
सोलह आने महत्त्व दिया जावे तो और वर्गों को—होरा, द्रेष्काण, सप्तमांश,
नवांश, द्वादशांश, त्रिंशांश को आठ आना महत्त्व देना चाहिये। किसी-
किसी का मत यह है कि नवांश को भी सोलह आने महत्त्व दिया जाना
चाहिये। बाकी के तीन वर्ग दशमांश, षोडशांश और षष्ट्यंश को रुपये
में चार आना महत्त्व देना चाहिये। हमारा विचार यह है कि राशि और

तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ६१
नवांश को करीब-करीब बराबर सा महत्त्व देना उचित है । यदि राशि
शरीर है तो नवांश दिल है; शरीर कमज़ोर हो, दिल मज़बूत हो तो
मनुष्य दीर्घ आयु तक जिन्दा रहता है किन्तु शरीर बलवान् हो और दिल
कमजोर हो तो हार्ट फेल होने में देर नहीं लगती ।
यदि कोई ग्रह जिस राशि में है उसी नवांश में हो तो उसे वर्गोत्तम
कहते हैं । उदाहरण के लिये चन्द्रमा के मेष राशि में दो अंश हों तो चन्द्रमा।
मेष राशि और मेष ही नवांश में होने के कारण वर्गोत्तम में हुआ । वर्गोत्तम
ग्रह ऐसा ही बलवान् समझा जाता है जैसा स्वराशि में । इसके अतिरिक्त
ग्रहों की एक संज्ञा और बतायी है वह है बाल, कुमार, युवा, प्रौढ़ और
वृद्ध । मेष मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ राशियों में ६° तक बाल,
१२° तक कुमार १८° तक युवा २४° तक प्रौढ़ और अन्तिम ६° में ग्रह
मृत (मरा हुआ) समझा जाता है । वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और
मीन राशियों में उल्टा क्रम है । ६° तक मृत, १२° तक प्रौढ़, १८° तक
युवा, २४° तक कुमार, और अन्तिम ६° तक बाल (बच्चा) समझा जाता है।
किसी ग्रह के बलाबल का विचार करना हो तो देखिये कि वह ग्रह
केन्द्र या त्रिकोण में है अपनी राशि, मूल त्रिकोण राशि, उच्च राशि या
वर्गोत्तम में है क्या ? इसके बाद सप्त वर्ग या दस वर्ग में विचार कीजिये ।
बहुत-से लोग केवल दस वर्गों में देखते हैं और मित्र गृही है, स्वराशि में
है या उच्च राशि में—इन सब बातों के लिये तेरह वर्गों का विचार
करते हैं ।
वर्गान्योजयतु त्रयोदश सुहृत्स्वर्त्तोच्चभेषु क्रमाद्-
द्विस्त्रिः पञ्च चतुर्नवाद्रिवसुषट्संख्यासु वर्गैक्यतः ।
प्राहुश्चोत्तमपारिजात कथितौ सिंहासनं गोपुरं
चेत्यैरावतदेवलोकसुरलोकांशान्श्च पारावतम् ॥ ७ ॥
तेरह वर्गों में यह विचार करना चाहिये कि ग्रह अपनी उच्च राशि
में है, मित्र राशि में या स्वराशि में । यदि दो वर्गों में स्वराशि, स्ववर्ग

न्द्रदयितं भूपालतुल्यं नरम् ॥ ८ ॥`
Wait, "नृपेन्द्रदयितं":
नृ (nri)
पे (pe)
न्द्र (ndra)
द (da)
यि (yi)
तं (tam)
Yes: "नृपेन्द्रदयितं".

Line 18:
श्रेष्ठाश्वद्विपवाहनादि विभवं पारावताधिष्ठितः

Line 19:
सत्कीर्तिं यदि देवलोकसहितो भूमण्डलाधीश्वरम् ।

Line 20:
वन्द्यं भूपतिभिः सुरेन्द्रसदृशं त्वैरावतांशास्थितः
Wait, look at "त्वैरावतांशास्थितः" again.
Is it "त्वैरावतांशस्थितः"?
Let's look at the meter:
वन् (G) द्यं (G) भू (G)
प (L) ति (L) भिः (G)
सु (L) रें (G) द्र (L)
स (L) दृ (L) शं (G)
त्वै (G) रा (G) व (L)
तां (G) श (L) स्थि (L) तः (G) -- wait!
In Shardulavikridita:
Syllable 13: त्वै (G)
Syllable 14: रा

तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ६३
ऊपर कितने स्ववर्ग आदि में ग्रह क्या-क्या कहलाता है यह बतलाने के
बाद अब इसका फल बताते हैं; यदि कोई ग्रह "पारिजातांश" में हो तो
वह जातक को अनेक गुणों से युक्त धनी, सुखी, मान प्रतिष्ठा वाला बनाता
है। यदि कोई ग्रह उत्तमांश में हो तो वह उत्तम आचार वाला (कुलक्रमागत
शिष्ट, जनानुमोदित) रास्ते पर चलने वाला चतुर और विनयी होता
है। यदि किसी जातक का कोई ग्रह गोपुरांश में हो तो उसकी बुद्धि शुभ
होती है और उसको गायों का, धन का, खेत का तथा अपने मकान का
सुख प्राप्त होता है। यदि ग्रह सिंहासनांश में हो तो मनुष्य राजा का
प्यारा हो; या राजा के बराबर हो या राजा ही हो जाय, यह सब परि-
स्थिति देखकर फलादेश कहना चाहिये।
यदि कोई ग्रह पारावतांश में हो तो जातक को श्रेष्ठ, घोड़े, हाथी,
सवारी आदि प्राप्त हों और वैभव से युक्त हो। यदि कोई ग्रह देवलोकांश
में हों तो जातक सत्कीर्ति से युक्त भूमण्डलाधीश (राजा) गवर्नर आदि
हो। ऐरावतांश में ग्रह होने से वह साक्षात् इन्द्र के वैभव से युक्त होगा
और अनेक राजा उसको सलाम करेंगे। सुरलोकांश का फल भी करीब-
करीब ऐसा ही है। धन-धान्य, सौभाग्य, पुत्र सुख से युक्त महाराजा हो।
ऊपर जो अधिकाधिक शुभ वर्गों में उत्तम फल बताये गये हैं; इनका
शब्दार्थ नहीं लेना चाहिये। केवल भावार्थ लेना चाहिये, कि जितना
अधिक कोई ग्रह स्ववर्गों में होगा उतना ही सुख, फल दिखाने में समर्थ
होगा। केवल एक ग्रह अच्छा होने से न कोई राजा बनता है न कोई
एक ग्रह खराब होने से कोई रंक हो जाता है। न सब ग्रह किसी के बनते
हैं न सब ग्रह किसी के बिगड़ते हैं इसीलिये फलादेश करते समय सब ग्रहों
के बलाबल का तारतम्य कर अन्तिम नतीजे पर पहुंचना चाहिये॥ ९॥
ऊपर के श्लोकों में ग्रहों के बलवान् होने का शुभ फल बताया है।
अब ग्रहों के निर्बल होने का फल बताते हैं। दशों वर्गों में बलहीन हो तो
मृत्यु हो जावे। यदि नौ में बलहीन हो तो 'नाश' हो, आठ में
बलहीन हो तो "दुःख" उत्पन्न करे। सात में निर्बलता का फल है

अनर्थ । छः में सुखहीनता । यदि पांच वर्गों में बलवान् हो तो
बन्धुओं का प्यारा । ६ वर्गों में बलवान् होने से बन्धुओं में श्रेष्ठ
हो । ७ वर्गों में बलवान् होने का फल है राजा की कृपा प्राप्त
होना । ८ का फल है धनी होना । ९ का फल है राजा होना और दसों
वर्गों में बलवान् होने से महाराजा होता है । अब राजा महाराजा होते
नहीं इस कारण यह अर्थ समझना चाहिये कि जितने अधिक वर्गों में बलवान्
हो उतना ही शुभ फल अधिक होगा ।
यदि ग्रह बालावस्था में हो तो व्यक्ति वृद्धि को प्राप्त हो, कुमारावस्था
में ग्रह हो तो जातक को सुख प्रदान करे । यदि ग्रह युवावस्था में हो
तो जातक को नृप बना दे । अर्थात् अधिक अभ्युदय करे । यदि ग्रह
प्रौढ़ावस्था में हो तो बीमारी पैदा करता है । और वृद्ध अवस्था में मृत्यु
पैदा करता है। यहां भी शब्दार्थ न लेकर भावार्थ लेना चाहिये कि ग्रह
यदि बाल हो तो क्रमशः उन्नति यदि कुमार हो तो बाल से अधिक अच्छा
फल, युवा हो फल प्रदान करने में पूर्ण शक्तिमान्, प्रौढ़ हो तो भलाई
करने में अशक्त, बुराई के लिये उद्यत और मृत अवस्था में हो तो अत्यन्त
निकृष्ट फल देता है ।। १० ।।
षड् वर्गेषु शुभग्रहाधिकगुणैः* श्रीमांश्चिरं जीवति
क्रूरांशे बहुले विलग्नभवने दीनोऽल्पजीवः शठः ।
तन्नाथा बलिनो नृपोऽस्त्यथ नवांशेशो दृगाणेश्वरो
लग्नेशः क्रमशः सुखी नृपसमः क्षोणीपतिर्भाग्यवान् ।। ११ ।।
यदि शुभ ग्रह षड्वर्गों में बलवान् हो तो मनुष्य धनवान् और दीर्घायु
होता है। जिस प्रकार ग्रहों के षड्वर्ग देखे जाते हैं उसी प्रकार लग्न स्पष्ट
करके यह देखना चाहिये कि जो राशि, अंश कला, विकला उदय हो रही है
*राशि, होरा, द्रेष्काण नवांश, द्वादशांश, और त्रिंशांश यह षड्वर्ग
कहलाते हैं ।

तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ६५
वह लग्नेश की अपनी किंवा शुभ ग्रहों के वर्ग में है या नहीं। यदि लग्न
क्रूर अंशों के षड्वर्गों में हो तो जातक अल्पायु, दरिद्र और दुष्ट प्रकृति
का होता है। किन्तु यदि जिन अंशों में लग्न स्पष्ट है उन अंशों के स्वामी
बलवान् हों तो मनुष्य बहुत उच्च पदवी प्राप्त करेगा।
यदि लग्न के नवांश का स्वामी बलवान् हो तो मनुष्य सुखी होगा;
यदि लग्न द्रेष्काण का स्वामी बलवान् हो तो मनुष्य राजा के समान
पदवी प्राप्त करे। और यदि स्वयं लग्नेश बहुत बलवान् हो तो मनुष्य पृथ्वी
(भूमि) का स्वामी और भाग्यवान् हो ॥ ११ ॥
ओजे क्रूरेऽर्कहोरां गतवति बलवान् क्रूरवृत्तिर्धनाढ्यो
युग्मे चान्द्रीं शुभेषु द्युतिविनयवचोहृद्यसौभाग्ययुक्तः ।
व्यस्तं व्यस्तेऽत्र मिश्रे समफलमुदितं लग्नचन्द्रौ बलिष्ठौ
तन्नाथौ द्वौ च तद्वद्यदि भवति चिरंजीव्यदुःखी यशस्वी ॥१२॥
जिनकी जन्मकुण्डली में क्रूर ग्रह मेष, मिथुन, सिंह, तुला, वृश्चिक और
कुम्भ राशि में स्थित होकर सूर्य की होरा में हों (प्रथम पन्द्रह अंश)
वे व्यक्ति क्रूर वृत्ति वाले, बलवान् और धनाढ्य होते हैं। इसके विपरीत
जिनकी जन्मकुण्डलियों में शुभ ग्रह वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर,
और मीन राशियों में स्थित होकर चन्द्र होरा में हों (प्रारंभिक पन्द्रह अंशों
में) वे लोग कान्तियुक्त, विनयी, नम्र वचन बोलने वाले, हृद्य (जिनकी
तरफ हृदय का आकर्षण हो) और सौभाग्यशाली होते हैं। ऊपर जो दो
परिस्थितियां बताई गई हैं ग्रह स्थिति उसके विपरीत हों तो विपरीत
फल होता है। यदि मिली-जुली परिस्थिति हो तो परिणाम भी मिला-
जुला होता है। जिसकी जन्म कुण्डली में लग्न और चन्द्रमा दोनों बलवान्
हों तथा लग्न का स्वामी और चन्द्रमा जिस राशि में हो उसका स्वामी ये
दोनों भी पूर्ण बलवान् हों तो वह व्यक्ति दीर्घायु, सुखी और यशस्वी
होता है।

६६ फलदीपिका
सिंहाजाशिवितुलानृयुग्मभवनेष्वन्त्या ह्यजादिमाः
मध्यौ स्त्रीयमयोरिहायुधभृतः पाशोलिमध्यो भवेत् ।
नक्राद्यो निगलो मृगेन्द्रघटयोराद्यो वणिङ्मध्यमो
गृध्रास्यो वृषभांतिमश्च विहगः कर्क्यादि कोलाननम् ॥१३॥
कौर्याद्यः कर्कटान्त्यो झषचरममहिश्वाजगोमध्यसिंहा-
द्यल्यन्त्यं स्याच्चतुष्पादिह फलमधनक्रूरनिन्द्या दरिद्राः ।
द्वन्द्वर्क्षे स्युर्दृगाणैरधमसमशुभान्यस्थिरे चोत्क्रमेण
प्राहुस्तज्ज्ञाः स्थिरक्ष्वशुभशुभसमान्येव लग्न फलानि ॥१४॥
इन द्रेष्काणों का स्वरूप बताते हैं। निम्नलिखित द्रेष्काण हैं ।
' प्रथम द्रेष्काण द्वितीय द्रेष्काण तृतीय द्रेष्काण
मेष आयुध चतुष्पाद आयुध
वृष चतुष्पाद पक्षी
मिथुन आयुध आयुध
कर्क कोलानन सर्प
सिंह गृध्रास्य आयुध
चतुष्पाद
कन्या आयुध
तुला गृध्रास्य आयुध
वृश्चिक सर्प पाश चतुष्पाद
धनु आयुध आयुध
मकर निगड
कुंभ गृध्रास्य
मीन सर्प
फलदीपिका की एक संस्कृत प्रति में द्रेष्काण का स्वरूप वर्णन करने
वाले श्लोक १३ और १४ नहीं हैं। अन्य प्रति में सिंह के आद्य ( प्रथम )

तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ६७
द्रक्काणेशे स्ववर्गे शुभखगसहिते स्वोच्चमित्रर्क्षगे वा
तद्व त्त्रिंशांशनाथे बलवति यदि चेद् द्वादशांशाधिपे वा ।
होरानाथे तथा चेन्निखिलगुणगणो नित्यशुद्धप्रवीणो
दीर्घायुः स्याद्द्यावान् सुतधनसहितः कीर्तिमान्राजभोगः॥१५॥
यदि लग्न द्रेष्काण का स्वामी अपने उच्च वर्ग में स्ववर्ग में या मित्र
के वर्ग में शुभ ग्रह के साथ हो, यदि लग्न होरा, लग्न त्रिंशांश तथा लग्न
द्वादशांश के स्वामी भी अपने-अपने उच्च वर्गों में स्ववर्गों में या
मित्र वर्गों में हों और शुभ ग्रह सहित हों तो उस व्यक्ति में अनेकानेक गुण
द्रेष्काण को श्लोक १३ में 'गृध्रास्य, कहा है (श्लोक १३ पंक्ति ३-४)
और श्लोक १४ में (पंक्ति १-२) इसी सिंह राशि के प्रथम द्रेष्काण को
चतुष्पाद कहा है। प्रतीत होता है मूल संस्कृत में मुद्रण में कुछ अशुद्धि
हैं
आयुध —शस्त्र, या शस्त्र धारण करने वाला
चतुष्पाद —चौपाया-जानवर
कोलानन —सूअर के मुख वाला
गृध्रास्य —गृध्र के मुख वाला
पाश —जाल-जिसमें किसी को बांध लिया जावे
पक्षी —परिन्दा
सर्प —साँप
निगड़ —बेड़ी में जकड़ा हुआ
जब जन्म के समय उपर्युक्त द्रेष्काण उदित हो तो जातक अधन (धन-
रहित), क्रूर, निन्द्य (निन्दा के योग्य उसके कर्म हों) तथा दरिद्र
होता है ।
सामान्यतः चर, स्थिर, द्वि स्वभाव राशियों में प्रथम, द्वितीय, तृतीय
द्रेष्काणों का फल निम्नलिखित है ।

६८ फलदीपिका
होते हैं। वह चतुर दीर्घायु, दयावान्, पवित्र, यशस्वी राजाओं के सदृश
भोग भोगने वाला होता है। उसको पुत्र सुख प्राप्त होता है और वह् धनी
भी होता है ॥ १५ ॥
मान्दिस्थराशिपतिसङ्गतसुत्रिकोणं
तस्यांशराशिपतिसंयुतमंशकोणम् ।
लग्नं वदन्ति गुलिकांशकराशिकोणं
तद्वद्विधौ बलयुते शशिनैव विद्यात् ॥ १६ ॥
यह देखिये कि किस राशि में मान्दि है और मान्दि राशि (जिस राशि
में मान्दि है) का स्वामी कहाँ है। जातक का जन्म लग्न इन दोनों राशियों
से त्रिकोण में (नवम या पञ्चम) होगा अथवा मान्दि जिस नवांश में है
उससे नवम पञ्चम या मान्दि राशि नवांश का जो स्वामी है वह जिस
नवांश में बैठा है उससे नवम या पञ्चम जन्म लग्न होगा। अथवा गुलिक
जिस नवांश में है उससे पञ्चम या नवम। यहां लग्न निश्चय करने के
लिये कुछ हिदायतें दी गई हैं उनको अमल में लाने के पूर्व क्या निश्चय
करना चाहिये यह ऊपर बताया गया है। नवीन ज्योतिषियों के हितार्थ इसे
पुनः समझाया जाता ह।
प्रथम द्वितीय तृतीय
चर राशि
(मेष, कर्क, तुला, मकर) शुभ सम अधम
स्थिर राशि अशुभ शुभ सम
(वृष, सिंह, वृश्चिक, कुंभ)
द्विस्वभाव राशि अधम सम शुभ
(मिथुन, कन्या, धनु, मीन)
उपर्युक्त फल लग्न राशि, चर है, स्थिर या द्विस्वभाव, प्रथम द्रेष्काण
उदय हो रहा है, द्वितीय या तृतीय यह निश्चित कर कहना चाहिये ।

तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ६९
(१) मान्दि राशि, (२) मान्दिराशि पति, (३) मान्दि नवांश
स्वामी नवांशपति, (४) १गुलिक नवांश । ऊपर जो चार स्थान बताये
गये हैं उनसे नवम या पञ्चम जन्म लग्न होगा । जिस प्रकार ऊपर मान्दि
को आधार मानकर लग्न निश्चय करना बताया गया है उसी प्रकार
यदि चन्द्रमा बलवान् हो तो चन्द्रमा को आधार मानकर लग्न निश्चय करना
चाहिये ॥ १६ ॥
कुर्यादात्मसुहृद्द्रेष्काणगशशी कल्याणरूपं गुणं
श्रेयांस्युत्तमवर्गजस्त्वपरगस्तन्नाथजातान् गुणान् ।
स्वत्रिंशांशगता ग्रहा विदधते तत्कारकत्वोदितं
तत्रैकोऽपि सुहृद्ग्रहेक्षितयुतः स्वोच्चेऽर्थयुक्तं नृपम् ॥१७॥
यदि चन्द्रमा अपने द्रेष्काण में हो या मित्र द्रेष्काण में हो तो जातक
को उत्तम रूप और गुण प्रदान करता है । यदि चन्द्रमा को उत्तम वर्ग
प्राप्त हो तो भी जातक बहुत भाग्यशाली होगा । यदि इससे भी अधिक
अच्छे वर्गों में हो तो और भी उत्कृष्ट फल समझना चाहिये । साधारण
नियम यह है कि चन्द्रमा जिस ग्रह की राशि में होता है उसके गुण ले लेता
है। चन्द्रमा मन है जैसे ग्रह की राशि में रहेगा उसी ग्रह के अनुसार मन बन
जावेगा ।
कौन-सा ग्रह किस बल का कारक है यह बताया जा चुका है। यदि
यह देखना हो कि कोई ग्रह अपने कारकत्व का प्रभाव कैसा करेगा तो
कैसे त्रिंशांश में बैठा है यह देखें । अपने त्रिंशांश में बैठने का सर्वश्रेष्ठ
फल, मित्र त्रिंशांश में मध्यम फल, शत्रु त्रिंशांश में अधम फल और क्रूर
अधिशत्रु त्रिंशांश में अधमाधम फल समझना चाहिये । यदि एक भी ग्रह
अपनी राशि या उच्च राशि में हो और मित्र ग्रह के साथ या उससे देखा
१. यद्यपि गुलिक और मान्दि एक ही वस्तु हैं किन्तु बहुत-से लोग
भ्रमवश इनको भिन्न-भिन्न मानते हैं ।

७० फलदीपिका।
जाता हो तो मनुष्य को उत्तम धन भाग्य और पदवी प्राप्त कराता है ।
बहुतों के मत से त्रिंशांश में उच्च या स्वग्रही ग्रह हो तभी यह फल
घटित होगा ॥ १७ ॥
स्वोच्चे प्रदीप्तः सुखितस्त्रिकोणे स्वस्थः स्वगेहे मुदितः सुहृद्भे ।
शान्तस्तु सौम्यग्रहवर्गयुक्तः शक्तो मतोऽसौ स्फुटरश्मिजालः ॥१८॥
ग्रहाभिभूतः स निपीडितः स्यात् खलस्तु पापग्रहवर्गयातः ।
सुदुःखितः शत्रुगृहे ग्रहेन्द्रो नीचेऽतिभीतो विकलोऽस्तयातः ॥१९॥
पूर्णं प्रदीप्ता विकलास्तु शून्यं मध्येऽनुपाताच्च शुभं क्रमेण ।
अनुक्रमेणाशुभमेव कुर्यु र्नामानुरूपाणि फलानि तेषाम् ॥२०॥
अपनी उच्च राशि में ग्रह प्रदीप्त कहलाता है । अपनी मूल
त्रिकोण राशि में इसे सुखित कहते हैं। अपनी स्वराशि में ग्रह स्वस्थ
कहलाता है। मित्र के घर में मुदित, सौम्यग्रह के वर्ग में हो और
सौम्य ग्रह से युक्त हो तो ग्रह को शान्त कहते हैं। जब किसी
ग्रह का प्रकाश मण्डल पृथ्वी से दिखाई दे (अर्थात् सूर्य के समीप
रहने के कारण ग्रह अस्त न हो) तो ऐसा ग्रह शक्त कहलाता है अर्थात्
शुभ प्रभाव दिखाने की ताक़त उसमें होती है । अस्त ग्रह बहुत निकृष्ट
फल दिखाता है। इतना कमजोर रहता है कि वह कुछ भलाई करने के
काबिल ही नहीं रहता। अस्त ग्रह को विकल भी कहते हैं अर्थात् यदि
अस्त न हो तो शक्त, यदि अस्त हो तो विकल। जो ग्रह युद्ध में दूसरे ग्रह
१. यदि राशि द्रेष्काण नवांश आदि तीनों में स्ववर्ग या उच्च वर्ग
में हो तो ग्रह उत्तम वर्ग में कहलाता है। बहुत-से ज्योतिषी दस वर्गों में
से कोई से तीन वर्गों में शुभ या मित्र वर्ग प्राप्त होने से उत्तम वर्ग मान लेते
हैं यह कमजोर बात है।

तीसरा अध्याय : वर्ग भेद ७१
से 'हारा' हुआ हो उसे निपीडित कहते हैं। जो पाप ग्रह या ग्रहों के वर्ग
में हो उसे खल कहते हैं। जो शत्रु गृह में हो उसे पूर्ण दुःखी और जो अपनी
नीच राशि में हो उसे अतिभीत कहते हैं । प्रायः जैसा कि प्रदीप्त सुखित,
स्वस्थ, मुदित, शान्त, शक्त, निपीडित, खल, सुदुःखित, नीच और विकल
यह जो ११ अवस्थायें बतायी गई हैं—इनमें नाम के अनुसार ही फल
१. 'हारा' हुआ ग्रह किसे कहते हैं । जब दो ग्रह एक ही राशि, अंश
कला में हों तो दो दोनों ग्रह परस्पर युद्ध में हैं—ऐसा समझा जाता
है। दोनों ग्रहों का स्थानबल दिक्बल और कालबल निकालना चाहिये ।
षड्बल छः प्रकार के बलों के योग को कहते हैं (१) स्थान बल (२)
काल बल, (३) दिक् बल, (४) अयन बल, (५) चेष्टाबल, (६)
नैसर्गिक बल। परन्तु युद्धबल निकालने के लिये (१), (२); (३) का
योग करते हैं ।
जो दो ग्रह युद्ध में हों—उनके बलों को देखिये अधिक बल में से
कम को घटाइये । जो बचे उसे उन दोनों के विव परिमाण के अन्तर से
भाग दीजिये । जो भजन फल आवे—उसे उस ग्रह के बल में जोड़िये,
जो उत्तर हो और उस ग्रह के बल में से घटाइये जो दक्षिण हो । जो ग्रह
उत्तर को है वह जीता हुआ और जो दक्षिण को है वह हारा हुआ समझा
जाता है ।
ग्रहों के बिंब परिमाण निम्नलिखित हैं :—
ग्रह बिंब परिमाण
मंगल ९.४ विकला
बुध ६.६ ,,
बृहस्पति १९०.४ ,,
शुक्र १६.६ ,,
शनि १५८.० ,,

७२ फलदीपिका
समझना चाहिये । प्रथम ६ अवस्थाओं में ग्रह शुभ फल देता है । उच्च में
१६ आना शुभ; सुखित में १४ आना; स्वराशि में १२ आना, 'मित्र राशि
में १० आना, शान्त अवस्था में ८ आना और शक्त अवस्था में ६ आना
शुभ। निपीडित अवस्था में ६ आना अशुभ, खल अवस्था में ८ आना अशुभ
फल; सुदुःखित अवस्था में १० आना अशुभ फल, नीच राशि में १२ आना
अशुभ फल, और विकल अवस्था में १६ आना अर्थात् पूर्ण अशुभ फल
समझना चाहिये । अच्छी अवस्था वाले ग्रह की दशा अन्तर्दशा में शुभ
परिणाम होंगे । निकृष्ट अवस्था वाले ग्रह की दशा अन्तर्दशा में अशुभ
फल होगा ॥ १८-२० ॥

चौथा अध्याय
ग्रह बल
इस अध्याय में ग्रह और भावों का बल कैसे ज्ञात करना चाहिये यह
बताया गया है। इस सम्बन्ध में मन्त्रेश्वर महाराज का मत क्या है यह जानने
के पूर्व यह ज्ञात होना आवश्यक है कि अन्य आचार्यों का मत क्या है।
जिनको षड्बल (ग्रहों का ६ प्रकार का बल) निकालने का प्रकार मालूम है
उन्हें तो फलदीपिका के श्लोकों का अर्थ आसानी से समझ में आ जावेगा।
किन्तु जिनका षड्बल से परिचय नहीं है उन्हें निम्नलिखित विवरण ध्यान
से पढ़ लेना चाहिये।
ग्रहों का षड्बल भारतीय ज्योतिष की एक विशेष चीज़ है। षड्बल—
(क) स्थान बल, (ख) दिक् बल, (ग) काल बल, (घ) चेष्टा बल,
(ङ) नैसर्गिक बल तथा (च) दृक् बल के योग को कहते हैं। अब इनमें
से प्रत्येक को समझाते हैं।
स्थान बल—यह १२ प्रकार के बलों का योग है।
(१) उच्च बल—जब कोई ग्रह अपनी परमोच्च अवस्था में*
होता है तो उसे १ रूप (=६० षष्ट्यंश) बल प्राप्त होता है; यदि वह
परम नीचांश में हो तो उसे कुछ बल प्राप्त नहीं होता—अर्थात् ० प्राप्त
होता है। मध्य में कहीं हो तो त्रैराशिक से बल निकालना चाहिये। इसे
उच्च बल कहते हैं।
(२) यदि ग्रह अपनी मूल त्रिकोण राशि में हो (किसी ग्रह की मूल
*जिस राशि के जिस अंश पर ग्रह परम उच्च होता है वह उसकी
परमोच्च अवस्था और जिस राशि के जिस अंश पर वह परम नीच होता
है वह उसकी परम नीच स्थिति कहलाती है।

७४ फलदीपिका
त्रिकोण राशि किस अंश से किस अंश तक है इसके लिये देखिये सुगम
ज्योतिष प्रवेशिका पृ. ३१) तो उसे ४५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है।
यदि स्वराशि में हो तो केवल ३० षष्ट्यंश बल मिलता है; यदि अधिमित्र
राशि में हो तो २२.५ षष्ट्यंश; मित्र राशि में हो तो १५ षष्ट्यंश;
सम राशि में हो तो ७.५ षष्ट्यंश, शत्रु राशि में ३.७५ षष्ट्यंश, और
अधिशत्रु राशि में हो तो सबसे कम—केवल १.८७५ षष्ट्यंश बल प्राप्त
होता है।
(३) यदि कोई ग्रह स्वहोरा में हो तो ३० षष्ट्यंश, अधिमित्र होरा
में हो तो २२.५ षष्ट्यंश; मित्र होरा में १५ षष्ट्यंश, सम होरा में ७.५
षष्ट्यंश शत्रु होरा में ३.७५ षष्ट्यंश और अधि शत्रु होरा में केवल १.८७५
षष्ट्यंश।
(४) 'यदि कोई ग्रह स्वद्रेष्काण में हो तो ३० षष्ट्यंश, यदि अधि-
मित्र द्रेष्काण में हो तो २२.५; मित्र द्रेष्काण में १५ सम द्रेष्काण में ७.५;
शत्रु द्रेष्काण में ३.७५ और अधिशत्रु द्रेष्काण में १.८७५ षष्ट्यंश।
(५) यदि कोई ग्रह अपने सप्तमांश में हो तो ३० षष्ट्यंश, अधि-
मित्र सप्तमांश में २२.५; मित्र सप्तमांश में १५; सम सप्तमांश में ७.५;
शत्रु सप्तमांश में ३.७५ और अधिशत्रु सप्तमांश में १.८७५ षष्ट्यंश।
(६) यदि कोई ग्रह स्व नवांश में हो तो ३० षष्ट्यंश; अधिमित्र
नवांश में हो तो २२.५; मित्र नवांश में १५; सम नवांश में ७.५; शत्रु-
नवांश में ३.७५ और अधिशत्रु नवांश में केवल १.८७५ षष्ट्यंश।
टिप्पणी—द्रव्य का परिमाण रुपये आने, पैसे, में व्यक्त किया जाता है।
वस्तु का मन, सेर, छटांक में। षड्बल का परिमाण 'रूप' में
व्यक्त किया जाता है। जिस तरह एक रुपये में १०० नये पैसे
होते हैं वैसे ही एक रूप में ६० षष्ट्यंश होते हैं। यदि किसी
ग्रह का बल पूरा-पूरा 'रूप' में व्यक्त नहीं किया जा सकता तो
... 'रूप'... 'षष्ट्यंश या केवल... 'षष्ट्यंश'—इस प्रकार
किया जाता है।

चौथा अध्याय : ग्रह बल ७५
(७) यदि कोई ग्रह अपने द्वादशांश में हो तो उसे ३० षष्ट्यंश बल
प्राप्त होता है; अधिमित्र द्वादशांश में २२.५; मित्र द्वादशांश में १५;
सम द्वादशांश में ७.५; शत्रु द्वादशांश में ३.७५ और अधिशत्रु द्वादशांश में
१.८७५ षष्ट्यंश ।
(८) यदि कोई ग्रह अपने ही त्रिंशांश में हो तो उसे ३० षष्ट्यंश
बल प्राप्त होता है; अधिमित्र के त्रिंशांश में हो तो २२.५ और मित्र के
त्रिंशांश में हो तो १५ । यदि समग्रह के त्रिंशांश में हो तो ७.५ षष्ट्यंश;
शत्रु के त्रिंशांश में ३.७५ और अधिशत्रु के त्रिंशांश में होने से केवल
१.८७५ षष्ट्यंश ।
(९) सूर्य, मंगल, बुध, बृहस्पति और शनि--इन पांचों में जो-जो
ग्रह ओज राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ) में हों उनको--
प्रत्येक को--१५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है ।
(ख) चन्द्र और शुक्र इन दोनों में जो-जो युग्म राशि (वृषभ
कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर या मीन) में हो उसको--प्रत्येक को--१५
षष्ट्यंश बल मिलता है ।
(१०) (क) सूर्य, मंगल, बुध, वृहस्पति और शनि--इन पांचों में
जो-जो ग्रह ओज (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु या कुंभ) नवांश में हो
उनको--प्रत्येक को १५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है ।
(ख) चन्द्रमा और शुक्र इन दोनों में जो-जो युग्म (वृष, कर्क,
टिप्पणी—मान लीजिये सूर्य बृहस्पति के द्रेष्काण में है और बृहस्पति सूर्य
का अधिमित्र है तो सूर्य को २२.५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होगा ।
यह “श्रीपति पद्धति” का मत है । “केशवी जातक” की टीका
करते हुए कुछ विद्वानों ने लिखा है कि सूर्य बृहस्पति के द्रेष्काण
में हो और बृहस्पति अपने अधिमित्र वर्ग में हो तो सूर्य को
२२.५ षष्ट्यंश बल मिलेगा । हम श्रीपति पद्धति के विचार से
सहमत हैं । केशवी जातक के टीकाकारों का मत हमें मान्य नहीं ।

७६ फलदीपिका
कन्या, वृश्चिक या मीन) नवांश में हो उसको—प्रत्येक को—१५ षष्ट्यंश
बल प्राप्त होता है।
(११) जो ग्रह केन्द्र राशि में हो उसे १ रूप (=६० षष्ट्यंश) जो
पणफर राशि में हो उसे ३० षष्ट्यंश और जो आपोक्लिम राशि में हो उसे
केवल १५ षष्ट्यंश बल मिलता है।
(१२) (क) सूर्य, मंगल या बृहस्पति यदि किसी राशि के प्रथम
द्रेष्काण में हों तो उनकी (जो हो—प्रत्येक को) १५ षष्ट्यंश बल प्राप्त
होता है। अन्य द्रेष्काण में होने से कुछ नहीं मिलता।
(ख) शनि या बुध—जो भी—किसी राशि के द्वितीय
द्रेष्काण में हो उसे १५ षष्ट्यंश बल मिलता है।
(ग) चन्द्रमा और शुक्र इनमें से जो भी ग्रह किसी राशि के
अन्तिम द्रेष्करण में हो उसे १५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है।
इन १२ प्रकार के बलों का योग स्थान बल कहलाता है। इनके संस्कृत
नाम निम्नलिखित हैं :—(१) उच्च बल, (२)—(८) सप्तवर्गज
बल, (९) ओज युग्म राशि बल, (१०) ओज युग्म नवांश बल, (११)
केन्द्रादिबल, (१२) द्रेष्काण बल।
दिक् बल
दिक् बल कहिये, दिशा* बल कहिये एक ही बात है।
(क) सूर्य और मंगल—इन दोनों में जो भी—दशम भाव
मध्य पर हो उसे १ रूप बल प्राप्त होता है और यदि ये चतुर्थ भाव मध्य पर .
हों तो ० बल प्राप्त होता है। मध्य में अनुपात से निकालिये।
(ख) चन्द्रमा और शुक्र इन दोनों में जो भी चतुर्थ भाव मध्य
पर हो या हों—उसे १ रूप बल प्राप्त होता है और दशम भाव मध्य पर ०।
मध्य में अनुपात से निकालिये।
*प्रथम भाव मध्य को पूर्व, सप्तम भाव मध्य को पश्चिम, चतुर्थ
भाव मध्य को उत्तर और दशम भाव मध्य को दक्षिण कहते हैं।