फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 66, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ६५
वह लग्नेश की अपनी किंवा शुभ ग्रहों के वर्ग में है या नहीं। यदि लग्न
क्रूर अंशों के षड्वर्गों में हो तो जातक अल्पायु, दरिद्र और दुष्ट प्रकृति
का होता है। किन्तु यदि जिन अंशों में लग्न स्पष्ट है उन अंशों के स्वामी
बलवान् हों तो मनुष्य बहुत उच्च पदवी प्राप्त करेगा।
यदि लग्न के नवांश का स्वामी बलवान् हो तो मनुष्य सुखी होगा;
यदि लग्न द्रेष्काण का स्वामी बलवान् हो तो मनुष्य राजा के समान
पदवी प्राप्त करे। और यदि स्वयं लग्नेश बहुत बलवान् हो तो मनुष्य पृथ्वी
(भूमि) का स्वामी और भाग्यवान् हो ॥ ११ ॥
ओजे क्रूरेऽर्कहोरां गतवति बलवान् क्रूरवृत्तिर्धनाढ्यो
युग्मे चान्द्रीं शुभेषु द्युतिविनयवचोहृद्यसौभाग्ययुक्तः ।
व्यस्तं व्यस्तेऽत्र मिश्रे समफलमुदितं लग्नचन्द्रौ बलिष्ठौ
तन्नाथौ द्वौ च तद्वद्यदि भवति चिरंजीव्यदुःखी यशस्वी ॥१२॥
जिनकी जन्मकुण्डली में क्रूर ग्रह मेष, मिथुन, सिंह, तुला, वृश्चिक और
कुम्भ राशि में स्थित होकर सूर्य की होरा में हों (प्रथम पन्द्रह अंश)
वे व्यक्ति क्रूर वृत्ति वाले, बलवान् और धनाढ्य होते हैं। इसके विपरीत
जिनकी जन्मकुण्डलियों में शुभ ग्रह वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर,
और मीन राशियों में स्थित होकर चन्द्र होरा में हों (प्रारंभिक पन्द्रह अंशों
में) वे लोग कान्तियुक्त, विनयी, नम्र वचन बोलने वाले, हृद्य (जिनकी
तरफ हृदय का आकर्षण हो) और सौभाग्यशाली होते हैं। ऊपर जो दो
परिस्थितियां बताई गई हैं ग्रह स्थिति उसके विपरीत हों तो विपरीत
फल होता है। यदि मिली-जुली परिस्थिति हो तो परिणाम भी मिला-
जुला होता है। जिसकी जन्म कुण्डली में लग्न और चन्द्रमा दोनों बलवान्
हों तथा लग्न का स्वामी और चन्द्रमा जिस राशि में हो उसका स्वामी ये
दोनों भी पूर्ण बलवान् हों तो वह व्यक्ति दीर्घायु, सुखी और यशस्वी
होता है।