फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ६७
द्रक्काणेशे स्ववर्गे शुभखगसहिते स्वोच्चमित्रर्क्षगे वा
तद्व त्त्रिंशांशनाथे बलवति यदि चेद् द्वादशांशाधिपे वा ।
होरानाथे तथा चेन्निखिलगुणगणो नित्यशुद्धप्रवीणो
दीर्घायुः स्याद्द्यावान् सुतधनसहितः कीर्तिमान्राजभोगः॥१५॥
यदि लग्न द्रेष्काण का स्वामी अपने उच्च वर्ग में स्ववर्ग में या मित्र
के वर्ग में शुभ ग्रह के साथ हो, यदि लग्न होरा, लग्न त्रिंशांश तथा लग्न
द्वादशांश के स्वामी भी अपने-अपने उच्च वर्गों में स्ववर्गों में या
मित्र वर्गों में हों और शुभ ग्रह सहित हों तो उस व्यक्ति में अनेकानेक गुण
द्रेष्काण को श्लोक १३ में 'गृध्रास्य, कहा है (श्लोक १३ पंक्ति ३-४)
और श्लोक १४ में (पंक्ति १-२) इसी सिंह राशि के प्रथम द्रेष्काण को
चतुष्पाद कहा है। प्रतीत होता है मूल संस्कृत में मुद्रण में कुछ अशुद्धि
हैं
आयुध —शस्त्र, या शस्त्र धारण करने वाला
चतुष्पाद —चौपाया-जानवर
कोलानन —सूअर के मुख वाला
गृध्रास्य —गृध्र के मुख वाला
पाश —जाल-जिसमें किसी को बांध लिया जावे
पक्षी —परिन्दा
सर्प —साँप
निगड़ —बेड़ी में जकड़ा हुआ
जब जन्म के समय उपर्युक्त द्रेष्काण उदित हो तो जातक अधन (धन-
रहित), क्रूर, निन्द्य (निन्दा के योग्य उसके कर्म हों) तथा दरिद्र
होता है ।
सामान्यतः चर, स्थिर, द्वि स्वभाव राशियों में प्रथम, द्वितीय, तृतीय
द्रेष्काणों का फल निम्नलिखित है ।