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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 414, कुल 684 में से

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पृष्ठ 414

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४१३
निकला कि पंचमेश या नवमेश-इन दोनों में से किसी का भी
सम्बन्ध यदि दशमेश से हो तो योगकारक होता है । किन्तु
अन्य लोग बली का अर्थ केवल बलवान् लेते हैं । इस मतानुसार
यदि कोई भी केन्द्रेश बलवान् है और किसी भी त्रिकोणेश से
सम्बन्ध भी करता है तो राज योगकारक हुआ ॥ ४६ ॥
केन्द्रत्रिकोणाधिपयोरेक्ये तौ योगकारकौ ।
अन्यत्रिकोणपतिना संबन्धो यदि किं पुनः ॥४७॥
यदि किसी केन्द्र के स्वामी का दोनों त्रिकोणों में से एक के
स्वामी के साथ ऐक्य हो (दोनों एक साथ हों) तो इस ऐक्य के
कारण यह दोनों (परस्पर सम्बन्ध करने वाले त्रिकोणेश और केन्द्रेश)
योग कारक हो जाते हैं। यदि केन्द्रनाथ एक त्रिकोणाधिपति से
सम्बन्ध करे और साथ ही साथ दूसरे त्रिकोणपति से भी सम्बन्ध कर ले
तो फिर कहना ही क्या है अर्थात् किसी एक केन्द्रनाथ का दोनों
त्रिकोणेश से सम्बन्ध होना बहुत बड़ा राजयोग है।
यहाँ यह भी बतला देना आवश्यक है कि यदि एक ही ग्रह केन्द्र
और कोण का स्वामी हो तो वह स्वयं योगकारक हो जाता है ।
जैसे कर्क और सिंह लग्न वाले के लिये मंगल; मकर और कुंभ वाले के
लिये शुक्र; वृष और तुला लग्न वाले के लिये शनि। ऐसा योगकारक
ग्रह अपनी अन्तर्दशा में भाग्योदय करता है ॥ ४७ ॥
*मूल में शब्द "ऐक्य" है। अर्थात् एक साथ हों किन्तु यदि
चारों प्रकार के सम्बन्ध में से एक भी प्रकार का सम्बन्ध हो तो
हमारे विचार से वह काफ़ी है ।