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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 410, कुल 684 में से

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पृष्ठ 410

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०९
सर्पान्वितः स तु खगः शुभदोऽपि कष्टं
दुःखं दशान्त्यसमये कुरुते विशेषात् ॥३६॥
राहु जैसे ग्रह के साथ बैठता है उसके गुणदोष ग्रहण करके उसी
ग्रह का सा प्रभाव दिखाता है । साथ की कुण्डली में राहु शुक्र के
[कुण्डली: लग्न ४; २ भाव ५; ३ भाव ६; ४ भाव ७ में रा. शु.; ५ भाव ८; ६ भाव ९;] साथ है । इस लिये शुक्र के जो भी गुण
[७ भाव १०; ८ भाव ११; ९ भाव १२; १० भाव १; ११ भाव २; १२ भाव ३] या दोष हैं वह राहु भी करेगा ।
यह श्लोक के प्रथम दो चरणों में
कहा गया है । आगे चलकर
कहते हैं कि जो ग्रह राहु के साथ
बैठता है वह ग्रह चाहे शुभ हो
किन्तु कष्टकारक होता है खास .
कर—अपनी दशा के अन्त के समय
में । उदाहरण कुण्डली में शुक्र राहु
के साथ है इसलिये शुभ होने पर भी शुक्र कष्टकारक होगा ।
कहने का तात्पर्य यह है कि राहु सर्प है यह अपना विष अपने
साथ में रहने वाले ग्रह को दे देता है ॥ ३९ ॥
द्वावर्थकामाविह मारकाख्यौ
तदीश्वरस्तत्र गतो बलाढ्यः ।
हन्ति स्वपाके निधनेश्वरो वा
व्ययेश्वरो वाऽप्यतिदुर्बलश्चेत् ॥४०॥
द्वितीय और सप्तम भाव को मारक स्थान कहते हैं । यदि इनके
स्वामी या अन्य ग्रह बलवान् होकर इन स्थानों में पड़े हुए हों तो
वह अपनी दशा में मृत्यु करते हैं । यदि अष्टमेश या व्ययेश भी अति
दुर्बल हों तो उसकी भी दशा में मृत्यु हो सकती है ॥ ४० ॥