फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 402, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०१
दिखाते हैं । अमोघ कहते हैं ऐसे कष्ट को जो निश्चय ही होता है और
जिससे छुटकारा पाना सम्भव न हो ॥ २७ ॥
अब तक महादशा, अन्तर्दशा का फल बता रहे थे । अब बीच
में अन्तर्दशा का फल बताने वाला एक श्लोक कहते हैं ।
दशेशशत्रोररिगेहभाजो
लग्नेशशत्रोरपि वाऽथ भुक्तौ ।
शत्रोर्भयं स्थानलयः तदास्य
स्निग्धोपि शत्रुत्वमुपैति नूनम् ॥२८॥
यदि ऐसे ग्रह की अन्तर्दशा हो जो ( १ ) जिस ग्रह की महादशा चल
रही है उसका शत्रु हो । ( २ ) या शत्रु-राशि में हो ( ३ ) या छठे
हो ( ४ ) या लग्नेश का शत्रु हो, तो ऐसी अन्तर्दशा में शत्रु का भय हो,
स्थान भय हो । ( नौकरी या मकान छूटे । ) यह अन्तर्दशा बहुत
कष्टकारक बीतती है और जातक के मित्र भी शत्रु हो जाते
हैं।* ॥ २८ ॥
यद्भावगः पाकपतिर्दशेशात्-
तद्भावजातानि फलानि कुर्यात् ।
विपक्षरिफाष्टमभावगश्चेद्-
दुःखं विदध्यादितरत्र सौख्यम् ॥२९॥
*मूल श्लोक में शब्द आया है 'अरिगेहभाजो' जिसको दो अर्थ हो
सकते हैं । ( १ ) शत्रु के घर में हो ( २ ) शत्रु का विचार छठे घर
से किया जाता है इसलिये लग्न से छठे घर में हो । ऊपर श्लोक
का भावार्थ समझाते हुए यह दोनों अर्थ दे दिये गये गये हैं ।
यह भी विचार कर लेना चाहिये कि अन्तर्दशा नाथ महादशा
स्वामी की शत्रु-राशि में तो नहीं है ।